महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन
पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन
जनमेजय उवाच
बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।
को ह्यत्र पुरुषः श्रेष्ठः को वा योनिरिहोच्यते ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! पुरुष अनेक हैं या एक? इस जगत्में कौन पुरुष सबसे श्रेष्ठ है? अथवा किसे यहाँ सबकी उत्पत्तिका स्थान बताया जाता है? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
बहवः पुरुषा लोके सांख्ययोगविचारणे ।
नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**कुरुकुलका भार वहन करनेवाले नरेश! सांख्य और योगकी विचारधाराके अनुसार इस जगत्में पुरुष अनेक हैं। वे 'एकपुरुषवाद' नहीं स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥
बहूनां पुरुषाणां च यथैका योनिरुच्यते ।
तथा तं पुरुषं विश्वं व्याख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥ ३ ॥
नमस्कृत्वा च गुरवे व्यासाय विदितात्मने ।
तपोयुक्ताय दान्ताय वन्द्याय परमर्षये ॥ ४ ॥
बहुत-से पुरुषोंकी उत्पत्तिका स्थान एक ही पुरुष कैसे बताया जाता है? यह समझानेके लिये आत्मज्ञानी, तपस्वी, जितेन्द्रिय एवं वन्दनीय परमर्षि गुरु व्यासजीको नमस्कार करके मैं तुम्हारे सामने अधिक गुणशाली विश्वात्मा पुरुषकी व्याख्या करूँगा ॥ ३-४ ॥
इदं पुरुषसूक्तं हि सर्ववेदेषु पार्थिव ।
ऋतं सत्यं च विख्यातमृषिसिंहेन चिन्तितम् ॥ ५ ॥
राजन्! यह पुरुषसम्बन्धी सूक्त तथा ऋत और सत्य सम्पूर्ण वेदोंमें विख्यात है। ऋषिसिंह व्यासने इसका भलीभाँति चिन्तन किया है ॥ ५ ॥
उत्सर्गेणापवादेन ऋषिभिः कपिलादिभिः ।
अध्यात्मचिन्तामाश्रित्य शास्त्राण्युक्तानि भारत ॥ ६ ॥
भारत! कपिल आदि ऋषियोंने सामान्य और विशेषरूपमें अध्यात्म-तत्त्वका चिन्तन करके विभिन्न शास्त्रोंका प्रतिपादन किया है ॥ ६ ॥
समासतस्तु यद् व्यासः पुरुषैकत्वमुक्तवान् ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि प्रसादादमितौजसः ॥ ७ ॥
परंतु व्यासजीने संक्षेपसे पुरुषकी एकताका जिस तरह प्रतिपादन किया है, उसीको मैं भी उन अमिततेजस्वी गुरुके कृपा-प्रसादसे तुम्हें बताऊँगा ॥ ७ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ब्रह्मणा सह संवादं त्र्यम्बकस्य विशाम्पते ॥ ८ ॥
प्रजानाथ! इस विषयमें जानकार मनुष्य ब्रह्माजीके साथ रुद्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ८ ॥
क्षीरोदस्य समुद्रस्य मध्ये हाटकसप्रभः ।
वैजयन्त इति ख्यातः पर्वतप्रवरो नृप ॥ ९ ॥
नरेश्वर! क्षीरसागरके मध्यभागमें वैजयन्त नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ पर्वत है, जो सुवर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ९ ॥
तत्राध्यात्मगतिं देव एकाकी प्रविचिन्तयन् ।
वैराजसदनान्नित्यं वैजयन्तं निषेवते ॥ १० ॥
वहाँ एकाकी ब्रह्मा अध्यात्मगतिका चिन्तन करनेके लिये ब्रह्मलोकसे प्रतिदिन आते और उस वैजयन्त पर्वतका सेवन करते थे ॥ १० ॥
अथ तत्रासतस्तस्य चतुर्वक्त्रस्य धीमतः ।
ललाटप्रभवः पुत्रः शिव आगाद् यदृच्छया ॥ ११ ॥
आकाशेन महायोगी पुरा त्रिनयनः प्रभुः ।
ततः खान्निपपाताशु धरणीधरमूर्धनि ॥ १२ ॥
पहले एक दिन बुद्धिमान् चतुर्मुख ब्रह्माजी जब वहाँ बैठे हुए थे, उसी समय उनके ललाटसे उत्पन्न हुए पुत्र महायोगी त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव अनायास ही आकाशमार्गसे घूमते हुए वैजयन्तपर्वतके सामने आये और शीघ्र ही आकाशसे उस पर्वतशिखरपर उतर पड़े ॥ ११-१२ ॥
अग्रतश्चाभवत् प्रीतो ववन्दे चापि पादयोः ।
तं पादयोर्निपतितं दृष्ट्वा सव्येन पाणिना ॥ १३ ॥
उत्थापयामास तदा प्रभुरेकः प्रजापतिः ।
उवाच चैनं भगवांश्चिरस्यागतमात्मजम् ॥ १४ ॥
सामने ब्रह्माजीको देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनके दोनों चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। भगवान् शिवको अपने चरणोंमें पड़ा देख उस समय एकमात्र सर्वसमर्थ भगवान् प्रजापतिने दाहिने हाथसे उन्हें उठाया और दीर्घकालके पश्चात् अपने निकट आये हुए पुत्रसे इस प्रकार कहा ॥ १३-१४ ॥
पितामह उवाच
स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मेऽन्तिकम् ।
कच्चित् ते कुशलं पुत्र स्वाध्यायतपसोः सदा ॥ १५ ॥
नित्यमुग्रतपास्त्वं हि ततः पृच्छामि ते पुनः ॥ १६ ॥
ब्रह्माजी बोले— महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है। सौभाग्यसे मेरे निकट आये हो। बेटा! तुम्हारा स्वाध्याय और तप सदा सकुशल चल रहा है न? तुम सर्वदा कठोर तपस्यामें ही लगे रहते हो; इसलिये मैं तुमसे बारंबार तपके विषयमें पूछता हूँ ॥ १५-१६ ॥
रुद्र उवाच
त्वत्प्रसादेन भगवन् स्वाध्यायतपसोर्मम ।
कुशलं चाव्ययं चैव सर्वस्य जगतस्त्वथ ॥ १७ ॥
रुद्रने कहा— भगवन्! आपकी कृपासे मेरे स्वाध्याय और तप सकुशल चल रहे हैं; कभी भंग नहीं हुए हैं। सम्पूर्ण जगत् भी कुशल-क्षेमसे है ॥ १७ ॥
चिरदृष्टो हि भगवान् वैराजसदने मया ।
ततोऽहं पर्वतं प्राप्तस्त्विमं त्वत्पादसेवितम् ॥ १८ ॥
प्रभो! बहुत दिन हुए, मैंने ब्रह्मलोकमें आपका दर्शन किया था। इसीलिये आज आपके चरणोंद्वारा सेवित इस पर्वतपर पुनः दर्शनके लिये आया हूँ ॥ १८ ॥
कौतूहलं चापि हि मे एकान्तगमनेन ते ।
नैतत् कारणमल्पं हि भविष्यति पितामह ॥ १९ ॥
पितामह! आपके एकान्तमें जानेसे मेरे मनमें बड़ा कौतूहल पैदा हुआ। मैंने सोचा, इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं होगा ॥ १९ ॥
किं नु तत्सदनं श्रेष्ठं क्षुत्पिपासाविवर्जितम् ।
सुरासुरैरध्युषितं ऋषिभिश्चामितप्रभैः ॥ २० ॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सततं संनिषेवितम् ।
उत्सृज्येमं गिरिवरमेकाकी प्राप्तवानसि ॥ २१ ॥
क्या कारण है कि क्षुधा-पिपासासे रहित उस श्रेष्ठ धामको, जहाँ निरन्तर देवता, असुर, अमिततेजस्वी ऋषि, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपकी सेवामें उपस्थित रहते हैं, छोड़कर आप अकेले इस श्रेष्ठ पर्वतपर चले आये हैं? ॥ २०-२१ ॥
ब्रह्मोवाच
वैजयन्तो गिरिवरः सततं सेव्यते मया ।
अत्रैकाग्रेण मनसा पुरुषश्चिन्त्यते विराट् ॥ २२ ॥
ब्रह्माजीने कहा— वत्स! मैं इन दिनों गिरिवर वैजयन्तका जो निरन्तर सेवन कर रहा हूँ, इसका कारण यह है कि यहाँ एकाग्रचित्तसे विराट् पुरुषका चिन्तन किया करता हूँ ॥ २२ ॥
रुद्र उवाच
बहवः पुरुषा ब्रह्मंस्त्वया सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
सृज्यन्ते चापरे ब्रह्मन् स चैकः पुरुषो विराट् ॥ २३ ॥
**रुद्र बोले—**ब्रह्मन्! आप स्वयम्भू हैं। आपने बहुत-से पुरुषोंकी सृष्टि की है और अभी दूसरे-दूसरे पुरुषोंकी सृष्टि करते जा रहे हैं। वह विराट् भी तो एक पुरुष ही है, फिर उसमें क्या विशेषता है? ॥ २३ ॥
को ह्यसौ चिन्त्यते ब्रह्मंस्त्वयैकः पुरुषोत्तमः ।
एतन्मे संशयं ब्रूहि महत् कौतूहलं हि मे ॥ २४ ॥
प्रभो! आप जिन एक पुरुषोत्तमका चिन्तन करते हैं, वे कौन हैं? मेरे इस संशयका समाधान कीजिये। इस विषयको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ २४ ॥
ब्रह्मोवाच
बहवः पुरुषाः पुत्र त्वया ये समुदाहृताः ।
एवमेतदतिक्रान्तं द्रष्टव्यं नैवमित्यपि ॥ २५ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**बेटा! तुमने जिन बहुत-से पुरुषोंका उल्लेख किया है, उनके विषयमें तुम्हारा यह कथन ठीक ही है। जिनकी सृष्टि मैं करता हूँ, उनका चिन्तन मैं क्यों करूँगा? ॥ २५ ॥
आधारं तु प्रवक्ष्यामि एकस्य पुरुषस्य ते ।
बहूनां पुरुषाणां स यथैका योनिरुच्यते ॥ २६ ॥
मैं तुम्हें उस एक पुरुषके सम्बन्धमें बताऊँगा, जो सबका आधार है और जिस प्रकार वह बहुत-से पुरुषोंका एकमात्र कारण बताया जाता है ॥ २६ ॥
तथा तं पुरुषं विश्वं परमं सुमहत्तमम् ।
निर्गुणं निर्गुणा भूत्वा प्रविशन्ति सनातनम् ॥ २७ ॥
जो लोग साधन करते-करते गुणातीत हो जाते हैं, वे ही उस विश्वरूप, अत्यन्त महान्, सनातन एवं निर्गुण परम पुरुषमें प्रवेश करते हैं ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये ब्रह्मारुद्रसंवादे पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाके प्रसंगमें ब्रह्मा तथा रुद्रका संवादविषयक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५० ॥