महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११५-
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ संशयो मे महानयम् ।
संछेत्तव्यस्त्वया राजन् भवान् कुलकरो हि नः ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— 'परमबुद्धिमान् पितामह! मेरे मनमें यह एक महान् संशय बना हुआ है। राजन्! आप मेरे उस संदेहका निवारण करें; क्योंकि आप हमारे वंशके प्रवर्तक हैं ॥ १ ॥
पुरुषाणामयं तात दुर्वृत्तानां दुरात्मनाम् ।
कथितो वाक्यसंचारस्ततो विज्ञापयामि ते ॥ २ ॥
तात! आपने दुरात्मा और दुराचारी पुरुषोंके बोलचालकी चर्चा की है; इसलिये मैं आपसे कुछ निवेदन कर रहा हूँ ॥ २ ॥
यद्धितं राज्यतन्त्रस्य कुलस्य च सुखोदयम् ।
आयत्यां च तदात्वे च क्षेमवृद्धिकरं च यत् ॥ ३ ॥
पुत्रपौत्राभिरामं च राष्ट्रवृद्धिकरं च यत् ।
अन्नपाने शरीरे च हितं यत्तद् ब्रवीहि मे ॥ ४ ॥
आप मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये जो हमारे इस राज्यतन्त्रके लिये हितकारक, कुलके लिये सुखदायक, वर्तमान और भविष्यमें भी कल्याणकी वृद्धि करनेवाला, पुत्र और पौत्रोंकी परम्पराके लिये हितकर, राष्ट्रकी उन्नति करनेवाला तथा अन्न, जल और शरीरके लिये भी लाभकारी हो ॥ ३-४ ॥
अभिषिक्तो हि यो राजा राष्ट्रस्थो मित्रसंवृतः ।
ससुहृत्समुपेतो वा स कथं रञ्जयेत् प्रजाः ॥ ५ ॥
जो राजा अपने राज्यपर अभिषिक्त हो देशमें मित्रोंसे घिरा हुआ रहता है, तथा जो हितैषी सुहृदोंसे भी सम्पन्न है, वह किस प्रकार अपनी प्रजाको प्रसन्न रखे? ॥ ५ ॥
यो ह्यसत्संग्रहरतिः स्नेहरागबलात्कृतः ।
इन्द्रियाणामनीशत्वादसज्जनबुभूषकः ॥ ६ ॥
तस्य भृत्या विगुणतां यान्ति सर्वे कुलोद्गताः ।
न च भृत्यफलैरर्थैः स राजा सम्प्रयुज्यते ॥ ७ ॥
जो असद् वस्तुओंके संग्रहमें अनुरक्त है, स्नेह और रागके वशीभूत हो गया है और इन्द्रियोंपर वश न चलनेके कारण सज्जन बननेकी चेष्टा नहीं करता, उस राजाके उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए समस्त सेवक भी विपरीत गुणवाले हो जाते हैं। ऐसी दशामें सेवकोंके
रखनेका जो फल धनकी वृद्धि आदि है, उससे वह राजा सर्वथा वंचित रह जाता है॥ ६-७॥
एतन्मे संशयस्यास्य राजधर्मान् सुदुर्विदान् ।
बृहस्पतिसमो बुद्ध्या भवान् शंसितुमर्हति ॥ ८ ॥
मेरे इस संशयका निवारण करके आप दुर्बोध राजधर्मोंका वर्णन कीजिये; क्योंकि आप बुद्धिमें साक्षात् बृहस्पतिके समान हैं॥ ८॥
शंसिता पुरुषव्याघ्र त्वन्नः कुलहिते रतः।
क्षत्ता चैको महाप्राज्ञो यो नः शंसति सर्वदा ॥ ९ ॥
पुरुषसिंह! हमारे कुलके हितमें तत्पर रहनेवाले आप ही हमें ऐसा उपदेश दे सकते हैं। दूसरे हमारे हितैषी महाज्ञानी विदुरजी हैं, जो हमें सर्वदा सदुपदेश दिया करते हैं॥ ९॥
त्वत्तः कुलहितं वाक्यं श्रुत्वा राज्यहितोदयम् ।
अमृतस्याव्ययस्येव तृप्तः स्वप्स्याम्यहं सुखम् ॥ १० ॥
आपके मुखसे कुलके लिये हितकारी तथा राज्यके लिये कल्याणकारी उपदेश सुनकर मैं अक्षय अमृतसे तृप्त होनेके समान सुखसे सोऊँगा॥ १०॥
कीदृशाः संनिकर्षस्था भृत्याः सर्वगुणान्विताः।
कीदृशैः किं कुलीनैर्वा सह यात्रा विधीयते ॥ ११ ॥
कैसे सर्वगुणसम्पन्न सेवक राजाके निकट रहने चाहिये और किस कुलमें उत्पन्न हुए कैसे सैनिकोंके साथ राजाको युद्धकी यात्रा करनी चाहिये?॥ ११॥
न ह्येको भृत्यरहितो राजा भवति रक्षिता।
राज्यं चेदं जनः सर्वस्तत्कुलीनोऽभिकांक्षति ॥ १२ ॥
सेवकोंके बिना अकेला राजा राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न सभी लोग इस राज्यकी अभिलाषा करते हैं॥ १२॥
भीष्म उवाच
न च प्रशास्तुं राज्यं हि शक्यमेकेन भारत।
असहायवता तात नैवार्थः केचिदप्युत ॥ १३ ॥
लब्धुं लब्धा ह्यपि सदा रक्षितुं भरतर्षभ।
यस्य भृत्यजनः सर्वो ज्ञानविज्ञानकोविदः ॥ १४ ॥
हितैषी कुलजः स्निग्धः स राज्यफलमश्नुते ॥ १५ ॥
भीष्मजीने कहा— तात भरतनन्दन! कोई भी सहायकोंके बिना अकेले राज्य नहीं चला सकता। राज्य ही क्या? सहायकोंके बिना किसी भी अर्थकी प्राप्ति नहीं होती। यदि प्राप्ति हो भी गयी तो सदा उसकी रक्षा असम्भव हो जाती है (अतः सेवकों या सहायकोंका
होना आवश्यक है)। जिसके सभी सेवक ज्ञान-विज्ञानमें कुशल, हितैषी, कुलीन और स्नेही हों, वही राजा राज्यका फल भोग सकता है ॥ १३-१५ ॥
मन्त्रिणो यस्य कुलजा असंहार्याः सहोषिताः ।
नृपतेर्मतिदाः सन्तः सम्बन्धज्ञानकोविदाः ॥ १६ ॥
अनागतविधातारः कालज्ञानविशारदाः ।
अतिक्रान्तमशोचन्तः स राज्यफलमश्नुते ॥ १७ ॥
जिसके मन्त्री कुलीन, धनके लोभसे फोड़े न जा सकनेवाले, सदा राजाके साथ रहनेवाले, उन्हें अच्छी बुद्धि देनेवाले, सत्पुरुष, सम्बन्ध-ज्ञानकुशल, भविष्यका भलीभाँति प्रबन्ध करनेवाले, समयके ज्ञानमें निपुण तथा बीती हुई बातके लिये शोक न करनेवाले हों, वही राजा राज्यके फलका भागी होता है ॥ १६-१७ ॥
समदुःखसुखा यस्य सहायाः प्रियकारिणः ।
अर्थचिन्तापराः सत्याः स राज्यफलमश्नुते ॥ १८ ॥
जिसके सहायक राजाके सुखमें सुख और दुःखमें दुःख मानते हों, सदा उसका प्रिय करनेवाले हों और राजकीय धन कैसे बढ़े—इसकी चिन्तामें तत्पर तथा सत्यवादी हों, वह राजा राज्यका फल पाता है ॥ १८ ॥
यस्य नार्तो जनपदः संनिकर्षगतः सदा ।
अक्षुद्रः सत्यथालम्बी स राजा राज्यभाग्भवेत् ॥ १९ ॥
जिसका देश दुखी न हो तथा सदा समीपवर्ती बना रहे, जो स्वयं भी छोटे विचारका न होकर सदा सन्मार्गका अवलम्बन करनेवाला हो, वही राजा राज्यका भागी होता है ॥ १९ ॥
कोशाख्यपटलं यस्य कोशवृद्धिकरैर्न रैः ।
आप्तैस्तुष्टैश्च सततं चीयते स नृपोत्तमः ॥ २० ॥
विश्वासपात्र, संतोषी तथा खजाना बढ़ानेका सतत प्रयत्न करनेवाले, खजांचियोंके द्वारा जिसके कोषकी सदा वृद्धि हो रही हो, वही राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥
कोष्ठागारमसंहार्यैराप्तैः संचयतत्परैः ।
पात्रभूतैरलुब्धैश्च पाल्यमानं गुणी भवेत् ॥ २१ ॥
यदि लोभवश फूट न सकनेवाले, विश्वासपात्र, संग्रही, सुपात्र एवं निर्लोभ मनुष्य अन्नादि भण्डारकी रक्षामें तत्पर हों तो उसकी विशेष उन्नति होती है ॥ २१ ॥
व्यवहारश्च नगरे यस्य कर्मफलोदयः ।
दृश्यते शंखलिखितः स धर्मफलभाङ् नृपः ॥ २२ ॥
जिसके नगरमें कर्मके अनुसार फलकी प्राप्तिका प्रतिपादन करनेवाले शंख-लिखित मुनिके बनाये हुए न्याय-व्यवहारका पालन होता देखा जाता है, वह राजा धर्मके फलका भागी होता है ॥ २२ ॥
संगृहीतमनुष्यश्च यो राजा राजधर्मवित् ।
षड्वर्गं प्रतिगृह्णाति स धर्मफलमश्नुते ॥ २३ ॥
जो राजा राजधर्मको जानता और अपने यहाँ अच्छे लोगोंको जुटाकर रखता है तथा अवसरके अनुसार संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव एवं समाश्रय नामक छः गुणोंका उपयोग करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ पन्द्रहवाँ
अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥