महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवाद, श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवाद, श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश
युधिष्ठिर उवाच
किमिदं परमाश्चर्यं ध्यायस्यमितविक्रम ।
कच्चिल्लोकत्रयस्यास्य स्वस्ति लोकपरायण ॥ १ ॥
चतुर्थं ध्यानमार्गं त्वालम्ब्य पुरुषर्षभ ।
अपक्रान्तो यतो देवस्तेन मे विस्मितं मनः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— अमितपराक्रमी, जगत्के आश्रयदाता पुरुषोत्तम! आप यह किसका ध्यान कर रहे हैं? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! इस त्रिलोकीका कुशल तो है न? आप तो जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीय ध्यानमार्गका आश्रय लेकर स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे ऊपर उठ गये हैं। इससे मेरे मनको बड़ा आश्चर्य हो रहा है ॥ १-२ ॥
निगृहीतो हि वायुस्ते पञ्चकर्मा शरीरगः ।
इन्द्रियाणि प्रसन्नानि मनसि स्थापितानि ते ॥ ३ ॥
आपके शरीरमें रहनेवाली और श्वास-प्रश्वास आदि पाँच कर्म करनेवाली प्राणवायु अवरुद्ध हो गयी है। आपने अपनी प्रसन्न इन्द्रियोंको मनमें स्थापित कर दिया है ॥ ३ ॥
वाक् च सत्त्वं च गोविन्द बुद्धौ संवेशितानि ते ।
सर्वे चैव गुणा देवाः क्षेत्रज्ञे ते निवेशिताः ॥ ४ ॥
गोविन्द! मन तथा वाक् आदि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ आपके द्वारा बुद्धिमें लीन कर दी गयी हैं। समस्त गुणोंको और इन्द्रियोंके अनुग्राहक देवताओंको आपने क्षेत्रज्ञ आत्मामें स्थापित कर दिया है ॥ ४ ॥
नेङ्गन्ति तव रोमाणि स्थिरा बुद्धिस्तथा मनः ।
काष्ठकुड्यशिलाभूतो निरीहश्चासि माधव ॥ ५ ॥
आपके रोंगटे खड़े हो गये हैं। जरा भी हिलते नहीं हैं। बुद्धि तथा मन भी स्थिर हैं। माधव! आप काठ, दीवार और पत्थरकी तरह निश्चेष्ट हो गये हैं ॥ ५ ॥
यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलते पुनः ।
तथासि भगवन् देव पाषाण इव निश्चलः ॥ ६ ॥
भगवन्! देवदेव! जैसे वायुशून्य स्थानमें रखे हुए दीपककी लौ काँपती नहीं, एकतार जलती रहती है, उसी तरह आप भी स्थिर हैं मानो पाषाणकी मूर्ति हों ॥
यदि श्रोतुमिहार्हामि न रहस्यं च ते यदि ।
छिन्धि मे संशयं देव प्रपन्नायाभियाचते ॥ ७ ॥
देव! यदि मैं सुननेका अधिकारी होऊँ और यदि यह आपका कोई गोपनीय रहस्य न हो तो मेरे इस संशयका निवारण कीजिये; इसके लिये मैं आपकी शरणमें आकर बारंबार याचना करता हूँ ॥ ७ ॥
त्वं हि कर्ता विकर्ता च क्षरं चैवाक्षरं च हि ।
अनादिनिधनश्चाद्यस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥ ८ ॥
पुरुषोत्तम! आप ही इस जगत्को बनाने और विलीन करनेवाले हैं। आप ही क्षर और अक्षर पुरुष हैं। आपका न आदि है और न अन्त। आप ही सबके आदि कारण हैं ॥ ८ ॥
त्वत्प्रपन्नाय भक्ताय शिरसा प्रणताय च ।
ध्यानस्यास्य यथा तत्त्वं ब्रूहि धर्मभृतां वर ॥ ९ ॥
मैं आपकी शरणमें आया हुआ भक्त हूँ और माथा टेककर आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रभो! इस ध्यानका यथार्थ तत्त्व मुझे बता दीजिये ॥
ततः स्वे गोचरे न्यस्य मनोबुद्धीन्द्रियाणि सः ।
स्मितपूर्वमुवाचेदं भगवान् वासवानुजः ॥ १० ॥
युधिष्ठिरकी यह प्रार्थना सुनकर मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंको अपने स्थानमें स्थापित करके इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए इस प्रकार बोले ॥ १० ॥