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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1883)

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कृत्वा नसुकरं कर्म दानवेष्विव वासवः ।
जैसे इन्द्र दानवोंपर महान् पराक्रम प्रकट करके आये हों, उसी प्रकार दुष्कर कर्म करके दीर्घकालके प्रवाससे प्रसन्नचित्त होकर लौटे हुए भगवान् श्रीकृष्णने अपने भवनमें प्रवेश किया ।। १७ १/२ ।।


भगवान् श्रीकृष्ण अपने पिता-माता आदिको महाभारतका वृत्तान्त सुना रहे हैं

उपायान्तं तु वार्ष्णेयं भोजवृष्ण्यन्धकास्तथा ।। १८ ।।
अभ्यगच्छन् महात्मानं देवा इव शतक्रतुम् ।
जैसे देवता देवराज इन्द्रकी अगवानी करते हैं, उसी प्रकार भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके यादवोंने अपने निकट आते हुए महात्मा श्रीकृष्णका आगे बढ़कर स्वागत किया ।। १८ १/२ ।।
स तानभ्यर्च्य मेधावी पृष्ट्वा च कुशलं तदा ।
अभ्यवादयत प्रीतः पितरं मातरं तदा ।। १९ ।।

मेधावी श्रीकृष्णने उन सबका आदर करके उनका कुशल-समाचार पूछा और प्रसन्नतापूर्वक अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ १९ ॥
ताभ्यां स सम्परिष्वक्तः सान्त्वितश्च महाभुजः।
उपोपविष्टैः सर्वैस्तैर्वृष्णिभिः परिवारितः ॥ २० ॥
उन दोनोंने उन महाबाहु श्रीकृष्णको अपनी छातीसे लगा लिया और मीठे वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना दी। इसके बाद सभी वृष्णिवंशी उनको घेरकर आस-पास बैठ गये ॥ २१ ॥
स विश्रान्तो महातेजाः कृतपादावनेजनः।
कथयामास तत्सर्वं पृष्टः पित्रा महाहवम् ॥ २१ ॥
महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब हाथ-पैर धोकर विश्राम कर चुके, तब पिताके पूछनेपर उन्होंने उस महायुद्धकी सारी घटना कह सुनायी ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णस्य द्वारकाप्रवेशे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाप्रवेशविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/३ श्लोक हैं)