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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन

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षट्त्रिंशोऽध्यायः

स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन

युधिष्ठिर उवाच

किं भक्ष्यं चाप्यभक्ष्यं च किं च देयं प्रशस्यते ।
किं च पात्रमपात्रं वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य? किस वस्तुका दान उत्तम माना जाता है? कौन दानका पात्र है अथवा कौन अपात्र? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥

व्यास उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सिद्धानां चैव संवादं मनोश्चैव प्रजापतेः ॥ २ ॥
**व्यासजी बोले—**राजन्! इस विषयमें लोग प्रजापति मनु और सिद्ध पुरुषोंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
ऋषयस्तु व्रतपराः समागम्य पुरा विभुम् ।
धर्मं पप्रच्छुरासीनमादिकाले प्रजापतिम् ॥ ३ ॥
पहलेकी बात है एक समय बहुत-से व्रतपरायण तपस्वी ऋषि एकत्र हो प्रजापति राजा मनुके पास गये और उन बैठे हुए नरेशसे धर्मकी बात पूछते हुए बोले— ॥
कथमन्नं कथं पात्रं दानमध्ययनं तपः ।
कार्याकार्यं च यत् सर्वं शंस वै त्वं प्रजापते ॥ ४ ॥
‘प्रजापते! अन्न क्या है? पात्र कैसा होना चाहिये? दान, अध्ययन और तपका क्या स्वरूप है? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? यह सब हमें बताइये’ ॥ ४ ॥
तैरेवमुक्तो भगवान् मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
श्रुश्रूषध्वं यथावृत्तं धर्मं व्याससमासतः ॥ ५ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् स्वायम्भुव मनुने कहा—‘महर्षियो! मैं संक्षेप और विस्तारके साथ धर्मका यथार्थ स्वरूप बताता हूँ, आपलोग सुनें ॥ ५ ॥
अनादेशे जपो होम उपवासस्तथैव च ।
आत्मज्ञानं पुण्यनद्यो यत्र प्रायश्च तत्पराः ॥ ६ ॥
अनादिष्टं तथैतानि पुण्यानि धरणीभृतः ।

सुवर्णप्राशनमपि रत्नादिस्नानमेव च ॥ ७ ॥
देवस्थानाभिगमनमाज्यप्राशनमेव च ।
एतानि मेध्यं पुरुषं कुर्वन्त्याशु न संशयः ॥ ८ ॥
'जिनके दोषोंका विशेषरूपसे उल्लेख नहीं हुआ है, ऐसे कर्म बन जानेपर उनके दोषके निवारणके लिये जप, होम, उपवास, आत्मज्ञान, पवित्र नदियोंमें स्नान तथा जहाँ जप-होम आदिमें तत्पर रहनेवाले बहुत-से पुण्यात्मा पुरुष रहते हों, उस स्थानका सेवन—ये सामान्य प्रायश्चित्त हैं। ये सारे कर्म पुण्यदायक हैं। पर्वत, सुवर्णप्राशन (सोनेसे स्पर्श कराये हुए जलका पान), रत्न आदिसे मिश्रित जलमें स्नान, देव-स्थानोंकी यात्रा और घृतपान—ये सब मनुष्यको शीघ्र ही पवित्र कर देते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ६—८ ॥
न गर्वेण भवेत् प्राज्ञः कदाचिदपि मानवः ।
दीर्घमायुरथेच्छन् हि त्रिरात्रं चोष्णपो भवेत् ॥ ९ ॥
'विद्वान् पुरुष कभी गर्व न करे और यदि दीर्घायुकी इच्छा हो तो तीन रात तप्तकृच्छ्रव्रतकी विधिसे गरम-गरम दूध, घृत और जल पीये ॥ ९ ॥
अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययनं तपः ।
अहिंसा सत्यमक्रोध इज्या धर्मस्य लक्षणम् ॥ १० ॥
'बिना दी हुई वस्तुको न लेना, दान, अध्ययन और तपमें तत्पर रहना, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रोध त्याग देना और यज्ञ करना—ये सब धर्मके लक्षण हैं ॥ १० ॥
स एव धर्मः सोऽधर्मो देशकाले प्रतिष्ठितः ।
आदानमनृतं हिंसा धर्मो ह्यावस्थिकः स्मृतः ॥ ११ ॥
'एक ही क्रिया देश और कालके भेदसे धर्म या अधर्म हो जाती है! चोरी करना, झूठ बोलना एवं हिंसा करना आदि अधर्म भी अवस्थाविशेषमें धर्म माने गये हैं ॥ ११ ॥
द्विविधौ चाप्युभावेतौ धर्माधर्मौ विजानताम् ।
अप्रवृत्तिः प्रवृत्तिश्च द्वैविध्यं लोकवेदयोः ॥ १२ ॥
'इस प्रकार विज्ञ पुरुषोंकी दृष्टिमें धर्म और अधर्म दोनों ही देश-कालके भेदसे दो-दो प्रकारके हैं। धर्माधर्ममें जो अप्रवृत्ति और प्रवृत्ति होती हैं, ये भी लोक और वेदके भेदसे दो प्रकारकी हैं (अर्थात् लौकिकी अप्रवृत्ति और लौकिकी प्रवृत्ति, वैदिकी अप्रवृत्ति और वैदिकी प्रवृत्ति) ॥ १२ ॥
अप्रवृत्तेरमर्त्यत्वं मर्त्यत्वं कर्मणः फलम् ।
अशुभस्याशुभं विद्याच्छुभस्य शुभमेव च ।
एतयोश्चोभयोः स्यातां शुभाशुभतया तथा ॥ १३ ॥
'वैदिकी अप्रवृत्ति (निवृत्ति-धर्म)-का फल है अमृतत्व (मोक्ष) और वैदिकी प्रवृत्ति अर्थात् सकाम कर्मका फल है जन्म-मरणरूप संसार। लौकिकी अप्रवृत्ति और प्रवृत्ति—ये

दोनों यदि अशुभ हों तो उनका फल भी अशुभ समझे तथा शुभ हों तो उनका फल भी शुभ जानना चाहिये; क्योंकि ये दोनों ही शुभ और अशुभरूप होती हैं ।।

दैवं च दैवसंयुक्तं प्राणंश्च प्राणदश्च ह ।
अपेक्षापूर्वककरणादशुभानां शुभं फलम् ।। १४ ।।
‘देवताओंके निमित्त, दैवयुक्त (शास्त्रीय कर्म), प्राण और प्राणदाता—इन चारोंकी अपेक्षापूर्वक जो कुछ किया जाता है, उससे अशुभका भी शुभ ही फल होता है ।। १४ ।।

ऊर्ध्वं भवति संदेहादिह दृष्टार्थमेव च ।
अपेक्षापूर्वककरणात् प्रायश्चित्तं विधीयते ।। १५ ।।
‘प्राणोंपर संशय न होनेकी स्थितिमें अथवा किसी प्रत्यक्ष लाभके लिये जो यहाँ अशुभ कर्म बन जाता है, उसे इच्छापूर्वक करनेके कारण उसके दोषकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्तका विधान है ।। १५ ।।

क्रोधमोहकृते चैव दृष्टान्तागमहेतुभिः ।
शरीराणामुपक्लेशो मनसश्च प्रियाप्रिये ।
तदौषधैश्च मन्त्रैश्च प्रायश्चित्तैश्च शाम्यति ।। १६ ।।
‘यदि क्रोध और मोहके वशीभूत होकर मनको प्रिय या अप्रिय लगनेवाले अशुभ कार्य हो जाते हैं तो उनके निवारणके लिये दृष्टान्तप्रतिपादक शास्त्रकी दृष्टियोंसे उपवास आदिके द्वारा शरीरको सुखाना ही करने योग्य प्रायश्चित्त माना गया है। इसके सिवा, हविष्यान्न-भोजन, मन्त्रोंके जप तथा अन्यान्य प्रायश्चित्तोंसे भी क्रोध आदिके कारण किये गये पापकी शान्ति होती है ।। १६ ।।

उपवासमेकरात्रं दण्डोत्सर्गे नराधिपः ।
विशुद्ध्येदात्मशुद्ध्यर्थं त्रिरात्रं तु पुरोहितः ।। १७ ।।
‘यदि राजा दण्डनीय पुरुषको दण्ड न दे तो उसे अपनी शुद्धिके लिये एक रातका उपवास करना चाहिये। यदि पुरोहित राजाको ऐसे अवसरपर कर्तव्यका उपदेश न दे तो उसे तीन रातका उपवास करना चाहिये ।। १७ ।।

क्षयं शोकं प्रकुर्वाणो न म्रियेत यदा नरः ।
शस्त्रादिभिरुपाविष्टस्त्रिरात्रं तत्र निर्दिशेत् ।। १८ ।।
‘यदि पुत्र आदिकी मृत्युके कारण शोक करनेवाला पुरुष आमरण उपवास करनेके लिये बैठ जाय अथवा शस्त्र आदिसे आत्मघातकी चेष्टा करे; परंतु उसकी मृत्यु न हो, उस दशामें भी उस निन्द्यकर्मके लिये जो चेष्टा की गयी थी, उसके दोषकी निवृत्तिके लिये उसे तीन रातका उपवास बताना चाहिये ।। १८ ।।

जातिश्रेण्यधिवासानां कुलधर्मांश्च सर्वतः ।
वर्जयन्ति च ये धर्मं तेषां धर्मो न विद्यते ।। १९ ।।

‘परंतु जो पुरुष अपनी जाति, आश्रम तथा कुलके धर्मोंका सर्वथा परित्याग कर देते हैं और जो लोग धर्ममात्रको छोड़ बैठते हैं उनके लिये कोई धर्म (प्रायश्चित्त) नहीं है। अर्थात् किसी भी प्रायश्चित्तसे उनकी शुद्धि नहीं हो सकती है ।। १९ ।।

दश वा वेदशास्त्रज्ञास्त्रयो वा धर्मपाठकाः ।
यद् ब्रूयुः कार्य उत्पन्ने स धर्मो धर्मसंशये ।। २० ।।
‘यदि प्रायश्चित्तकी आवश्यकता पड़ जाय और धर्मके निर्णयमें संदेह उपस्थित हो जाय तो वेद और धर्म-शास्त्रको जाननेवाले दस अथवा निरन्तर धर्मका विचार करनेवाले तीन ब्राह्मण उस प्रश्नपर विचार करके जो कुछ कहें, उसे ही धर्म मानना चाहिये ।। २० ।।

अनड्वान् मृत्तिका चैव तथा क्षुद्रपिपीलिकाः ।
श्लेष्मातकस्तथा विप्रैरभक्ष्यं विषमेव च ।। २१ ।।
‘बैल, मिट्टी, छोटी-छोटी चीटियाँ, श्लेष्मातक³ (लसोड़ा) और विष—ये सब ब्राह्मणोंके लिये अभक्ष्य हैं ।। २१ ।।

अभक्ष्या ब्राह्मणैर्मत्स्याः शल्कैर्यै वै विवर्जिताः ।
चतुष्पात् कच्छपादन्द्यो मण्डूका जलजाश्च ये ।। २२ ।।
‘काँटोंसे रहित जो मत्स्य हैं, वे भी ब्राह्मणोंके लिये अभक्ष्य हैं। कच्छप और उसके सिवा अन्य चार पैरवाले सभी जीव अभक्ष्य हैं। मेढ़क और जलमें उत्पन्न होनेवाले अन्य जीव भी अभक्ष्य ही हैं ।। २२ ।।

भासा हंसाः सुपर्णाश्च चक्रवाकाः प्लवा बकाः ।
काको मद्गुश्च गृध्रश्च श्येनोल्लूकस्तथैव च ।। २३ ।।
क्रव्यादा दंष्ट्रिणः सर्वे चतुष्पात् पक्षिणश्च ये ।
येषां चोभयतो दन्ताश्चतुर्दंष्ट्राश्च सर्वशः ।। २४ ।।
‘भास, हंस, गरुड़, चक्रवाक, बतख, बगुले, कौए, मद्गु³, गीध, बाज, उल्लू, कच्चे मांस खानेवाले दाढ़ोंसे युक्त सभी हिंसक पशु, चार पैरवाले जीव और पक्षी तथा दोनों ओर दाँत और चार दाढ़ोंवाले सभी जीव अभक्ष्य हैं ।। २३-२४ ।।

एडकाश्वखरोष्ट्रीणां सूतिकानां गवामपि ।
मानुषीणां मृगीणां च न पिबेद् ब्राह्मणः पयः ।। २५ ।।
‘भेड़, घोड़ी, गदही, ऊँटनी, दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई गाय, मानवी स्त्री और हिरनियोंका दूध ब्राह्मण न पीये ।। २५ ।।

प्रेतान्नं सूतिकान्नं च यच्च किंचिदनिर्दशम् ।
अभोज्यं चाप्यपेयं च धेनोर्दुग्धमनिर्दशम् ।। २६ ।।
‘यदि किसीके यहाँ मरणाशौच या जननाशौच हो गया हो तो उसके यहाँ दस दिनोंतक कोई अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये, इसी प्रकार ब्यायी हुई गायका दूध भी यदि दस दिनके

भीतरका हो तो उसे नहीं पीना चाहिये ॥ २६ ॥
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् ।
आयुः सुवर्णकारान्नंमवीरायाश्च योषितः ॥ २७ ॥
‘राजाका अन्न तेज हर लेता है, शूद्रका अन्न ब्रह्मतेजको नष्ट कर देता है, सुनारका तथा पति और पुत्रसे हीन युवतीका अन्न आयुका नाश करता है ॥ २७ ॥
विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं गणिकान्नंमथेन्द्रियम् ।
मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितान्नं च सर्वशः ॥ २८ ॥
‘व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान है और वेश्याका अन्न वीर्यके समान। जो अपनी स्त्रीके पास किसी उपपतिका आना सह लेते हैं, उन कायरोंका तथा सदा स्त्रीके वशीभूत रहनेवाले पुरुषोंका अन्न भी वीर्यके ही तुल्य है ॥ २८ ॥
दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रतुविक्रयिकस्य च ।
तक्षणश्चर्मावकर्तुश्च पुंश्चल्या रजकस्य च ॥ २९ ॥
चिकित्सकस्य यच्चान्नंमभोज्यं रक्षिणस्तथा ।
‘जिसने यज्ञकी दीक्षा ली हो उसका अन्न अग्निषोमीय होमविशेषके पहले अग्राह्य है। कंजूस, यज्ञ बेचनेवाले, बढ़ई, चमार या मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य तथा चौकीदारका अन्न भी खाने योग्य नहीं है ॥ २९ ½ ॥
गणग्रामाभिशस्तानां रङ्गस्त्रीजीविनां तथा ॥ ३० ॥
परिवित्तीनां पुंसां च बन्दिद्यूतविदां तथा ।
‘जिन्हें किसी समाज या गाँवने दोषी ठहराया हो, जो नर्तकीके द्वारा अपनी जीविका चलाते हों, छोटे भाईका ब्याह हो जानेपर भी कुँवारे रह गये हों, बंदी (चारण या भाट)-का काम करते हों या जुआरी हों, ऐसे लोगोंका अन्न भी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥ ३० ½ ॥
वामहस्ताहृतं चान्नं भक्तं पर्युषितं च यत् ॥ ३१ ॥
सुरानुगतमुच्छिष्टमभोज्यं शेषितं च यत् ।
‘बायें हाथसे लाया अथवा परोसा गया अन्न, बासी भात, शराब मिला हुआ, जूठा और घरवालोंको न देकर अपने लिये बचाया हुआ अन्न भी अखाद्य ही है ॥ ३१ ½ ॥
पिष्टस्य चेक्षुशाकानां विकाराः पयसस्तथा ॥ ३२ ॥
सक्तुधानाकरम्भाणां नोपभोग्याश्चिरस्थिताः ।
‘इसी प्रकार जो पदार्थ आटे, ईखके रस, साग या दूधको बिगाड़कर या सड़ाकर बनाये गये हों, सत्तू, भूने हुए जौ और दहीमिश्रित सत्तू इन्हें विकृत करके बनाये हुए पदार्थ यदि बहुत देरके बने हों तो उन्हें नहीं खाना चाहिये ॥ ३२ ½ ॥
पायसं कृसरं मांसमपूपांश्च वृथाकृताः ॥ ३३ ॥
अपेयाश्चाप्यभक्ष्याश्च ब्राह्मणैर्गृहमेधिभिः ।

'खीर, खिचड़ी, फलका गूदा और पूए यदि देवताके उद्देश्यसे न बनाये गये हों तो गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये खाने-पीने योग्य नहीं हैं ॥ ३३ १/२ ॥
देवानृषीन् मनुष्यांश्च पितॄन् गृह्याश्च देवताः ॥ ३४ ॥
पूजयित्वा ततः पश्चाद् गृहस्थो भोक्तुमर्हति ।
'गृहस्थको चाहिये कि वह पहले देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों (अतिथियों), पितरों और घरके देवताओंका पूजन करके पीछे अपने भोजन करे ॥ ३४ १/२ ॥
यथा प्रव्रजितो भिक्षुस्तथैव स्वे गृहे वसेत् ॥ ३५ ॥
एवंवृत्तः प्रियैर्दारैः संवसन् धर्ममाप्नुयात् ।
'जैसे गृहत्यागी संन्यासी घरके प्रति अनासक्त होता है, उसी प्रकार गृहस्थको भी ममता और आसक्ति छोड़कर ही घरमें रहना चाहिये। जो इस प्रकार सदाचारका पालन करते हुए अपनी प्रिय पत्नीके साथ घरमें निवास करता है, वह धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ १/२ ॥
न दद्याद् यशसे दानं न भयान्नोपकारिणे ॥ ३६ ॥
न नृत्यगीतशीलेषु हासकेषु च धार्मिकः ।
न मत्ते चैव नोन्मत्ते न स्तेने न च कुत्सके ॥ ३७ ॥
न वाग्धीने विवर्णे वा नाङ्गहीने न वामने ।
न दुर्जने दौष्कुले वा व्रतैर््यो वा न संस्कृतः ।
न श्रोत्रियमृते दानं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते ॥ ३८ ॥
'धर्मात्मा पुरुषको चाहिये कि वह यशके लोभसे, भयके कारण अथवा अपना उपकार करनेवालेको दान न दे अर्थात् उसे जो दिया जाय वह दान नहीं है, ऐसा समझना चाहिये। जो नाचने-गानेवाले, हँसी-मजाक करनेवाले (भाँड़ आदि), मदमत्त, उन्मत्त, चोर, निन्दक, गूँगे, कान्तिहीन, अङ्गहीन, बौने, दुष्ट, दूषित कुलमें उत्पन्न तथा व्रत एवं संस्कारसे शून्य हों, उन्हें भी दान न दे। श्रोत्रियके सिवा वेदज्ञानशून्य ब्राह्मणको दान नहीं देना चाहिये ॥ ३६—३८ ॥
असम्यक् चैव यद् दत्तमसम्यक् च प्रतिग्रहः ।
उभयं स्यादनर्थाय दातुरादातुरेव च ॥ ३९ ॥
'जो उत्तम विधिसे दिया न गया हो तथा जिसे उत्तम विधिके साथ ग्रहण न किया गया हो, वह देना और लेना दोनों ही देने और लेनेवालेके लिये अनर्थकारी होते हैं ॥ ३९ ॥
यथा खदिरमालम्ब्य शिलां वाप्यर्णवं तरन् ।
मज्जेत मज्जतस्तद्वद् दाता यश्च प्रतिग्रही ॥ ४० ॥
'जैसे खैरकी लकड़ी या पत्थरकी शिलाका सहारा लेकर समुद्र पार करनेवाला मनुष्य बीचमें ही डूब जाता है, उसी प्रकार अविधिपूर्वक दान देने और लेनेवाले यजमान और पुरोहित दोनों डूब जाते हैं ॥ ४० ॥

काष्ठैरार्द्रैर्यथा वह्निरुपस्तीर्णो न दीप्यते ।
तपःस्वाध्यायचारित्रैरेवं हीनः प्रतिग्रही ॥ ४१ ॥
‘जैसे गीली लकड़ीसे ढकी हुई आग प्रज्वलित नहीं होती, उसी प्रकार तपस्या, स्वाध्याय तथा सदाचारसे हीन ब्राह्मण यदि दान ग्रहण कर ले तो वह उसे पचा नहीं सकता ॥ ४१ ॥

कपाले यद्वदापः स्युः श्वदृतौ च यथा पयः ।
आश्रयस्थानदोषेण वृत्तहीने तथा श्रुतम् ॥ ४२ ॥
‘जैसे मनुष्यकी खोपड़ीमें भरा हुआ जल और कुत्तेकी खालमें रखा हुआ दूध आश्रयदोषसे अपवित्र होता है, उसी प्रकार सदाचारहीन ब्राह्मणका शास्त्रज्ञान भी आश्रय-स्थानके दोषसे दूषित हो जाता है ॥ ४२ ॥

निर्मन्त्रो निर्वृतो यः स्यादशास्त्रज्ञोऽनसूयकः ।
अनुक्रोशात् प्रदातव्यं हीनेष्वव्रतिकेषु च ॥ ४३ ॥
‘जो ब्राह्मण वेदज्ञानसे शून्य और शास्त्रज्ञानसे रहित होता हुआ भी दूसरोंमें दोष नहीं देखता तथा संतुष्ट रहता है, उसे तथा व्रतशून्य दीन-हीनको भी दया करके दान देना चाहिये ॥ ४३ ॥

न वै देयमनुक्रोशाद् दीनायाप्यपकारिणे ।
आप्ताचरित इत्येव धर्म इत्येव वा पुनः ॥ ४४ ॥
‘पर जो दूसरोंका बुरा करनेवाला हो वह यदि दीन हो तो भी उसे दया करके नहीं देना चाहिये। यह शिष्टोंका आचार है और यही धर्म है ॥ ४४ ॥

निष्कारणं स्मृतं दत्तं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते ।
भवेद्पात्रदोषेण न चात्रास्ति विचारणा ॥ ४५ ॥
‘वेदविहीन ब्राह्मणोंको दिया हुआ दान अपात्रदोषसे निरर्थक हो जाता है, इसमें कोई विचार करनेकी बात नहीं है ॥ ४५ ॥

यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
ब्राह्मणश्चानधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ ४६ ॥
‘जैसे लकड़ीका हाथी और चामका बना हुआ मृग हो, उसी प्रकार वेदशास्त्रोंके अध्ययनसे शून्य ब्राह्मण है। ये तीनों नाममात्र धारण करते हैं (परंतु नामके अनुसार काम नहीं देते) ॥ ४६ ॥

यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला ।
शकुनिर्वाप्यपक्षः स्यान्निर्मन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥ ४७ ॥
‘जैसे नपुंसक मनुष्य स्त्रियोंके पास जाकर निष्फल होता है, गाय गायसे ही संयुक्त होनेपर कोई फल नहीं दे सकती और जैसे बिना पंखका पक्षी उड़ नहीं सकता, उसी प्रकार वेदमन्त्रोंके ज्ञानसे शून्य ब्राह्मण भी व्यर्थ ही होता है ॥ ४७ ॥

ग्रामो धान्यैर्यथा शून्यो यथा कूपश्च निर्जलः ।
यथा हुतमनग्नौ च तथैव स्यान्निराकृतौ ॥ ४८ ॥

‘जिस प्रकार अन्नहीन ग्राम, जलरहित कुँआ और राखमें की हुई आहुति व्यर्थ होती है, उसी प्रकार मूर्ख ब्राह्मणको दिया हुआ दान भी व्यर्थ ही है ॥ ४८ ॥
देवतानां पितॄणां च हव्यकव्यविनाशकः ।
शत्रुरर्थहरो मूर्खो न लोकान् प्राप्तुमर्हति ॥ ४९ ॥

‘मूर्ख ब्राह्मण देवताओंके यज्ञ और पितरोंके श्राद्धका नाश करनेवाला होता है। वह धनका अपहरण करनेवाला शत्रु है। वह दान देनेवालोंको उत्तम लोकमें नहीं पहुँचा सकता’ ॥ ४९ ॥
एतत् ते कथितं सर्वं यथावृत्तं युधिष्ठिर ।
समासेन महद्ध्येतच्छ्रोतव्यं भरतर्षभ ॥ ५० ॥

भरतभूषण युधिष्ठिर! यह सब वृत्तान्त तुम्हें यथावत् रूपसे थोड़ेमें बताया गया। यह महत्त्वपूर्ण प्रसंग सबको सुनना चाहिये ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये
षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥


१-श्लेष्मातकके वैद्यकमें अनेक नाम आये हैं, उनमेंसे एक नाम ‘द्विजकुत्सित’ भी है। इससे सिद्ध होता है कि वह द्विजातिमात्रके लिये अभक्ष्य है।
२-मद्गु एक प्रकारके जलचर पक्षीका नाम है।