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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन

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सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन

भीष्म उवाच

नित्योद्युक्तेन वै राज्ञा भवितव्यं युधिष्ठिर ।
प्रशस्यते न राजा हि नारीवोद्यमवर्जितः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! राजाको सदा ही उद्योगशील होना चाहिये। जो उद्योग छोड़कर स्त्रीकी भाँति बेकार बैठा रहता है, उस राजाकी प्रशंसा नहीं होती ॥ १ ॥

भगवानुशना चाह श्लोकमत्र विशाम्पते ।
तदिहैकमना राजन् गदतस्तं निबोध मे ॥ २ ॥
प्रजानाथ! इस विषयमें भगवान् शुक्राचार्यने एक श्लोक कहा है, उसे मैं बता रहा हूँ। तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर मुझसे उस श्लोकको सुनो ॥ २ ॥

द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव ।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ ३ ॥
जैसे साँप बिलमें रहनेवाले चूहोंको निगल जाता है, उसी प्रकार दूसरोंसे लड़ाई न करनेवाले राजा तथा विद्याध्ययन आदिके लिये घर छोड़कर अन्यत्र न जानेवाले ब्राह्मणको पृथ्वी निगल जाती है (अर्थात् वे पुरुषार्थ-साधन किये बिना ही मर जाते हैं)' ॥ ३ ॥

तदेतन्नरशार्दूल हृदि त्वं कर्तुमर्हसि ।
संधेयानभिसंधत्स्व विरोध्यांश्च विरोधय ॥ ४ ॥
अतः नरश्रेष्ठ! तुम इस बातको अपने हृदयमें धारण कर लो, जो संधि करनेके योग्य हों, उनसे संधि करो और जो विरोधके पात्र हों, उनका डटकर विरोध करो ॥ ४ ॥

सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य विपरीतं य आचरेत् ।
गुरुर्वा यदि वा मित्रं प्रतिहन्तव्य एव सः ॥ ५ ॥
राज्यके सात अङ्ग हैं—राजा, मन्त्री, मित्र, खजाना, देश, दुर्ग और सेना। जो इन सात अङ्गोंसे युक्त राज्यके विपरीत आचरण करे, वह गुरु हो या मित्र, मार डालनेके ही योग्य है ॥ ५ ॥

मरुत्तेन हि राज्ञा वै गीतः श्लोकः पुरातनः ।
राजाधिकारे राजेन्द्र बृहस्पतिमते पुरा ॥ ६ ॥
राजेन्द्र! पूर्वकालमें राजा मरुत्तने एक प्राचीन श्लोकका गान किया था, जो बृहस्पतिके मतानुसार राजाके अधिकारके विषयमें प्रकाश डालता है ॥ ६ ॥

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथप्रतिपन्नस्य दण्डो भवति शाश्वतः ॥ ७ ॥

'घमण्डमें भरकर कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान न रखनेवाला तथा कुमार्गपर चलनेवाला मुनष्य यदि अपना गुरु हो तो उसे भी दण्ड देनेका सनातन विधान है' ।। ७ ।।

बाहोः पुत्रेण राज्ञा च सगरेण च धीमता ।
असमञ्जाः सुतो ज्येष्ठस्त्यक्तः पौरहितैषिणा ।। ८ ।।
बाहुके पुत्र बुद्धिमान् राजा सगरने तो पुरवासियोंके हितकी इच्छासे अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंजाका भी त्याग कर दिया था ।। ८ ।।

असमञ्जाः सरय्वां स पौराणां बालकान् नृप ।
न्यमज्जयदतः पित्रा निर्भर्त्स्य स विवासितः ।। ९ ।।
नरेश्वर! असमंजा पुरवासियोंके बालकोंको पकड़कर सरयूनदीमें डुबा दिया करता था; अतः उसके पिताने उसे दुत्कारकर घरसे बाहर निकाल दिया ।। ९ ।।

ऋषिणोद्दालकेनापि श्वेतकेतुर्महातपाः ।
मिथ्या विप्रानुपचरन् संत्यक्तो दयितः सुतः ।। १० ।।
उद्दालक ऋषिने अपने प्रिय पुत्र महातपस्वी श्वेतकेतुको केवल इस अपराधसे त्याग दिया कि वह ब्राह्मणोंके साथ मिथ्या एवं कपटपूर्ण व्यवहार करता था ।। १० ।।

लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः ।
सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ।। ११ ।।
अतः इस लोकमें प्रजावर्गको प्रसन्न रखना ही राजाओंका सनातन धर्म है। सत्यकी रक्षा और व्यवहारकी सरलता ही राजोचित कर्तव्य है ।। ११ ।।

न हिंस्यात् परवित्तानि देयं काले च दापयेत् ।
विक्रान्तः सत्यवाक् क्षान्तो नृपो न चलते पथः ।। १२ ।।
दूसरोंके धनका नाश न करे। जिसको जो कुछ देना हो, उसे वह समयपर दिलानेकी व्यवस्था करे। पराक्रमी, सत्यवादी और क्षमाशील बना रहे—ऐसा करनेवाला राजा कभी पथभ्रष्ट नहीं होता ।। १२ ।।

आत्मवांश्च जितक्रोधः शास्त्रार्थकृतनिश्चयः ।
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ।। १३ ।।
त्रय्यां संवृतमन्त्रश्च राजा भवितुमर्हति ।
वृजिनं च नरेन्द्राणां नान्यच्चारक्षणात् परम् ।। १४ ।।
जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, क्रोधको जीत लिया है तथा शास्त्रोंके सिद्धान्तका निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके प्रयत्नमें निरन्तर लगा रहता है, जिसे तीनों वेदोंका ज्ञान है तथा जो अपने गुप्त विचारोंको दूसरोंपर प्रकट नहीं होने देता है, वही राजा होने योग्य है, प्रजाकी रक्षा न करनेसे बढ़कर राजाओंके लिये दूसरा कोई पाप नहीं है ।। १३-१४ ।।

चातुर्वर्ण्यस्य धर्मांश्च रक्षितव्या महीक्षिता ।

धर्मसंकररक्षा च राज्ञां धर्मः सनातनः ॥ १५ ॥
राजाको चारों वर्णोंके धर्मोंकी रक्षा करनी चाहिये, प्रजाको धर्मसंकरतासे बचाना राजाओंका सनातन धर्म है ॥ १५ ॥
न विश्वसेच्च नृपतिर्न चात्यर्थं च विश्वसेत् ।
षाड्गुण्यगुणदोषांश्च नित्यं बुद्ध्यावलोकयेत् ॥ १६ ॥
राजा किसीपर भी विश्वास न करे। विश्वसनीय व्यक्तिका भी अत्यन्त विश्वास न करे। राजनीतिके छः गुण होते हैं—सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय*। इन सबके गुण-दोषोंका अपनी बुद्धिद्वारा सदा निरीक्षण करे ॥ १६ ॥
द्विच्छिद्रदर्शी नृपतिर्नित्यमेव प्रशस्यते ।
त्रिवर्ग विदितार्थश्च युक्तचारोपधिश्च यः ॥ १७ ॥
शत्रुओंके छिद्र देखनेवाले राजाकी सदा ही प्रशंसा की जाती है। जिसे धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वका ज्ञान है तथा जिसने शत्रुओंकी गुप्त बातोंको जानने और उनके मन्त्री आदिको फोड़नेके लिये गुप्तचर लगा रखा है, वह भी प्रशंसाके ही योग्य है ॥ १७ ॥
कोशस्योपार्जनरतिर्यमवैश्रवणोपमः ।
वेत्ता च दशवर्गस्य स्थानवृद्धिक्षयात्मनः ॥ १८ ॥
राजाको उचित है कि वह सदा अपने कोषागारको भरा-पूरा रखनेका प्रयत्न करता रहे, उसे न्याय करनेमें यमराज और धन-संग्रह करनेमें कुबेरके समान होना चाहिये। वह स्थान, वृद्धि तथा क्षयके हेतुभूत दस* वर्गोंका सदा ज्ञान रखे ॥ १८ ॥
अभृतानां भवेद् भर्ता भृतानामन्ववेक्षकः ।
नृपतिः सुमुखश्च स्यात् स्मितपूर्वाभिभाषिता ॥ १९ ॥
जिनके भरण-पोषणका प्रबन्ध न हो उनका पोषण राजा स्वयं करे और उसके द्वारा जिनका भरण-पोषण चल रहा हो, उन सबकी देखभाल रखे। राजाको सदा प्रसन्नमुख रहना और मुसकराते हुए वार्तालाप करना चाहिये ॥ १९ ॥
उपासिता च वृद्धानां जिततन्द्रिरलोलुपः ।
सतां वृत्ते स्थितमतिः संतोष्यश्चारुदर्शनः ॥ २० ॥
राजाको वृद्ध पुरुषोंकी उपासना (सेवा या संग) करनी चाहिये, वह आलस्यको जीते और लोलुपताका परित्याग करे। सत्पुरुषोंके व्यवहारमें मन लगावे। संतुष्ट होने योग्य स्वभाव बनाये रखे। वेश-भूषा ऐसी रखे, जिससे वह देखनेमें अत्यन्त मनोहर जान पड़े ॥ २० ॥
न चाददीत वित्तानि सतां हस्तात् कदाचन ।
असदभ्यश्च समादद्यात् सद्‍भ्यस्तु प्रतिपादयेत् ॥ २१ ॥

साधुपुरुषोंके हाथसे कभी धन न छीने। असाधु पुरुषोंसे दण्डके रूपमें धन लेना चाहिये; साधु पुरुषोंको तो धन देना चाहिये ॥ २१ ॥

स्वयं प्रहर्ता दाता च वश्यात्मा रम्यसाधनः ।
काले दाता च भोक्ता च शुद्धाचारस्तथैव च ॥ २२ ॥

स्वयं दुष्टोंपर प्रहार करे, दानशील बने, मनको वशमें रखे, सुरम्य साधनसे युक्त रहे, समय-समयपर धनका दान और उपभोग भी करे तथा निरन्तर शुद्ध एवं सदाचारी बना रहे ॥ २२ ॥

शूरान् भक्तानसंहार्यान् कुले जातानरोगिणः ।
शिष्टान् शिष्टाभिसम्बन्धान्मानिनोऽनवमानिनः ॥ २३ ॥
विद्याविदो लोकविदः परलोकान्वेक्षकान् ।
धर्मे च निरतान् साधूनचलानचलानिव ॥ २४ ॥
सहायान् सततं कुर्याद् राजा भूतिपुरस्कृतः ।
तैश्च तुल्यो भवेद् भोगैश्छत्रमात्राज्ञयाधिकः ॥ २५ ॥

जो शूरवीर एवं भक्त हों, जिन्हें विपक्षी फोड़ न सकें, जो कुलीन, नीरोग एवं शिष्ट हों तथा शिष्ट पुरुषोंसे सम्बन्ध रखते हों, जो आत्मसम्मानकी रक्षा करते हुए दूसरोंका कभी अपमान न करते हों, धर्मपरायण, विद्वान्, लोकव्यवहारके ज्ञाता और शत्रुओंकी गतिविधिपर दृष्टि रखनेवाले हों, जिनमें साधुता भरी हो तथा जो पर्वतोंके समान अटल रहनेवाले हों, ऐसे लोगोंको ही राजा सदा अपना सहायक बनावे और उन्हें ऐश्वर्यका पुरस्कार दे। उन्हें अपने समान ही सुखभोगकी सुविधा प्रदान करे, केवल राजोचित छत्र धारण करना और सबको आज्ञा प्रदान करना—इन दो बातोंमें ही वह उन सहायकोंकी अपेक्षा अधिक रहे ॥ २३—२५ ॥

प्रत्यक्षा च परोक्षा च वृत्तिश्चास्य भवेत् समा ।
एवं कुर्वन् नरेन्द्रोऽपि न खेदमिह विन्दति ॥ २६ ॥

प्रत्यक्ष और परोक्षमें भी उनके साथ राजाका एक-सा ही बर्ताव होना चाहिये। ऐसा करनेवाला नरेश इस जगत्में कभी कष्ट नहीं उठाता ॥ २६ ॥

सर्वाभिशङ्की नृपतिर्यश्च सर्वहरो भवेत् ।
स क्षिप्रमनृजुर्लुब्धः स्वजनेनैव बध्यते ॥ २७ ॥

जो राजा सबपर संदेह करता और सबका सर्वस्व हर लेता है, वह लोभी और कुटिल राजा एक दिन अपने ही लोगोंके हाथसे शीघ्र मारा जाता है ॥ २७ ॥

शुचिस्तु पृथिवीपालो लोकचित्तग्रहे रतः ।
न पतत्यरिभिर्ग्रस्तः पतितश्चावतिष्ठते ॥ २८ ॥

जो भूपाल बाहर-भीतरसे शुद्ध रहकर प्रजाके हृदयको अपनानेका प्रयत्न करता है, वह शत्रुओंका आक्रमण होनेपर भी उनके वशमें नहीं पड़ता, यदि उसका पतन हुआ भी तो

वह सहायकोंको पाकर शीघ्र ही उठ खड़ा होता है ।। २८ ।।
अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः ।
राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ।। २९ ।।
जिसमें क्रोधका अभाव होता है, जो दुर्व्यसनोंसे दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा जो अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा लेता है, वह राजा हिमालयके समान सम्पूर्ण प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है ।। २९ ।।
प्राज्ञस्त्यागगुणोपेतः पररन्ध्रेषु तत्परः ।
सुदर्शः सर्ववर्णानां नयापनयवित् तथा ।। ३० ।।
क्षिप्रकारी जितक्रोधः सुप्रसादो महामनाः ।
अरोषप्रकृतियुक्तः क्रियावानविकत्थनः ।। ३१ ।।
आरब्धान्येव कार्याणि सुपर्यवसितानि च ।
यस्य सङ्गः प्रदृश्यन्ति स राजा राजसत्तमः ।। ३२ ।।
जो बुद्धिमान्, त्यागी, शत्रुओंकी दुर्बलता जाननेके प्रयत्नमें तत्पर, देखनेमें सुन्दर, सभी वर्णोंके न्याय और अन्यायको समझनेवाला, शीघ्र कार्य करनेमें समर्थ, क्रोधपर विजय पानेवाला, आश्रितोंपर कृपा करनेवाला, महामनस्वी, कोमल स्वभावसे युक्त, उद्योगी, कर्मठ तथा आत्मप्रशंसासे दूर रहनेवाला है, जिस राजाके आरम्भ किये हुए सभी कार्य सुन्दर रूपसे समाप्त होते दिखायी देते हैं, वह समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।।
पुत्रा इव पितुर्गेहे विषये यस्य मानवाः ।
निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः ।। ३३ ।।
जैसे पुत्र अपने पिताके घरमें निर्भीक होकर रहते हैं, उसी प्रकार जिस राजाके राज्यमें मनुष्य निर्भय होकर विचरते हैं, वह सब राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३३ ।।
अगूढविभवा यस्य पौरा राष्ट्रनिवासिनः ।
नयापनयवेत्तारः स राजा राजसत्तमः ।। ३४ ।।
जिसके राज्य अथवा नगरमें निवास करनेवाले लोग (चोरोंसे भय न होनेके कारण) अपने धनको छिपाकर न रखते हों तथा न्याय और अन्यायको समझते हों, वह राजा समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३४ ।।
स्वकर्मनिरता यस्य जना विषयवासिनः ।
असंघातारता दान्ताः पाल्यमाना यथाविधि ।। ३५ ।।
वश्या नेया विधेयाश्च न च संघर्षशीलिनः ।
विषये दानरुचयो नरा यस्य स पार्थिवः ।। ३६ ।।
जिसके राज्यमें निवास करनेवाले लोग विधिपूर्वक सुरक्षित एवं पालित होकर अपने-अपने कर्ममें संलग्न, शरीरमें आसक्ति न रखनेवाले और जितेन्द्रिय हों, अपने वशमें रहते

हों, शिक्षा देने और ग्रहण करने योग्य हों, आज्ञा पालन करते हों, कलह और विवादसे दूर रहते हों और दान देनेकी रुचि रखते हों, वह राजा श्रेष्ठ है ।। ३५—३६ ।।

न यस्य कूटं कपटं न माया न च मत्सरः ।
विषये भूमिपालस्य तस्य धर्मः सनातनः ।। ३७ ।।
जिस भूपालके राज्यमें कूटनीति, कपट, माया तथा ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो उसीके द्वारा सनातन धर्मका पालन होता है ।। ३७ ।।

यः सत्करोति ज्ञानानि ज्ञेये परहिते रतः ।
सतां वर्त्मानुगस्त्यागी स राजा राज्यमर्हति ।। ३८ ।।
जो ज्ञान एवं ज्ञानियोंका सत्कार करता है, शास्त्रके ज्ञातव्य विषयको समझने तथा परहित-साधन करनेमें संलग्न रहता है, सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाला और स्वार्थत्यागी है, वही राजा राज्य चलानेके योग्य समझा जाता है ।। ३८ ।।

यस्य चाराश्च मन्त्राश्च नित्यं चैव कृताकृताः ।
न ज्ञायन्ते हि रिपुभिः स राजा राज्यमर्हति ।। ३९ ।।
जिसके गुप्तचर, गुप्त विचार, निश्चय किए हुए करने योग्य कर्म और किये हुए कर्म शत्रुओंद्वारा कभी जाने न जा सकें, वही राजा राज्य पानेका अधिकारी है ।।

श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना ।
आख्याते राजचरिते नृपतिं प्रति भारत ।। ४० ।।
भारत! महात्मा भार्गवने पूर्वकालमें किसी राजाके प्रति राजोचित कर्तव्यका वर्णन करते समय इस श्लोकका गान किया था ।। ४० ।।

राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् ।
राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ।। ४१ ।।
‘मनुष्य पहले राजाको प्राप्त करे। उसके बाद पत्नीका परिग्रह और धनका संग्रह करे। लोकरक्षक राजाके न होनेपर कैसे भार्या सुरक्षित रहेगी और किस तरह धनकी रक्षा हो सकेगी?’ ।। ४१ ।।

तद्राज्ये राज्यकामानां नान्यो धर्मः सनातनः ।
ऋते रक्षां तु विस्पष्टां रक्षा लोकस्य धारिणी ।। ४२ ।।
राज्य चाहनेवाले राजाओंके लिये राज्यमें प्रजाओंकी भलीभाँति रक्षाको छोड़कर और कोई सनातन धर्म नहीं है, रक्षा ही जगत्को धारण करनेवाली है ।। ४२ ।।

प्राचेतसेन मनुना श्लोकौ चेमावुदाहृतौ ।
राजधर्मेषु राजेन्द्र ताविहैकमनाः शृणु ।। ४३ ।।
राजेन्द्र! प्राचेतस मनुने राजधर्मके विषयमें ये दो श्लोक कहे हैं। तुम एकचित होकर उन दोनों श्लोकोंको यहाँ सुनो ।। ४३ ।।

षडेतान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे ।

अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥ ४४ ॥
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम् ।
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥ ४५ ॥
‘जैसे समुद्रकी यात्रामें टूटी हुई नौकाका त्याग कर दिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्यको चाहिये कि वह उपदेश न देनेवाले आचार्य, वेदमन्त्रोंका उच्चारण न करनेवाले ऋत्विज्, रक्षा न कर सकने-वाले राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, गाँवमें रहनेकी इच्छा रखनेवाले ग्वाले और जंगलमें रहनेकी कामना करनेवाले नाई—इन छः व्यक्तियोंका त्याग कर दे’ ॥ ४४-४५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥


* यदि शत्रुपर चढ़ाई की जाय और वह अपनेसे बलवान् सिद्ध हो तो उससे मेल कर लेना ‘सन्धि’ नामक गुण है। यदि दोनोंमें समान बल हो तो लड़ाई जारी रखना ‘विग्रह’ है। यदि शत्रु दुर्बल हो तो उस अवस्थामें उसके दुर्ग आदिपर जो आक्रमण किया जाता है, उसे ‘यान’ कहते हैं। यदि अपने ऊपर शत्रु की ओरसे आक्रमण हो और शत्रु का पक्ष प्रबल जान पड़े तो उस समय अपनेको दुर्ग आदिमें छिपाये रखकर जो आत्मरक्षा की जाती है, वह ‘आसन’ कहलाता है। यदि चढ़ाई करनेवाला शत्रु मध्यम श्रेणीका हो तो ‘द्वैधीभाव’ का सहारा लिया जाता है। उसमें ऊपरसे दूसरा भाव दिखाया जाता है और भीतर दूसरा ही भाव रखा जाता है। जैसे आधी सेना दुर्गमें रखकर आत्मरक्षा करना और आधीको भेजकर शत्रुओंके अन्न आदि सामग्रीपर कब्जा करना आदि कार्य ‘द्वैधीभाव’ नीतिके अन्तर्गत हैं। आक्रमणकारीसे पीड़ित होनेपर किसी मित्र राजाका सहारा लेकर उसके साथ लड़ाई छेड़ना ‘समाश्रय’ कहलाता है।

* मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग (किला), खजाना और दण्ड—ये पाँच ‘प्रकृति’ कहे गये हैं। ये ही अपने और शत्रुपक्षके मिलाकर ‘दशवर्ग’ कहलाते हैं, यदि दोनोंके मन्त्री आदि समान हों तो ये स्थानके हेतु होते हैं। अर्थात् दोनों पक्षकी स्थिति कायम रहती है, अगर अपने पक्षमें इनकी अधिकता हो तो ये वृद्धिके साधक होते हैं और कमी हो तो क्षयके कारण बनते हैं।