महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३६१-
एकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत
भीष्म उवाच
स पन्नगपतिस्तत्र प्रययौ ब्राह्मणं प्रति ।
तमेव मनसा ध्यायन् कार्यवत्तां विचारयन् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! यह कहकर नागराज मन-ही-मन उस ब्राह्मणके कार्यका विचार करते हुए उसके पास गये ॥ १ ॥
तमतिक्रम्य नागेन्द्रो मतिमान् स नरेश्वर ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं प्रकृत्या धर्मवत्सलः ॥ २ ॥
नरेश्वर! उसके निकट पहुँचकर बुद्धिमान् नागेन्द्र, जो स्वभावसे ही धर्मानुरागी थे, मधुर वाणीमें बोले— ॥
भो भोः क्षाम्याभिभाषे त्वां न रोषं कर्तुमर्हसि ।
इह त्वमभिसम्प्राप्तः कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ॥ ३ ॥
‘हे ब्राह्मणदेव! आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। मुझपर रोष न करें। मैं आपसे पूछता हूँ कि आप यहाँ किसके लिये आये हैं? आपका क्या प्रयोजन है? ॥ ३ ॥
आभिमुख्यादभिक्रम्य स्नेहात् पृच्छामि ते द्विज ।
विविक्ते गोमतीतीरे कं वा त्वं पर्युपाससे ॥ ४ ॥
‘ब्रह्मन्! मैं आपके सामने आकर प्रेमपूर्वक पूछता हूँ कि गोमतीके इस एकान्त तटपर आप किसकी उपासना करते हैं?’ ॥ ४ ॥
ब्राह्मण उवाच
धर्मारण्यं हि मां विद्धि नागं द्रष्टुमिहागतम् ।
पद्मनाभं द्विजश्रेष्ठ तत्र मे कार्यमाहितम् ॥ ५ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपको विदित हो कि मेरा नाम धर्मारण्य है। मैं नागराज पद्मनाभका दर्शन करनेके लिये यहाँ आया हूँ। उन्हींसे मुझे कुछ काम है ॥ ५ ॥
तस्य चाहमसांनिध्ये श्रुतवानस्मि तं गतम् ।
स्वजनात् तं प्रतीक्षामि पर्जन्यमिव कर्षकः ॥ ६ ॥
उनके स्वजनोंसे मैंने सुना है कि वे यहाँसे दूर गये हुए हैं, अतः जैसे किसान वर्षाकी राह देखता है, उसी तरह मैं भी उनकी बाट जोहता हूँ ॥ ६ ॥
तस्य चाक्लेशकरणं स्वस्तिकारसमाहितम् ।
आवर्तयामि तद् ब्रह्म योगयुक्तो निरामयः ॥ ७ ॥
उन्हें कोई क्लेश न हो। वे सकुशल घर लौटकर आ जायँ, इसके लिये नीरोग एवं योगयुक्त होकर मैं वेदोंका पारायण कर रहा हूँ ॥ ७ ॥
नाग उवाच
अहो कल्याणवृत्तस्त्वं साधुः सज्जनवत्सलः ।
अवाच्यस्त्वं महाभाग परं स्नेहेन पश्यसि ॥ ८ ॥
**नागने कहा—**महाभाग! आपका आचरण बड़ा ही कल्याणमय है। आप बड़े ही साधु हैं और सज्जनोंपर स्नेह रखते हैं। किसी भी दृष्टिसे आप निन्दनीय नहीं हैं; क्योंकि दूसरोंको स्नेहदृष्टिसे देखते हैं ॥ ८ ॥
अहं स नागो विप्रर्षे यथा मां विन्दते भवान् ।
आज्ञापय यथा स्वैरं किं करोमि प्रियं तव ॥ ९ ॥
ब्रह्मर्षे! मैं ही वह नाग हूँ, जिससे आप मिलना चाहते हैं। आप मुझे जैसा जानते हैं, मैं वैसा ही हूँ। इच्छानुसार आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ ९ ॥
भवन्तं स्वजनादस्मि सम्प्राप्तं श्रुतवानहम् ।
अतस्त्वां स्वयमेवाहं द्रष्टुमभ्यागतो द्विज ॥ १० ॥
ब्रह्मन्! अपने स्वजन (पत्नी) से मैंने आपके आगमनका समाचार सुना है; इसलिये स्वयं ही आपका दर्शन करनेके लिये चला आया हूँ ॥ १० ॥
सम्प्राप्तश्च भवानद्य कृतार्थः प्रतियास्यति ।
विस्रब्धो मां द्विजश्रेष्ठ विषये योक्तुमर्हसि ॥ ११ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जब आप यहाँतक आ गये हैं, तब अब कृतार्थ होकर ही यहाँसे लौटेंगे; अतः बेखटके मुझे अपने अभीष्ट कार्यके साधनमें लगाइये ॥ ११ ॥
वयं हि भवता सर्वे गुणक्रीता विशेषतः ।
यस्त्वमात्महितं त्यक्त्वा मामेवेहानुरुध्यसे ॥ १२ ॥
आपने हम सब लोगोंको विशेषरूपसे अपने गुणोंसे खरीद लिया है; क्योंकि आप अपने हितकी बातको अलग रखकर मेरे ही कल्याणका चिन्तन कर रहे हैं ॥ १२ ॥
ब्राह्मण उवाच
आगतोऽहं महाभाग तव दर्शनलालसः ।
कंचिदर्थमनर्थज्ञः प्रष्टुकामो भुजङ्गम ॥ १३ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**महाभाग नागराज! मैं आपहीके दर्शनकी लालसासे यहाँ आया हूँ। आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, जिसे मैं स्वयं नहीं जानता हूँ ॥ १३ ॥
अहमात्मानमात्मस्थो मार्गमाणोऽऽत्मनो गतिम् ।
वासार्थिनं महाप्रज्ञं चलच्चित्तमुपास्मि ह ॥ १४ ॥
मैं विषयोंसे निवृत्त हो अपने-आपमें ही स्थित रहकर जीवात्माओंकी परमगतिस्वरूप परब्रह्म परमात्माकी खोज कर रहा हूँ, तो भी महान् बुद्धियुक्त गृहमें आसक्त हुए इस चंचल चित्तकी उपासना करता हूँ (अतः मैं न तो आसक्त हूँ और न विरक्त ही हूँ) ॥ १४ ॥
प्रकाशितस्त्वं स्वगुणैर्यशोगर्भर्गभस्तिभिः ।
शशाङ्ककरसंस्पर्शैर्हृद्यैरात्मप्रकाशितैः ॥ १५ ॥
आप चन्द्रमाकी किरणोंकी भाँति सुखद स्पर्शवाले और स्वतः प्रकाशित होनेवाले सुयशरूपी किरणोंसे युक्त अपने मनोरम गुणोंसे ही प्रकाशमान हैं ॥ १५ ॥
तस्य मे प्रश्नमुत्पन्नं छिन्धि त्वमनिलाशन ।
पश्चात् कार्यं वदिष्यामि श्रोतुमर्हति तद् भवान् ॥ १६ ॥
पवनाशन! इस समय मेरे मनमें एक नया प्रश्न उठा है। पहले इसका समाधान कीजिये। उसके बाद मैं आपसे अपना कार्य निवेदन करूँगा और आप उसे ध्यानसे सुनियेगा ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
एकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका
उपाख्यानविषयक तीन सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६१ ।।