महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1595)
सप्तमोऽध्यायः
संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना
संवर्त उवाच
कथमस्मि त्वया ज्ञातः केन वा कथितोऽस्मि ते ।
एतदाचक्ष्व मे तत्त्वमिच्छसे चेन्मम प्रियम् ॥ १ ॥
संवर्त बोले— राजन्! तुमने मुझे कैसे पहचाना? किसने तुम्हें मेरा परिचय दिया है? यदि मेरा प्रिय चाहते हो तो यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ ॥ १ ॥
सत्यं ते ब्रुवतः सर्वे सम्पत्स्यन्ते मनोरथाः ।
मिथ्या च ब्रुवतो मूर्धा शतधा ते स्फुटिष्यति ॥ २ ॥
यदि सच-सच बता दोगे तो तुम्हारे सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ॥ २ ॥
मरुत्त उवाच
नारदेन भवान् मह्यमाख्यातो ह्यटता पथि ।
गुरुपुत्रो ममेति त्वं ततो मे प्रीतिरुत्तमा ॥ ३ ॥
मरुत्तने कहा— मुने! भ्रमणशील नारदजीने रास्तेमें मुझे आपका परिचय दिया और पता बताया। आप मेरे गुरु अंगिराके पुत्र हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ३ ॥
संवर्त उवाच
सत्यमेतद् भवानाह स मां जानाति सत्रिणम् ।
कथयस्व तदेतन्मे क्व नु सम्प्रति नारदः ॥ ४ ॥
संवर्त बोले— राजन्! तुम ठीक कहते हो, नारदको यह मालूम है कि मैं यज्ञ कराना जानता हूँ और गुप्त वेषमें घूम रहा हूँ। अच्छा यह तो बताओ, इस समय नारद कहाँ हैं? ॥ ४ ॥
मरुत्त उवाच
भवन्तं कथयित्वा तु मम देवर्षिसत्तमः ।
ततो मामभ्यनुज्ञाय प्रविष्टो हव्यवाहनम् ॥ ५ ॥
मरुत्तने कहा— मुने! मुझे आपका परिचय और पता बताकर देवर्षिशिरोमणि नारद मुझे जानेकी आज्ञा दे स्वयं अग्निमें प्रवेश कर गये थे ॥ ५ ॥
व्यास उवाच
श्रुत्वा तु पार्थिवस्यैतत् संवर्तः प्रमुदं गतः ।
एतावदहमप्येवं शक्नुयामिति सोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥
व्यासजी कहते हैं— राजन्! राजाकी यह बात सुनकर संवर्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और बोले— 'इतना तो मैं भी कर सकता हूँ' ॥ ६ ॥
ततो मरुत्तमुन्मत्तो वाचा निर्भर्त्सयन्निव ।
रूक्षया ब्राह्मणो राजन् पुनः पुनरथाब्रवीत् ॥ ७ ॥
राजन्! वे उन्मत्त वेषधारी ब्राह्मण देवता मरुत्तको अपनी रूखी वाणीद्वारा बारंबार फटकारते हुए-से बोले— ॥ ७ ॥
वातप्रधानेन मया स्वचित्तवशवर्तिना ।
एवं विकृतरूपेण कथं याजितुमिच्छसि ॥ ८ ॥
‘नरेश्वर! मैं तो वायु-प्रधान—बावला हूँ, अपने मनकी मौजसे ही सब काम करता हूँ, मेरा रूप भी विकृत है। अतः मुझ-जैसे व्यक्तिसे तुम क्यों यज्ञ कराना चाहते हो? ॥ ८ ॥
भ्राता मम समर्थश्च वासवेन च संगतः ।
वर्तते याजने चैव तेन कर्माणि कारय ॥ ९ ॥
‘मेरे भाई बृहस्पति इस कार्यमें पूर्णतः समर्थ हैं। आजकल इन्द्रके साथ उनका मेलजोल बढ़ा हुआ है। वे उनके यज्ञ करानेमें लगे रहते हैं। अतः उन्हींसे अपने सारे यज्ञकर्म कराओ ॥ ९ ॥
गार्हस्थ्यं चैव याज्याश्च सर्वा गृह्याश्च देवताः ।
पूर्वजेन ममाक्षिप्तं शरीरं वर्जितं त्विदम् ॥ १० ॥
‘घर-गृहस्थीका सारा सामान, यजमान तथा गृहदेवताओंके पूजन आदि कर्म—इन सबको इस समय मेरे बड़े भाईने अपने अधिकारमें कर लिया है। मेरे पास तो केवल मेरा एक शरीर ही छोड़ रखा है ॥ १० ॥
नाहं तेनाननुज्ञातस्त्वामाविक्षित कर्हिचित् ।
याजयेयं कथंचिद् वै स हि पूज्यतमो मम ॥ ११ ॥
‘आविक्षित्-कुमार! मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना कभी किसी तरह भी तुम्हारा यज्ञ नहीं करा सकता; क्योंकि वे मेरे परम पूजनीय भाई हैं ॥ ११ ॥
स त्वं बृहस्पतिं गच्छ तमनुज्ञाप्य चाव्रज ।
ततोऽहं याजयिष्ये त्वां यदि यष्टुमिहेच्छसि ॥ १२ ॥
‘अतः तुम बृहस्पतिके पास जाओ और उनकी आज्ञा लेकर आओ। उस दशामें यदि तुम यज्ञ कराना चाहो तो मैं यज्ञ करा दूँगा' ॥ १२ ॥
मरुत्त उवाच
बृहस्पतिं गतः पूर्वमहं संवर्त तच्छृणु ।
न मां कामयते याज्यमसौ वासवकाम्यया ॥ १३ ॥
मरुत्तने कहा—संवर्तजी! मैं पहले बृहस्पतिजीके ही पास गया था। वहाँका समाचार बताता हूँ, सुनिये। वे इन्द्रको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे अब मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते हैं ॥ १३ ॥
अमरं याज्यमासाद्य याजयिष्ये न मानुषम् ।
शक्रेण प्रतिषिद्धोऽहं मरुत्तं मा स्म याजयेः ॥ १४ ॥
स्पर्धते हि मया विप्र सदा हि स तु पार्थिवः ।
एवमस्त्विति चाप्युक्तो भ्रात्रा ते बलसूदनः ॥ १५ ॥
उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि 'अमर यजमान पाकर अब मैं मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ नहीं कराऊँगा।' साथ ही इन्द्रने मना भी किया है कि 'आप मरुत्तका यज्ञ न कराइयेगा; क्योंकि ब्रह्मन्! वह राजा सदा मेरे साथ ईर्ष्या रखता है।' इन्द्रकी इस बातको आपके भाईने 'एवमस्तु' कहकर स्वीकार कर लिया है ॥ १४-१५ ॥
स मामधिगतं प्रेम्णा याज्यत्वेन बुभूषति ।
देवराजं समाश्रित्य तद् विद्धि मुनिपुङ्गव ॥ १६ ॥
मुनिप्रवर! मैं बड़े प्रेमसे उनके पास गया था; परंतु वे देवराज इन्द्रका आश्रय लेकर मुझे अपना यजमान बनाना ही नहीं चाहते हैं। इस बातको आप अच्छी तरह जान लें ॥ १६ ॥
सोऽहमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम् ।
कामये समतिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणैः ॥ १७ ॥
अतः मेरी इच्छा यह है कि मैं सर्वस्व देकर भी आपसे ही यज्ञ कराऊँ और आपके द्वारा सम्पादित गुणोंके प्रभावसे इन्द्रको भी मात कर दूँ ॥ १७ ॥
न हि मे वर्तते बुद्धिर्गन्तुं ब्रह्मन् बृहस्पतिम् ।
प्रत्याख्यातो हि तेनास्मि तथानपकृते सति ॥ १८ ॥
ब्रह्मन्! अब बृहस्पतिके पास जानेका मेरा विचार नहीं है; क्योंकि बिना अपराधके ही उन्होंने मेरी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी है ॥ १८ ॥
संवर्त उवाच
चिकीर्षसि यथाकामं सर्वमेतत् त्वयि ध्रुवम् ।
यदि सर्वानभिप्रायन् कर्तासि मम पार्थिव ॥ १९ ॥
संवर्तने कहा—पृथ्वीनाथ! यदि मेरी इच्छाके अनुसार काम करो तो तुम जो कुछ चाहोगे, वह निश्चय ही पूर्ण होगा ॥ १९ ॥
याज्यमानं मया हि त्वां बृहस्पतिपुरन्दरौ ।
द्विषेतां समभिक्रुद्धावेतदेकं समर्थसेः ॥ २० ॥
जब मैं तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा, तब बृहस्पति और इन्द्र दोनों ही कुपित होकर मेरे साथ द्वेष करेंगे। उस समय तुम्हें मेरे पक्षका समर्थन करना होगा ॥ २० ॥
स्थैर्यमत्र कथं मे स्यात् सत्त्वं निःसंशयं कुरु ।
कुपितस्त्वां न हीदानीं भस्म कुर्यां सबान्धवम् ॥ २१ ॥
परंतु इस बातका मुझे विश्वास कैसे हो कि तुम मेरा साथ दोगे। अतः जैसे भी हो, मेरे मनका संशय दूर हो; नहीं तो अभी क्रोधमें भरकर मैं बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें भस्म कर डालूँगा ॥ २१ ॥
मरुत्त उवाच
यावत् तपेत् सहस्रांशुस्तिष्ठेरंश्चापि पर्वताः ।
तावल्लोकान्न लभेयं त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २२ ॥
**मरुत्तने कहा—**ब्रह्मन्! यदि मैं आपका साथ छोड़ दूँ तो जबतक सूर्य तपते हों और जबतक पर्वत स्थिर रहें तबतक मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति न हो ॥ २२ ॥
मा चापि शुभबुद्धित्वं लभेयमिह कर्हिचित् ।
विषयैः सङ्गतं चास्तु त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २३ ॥
यदि आपका साथ छोड़ दूँ तो मुझे संसारमें शुभ बुद्धि कभी न प्राप्त हो और मैं सदा विषयोंमें ही रचा-पचा रह जाऊँ ॥ २३ ॥
संवर्त उवाच
आविक्षित शुभा बुद्धिवर्ततां तव कर्मसु ।
याजनं हि ममाप्येव वर्तते हृदि पार्थिव ॥ २४ ॥
**संवर्तने कहा—**अविक्षित्-कुमार! तुम्हारी शुभ बुद्धि सदा सत्कर्मोंमें ही लगी रहे। पृथ्वीनाथ! मेरे मनमें भी तुम्हारा यज्ञ करानेकी इच्छा तो है ही ॥ २४ ॥
अभिधास्ये च ते राजन्नक्षयं द्रव्यमुत्तमम् ।
येन देवान् सगन्धर्वान् शक्रं चाभिभविष्यसि ॥ २५ ॥
राजन्! इसके लिये मैं तुम्हें परम उत्तम अक्षय धनकी प्राप्तिका उपाय बतलाऊँगा, जिससे तुम गन्धर्वों-सहित सम्पूर्ण देवताओं तथा इन्द्रको भी नीचा दिखा सकोगे ॥ २५ ॥
न तु मे वर्तते बुद्धिर्धने याज्येषु वा पुनः ।
विप्रियं तु करिष्यामि भ्रातुश्चेन्द्रस्य चोभयोः ॥ २६ ॥
मुझको अपने लिये धन अथवा यजमानोंके संग्रहका विचार नहीं है। मुझे तो भाई बृहस्पति और इन्द्र दोनोंके विरुद्ध कार्य करना है ॥ २६ ॥
गमयिष्यामि शक्रेण समतामपि ते ध्रुवम् ।
प्रियं च ते करिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥
निश्चय ही मैं तुम्हें इन्द्रकी बराबरीमें बैठाऊँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। मैं यह बात तुमसे सत्य कहता हूँ॥ २७॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७॥