Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

अध्याय (पृष्ठ 1885)

Page 1885Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्टितमोऽध्यायः

वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना

वसुदेव उवाच

श्रुतवानस्मि वार्ष्णेय संग्रामं परमाद्भुतम् ।
नराणां वदतां तत्र कथं वा तेषु नित्यशः ॥ १ ॥
**वसुदेवजीने पूछा—**वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीतके प्रसंगमें लोगोंके मुँहसे सुनता आ रहा हूँ कि महाभारत-युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिये पूछता हूँ कि कौरवों और पाण्डवोंमें किस तरह युद्ध हुआ? ॥ १ ॥

त्वं तु प्रत्यक्षदर्शी च रूपज्ञश्च महाभुज ।
तस्मात् प्रब्रूहि संग्रामं याथातथ्येन मेऽनघ ॥ २ ॥
महाबाहो! तुम तो उस युद्धके प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूपको भी भलीभाँति जानते हो; अतः अनघ! मुझसे उस युद्धका यथार्थ वर्णन करो ॥ २ ॥

यथा तदभवद् युद्धं पाण्डवानां महात्मनाम् ।
भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम् ॥ ३ ॥
महात्मा पाण्डवोंका भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और शल्य आदिके साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस तरह हुआ? ॥ ३ ॥

अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकशः ।
नानावेषाकृतिमतां नानादेशनिवासिनाम् ॥ ४ ॥
दूसरे-दूसरे देशोंमें निवास करनेवाले, भाँति-भाँतिकी वेशभूषा और आकृतिवाले जो अस्त्र-विद्यामें निपुण बहुसंख्यक क्षत्रिय वीर थे, उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया था? ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षः पित्रा मातुस्तदन्तिके ।
शशंस कुरुवीराणां संग्रामे निधनं यथा ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**माताके निकट पिताके इस प्रकार पूछनेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौरव वीरोंके संग्राममें मारे जानेका वह प्रसंग यथावत् रूपसे सुनाने लगे ॥ ५ ॥

वासुदेव उवाच

अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।

Page 1886Permalink

बहुलत्वान्न संख्यातुं शक्यान्यब्दशतैरपि ॥ ६ ॥
श्रीकृष्णने कहा— पिताजी! महाभारत-युद्धमें काममें आनेवाले मनस्वी क्षत्रिय वीरोंके कर्म बड़े अद्भुत हैं। वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तारके साथ उनका वर्णन किया जाय तो सौ वर्षोंमें भी उनकी समाप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥
प्राधान्यतस्तु गदतः समासेनैव मे शृणु ।
कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरद्युते ॥ ७ ॥
अतः देवताओंके समान तेजस्वी तात! मैं मुख्य-मुख्य घटनाओंको ही संक्षेपसे सुना रहा हूँ, आप उन भूपतियोंके कर्म यथावत् रूपसे सुनिये ॥ ७ ॥
भीष्मः सेनापतिर्भूदेकादशचमूपतिः ।
कौरव्यः कौरवेन्द्राणां देवानाामिव वासवः ॥ ८ ॥
जैसे इन्द्र देवताओंकी सेनाके स्वामी हैं, उसी प्रकार कुरुकुलतिलक भीष्म भी श्रेष्ठ कौरववीरोंके सेनापति बनाये गये थे। वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके संरक्षक थे ॥ ८ ॥
शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपतिः ।
बभूव रक्षितो धीमान् श्रीमता सव्यसाचिना ॥ ९ ॥
पाण्डवोंके सेनानायक शिखण्डी थे, जो सात अक्षौहिणी सेनाओंका संचालन करते थे। बुद्धिमान् शिखण्डी श्रीमान् सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सुरक्षित थे ॥ ९ ॥
तेषां तदभवद् युद्धं दशाहानि महात्मनाम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च सुमहल्लोमहर्षणम् ॥ १० ॥
उन महामनस्वी कौरवों और पाण्डवोंमें दस दिनोंतक महान् रोमांचकारी युद्ध हुआ ॥ १० ॥
ततः शिखण्डी गाङ्गेयं युध्यमानं महाहवे ।
जघान बहुभिर्बाणैः सह गाण्डीवधन्वना ॥ ११ ॥
फिर दसवें दिन शिखण्डीने महासमरमें जूझते हुए गंगानन्दन भीष्मको गाण्डीवधारी अर्जुनकी सहायतासे बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बहुत घायल कर दिया ॥ ११ ॥
अकरोत् स ततः कालं शरतल्पगतो मुनिः ।
अयनं दक्षिणं हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् भीष्मजी बाणशय्यापर पड़ गये। जबतक दक्षिणायन रहा है, वे मुनिव्रतका पालन करते हुए शरशय्यापर सोते रहे हैं। दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायणके आनेपर ही उन्होंने मृत्यु स्वीकार की है ॥ १२ ॥
ततः सेनापतिर्भूद् द्रोणोऽस्त्रविदुषां वरः ।
प्रवीरः कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव ॥ १३ ॥
तदनन्तर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कौरवपक्षके सेनापति बनाये गये। वे कौरवराजकी सेनाके प्रमुख वीर थे, मानो दैत्यराज बलिकी सेनाके प्रधान संरक्षक

Page 1887Permalink

शुक्राचार्य हों ॥ १३ ॥
अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्नवभिर्द्विजसत्तमः ।
संवृतः समरश्लाघी गुप्तः कृपवृषादिभिः ॥ १४ ॥
उस समय मरनेसे बची हुई नौ अक्षौहिणी सेना उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी थी। वे स्वयं तो युद्धका हौसला रखते ही थे, कृपाचार्य और कर्ण भी सदा उनकी रक्षा करते रहते थे ॥ १४ ॥
धृष्टद्युम्नस्त्वभून्नेता पाण्डवानां महास्त्रवित् ।
गुप्तो भीमेन मेधावी मित्रेण वरुणो यथा ॥ १५ ॥
इधर महान् अस्त्रवेत्ता धृष्टद्युम्न पाण्डवसेनाके अधिनायक हुए। जैसे मित्र वरुणकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन मेधावी धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे ॥ १५ ॥
स च सेनापरिवृतो द्रोणप्रेप्सुर्महामनाः ।
पितुर्निकारान् संस्मृत्य रणे कर्माकरोन्महत् ॥ १६ ॥
पाण्डवसेनासे घिरे हुए महामनस्वी वीर धृष्टद्युम्नने द्रोणके द्वारा अपने पिताके अपमानका स्मरण करके उन्हें मार डालनेके लिये युद्धमें बड़ा भारी पराक्रम दिखाया ॥ १६ ॥
तस्मिंस्ते पृथिवीपाला द्रोणपार्षतसंगरे ।
नानादिगागता वीराः प्रायशो निधनं गताः ॥ १७ ॥
धृष्टद्युम्न और द्रोणके उस भीषण संग्राममें नाना दिशाओंसे आये हुए भूपाल अधिक संख्यामें मारे गये ॥ १७ ॥
दिनानि पञ्च तद् युद्धमभूत् परमदारुणम् ।
ततो द्रोणः परिश्रान्तो धृष्टद्युम्नवशं गतः ॥ १८ ॥
उन दोनोंका वह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। अन्तमें द्रोणाचार्य बहुत थक गये और धृष्टद्युम्नके वशमें पड़कर मारे गये ॥ १८ ॥
ततः सेनापतिरभूत् कर्णो दौर्योधने बले ।
अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्वृतः पञ्चभिराहवे ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् दुर्योधनकी सेनामें कर्णको सेनापति बनाया गया, जो मरनेसे बची हुए पाँच अक्षौहिणी सेनाओंसे घिरकर युद्धके मैदानमें खड़ा था ॥ १९ ॥
तिस्रस्तु पाण्डुपुत्राणां चम्वो बीभत्सुपालिताः ।
हतप्रवीरभूयिष्ठा बभूवुः समवस्थिताः ॥ २० ॥
उस समय पाण्डवोंके पास तीन अक्षौहिणी सेनाएँ शेष थीं, जिनकी रक्षा अर्जुन कर रहे थे। उनमें बहुत-से प्रमुख वीर मारे गये थे; फिर भी वे युद्धके लिये डटी हुई थीं ॥ २० ॥
ततः पार्थं समासाद्य पतङ्ग इव पावकम् ।
पञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्वितीयेऽहनि दारुणः ॥ २१ ॥

Page 1888Permalink

कर्ण दो दिनतक युद्ध करता रहा। वह बड़े क्रूर स्वभावका था। जैसे पतंग जलती आगमें कूदकर जल मरता है, उसी प्रकार वह दूसरे दिनके युद्धमें अर्जुनसे भिड़कर मारा गया ।। २१ ।।

हते कर्णे तु कौरव्या निरुत्साहा हतौजसः ।
अक्षौहिणीभिस्तिसृभिर्मद्रेशं पर्यवारयन् ।। २२ ।।
कर्णके मारे जानेपर कौरव हतोत्साह होकर अपनी शक्ति खो बैठे और मद्रराज शल्यको सेनापति बनाकर उन्हें तीन अक्षौहिणी सेनाओंसे सुरक्षित रखकर उन्होंने युद्ध आरम्भ किया ।। २२ ।।

हतवाहनभूयिष्ठाः पाण्डवाऽपि युधिष्ठिरम् ।
अक्षौहिण्या निरुत्साहाः शिष्ट्या पर्यवारयन् ।। २३ ।।
पाण्डवोंके भी बहुत-से वाहन नष्ट हो गये थे। उनमें भी अब युद्धविषयक उत्साह नहीं रह गया था तो भी वे शेष बची हुई एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए युधिष्ठिरको आगे करके शल्यका सामना करनेके लिये बढ़े ।। २३ ।।

अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
तस्मिंस्तदार्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।। २४ ।।
कुरुराज युधिष्ठिरने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके दोपहर होते-होते मद्रराज शल्यको मार गिराया ।। २४ ।।

हते शल्ये तु शकुनिं सहदेवो महामनाः ।
आहर्तारं कलेस्तस्य जघानामितविक्रमः ।। २५ ।।
शल्यके मारे जानेपर अमित पराक्रमी महामना सहदेवने कलहकी नींव डालनेवाले शकुनिको मार दिया ।। २५ ।।

निहते शकुनौ राजा धार्तराष्ट्रः सुदुर्मनाः ।
अपाक्रामद् गदापाणिर्हतभूयिष्ठसैनिकः ।। २६ ।।
शकुनिकी मृत्यु हो जानेपर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। उसके बहुत-से सैनिक युद्धमें मार डाले गये थे। इसलिये वह अकेला ही हाथमें गदा लेकर रणभूमिसे भाग निकला ।। २६ ।।

तमन्वधावत् संक्रुद्धो भीमसेनः प्रतापवान् ।
ह्रदे द्वैपायने चापि सलिलस्थं ददर्श तम् ।। २७ ।।
इधरसे अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने उसका पीछा किया और द्वैपायन नामक सरोवरमें पानीके भीतर छिपे हुए दुर्योधनका पता लगा लिया ।। २७ ।।

हतशिष्टेन सैन्येन समन्तात् परिवार्य तम् ।
अथोपाविविशुर्हृष्टा ह्रदस्थं पञ्च पाण्डवाः ।। २८ ।।

Page 1889Permalink

तदनन्तर हर्षमें भरे हुए पाँचों पाण्डव मरनेसे बची हुई सेनाके द्वारा उसपर चारों ओरसे घेरा डालकर तालाबमें बैठे हुए दुर्योधनके पास जा पहुँचे ॥ २८ ॥
विगाह्य सलिलं त्वाशु वाग्बाणैर्भृशविक्षतः ।
उत्थाय स गदापाणिर्युद्धाय समुपस्थितः ॥ २९ ॥
उस समय भीमसेनके वाग्बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर दुर्योधन तुरंत पानीसे बाहर निकला और हाथमें गदा ले युद्धके लिये उद्यत हो पाण्डवोंके पास आ गया ॥ २९ ॥
ततः स निहतो राजा धार्तराष्ट्रो महारणे ।
भीमसेनेन विक्रम्य पश्यतां पृथिवीक्षिताम् ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् उस महासमरमें सब राजाओंके देखते-देखते भीमसेनने पराक्रम करके धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनको मार डाला ॥ ३० ॥
ततस्तत् पाण्डवं सैन्यं प्रसुप्तं शिबिरे निशि ।
निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता ॥ ३१ ॥
इसके बाद रातके समय जब पाण्डवोंकी सेना अपनी छावनीमें निश्चिन्त सो रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आक्रमण किया और सबको मार गिराया ॥ ३१ ॥
हतपुत्रा हतबला हतमित्रा मया सह ।
युयुधानसहायेन पञ्च शिष्टास्तु पाण्डवाः ॥ ३२ ॥
उस समय पाण्डवोंके पुत्र, मित्र और सैनिक सब मारे गये। केवल मेरे और सात्यकिके साथ पाँचों पाण्डव शेष रह गये हैं ॥ ३२ ॥
सहैव कृपभोजाभ्यां द्रौणिर्युद्धाद्वमुच्यत ।
युयुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्तःपाण्डवसंश्रयात् ॥ ३३ ॥
कौरवोंके पक्षमें कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा युद्धसे जीवित बचा है। कुरुवंशी युयुत्सु भी पाण्डवोंका आश्रय लेनेके कारण बच गये हैं ॥ ३३ ॥
निहते कौरवेन्द्रे तु सानुबन्धे सुयोधने ।
विदुरः संजयश्चैव धर्मराजमुपस्थितौ ॥ ३४ ॥
बन्धु-बान्धवोंसहित कौरवराज दुर्योधनके मारे जानेपर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिरके आश्रयमें आ गये हैं ॥ ३४ ॥
एवं तदभवद् युद्धमहान्यष्टादश प्रभो ।
यत्र ते पृथिवीपाला निहताः स्वर्गमावसन् ॥ ३५ ॥
प्रभो! इस प्रकार अठारह दिनोंतक वह युद्ध हुआ है। उसमें जो राजा मारे गये हैं, वे स्वर्गलोकमें जा बसे हैं ॥ ३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

Page 1890Permalink

शृण्वतां तु महाराज कथां तां लोमहर्षणाम् ।
दुःखशोकपरिक्लेशा वृष्णीनामभवंस्तदा ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! रोंगटे खड़े कर देनेवाली उस युद्ध-वार्ताको सुनकर वृष्णिवंशी लोग दुःख-शोकसे व्याकुल हो गये ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेववाक्ये षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णद्वारा युद्धवृत्तान्तका कथनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥