महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ
अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ कुरूणां प्रीतिवर्धन ।
प्रश्नं कञ्चित् प्रवक्ष्यामि तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— कौरवकुलकी प्रीति बढ़ानेवाले महाज्ञानी पितामह! मैं कुछ और प्रश्न आपके सामने उपस्थित कर रहा हूँ। मेरे उन प्रश्नोंका विवेचन कीजिये ॥ १ ॥
कीदृशा मानवाः सौम्याः कैः प्रीतिः परमा भवेत् ।
आयत्यां च तदात्वे च के क्षमास्तान् वदस्व मे ॥ २ ॥
सौम्य स्वभावके मनुष्य कैसे होते हैं? किनके साथ प्रेम करना उत्तम होता है? वर्तमान और भविष्यमें कौन-से मनुष्य उपकार करनेमें समर्थ होते हैं? उन सबका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
न हि तत्र धनं स्फीतं न च सम्बन्धिबान्धवाः ।
तिष्ठन्ति यत्र सुहृदस्तिष्ठन्तीति मतिर्मम ॥ ३ ॥
मेरी तो यह धारणा है कि जिस स्थानपर सुहृद् खड़े होते हैं वहाँ न तो प्रचुर धन काम दे सकता है और न सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव ही ठहर सकते हैं ॥ ३ ॥
दुर्लभो हि सुहृच्छ्रोता दुर्लभश्च हितः सुहृत् ।
एतद् धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४ ॥
हितकी बात सुननेवाला सुहृद् दुर्लभ है तथा हितकारी सुहृद् भी दुर्लभ ही है। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! इन सब प्रश्नोंका आप विशद विवेचन कीजिये ॥
भीष्म उवाच
संधेयान् पुरुषान् राजन्नसंधेयांश्च तत्त्वतः ।
वदतो मे निबोध त्वं निखिलेन युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा— राजा युधिष्ठिर! किनके साथ संधि (मित्रता) करनी चाहिये और किनके साथ नहीं? यह बात मैं तुम्हें ठीक-ठीक बता रहा हूँ। तुम सब कुछ ध्यान देकर सुनो ॥ ५ ॥
लुब्धः क्रूरस्त्यक्तधर्मा निकृतिः शठ एव च ।
क्षुद्रः पापसमाचारः सर्वशङ्की तथालसः ॥ ६ ॥
दीर्घसूत्रोऽनृजुः कृशो गुरुदारप्रधर्षकः ।
व्यसने यः परित्यागी दुरात्मा निरपत्रपः ॥ ७ ॥
सर्वतः पापदर्शी च नास्तिको वेदनिन्दकः ।
सम्पर्कीर्णेन्द्रियो लोके यः कामं निरतश्चरेत् ॥ ८ ॥
असत्यो लोकविद्विष्टः समये चानवस्थितः ।
पिशुनोऽथाकृतप्रज्ञो मत्सरी पापनिश्चयः ॥ ९ ॥
दुःशीलोऽथाकृतात्मा च नृशंसः कितवस्तथा ।
मित्रैरपकृतिर्नित्यमिच्छतेऽर्थं परस्य यः ॥ १० ॥
ददतश्च यथाशक्ति यो न तुष्यति मन्दधीः ।
अधैर्यमपि यो युङ्क्ते सदा मित्रं नरर्षभ ॥ ११ ॥
अस्थानक्रोधनोऽयुक्तो यश्चाकस्माद् विरुध्यते ।
सुहृदश्चैव कल्याणानाशु त्यजति किल्बिषी ॥ १२ ॥
अल्पेऽप्यपकृते मूढस्तथाज्ञानात् कृतेऽपि च ।
कार्यसेवी च मित्रेषु मित्रद्वेषी नराधिप ॥ १३ ॥
शत्रुर्मित्रमुखो यश्च जिह्मप्रेक्षी विलोचनः ।
न विरज्यति कल्याणे यस्त्यजेत् तादृशं नरम् ॥ १४ ॥
पानपो द्वेषणः क्रोधी निर्घृणः परुषस्तथा ।
परोपतापी मित्रध्रुक् तथा प्राणिवधे रतः ॥ १५ ॥
कृतघ्नश्चाधमो लोके न संधेयः कदाचन ।
छिद्रान्वेषी ह्यसंधेयः संधेयानपि मे शृणु ॥ १६ ॥
जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निन्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात् विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंसे मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें
तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो ।। ६-१६ ।।
कुलीना वाक्यसम्पन्ना ज्ञानविज्ञानकोविदाः ।
रूपवन्तो गुणोपेतास्तथाऽलुब्धा जितश्रमाः ।। १७ ।।
सन्मित्राश्च कृतज्ञाश्च सर्वज्ञा लोभवर्जिताः ।
माधुर्यगुणसम्पन्नाः सत्यसंधा जितेन्द्रियाः ।। १८ ।।
व्यायामशीला सततं कुलपुत्राः कुलोद्वहाः ।
दोषैः प्रमुक्ताः प्रथिातास्ते ग्राह्याः पार्थिवैर्नराः ।। १९ ।।
जो कुलीन, बोलनेमें समर्थ, ज्ञान-विज्ञानमें कुशल, रूपवान्, गुणवान्, लोभहीन, काम करनेसे कभी न थकनेवाले, अच्छे मित्रोंसे सम्पन्न, कृतज्ञ, सर्वज्ञ, लोभसे दूर रहनेवाले, मधुरस्वभाववाले, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, सदा व्यायामशील, उत्तम कुलकी संतान, अपने कुलका भार वहन करनेमें समर्थ, दोषशून्य तथा लोकमें विख्यात हों—ऐसे मनुष्योंको राजा अपना मित्र बनावे ।। १७-१९ ।।
यथाशक्ति समाचाराः सम्प्रतुष्यन्ति हि प्रभो ।
नास्थाने क्रोधवन्तश्च न चाकस्माद् विरागिणः ।
विरक्ताश्च न दुष्यन्ति मनसाप्यर्थकोविदाः ।। २० ।।
आत्मानं पीडयित्वापि सुहृत्कार्यपरायणाः ।
विरज्यन्ति न मित्रेभ्यो वासो रक्तमिवाविकम् ।। २१ ।।
क्रोधाच्च लोभमोहाभ्यां नानर्थे युवतीषु च ।
न दर्शयन्ति सुहृदो विश्वस्ता धर्मवत्सलाः ।। २२ ।।
लोष्टकाञ्चनतुल्यार्थाः सुहृत्सु दृढबुद्धयः ।
ये चरन्त्यभिमानानि सृष्टार्थमनुषङ्गिनः ।। २३ ।।
संगृह्णन्तः परिजनं स्वाम्यर्थपरमाः सदा ।
ईदृशैः पुरुषश्रेष्ठैर्यः संधिं कुरुते नृपः ।। २४ ।।
तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ।
प्रभो! जो अपनी शक्तिके अनुसार कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करते और संतुष्ट रहते
हैं, जिन्हें बेमौके क्रोध नहीं आता, जो अकस्मात् स्नेहका त्याग नहीं करते, जो उदासीन हो
जानेपर भी मनसे कभी बुराई नहीं चाहते, अर्थके तत्त्वको समझते हैं और अपनेको कष्टमें
डालकर भी हितैषी पुरुषोंका कार्य सिद्ध करते हैं। जैसे रँगा हुआ ऊनी कपड़ा अपने रंग
नहीं छोड़ता, उसी प्रकार जो मित्रकी ओरसे विरक्त नहीं होते हैं, जो क्रोधवश मित्रका अनर्थ
करनेमें प्रवृत्त नहीं होते हैं तथा लोभ और मोहके वशीभूत हो मित्रकी युवतियोंपर अपनी
आसक्ति नहीं दिखाते, जो मित्रके विश्वासपात्र और धर्मके प्रति अनुरक्त हैं, जिनकी दृष्टिमें
मिट्टीका ढेला और सोना दोनों एक-से हैं, जो सदा सुहृदोंके प्रति सुस्थिर बुद्धि रखनेवाले हैं,
सबके लिये प्रमाणभूत शास्त्रोंके अनुसार चलते हैं और प्रारब्धवश प्राप्त हुए धनमें ही संतुष्ट
रहते हैं, जो कुटुम्बका संग्रह रखते हुए सदा अपने सुहृद् एवं स्वामीके कार्य-साधनमें तत्पर
रहते हैं—ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ जो राजा संधि (मेल) करता है, उसका राज्य उसी तरह
बढ़ता है, जैसे चन्द्रमाकी चाँदनी ।। २०-२४ १/२ ।।
शास्त्रनित्या जितक्रोधा बलवन्तो रणे सदा ।। २५ ।।
जन्मशीलगुणोपेताः संधेयाः पुरुषोत्तमाः ।
जो प्रतिदिन शास्त्रोंका स्वाध्याय करते हैं, क्रोधको काबूमें रखते हैं और युद्धमें सदा
प्रबल रहते हैं। जिनका उत्तम कुलमें जन्म हुआ है, जो शीलवान् और श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हैं,
वे श्रेष्ठ पुरुष ही मित्र बनानेके योग्य होते हैं ।। २५ १/२ ।।
ये च दोषसमायुक्ता नराः प्रोक्ता मयानघ ।। २६ ।।
तेषामप्यधमा राजन् कृतघ्ना मित्रघातकाः ।
त्यक्तव्यास्तु दुराचाराः सर्वेषामिति निश्चयः ।। २७ ।।
निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न। वे
मित्रोंकी हत्यातक कर डालते हैं। ऐसे दुराचारी नराधमोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये। यह
सबका निश्चय है ।। २६-२७ ।।
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेणाथ सम्बन्धं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यः प्रोक्तस्तद् वदस्व मे ।। २८ ।।
युधिष्ठिरने कहा—पितामह! आपने जिसे मित्रद्रोही और कृतघ्न कहा है, उसका
यथार्थ इतिहास क्या है? यह मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, आप कृपा करके मुझे
बताइये ।। २८ ।।
भीष्म उवाच
हन्त ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
उदीच्यां दिशि यद् वृत्तं म्लेच्छेषु मनुजाधिप ।। २९ ।।
**भीष्मजीने कहा—**नरेश्वर! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें एक पुराना इतिहास बता रहा हूँ। यह घटना उत्तरदिशामें म्लेच्छोंके देशमें घटित हुई थी॥ २९॥
ब्राह्मणो मध्यदेशीयः कश्चिद् वै ब्रह्मवर्जितः।
ग्रामं वृद्धियुतं वीक्ष्य प्राविशद् भैक्ष्यकांक्षया॥ ३०॥
मध्यदेशका एक ब्राह्मण, जिसने वेद बिलकुल नहीं पढ़ा था, कोई सम्पन्न गाँव देखकर उसमें भीख माँगनेके लिये गया॥ ३०॥
तत्र दस्युर्धनयुतः सर्ववर्णविशेषवित्।
ब्रह्मण्यः सत्यसंधश्च दाने च निरतोऽभवत्॥ ३१॥
उस गाँवमें एक धनी डाकू रहता था, जो समस्त वर्णोंकी विशेषताका जानकार था। उसके हृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति थी। वह सत्यप्रतिज्ञ और दानी था॥ ३१॥
तस्य क्षयमुपागम्य ततो भिक्षामयाचत।
प्रतिश्रयं च वासार्थं भिक्षां चैवाथ वार्षिकीम्॥ ३२॥
प्रादात् तस्मै स विप्राय वस्त्रं च सदृशं नवम्।
नारीं चापि वयोपेतां भर्त्रा विरहितां तथा॥ ३३॥
ब्राह्मणने उसीके घर जाकर भिक्षाके लिये याचना की। दस्युने ब्राह्मणको रहनेके लिये एक घर देकर वर्षभर निर्वाह करनेके योग्य अन्नकी भिक्षाका प्रबन्ध कर दिया, उपयुक्त नया वस्त्र दिया और उसकी सेवामें एक युवती दासी भी दे दी, जो उस समय पतिसे रहित थी॥ ३२-३३॥
एतत् सम्प्राप्य हृष्टात्मा दस्योः सर्वं द्विजस्तथा।
तस्मिन् गृहवरे राजंस्तया रेमे स गौतमः॥ ३४॥
राजन्! दस्युसे ये सारी वस्तुएँ पाकर ब्राह्मण मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ; और उस सुन्दर गृहमें दासीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा॥ ३४॥
कुटुम्बार्थं च दास्याश्च साहाय्यं चाप्यथाकरोत्।
तत्रावसत् स वर्षांश्च समृद्धे शबरालये॥ ३५॥
वह दासीके कुटुम्बके लिये कुछ सहायता भी करने लगा। ब्राह्मणने भीलके उस समृद्धिशाली भवनमें अनेक वर्षोंतक निवास किया॥ ३५॥
बाणवेधे परं यत्नमकरोच्चैव गौतमः।
चक्राङ्गानन् स च नित्यं वै सर्वतो वनगोचरान्॥ ३६॥
जघान गौतमो राजन् यथा दस्युगणास्तथा।
हिंसापटुर्धृणाहीनः सदा प्राणिवधे रतः॥ ३७॥
उसका नाम गौतम था। उसने बाण चलाकर लक्ष्य बेधनेका वहाँ बड़े यत्नके साथ अभ्यास किया। राजन्! गौतम भी दस्युओंकी तरह प्रतिदिन जंगलमें सब ओर घूम-फिरकर
हंसोंका शिकार करने लगा। वह हिंसामें बड़ा प्रवीण था। उसमें दया नहीं थी। वह सदा प्राणियोंको मारनेकी ही ताकमें लगा रहता था ।। ३६-३७ ।।
गौतमः संनिकर्षेण दस्युभिः समतामियात् ।
तथा तु वसतरतस्य दस्युग्रामे सुखं तदा ।। ३८ ।।
अगमन् बहवो मासा निघ्नतः पक्षिणो बहून् ।
डाकुओंके सम्पर्कमें रहनेसे गौतम भी उनके ही समान पूरा डाकू बन गया। डाकुओंके गाँवमें सुखपूर्वक रहकर प्रतिदिन बहुत-से पक्षियोंका शिकार करते हुए उसके कई महीने बीत गये ।। ३८ १/२ ।।
ततः कदाचिदपरो द्विजस्तं देशमागतः ।। ३९ ।।
जटाचीराजिनधरः स्वाध्यायपरमः शुचिः ।
विनीतो नियताहारो ब्रह्मण्यो वेदपारगः ।। ४० ।।
तदनन्तर एक दिन कोई दूसरा ब्राह्मण उस गाँवमें आया जो जटा, वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए था। वह स्वाध्यायपरायण, पवित्र, विनयी, नियमके अनुकूल भोजन करनेवाला, ब्राह्मणभक्त तथा वेदोंका पारङ्गत विद्वान् था ।। ३९-४० ।।
स ब्रह्मचारी तद्देश्यः सखा तस्यैव सुप्रियः ।
तं दस्युग्राममगमद् यत्रासौ गौतमोऽवसत् ।। ४१ ।।
वह ब्रह्मचारी ब्राह्मण गौतमके ही गाँवका निवासी तथा उसका परमप्रिय मित्र था और घूमता हुआ डाकुओंके उसी गाँवमें जा पहुँचा था, जहाँ गौतम निवास करता था ।। ४१ ।।
स तु विप्रगृहान्tableवेषी शूद्रान्नपरिवर्जकः ।
ग्रामे दस्युसमाकीर्णे व्यचरत् सर्वतोदिशम् ।। ४२ ।।
वह शूद्रका अन्न नहीं खाता था; इसलिये दस्युओंसे भरे हुए उस गाँवमें ब्राह्मणके घरकी तलाश करता हुआ सब ओर घूमने लगा ।। ४२ ।।
ततः स गौतमगृहं प्रविवेश द्विजोत्तमः ।
गौतमश्चापि सम्प्राप्तस्तावन्त्योन्येन संगतौ ।। ४३ ।।
घूमता-घामता वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गौतमके घरपर गया, इतनेहीमें गौतम भी शिकारसे लौटकर वहाँ आ पहुँचा। उन दोनोंकी एक-दूसरेसे भेंट हुई ।। ४३ ।।
चक्राङ्गभारस्कन्धं तं धनुष्पाणिं धृतायुधम् ।
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं गृहद्वारमुपागतम् ।। ४४ ।।
तं दृष्ट्वा पुरुषादाभमपध्वस्तं क्षयागतम् ।
अभिज्ञाय द्विजो व्रीडन्निदं वाक्यमथाब्रवीत् ।। ४५ ।।
ब्राह्मणने देखा, गौतमके कंधेपर मारे गये हंसकी लाश है, हाथमें धनुष और बाण है, सारा शरीर रक्तसे सींच उठा है, घरके दरवाजेपर आया हुआ गौतम नरभक्षी राक्षसके समान जान पड़ता है; और ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट हो चुका है। उसे इस अवस्थामें घरपर आया
देख ब्राह्मणने पहचान लिया। पहचानकर वे बड़े लज्जित हुए और उससे इस प्रकार बोले — ॥ ४४-४५ ॥
किमिदं कुरुषे मोहाद् विप्रस्त्वं हि कुलोद्वहः ।
मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गतः कथम् ॥ ४६ ॥
‘अरे! तू मोहवश यह क्या कर रहा है? तू तो मध्यदेशका विख्यात एवं कुलीन ब्राह्मण था। यहाँ डाकू कैसे बन गया? ॥ ४६ ॥
पूर्वान् स्मर द्विज ज्ञातीन् प्रख्यातान् वेदपारगान् ।
तेषां वंशेऽभिजातस्त्वमीदृशः कुलपांसनः ॥ ४७ ॥
‘ब्रह्मन्! अपने पूर्वजोंको तो याद कर। उनकी कितनी ख्याति थी। वे कैसे वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे और तू उन्हींके वंशमें पैदा होकर ऐसा कुलकलङ्क निकला ॥ ४७ ॥
अवबुध्यात्मनाऽऽत्मानं सत्त्वं शीलं श्रुतं दमम् ।
अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज ॥ ४८ ॥
‘अब भी तो अपने-आपको पहचान! तू द्विज है; अतः द्विजोचित सत्त्व, शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दयाभावको याद करके अपने इस निवासस्थानको त्याग दे’ ॥ ४८ ॥
स एवमुक्तः सुहृदा तेन तत्र हितैषिणा ।
प्रत्युवाच ततो राजन् विनिश्चित्य तदार्तवत् ॥ ४९ ॥
राजन्! अपने उस हितैषी सुहृद्के इस प्रकार कहनेपर गौतम मन-ही-मन कुछ निश्चय करके आर्त-सा होकर बोला— ॥ ४९ ॥
निर्धनोऽस्मि द्विजश्रेष्ठ नापि वेदविदप्यहम् ।
वित्तार्थमिह सम्प्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ॥ ५० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! मैं निर्धन हूँ और वेदको भी नहीं जानता; अतः द्विजप्रवर! मुझे धन कमानेके लिये इधर आया हुआ समझें ॥ ५० ॥
त्वद्दर्शनात् तु विप्रेन्द्र कृतार्थोऽस्म्यद्य वै द्विज ।
आवां हि सह यास्यावः श्वो वसस्वाद्य शर्वरीम् ॥ ५१ ॥
‘विप्रेन्द्र! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। ब्रह्मन्! अब रातभर यहीं रहिये, कल सबेरे हम दोनों साथ ही चलेंगे’ ॥ ५१ ॥
स तत्र न्यवसद् विप्रो घृणी किञ्चिदसंस्पृशन् ।
क्षुधितश्छन्द्यमानोऽपि भोजनं नाभ्यनन्दत ॥ ५२ ॥
वह ब्राह्मण दयालु था। गौतमके अनुरोधसे उसके यहाँ ठहर गया, किंतु वहाँकी किसी भी वस्तुको हाथसे छूआ भी नहीं। यद्यपि वह भूखा था और भोजन करनेके लिये गौतमद्वारा उससे बड़ी अनुनय-विनय की गई तो भी किसी तरह वहाँका अन्न ग्रहण करना उसने स्वीकार नहीं किया ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥