महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1631)
द्वादशोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश
वासुदेव उवाच
द्विविधो जायते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा ।
परस्परं तयोर्जन्म निर्द्वन्द्वं नोपपद्यते ॥ १ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**कुन्तीनन्दन! दो प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं—एक शारीरिक दूसरा मानसिक। इन दोनोंका जन्म एक-दूसरेके सहयोगसे होता है। दोनोंके पारस्परिक सहयोगके बिना इनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है ॥ १ ॥
शरीरे जायते व्याधिः शारीरः स निगद्यते ।
मानसे जायते व्याधिर्मानसस्तु निगद्यते ॥ २ ॥
शरीरमें जो रोग उत्पन्न होता है, उसे शारीरिक रोग कहते हैं और मनमें जो व्याधि होती है, वह मानसिक रोग कहलाती है ॥ २ ॥
शीतोष्णे चैव वायुश्च गुणा राजन् शरीरजाः ।
तेषां गुणानां साम्यं चेत् तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ॥ ३ ॥
राजन्! शीत, उष्ण और वायु—ये तीन शरीरके गुण हैं। यदि शरीरमें इन तीनों गुणोंकी समानता हो तो यह स्वस्थ पुरुषका लक्षण है ॥ ३ ॥
उष्णेन बाध्यते शीतं शीतेनोष्णं च बाध्यते ।
सत्त्वं रजस्तमश्चेति त्रय आत्मगुणाः स्मृताः ॥ ४ ॥
उष्ण शीतका निवारण करता और शीत उष्णका निवारण करता है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन अन्तःकरणके गुण माने गये हैं ॥ ४ ॥
तेषां गुणानां साम्यं चेत् तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ।
तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिश्यते ॥ ५ ॥
इन गुणोंकी समानता हो तो यह मानसिक स्वास्थ्यका लक्षण है। इनमेंसे किसी एककी वृद्धि होनेपर उसके निवारणका उपाय बताया जाता है ॥ ५ ॥
हर्षेण बाध्यते शोको हर्षः शोकेन बाध्यते ।
कश्चिद् दुःखे वर्तमानः सुखस्य स्मर्तुमिच्छति ।
कश्चित् सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति ॥ ६ ॥
हर्षसे शोक बाधित होता है और शोकसे हर्ष। कोई दुःखमें पड़कर सुखकी याद करना चाहता है और कोई सुखी होकर दुःखकी याद करना चाहता है ॥ ६ ॥
स त्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी सुसुखस्य च ।
स्मर्तुमिच्छसि कौन्तेय किमन्यद् दुःखविभ्रमात् ॥ ७ ॥
कुन्तीनन्दन ! आप न तो दुखी होकर दुःखकी और न सुखी होकर उत्तम सुखकी याद करना चाहते हैं। यह दुःखविभ्रमके सिवा और क्या है ॥ ७ ॥
अथवा ते स्वभावोऽयं येन पार्थावकृष्यसे ।
दृष्ट्वा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम् ।
मिषतां पाण्डवेयानां न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ८ ॥
अथवा पार्थ! आपका यह स्वभाव ही है, जिससे आप आकृष्ट होते हैं। पाण्डवोंके देखते-देखते एकवस्त्रधारिणी रजस्वला कृष्णा सभामें घसीट लायी गयी। आप उसे उस अवस्थामें देखकर भी अब उसकी याद करना नहीं चाहते ॥ ८ ॥
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च विवासनम् ।
महारण्यनिवासश्च न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥
आपलोगोंको नगरसे निकाला गया, मृगछाला पहनाकर वनवास दिया गया और बड़े-बड़े घोर जंगलोंमें रहना पड़ा। इन सब बातोंको आप कभी याद करना नहीं चाहते हैं ॥ ९ ॥
जटासुरात् परिक्लेशश्चित्रसेनेन चाहवः ।
सैन्धवाच्च परिक्लेशो न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ १० ॥
जटासुरसे जो क्लेश उठाना पड़ा, चित्रसेनके साथ जूझना पड़ा और सिन्धुराज जयद्रथसे जो अपमान और कष्ट प्राप्त हुआ, उसका स्मरण करनेकी इच्छा आपको नहीं होती है ॥ १० ॥
पुनरज्ञातचर्यायां कीचकेन पदा वधः ।
याज्ञसेन्यास्तथा पार्थ न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ११ ॥
पार्थ! अज्ञातवासके दिनों कीचकने जो द्रौपदीको लात मारी थी, उसे भी आप नहीं याद करना चाहते हैं ॥
यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम ।
मनसैकेन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम् ॥ १२ ॥
शत्रुदमन! द्रोणाचार्य और भीष्मके साथ जो युद्ध हुआ था, वही युद्ध आपके सामने उपस्थित है। इस समय आपको अकेले अपने मनके साथ युद्ध करना होगा ॥
तस्मादभ्युपगन्तव्यं युद्धाय भरतर्षभ ।
परमव्यक्तरूपस्य पारं युक्त्या स्वकर्मभिः ॥ १३ ॥
भरतभूषण! अतः उस युद्धके लिये आपको तैयार हो जाना चाहिये। अपने कर्तव्यका पालन करते हुए योगके द्वारा मनको वशीभूत करके आप मायासे परे परब्रह्मको प्राप्त कीजिये ॥ १३ ॥
यत्र नैव शरैः कार्यं न भृत्यैर्न च बन्धुभिः ।
आत्मनैकेन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम् ॥ १४ ॥
मनके साथ होनेवाले इस युद्धमें न तो बाणोंका काम है और न सेवकों तथा बन्धु-बान्धवोंका ही। इस समय इसमें आपको अकेले ही युद्ध करना है और वह युद्ध सामने उपस्थित है ॥ १४ ॥
तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे कामवस्थां गमिष्यसि ।
एतज्ज्ञात्वा तु कौन्तेय कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ १५ ॥
यदि इस युद्धमें आप मनको न जीत सके तो पता नहीं आपकी क्या दशा होगी। कुन्तीनन्दन! इस बातको अच्छी तरह समझ लेनेपर आप कृतकृत्य हो जायेंगे ॥ १५ ॥
एतां बुद्धिं विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम् ।
पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम् ॥ १६ ॥
समस्त प्राणियोंका यों ही आवागमन होता रहता है। बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके आप अपने बाप-दादोंके बर्तावका पालन करते हुए उचित रीतिसे राज्यका शासन कीजिये ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥