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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1933)

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एकसप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना

वैशम्पायन उवाच

तान् समीपगतान् श्रुत्वा पाण्डवान् शत्रुकर्शनः ।
वासुदेवः सहामात्यः प्रययौ ससुहृद्गणः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डवोंके समीप आनेका समाचार सुनकर शत्रुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण अपने मित्रों और मन्त्रियोंके साथ उनसे मिलनेके लिये चले ॥ १ ॥

ते समेत्य यथान्यायं प्रत्युद्याता दिदृक्षया ।
ते समेत्य यथाधर्मं पाण्डवा वृष्णिभिः सह ॥ २ ॥
विविशुः सहिता राजन् पुरं वारणसाह्वयम् ।
उन सब लोगोंने पाण्डवोंसे मिलनेके लिये आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और सब यथायोग्य एक-दूसरेसे मिले। राजन्! धर्मानुसार पाण्डव वृष्णियोंसे मिलकर सब एक साथ हो हस्तिनापुरमें प्रविष्ट हुए ॥ २ १/२ ॥

महत्तस्तस्य सैन्यस्य खुरनेमिस्वनेन ह ॥ ३ ॥
द्यावापृथिव्योः खं चैव सर्वमासीत् समावृतम् ।
उस विशाल सेनाके घोड़ोंकी टापों और रथके पहियोंकी घरघराहटके तुमुल घोषसे पृथ्वी और स्वर्गके बीचका सारा आकाश व्याप्त हो गया था ॥ ३ १/२ ॥

ते कोशानग्रतः कृत्वा विविशुः स्वपुरं तदा ॥ ४ ॥
पाण्डवाः प्रीतमनसः सामात्याः ससुहृद्गणाः ।
वे खजानेको आगे करके अपनी राजधानीमें घुसे। उस समय मन्त्रियों एवं सुहृदोंसहित समस्त पाण्डवोंका मन प्रसन्न था ॥ ४ १/२ ॥

ते समेत्य यथान्यायं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ५ ॥
कीर्तयन्तः स्वनामानि तस्य पादौ ववन्दिरे ।
वे यथायोग्य सबसे मिलकर राजा धृतराष्ट्रके पास गये। अपना-अपना नाम बताते हुए उनके चरणोंमें प्रणाम करने लगे ॥ ५ १/२ ॥

धृतराष्ट्रादनु च ते गान्धारीं सुबलात्मजाम् ॥ ६ ॥

कुन्तीं च राजशार्दूल तदा भरतसत्तम ।
नृपश्रेष्ठ! भरतभूषण! धृतराष्ट्रसे मिलनेके बाद वे सुबलपुत्री गान्धारी और कुन्तीसे मिले ॥ ६½ ॥
विदुरं पूजयित्वा च वैश्यापुत्रं समेत्य च ॥ ७ ॥
पूज्यमानाः स्म ते वीरा व्यरोचन्त विशाम्पते ।
प्रजानाथ! फिर विदुरका सम्मान करके वैश्यापुत्र युयुत्सुसे मिलकर उन सबके द्वारा सम्मानित होते हुए वीर पाण्डव बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७½ ॥
ततस्तत् परमाश्चर्यं विचित्रं महदद्भुतम् ॥ ८ ॥
शुश्रुवुस्ते तदा वीराः पितुस्ते जन्म भारत ।
भरतनन्दन! तत्पश्चात् उन वीरोंने तुम्हारे पिताके जन्मका वह आश्चर्यपूर्ण विचित्र, महान् एवं अद्भुत वृत्तान्त सुना ॥ ८½ ॥
तदुपश्रुत्य तत् कर्म वासुदेवस्य धीमतः ॥ ९ ॥
पूजार्हं पूजयामासुः कृष्णं देवकिनन्दनम् ।
परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णका वह अलौकिक कर्म सुनकर पाण्डवोंने उन पूजनीय देवकीनन्दन श्रीकृष्णका पूजन किया अर्थात् उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ९½ ॥
ततः कतिपयाहस्य व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १० ॥
आजगाम महातेजा नगरं नागसाह्वयम् ।
तस्य सर्वे यथान्यायं पूजांचक्रुः कुरूद्वहाः ॥ ११ ॥
इसके थोड़े दिनों बाद महातेजस्वी सत्यवतीनन्दन व्यासजी हस्तिनापुरमें पधारे। कुरुकुलतिलक समस्त पाण्डवोंने उनका यथोचित पूजन किया ॥ १०-११ ॥
सह वृष्ण्यन्धकव्याघ्रैरुपासांचक्रिरे तदा ।
तत्र नानाविधाकाराः कथाः समभिकीर्त्य वै ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरो धर्मसुतो व्यासं वचनमब्रवीत् ।
फिर वृष्णि एवं अन्धकवंशी वीरोंके साथ वे उनकी सेवामें बैठ गये। वहाँ नाना प्रकारकी बातें करके धर्मपुत्र युधिष्ठिरने व्यासजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १२½ ॥
भवत्प्रसादाद् भगवन् यदिदं रत्नमाहृतम् ॥ १३ ॥
उपयोक्तुं तदिच्छामि वाजिमेधे महाक्रतौ ।
'भगवन्! आपकी कृपासे जो वह रत्न लाया गया है, उसका अश्वमेध नामक महायज्ञमें मैं उपयोग करना चाहता हूँ ॥ १३½ ॥
तमनुज्ञातुमिच्छामि भवता मुनिसत्तम ।
त्वदधीना वयं सर्वे कृष्णस्य च महात्मनः ॥ १४ ॥

'मुनिश्रेष्ठ! मैं चाहता हूँ कि इसके लिये आपकी आज्ञा प्राप्त हो जाय, क्योंकि हम सब लोग आप और महात्मा श्रीकृष्णके अधीन हैं' ।। १४ ।।

व्यास उवाच

अनुजानामि राजंस्त्वां क्रियतां यदनन्तरम् ।
यजस्व वाजिमेधेन विधिवत् दक्षिणावता ।। १५ ।।
**व्यासजीने कहा—**राजन्! मैं तुम्हें यज्ञके लिये आज्ञा देता हूँ। अब इसके बाद जो भी आवश्यक कार्य हो, उसे आरम्भ करो। विधिपूर्वक दक्षिणा देते हुए अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करो ।। १५ ।।

अश्वमेधो हि राजेन्द्र पावनः सर्वपाप्मनाम् ।
तेनेष्ट्वा त्वं विपाप्मा वै भविता नात्र संशयः ।। १६ ।।
राजेन्द्र! अश्वमेधयज्ञ समस्त पापोंका नाश करके यजमानको पवित्र बनानेवाला है। उसका अनुष्ठान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है ।। १६ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तु धर्मात्मा कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
अश्वमेधस्य कौरव्य चकाराहरणे मतिम् ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कुरुनन्दन! व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा कुरुराज युधिष्ठिरने अश्वमेधयज्ञ आरम्भ करनेका विचार किया ।। १७ ।।

समनुज्ञाप्य तत् सर्वं कृष्णद्वैपायनं नृपः ।
वासुदेवमथाभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ।। १८ ।।
श्रीकृष्णद्वैपायन व्याससे सब बातोंके लिये आज्ञा ले प्रवचनकुशल राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर इस प्रकार बोले— ।। १८ ।।

देवकी सुप्रजा देवी त्वया पुरुषसत्तम ।
यद् ब्रूयां त्वां महाबाहो तत् कृथास्त्वमिहाच्युत ।। १९ ।।
'पुरुषोत्तम! महाबाहु अच्युत! आपको ही पाकर देवकीदेवी उत्तम संतानवाली मानी गयी हैं। मैं आपसे जो कुछ कहूँ, उसे आप यहाँ सम्पन्न करें ।। १९ ।।

त्वत्प्रभावार्जितान् भोगानश्नीम यदुनन्दन ।
पराक्रमेण बुद्ध्या च त्वयेयं निर्जिता मही ।। २० ।।
'यदुनन्दन! हम आपके ही प्रभावसे प्राप्त हुई इस पृथ्वीका उपभोग कर रहे हैं। आपने ही अपने पराक्रम और बुद्धिबलसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीको जीता है ।। २० ।।

दीक्षयस्व त्वमात्मानं त्वं हि नः परमो गुरुः ।
त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम् ।। २१ ।।

‘दशार्हनन्दन! आप ही इस यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करें; क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। आपके यज्ञानुष्ठान पूर्ण कर लेनेपर निश्चय ही हमारे सब पाप नष्ट हो जायँगे ॥ २१ ॥
त्वं हि यज्ञोऽक्षरः सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापतिः ।
त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥ २२ ॥
‘आप ही यज्ञ, अक्षर, सर्वस्वरूप, धर्म, प्रजापति एवं सम्पूर्ण भूतोंकी गति हैं—यह मेरी निश्चित धारणा है’ ॥ २२ ॥

वासुदेव उवाच
त्वमेवैतन्महाबाहो वक्तुमर्हस्यरिंदम ।
त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥ २३ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**महाबाहो! शत्रुदमन नरेश! आप ही ऐसी बात कह सकते हैं। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके अवलम्ब हैं ॥ २३ ॥
त्वं चाद्य कुरुवीराणां धर्मेण हि विराजसे ।
गुणीभूताः स्म ते राजंस्त्वं नो राजा गुरुर्मतः ॥ २४ ॥
राजन्! समस्त कौरववीरोंमें एकमात्र आप ही धर्मसे सुशोभित होते हैं। हमलोग आपके अनुयायी हैं और आपको अपना राजा एवं गुरु मानते हैं ॥ २४ ॥
यजस्व मदनुज्ञातः प्राप्य एष क्रतुस्त्वया ।
युनक्तु नो भवान् कार्ये यत्र वाञ्छसि भारत ॥ २५ ॥
इसलिये भारत! आप हमारी अनुमतिसे स्वयं ही इस यज्ञका अनुष्ठान कीजिये तथा हमलोगोंमेंसे जिसको जिस कामपर लगाना चाहते हों, उसे उस कामपर लगनेकी आज्ञा दीजिये ॥ २५ ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वं कर्तास्मि तेऽनघ ।
भीमसेनार्जुनौ चैव तथा माद्रवतीसुतौ ।
इष्टवन्तो भविष्यन्ति त्वयीष्टवति पार्थिवे ॥ २६ ॥
निष्पाप नरेश! मैं आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप जो कुछ कहेंगे, वह सब करूँगा। आप राजा हैं, आपके द्वारा यज्ञ होनेपर भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवको भी यज्ञानुष्ठानका फल मिल जायगा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि
कृष्णव्यासानुज्ञायामेकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्ण और व्यासकी युधिष्ठिरको यज्ञ करनेके लिये आज्ञाविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥