महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन
सप्ततितमोऽध्यायः
राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वर्तमानो महीपतिः ।
सुखेनाथान् सुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाप्नुयात् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**आचारके ज्ञाता पितामह! किस प्रकारका आचरण करनेसे राजा इहलोक और परलोकमें भी भविष्यमें सुख देनेवाले पदार्थोंको सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अयं गुणानां षट्त्रिंशत्षट्त्रिंशद्गुणसंयुतः ।
यान् गुणांस्तु गुणोपेतः कुर्वन् गुणमवाप्नुयात् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! दया और उदारता आदि गुणोंसे युक्त राजा जिन गुणोंको आचरणमें लाकर उत्कर्ष लाभ कर सकता है, वे छत्तीस प्रकारके गुण हैं। राजाको चाहिये कि वह इन छत्तीस गुणोंसे सम्पन्न होनेकी चेष्टा करे ॥ २ ॥
चरेद् धर्मानकटुको मुञ्चेत् स्नेहं न चास्तिकः ।
अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत् काममनुद्धतः ॥ ३ ॥
(अब मैं क्रमशः उन गुणोंका वर्णन करता हूँ) १-धर्मका आचरण करे, किंतु कटुता न आने दे। २-आस्तिक रहते हुए दूसरोंके साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े। ३-क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही अर्थ-संग्रह करे। ४-मर्यादाका अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे ॥ ३ ॥
प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्यादविकत्थनः ।
दाता नापात्रवर्षी स्यात् प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ॥ ४ ॥
५-दीनता न लाते हुए ही प्रिय भाषण करे। ६-शूरवीर बने, किंतु बढ़-बढ़कर बातें न बनावे। ७-दान दे, परंतु अपात्रको नहीं। ८-साहसी हो, किंतु निष्ठुर न हो ॥
संदधीत न चानार्यैर्विगृह्णीयान्न बन्धुभिः ।
नाभक्तं चारयेच्चारं कुर्यात् कार्यमपीडया ॥ ५ ॥
९-दुष्टोंके साथ मेल न करे। १०-बन्धुओंके साथ लड़ाई-झगड़ा न ठाने। ११-जो राजभक्त न हो, ऐसे गुप्तचरसे काम न ले। १२-किसीको कष्ट पहुँचाये बिना ही अपना कार्य करे ॥ ५ ॥
अर्थं ब्रूयान्न चासत्सु गुणान् ब्रूयान्न चात्मनः ।
आदद्यान्न च साधुभ्यो नासत्पुरुषमाश्रयेत् ॥ ६ ॥
१३-दुष्टोंसे अपना अभीष्ट कार्य न कहे। १४-अपने गुणोंका स्वयं ही वर्णन न करे। १५-श्रेष्ठ पुरुषोंसे उनका धन न छीने। १६-नीच पुरुषोंका आश्रय न ले ॥
नापरीक्ष्य नयेद् दण्डं न च मन्त्रं प्रकाशयेत् ।
विसृजेन्न च लुब्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु ॥ ७ ॥
१७-अपराधकी अच्छी तरह जाँच पड़ताल किये बिना ही किसीको दण्ड न दे। १८-गुप्त मन्त्रणाको प्रकट न करे। १९-लोभियोंको धन न दे। २०-जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उनपर विश्वास न करे ॥ ७ ॥
अनीर्षुर्गूप्तदारः स्याच्चोक्षः स्यादघृणी नृपः ।
स्त्रियः सेवेत नात्यर्थं मृष्टं भुञ्जीत नाहितम् ॥ ८ ॥
२१-ईर्ष्यारहित होकर अपनी स्त्रीकी रक्षा करे। २२-राजा शुद्ध रहे; किंतु किसीसे घृणा न करे। २३-स्त्रियोंका अधिक सेवन न करे। २४-शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन करे, परंतु अहितकर भोजन न करे ॥ ८ ॥
अस्तब्धः पूजयेन्मान्यान् गुरून् सेवेदमायया ।
अर्चैद् देवानदम्भेन श्रियमिच्छेदकुत्सिताम् ॥ ९ ॥
२५-उद्दण्डता छोड़कर विनीतभावसे माननीय पुरुषोंका आदर-सत्कार करे। २६-निष्कपटभावसे गुरु-जनोंकी सेवा करे। २७-दम्भहीन होकर देवताओंकी पूजा करे। २८-अनिन्दित उपायसे धन-सम्पत्ति पानेकी इच्छा करे ॥ ९ ॥
सेवेत प्रणयं हित्वा दक्षः स्यान्न त्वकालवित् ।
सान्त्वयेन्न च मोक्षाय अनुगृह्णन्न चाक्षिपेत् ॥ १० ॥
२९-हठ छोड़कर प्रीतिका पालन करे। ३०-कार्य-कुशल हो, किंतु अवसरके ज्ञानसे शून्य न हो। ३१-केवल पिण्ड छुड़ानेके लिये किसीको सान्त्वना या भरोसा न दे। ३२-किसीपर कृपा करते समय आक्षेप न करे ॥ १० ॥
प्रहरेन्न त्वविज्ञाय हत्वा शत्रून् न शोचयेत् ।
क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु ॥ ११ ॥
३३-बिना जाने किसीपर प्रहार न करे। ३४-शत्रुओंको मारकर शोक न करे। ३५-अकस्मात् किसीपर क्रोध न करे तथा ३६-कोमल हो, परंतु अपकार करनेवालोंके लिये नहीं ॥ ११ ॥
एवं चरस्व राज्यस्थो यदि श्रेय इहेच्छसि ।
अतोऽन्यथा नरपतिर्भयमृच्छत्यनुत्तमम् ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर! यदि इस लोकमें कल्याण चाहते हो तो राज्यपर स्थित रहकर ऐसा ही बर्ताव करो; क्योंकि इसके विपरीत आचरण करनेवाला राजा बड़ी भारी विपत्ति या भयमें पड़
जाता है ।। १२ ।।
इति सर्वान् गुणानेतान् यथोक्तान् योऽनुवर्तते ।
अनुभूयेह भद्राणि प्रेत्य स्वर्गे महीयते ।। १३ ।।
जो राजा यथार्थरूपसे बताये गये इन सभी गुणोंका अनुवर्तन करता है, वह इस जगत्में कल्याणका अनुभव करके मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।।
वैशम्पायन उवाच
इदं वचः शान्तनवस्य शुश्रुवान्
युधिष्ठिरः पाण्डवमुख्यसंवृतः ।
तदा ववन्दे च पितामहं नृपो
यथोक्तमेतच्च चकार बुद्धिमान् ।। १४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मका यह उपदेश सुनकर पाण्डवोंसे और प्रधान राजाओंसे घिरे हुए बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने जैसा बताया था, वैसा ही किया ।। १४ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।