सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

२४९-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

ज्ञानके साधन तथा ज्ञानीके लक्षण और महिमा

व्यास उवाच

सृजते तु गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञस्त्वधितिष्ठति ।
गुणान् विक्रियतः सर्वानुदासीनवदीश्वरः ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं—पुत्र! प्रकृति ही गुणोंकी सृष्टि करती है। क्षेत्रज्ञ—आत्मा तो उदासीनकी भाँति उन सम्पूर्ण विकारशील गुणोंको देखा करता है। वह स्वाधीन एवं उनका अधिष्ठाता है ॥ १ ॥

स्वभावयुक्तं तत् सर्वं यदिमान् सृजते गुणान् ।
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं सृजते तद्गुणांस्तथा ॥ २ ॥
जैसे मकड़ी अपने शरीरसे तन्तुओंकी सृष्टि करती है, उसी प्रकार प्रकृति भी समस्त त्रिगुणात्मक पदार्थोंको उत्पन्न करती है। प्रकृति जो इन सब विषयोंकी सृष्टि करती है, वह सब उसके स्वभावसे ही होता है ॥ २ ॥

प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते ।
एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे ॥ ३ ॥
किन्हींका मत है कि तत्त्वज्ञानसे जब गुणोंका नाश कर दिया जाता है, तब भी वे सर्वथा नष्ट नहीं होते; किंतु तत्त्वज्ञके लिये उनकी उपलब्धि नहीं होती अर्थात् उसका उनसे सम्बन्ध नहीं रहता। दूसरे लोग मानते हैं कि उनकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है अर्थात् उनका अस्तित्व नहीं रहता ॥ ३ ॥

उभयं सम्प्रधार्यैतदध्यवस्येद् यथामति ।
अनेनैव विधानेन भवेद् गर्भशयो महान् ॥ ४ ॥
इन दोनों मतोंपर अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके सिद्धान्तका निश्चय करे। इस प्रकार निश्चय करनेसे (बार-बार) गर्भमें शयन करनेवाला जीव महान् हो जाता है ॥ ४ ॥

अनादिनिधनो ह्यात्मा तं बुद्ध्वा विचरेन्नरः ।
अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च नित्यं विगतमत्सरः ॥ ५ ॥
आत्मा आदि और अन्तसे रहित है। उसे जानकर मनुष्य सदा हर्ष, क्रोध और ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो विचरता रहे ॥ ५ ॥

इत्येवं हृदयग्रन्थिं बुद्धिचिन्तामयं दृढम् ।
अनित्यं सुखमासीत अशोचंश्छिन्नसंशयः ॥ ६ ॥
साधकको चाहिये कि बुद्धिके चिन्ता आदि धर्मोंसे सुदृढ़ हुई हृदयकी अविद्यामयी अनित्य ग्रन्थिको उपर्युक्त प्रकारसे काटकर शोक और संदेहसे रहित हो सुखपूर्वक

परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जाय ॥ ६ ॥
ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्व्या यथा पूर्णां नदीं नराः ।
अवगाढा ह्यविद्वांसो विद्धि लोकमिमं तथा ॥ ७ ॥
जैसे तैरनेकी कला न जाननेवाले मनुष्य यदि किनारेकी भूमिसे जलपूर्ण नदीमें गिर पड़ते हैं तो गोते खाते हुए महान् क्लेश सहन करते हैं; उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य इस संसार-सागरमें डूबकर कष्ट भोगते रहते हैं—ऐसा समझो ॥ ७ ॥
न तु ताम्यति वै विद्वान् स्थले चरति तत्त्ववित् ।
एवं यो विन्दतेऽऽत्मानं केवलं ज्ञानमात्मनः ॥ ८ ॥
परंतु जो तैरना जानता है, वह कष्ट नहीं उठाता। वह तो जलमें भी स्थलकी ही भाँति चलता है, उसी तरह ज्ञानस्वरूप विशुद्ध आत्माको प्राप्त हुआ तत्त्ववेत्ता संसार-सागरसे पार हो जाता है ॥ ८ ॥
एवं बुद्ध्वा नरः सर्वं भूतानामागतिं गतिम् ।
समवेक्ष्य च वैषम्यं लभते शममुत्तमम् ॥ ९ ॥
जो मनुष्य इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंके आवागमनको जानता तथा उनकी विषम अवस्थापर विचार करता है, उसे परम उत्तम शान्ति प्राप्त होती है ॥ ९ ॥
एतद् वै जन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्परायणम् ॥ १० ॥
विशेषरूपसे ब्राह्मणमें और समानभावसे मनुष्यमात्रमें इस ज्ञानको प्राप्त करनेकी जन्मसिद्ध शक्ति है। मन और इन्द्रियोंका संयम तथा आत्मज्ञान मोक्ष-प्राप्तिके लिये पर्याप्त साधन है ॥ १० ॥
एतद् बुद्ध्वा भवेत् शुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् ।
विज्ञायैतद् विमुच्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥ ११ ॥
शम और आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष अत्यन्त शुद्ध-बुद्ध हो जाता है। ज्ञानीका इसके सिवा और क्या लक्षण हो सकता है। बुद्धिमान् मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानकर कृतार्थ और मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥
न भवति विदुषां महद्भयं
यदविदुषां सुमहद्भयं परत्र ।
न हि गतिरधिकास्ति कस्यचिद्
भवति हि या विदुषः सनातनी ॥ १२ ॥
परलोकमें जो अज्ञानी मनुष्योंको महान् भय प्राप्त होता है, यह महान् भय ज्ञानी पुरुषोंको नहीं होता। ज्ञानीको जो सनातन गति प्राप्त होती है, उससे बढ़कर उत्तम गति और किसीको भी प्राप्त नहीं होती ॥ १२ ॥
लोकमातुरमसूयते जन-

स्तत् तदेव च निरीक्ष्य शोचते ।
तत्र पश्य कुशलानशोचतो
ये विदुस्तदुभयं कृताकृतम् ॥ १३ ॥
कुछ लोग मनुष्योंको दुखी और रोगी देखकर उनमें दोष-दृष्टि करते हैं और दूसरे लोग उनकी वह अवस्था देखकर शोक करते हैं। परंतु जो कार्य और कारण दोनोंको तत्त्वसे जानते हैं, वे शोक नहीं करते। तुम उन्हीं लोगोंको वहाँ कुशल समझो ॥ १३ ॥

यत् करोत्यनभिसंधिपूर्वकं
तच्च निर्णुदति तत् पुराकृतम् ।
न प्रियं तदुभयं न चाप्रियं
तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः ॥ १४ ॥
कर्मपरायण मनुष्य निष्कामभावसे जिस कर्मका अनुष्ठान करते हैं, वह पहलेके किये हुए सकाम या अशुभ कर्मोंको भी नष्ट कर देता है; इस प्रकार कर्म करनेवाले साधकके कर्म इस लोकमें या परलोकमें कहीं भी उसका भला-बुरा या दोनों कुछ भी नहीं कर सकते ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने
एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४९ ॥