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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

युधिष्ठिरने पूछा— दादाजी! जप करनेवालेको उसके दोषोंके कारण किस तरहके नरककी प्राप्ति होती है? उसका मुझसे वर्णन कीजिये। राजन्! उसे जाननेके लिये मेरे मनमे

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अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

परमधामके अधिकारी जापकके लिये देवलोक भी नरक-तुल्य हैं—इसका प्रतिपादन

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशं निरयं याति जापको वर्णयस्व मे ।
कौतूहलं हि राजन् मे तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— दादाजी! जप करनेवालेको उसके दोषोंके कारण किस तरहके नरककी प्राप्ति होती है? उसका मुझसे वर्णन कीजिये। राजन्! उसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है; अतः आप अवश्य बतावें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

धर्मस्यांशप्रसूतोऽसि धर्मिष्ठोऽसि स्वभावतः ।
धर्ममूलाश्रयं वाक्यं शृणुष्वावहितोऽनघ ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— अनघ! तुम धर्मके अंशसे उत्पन्न हुए हो और स्वभावसे ही धर्मनिष्ठ हो; अतः सावधान होकर धर्मके मूलभूत वेद और परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली मेरी बात सुनो ॥ २ ॥

अमूनि यानि स्थानानि देवानां परमात्मनाम् ।
नानासंस्थानवर्णानि नानारूपफलानि च ॥ ३ ॥
दिव्यानि कामचारीणि विमानानि सभास्तथा ।
आक्रीडा विविधा राजन् पद्मिन्यश्चैव काञ्चनाः ॥ ४ ॥

परम बुद्धिमान् देवताओंके ये जो स्थान बताये जाते हैं, उनके रूप-रंग अनेक प्रकारके हैं। फल भी नाना प्रकारके हैं। देवताओंके यहाँ इच्छानुसार विचरनेवाले दिव्य विमान तथा दिव्य सभाएँ होती हैं। राजन्! उनके यहाँ नाना प्रकारके क्रीडास्थल तथा सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित बावलियाँ होती हैं ॥ ३-४ ॥

चतुर्णां लोकपालानां शुक्रस्याथ बृहस्पतेः ।
मरुतां विश्वेदेवानां साध्यानामश्विनोरपि ॥ ५ ॥
रुद्रादित्यवसूनां च तथान्येषां दिवौकसाम् ।
एते वै निरयास्तात स्थानस्य परमात्मनः ॥ ६ ॥

तात! वरुण, कुबेर, इन्द्र और यमराज—इन चारों लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु तथा अन्य देवताओंके जो ऐसे ही लोक हैं, वे सब परमात्माके परमधामके सामने नरक ही हैं ।। ५-६ ।।

अभयं चानिमित्तं च न तत् क्लेशसमावृतम् ।
द्वाभ्यां मुक्तं त्रिभिर्मुक्तमष्टाभिस्त्रिभिरेव च ।। ७ ।।

परमात्माका परमधाम विनाशके भयसे रहित है; क्योंकि वह कारणरहित नित्य-सिद्ध है। वह अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक पाँच क्लेशोंसे घिरा हुआ नहीं है। उसमें प्रिय और अप्रिय ये दो भाव नहीं हैं³। प्रिय और अप्रियके हेतुभूत तीन गुण—सत्त्व, रज और तम भी नहीं हैं तथा वह परमधाम भूत, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, उपासना, कर्म, प्राण और अविद्या—इन आठ पुरियोंसे³ भी मुक्त है। वहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—इस त्रिपुटीका भी अभाव है ।। ७ ।।

चतुर्लक्षणवर्जं तु चतुष्कारणवर्जितम् ।
अप्रहर्षमनानन्दमशोकं विगतक्लमम् ।। ८ ।।

इतना ही नहीं, वह दृष्टि, श्रुति, मति और विज्ञाति-इन चार लक्षणोंसे रहित है³। ज्ञानके कारणभूत प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—इन चारोंसे वह परे है। वहाँ इष्ट विषयकी प्राप्तिसे होनेवाले हर्ष और उसके भोगजनित आनन्दका भी अभाव है। वह शोक और श्रमसे भी सर्वथा रहित है ।। ८ ।।

कालः सम्पद्यते तत्र कालस्तत्र न वै प्रभुः ।
स कालस्य प्रभू राजन् स्वर्गस्यापि तथेश्वरः ।। ९ ।।

राजन्! कालकी उत्पत्ति भी वहींसे होती है। उस धामपर कालकी प्रभुता नहीं चलती। वह परमात्मा कालका भी स्वामी और स्वर्गका भी ईश्वर है ।। ९ ।।

आत्मकेवलतां प्राप्तस्तत्र गत्वा न शोचति ।
ईदृशं परमं स्थानं निरयास्ते च तादृशाः ।। १० ।।

जो आत्मकैवल्यको प्राप्त हो चुका है वही मनुष्य वहाँ जाकर शोकसे रहित हो जाता है। उस परमधामका स्वरूप ऐसा ही है और पहले जो नाना प्रकारके सुखभोगोंसे सम्पन्न लोक बताये गये हैं, वे सभी उसकी तुलनामें नरक हैं ।। १० ।।

एते ते निरयाः प्रोक्ताः सर्व एव यथातथम् ।
तस्य स्थानवरस्येह सर्वे निरयसंज्ञिताः ।। ११ ।।

राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें यथार्थरूपसे ये सभी नरक बताये हैं। उस परमपदके सामने वस्तुतः वे सभी लोक ‘नरक’ ही कहलाने योग्य हैं ।। ११ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने अष्टनवतयधिकशततमोऽध्यायः ।। १९८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९८ ।।


१-श्रुति भी कहती है—‘अशरीरं वावसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः।’
२-आठ पुरियोंका बोधक वचन इस प्रकार उपलब्ध होता है—
भूतेन्द्रियमनोबुद्धिवासनाकर्मवायवः । अविद्या चेत्यमुं वर्गमाहुः पुर्यष्टकं बुधाः ।।
३-इन लक्षणोंका नाम-निर्देश श्रुतिमें इस प्रकार किया गया है—‘न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयान्न मतेर्मन्तारमन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ।