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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन

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पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा दस्युः समर्यादः प्रेत्यभावे न नश्यति ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जो दस्यु (डाकू) मर्यादाका पालन करता है, वह मरनेके बाद दुर्गतिमें नहीं पड़ता। इस विषयमें विद्वान् पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥

प्रहर्ता मतिमान् शूरः श्रुतवाननृशंसवान् ।
रक्षन्नाश्रमिणां धर्मं ब्रह्मण्यो गुरुपूजकः ॥ २ ॥
निषाद्यां क्षत्रियाज्जातः क्षत्रधर्मानुपालकः ।
कायव्यो नाम नैषादिर्दस्युत्वात् सिद्धिमाप्तवान् ॥ ३ ॥
कायव्यनामसे प्रसिद्ध एक निषादपुत्रने दस्यु होनेपर भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी। वह प्रहारकुशल, शूरवीर, बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ, क्रूरतारहित, आश्रमवासियोंके धर्मकी रक्षा करनेवाला, ब्राह्मणभक्त और गुरुपूजक था। वह क्षत्रिय पितासे एक निषादजातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था; अतः क्षत्रियधर्मका निरन्तर पालन करता था ॥ २-३ ॥

अरण्ये सायं पूर्वाह्ने मृगयूथप्रकोपिता ।
विधिज्ञो मृगजातीनां नैषादानां च कोविदः ॥ ४ ॥
कायव्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालके समय वनमें जाकर मृगोंकी टोलियोंको उत्तेजित कर देता था। वह मृगोंकी विभिन्न जातियोंके स्वभावसे परिचित तथा उन्हें काबूमें करनेकी कलाको जाननेवाला था। निषादोंमें वह सबसे निपुण था ॥ ४ ॥

सर्वकाननदेशज्ञः पारियात्रचरः सदा ।
धर्मज्ञः सर्वभूतानाममोघेषुर्दृढायुधः ॥ ५ ॥
उसे वनके सम्पूर्ण प्रदेशोंका ज्ञान था। वह सदा पारियात्र पर्वतपर विचरनेवाला तथा समस्त प्राणियोंके धर्मोंका ज्ञाता था। उसका बाण लक्ष्य बेधनेमें अचूक था। उसके सारे अस्त्र-शस्त्र सुदृढ़ थे ॥ ५ ॥

अप्यनेकशतं सेनामेक एव जिगाय सः ।
स वृद्धावन्धबधिरौ महारण्येऽभ्यपूजयत् ॥ ६ ॥

वह सैकड़ों मनुष्योंकी सेनाको अकेले ही जीत लेता था और उस महान् वनमें रहकर अपने अन्धे और बहरे माता-पिताकी सेवा-पूजा किया करता था ॥ ६ ॥
मधुमांसैर्मूलफलैरन्नैरुच्चावचैरपि ।
सत्कृत्य भोजयामास मान्यान् परिचचार च ॥ ७ ॥
वह निषाद मधु, मांस, फल, मूल तथा नाना प्रकारके अन्नोंद्वारा माता-पिताको सत्कारपूर्वक भोजन कराता था तथा दूसरे-दूसरे माननीय पुरुषोंकी भी सेवा-पूजा किया करता था ॥ ७ ॥
आरण्यकान् प्रव्रजितान् ब्राह्मणान् परिपूजयन् ।
अपि तेभ्यो गृहान् गत्वा निनाय सततं वने ॥ ८ ॥
वह वनमें रहनेवाले वानप्रस्थ और संन्यासी ब्राह्मणोंकी पूजा करता और प्रतिदिन उनके घरमें जाकर उनके लिये अन्न आदि वस्तुएँ पहुँचा देता था ॥ ८ ॥
येऽस्मान्न प्रतिगृह्णन्ति दस्युभोजनशङ्कया ।
तेषामासज्य गेहेषु कल्प एव स गच्छति ॥ ९ ॥
जो लोग लुटेरेके घरका भोजन होनेकी आशंकासे उसके हाथसे अन्न नहीं ग्रहण करते थे, उनके घरोंमें वह बड़े सबेरे ही अन्न और फल-मूल आदि भोजन-सामग्री रख जाता था ॥ ९ ॥
बहूनि च सहस्राणि ग्रामणित्वेऽभिवव्रिरे ।
निर्मर्यादानि दस्यूनां निरनुक्रोशवर्तिनाम् ॥ १० ॥
एक दिन मर्यादाका अतिक्रमण और भाँति-भाँतिके क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले कई हजार डाकुओंने उससे अपना सरदार बननेके लिये प्रार्थना की ॥ १० ॥

दस्यव ऊचुः

मुहूर्तदेशकालज्ञः प्राज्ञः शूरो दृढव्रतः ।
ग्रामणीर्भव नो मुख्यः सर्वेषामेव सम्मतः ॥ ११ ॥
**डाकू बोले—**तुम देश, काल और मुहूर्तके ज्ञाता, विद्वान्, शूरवीर और दृढप्रतिज्ञ हो; इसलिये हम सब लोगोंकी सम्मतिसे तुम हमारे सरदार हो जाओ ॥ ११ ॥
यथा यथा वक्ष्यसि नः करिष्यामस्तथा तथा ।
पालयास्मान् यथान्यायं यथा माता यथा पिता ॥ १२ ॥
तुम हमें जैसी-जैसी आज्ञा दोगे, वैसा-ही-वैसा हम करेंगे। तुम माता-पिताके समान हमारी यथोचित रीतिसे रक्षा करो ॥ १२ ॥

कायव्य उवाच

मा वधीस्त्वं स्त्रियं भीरुं मा शिशुं मा तपस्विनम् ।
नायुद्धयमानो हन्तव्यो न च ग्राह्या बलात् स्त्रियः ॥ १३ ॥

कायव्यने कहा—प्रिय बन्धुओ! तुम कभी स्त्री, डरपोक, बालक और तपस्वीकी हत्या न करना। जो तुमसे युद्ध न कर रहा हो, उसका भी वध न करना। स्त्रियोंको कभी बलपूर्वक न पकड़ना ॥ १३ ॥
सर्वथा स्त्री न हन्तव्या सर्वसत्त्वेषु केनचित् ।
नित्यं तु ब्राह्मणे स्वस्ति योद्धव्यं च तदर्थतः ॥ १४ ॥
तुममेंसे कोई भी सभी प्राणियोंके स्त्रीवर्गकी किसी तरह भी हत्या न करे। ब्राह्मणोंके हितका सदा ध्यान रखना। आवश्यकता हो तो उनकी रक्षाके लिये युद्ध भी करना ॥ १४ ॥
शस्यं च नापि हर्तव्यं सारविघ्नं च मा कृथाः ।
पूज्यन्ते यत्र देवाश्च पितरोऽतिथयस्तथा ॥ १५ ॥
खेतकी फसल न उखाड़ लाना, विवाह आदि उत्सवोंमें विघ्न न डालना, जहाँ देवता, पितर और अतिथियोंकी पूजा होती हो, वहाँ कोई उपद्रव न खड़ा करना ॥ १५ ॥
सर्वभूतेष्वपि च वै ब्राह्मणो मोक्षमर्हति ।
कार्याचोपचितिस्तेषां सर्वस्वेनापि या भवेत् ॥ १६ ॥
समस्त प्राणियोंमें ब्राह्मण विशेषरूपसे डाकुओंके हाथसे छुटकारा पानेका अधिकारी है। अपना सर्वस्व लगाकर भी तुम्हें उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ॥ १६ ॥
यस्य ह्येते सम्प्ररुष्टा मन्त्रयन्ति पराभवम् ।
न तस्य त्रिषु लोकेषु त्राता भवति कश्चन ॥ १७ ॥
देखो, ब्राह्मणलोग कुपित होकर जिसके पराभवका चिन्तन करने लगते हैं, उसका तीनों लोकोंमें कोई रक्षक नहीं होता ॥ १७ ॥
यो ब्राह्मणान् परिवदेद् विनाशं चापि रोचयेत् ।
सूर्योदय इव ध्वान्ते ध्रुवं तस्य पराभवः ॥ १८ ॥
जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है और उनका विनाश चाहता है, उसका जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार अवश्य ही पतन हो जाता है ॥
इहैव फलमासीनः प्रत्याकाङ्क्षेत सर्वशः ।
ये ये नो न प्रदास्यन्ति तांस्तांस्तेनाभियास्यसि ॥ १९ ॥
तुम लोग यहीं बैठे-बैठे लुटेरेपनका जो फल है, उसे पानेकी अभिलाषा रखो। जो-जो व्यापारी हमें स्वेच्छासे धन नहीं देंगे, उन्हीं-उन्हींपर तुम दल बाँधकर आक्रमण करोगे ॥ १९ ॥
शिष्ट्यर्थं विहितो दण्डो न वृद्ध्यर्थं विनिश्चयः ।
ये च शिष्टान् प्रबाधन्ते दण्डस्तेषां वधः स्मृतः ॥ २० ॥
दण्डका विधान दुष्टोंके दमनके लिये है, अपना धन बढ़ानेके लिये नहीं। जो शिष्ट पुरुषोंको सताते हैं, उनका वध ही उनके लिये दण्ड माना गया है ॥ २० ॥
ये च राष्ट्रोपरोधेन वृद्धिं कुर्वन्ति केचन ।

तदैव तेऽनुमार्यन्ते कुणपे कृमयो यथा ॥ २१ ॥
जो लोग राष्ट्रको हानि पहुँचाकर अपनी उन्नतिका लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दोंमें पड़े हुए कीड़ोंके समान उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं ॥ २१ ॥
ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः ।
अपि ते दस्यवो भूत्वा क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥ २२ ॥
जो दस्युजातिमें उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्रके अनुसार आचरण करते हैं, वे लुटेरे होनेपर भी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं (ये सब बातें तुम्हें स्वीकार हों तो मैं तुम्हारा सरदार बन सकता हूँ) ॥ २२ ॥

भीष्म उवाच

ते सर्वमेवानुचक्रुः कायव्यस्यानुशासनम् ।
वृद्धिं च लेभिरे सर्वे पापेभ्यश्चाप्युपारमन् ॥ २३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! यह सुनकर उन दस्युओंने कायव्यकी सारी आज्ञा मान ली और सदा उसका अनुसरण किया। इससे उन सभीकी उन्नति हुई और वे पाप-कर्मोंसे हट गये ॥ २३ ॥
कायव्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् ।
साधूनामाचरन् क्षेमं दस्यून् पापान्निवर्तयम् ॥ २४ ॥
कायव्यने उस पुण्यकर्मसे बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली; क्योंकि उसने साधु पुरुषोंका कल्याण करते हुए डाकुओंको पापसे बचा लिया था ॥ २४ ॥
इदं कायव्यचरितं यो नित्यमनुचिन्तयेत् ।
नारण्येभ्यो हि भूतेभ्यो भयं प्राप्नोति किंचन ॥ २५ ॥
जो प्रतिदिन कायव्यके इस चरित्रका चिन्तन करता है, उसे वनवासी प्राणियोंसे किंचिन्मात्र भी भय नहीं प्राप्त होता ॥ २५ ॥
न भयं तस्य भूतेभ्यः सर्वेभ्यश्चैव भारत ।
नासतो विद्यते राजन् स ह्यारण्येषु गोपतिः ॥ २६ ॥
भारत! उसे सम्पूर्ण भूतोंसे भी भय नहीं होता। राजन्! किसी दुष्टात्मासे भी उसको डर नहीं लगता। वह तो वनका अधिपति हो जाता है ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कायव्यचरिते
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कायव्यका चरित्रविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥