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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन

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त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन

व्यास उवाच

प्रत्याहारं तु वक्ष्यामि शर्वर्यादौ गतेऽहनि ।
यथेदं कुरुतेऽध्यात्मं सुसूक्ष्मं विश्वमीश्वरः ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं— बेटा! अब मैं यह बता रहा हूँ कि ब्रह्माजीका दिन बीतनेपर उनकी रात्रि आरम्भ होनेके पहले ही किस प्रकार इस सृष्टिका लय होता है तथा लोकेश्वर ब्रह्माजी स्थूल जगत्‌को अत्यन्त सूक्ष्म करके इसे कैसे अपने भीतर लीन कर लेते हैं? ॥ १ ॥

दिवि सूर्यस्तथा सप्त दहन्ति शिखिनोऽर्चिषः ।
सर्वमेतत् तदार्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते जगत् ॥ २ ॥
जब प्रलयका समय आता है, तब आकाशमें ऊपरसे सूर्य और नीचेसे अग्निकी सात ज्वालाएँ संसारको भस्म करने लगती हैं। उस समय यह सारा जगत् ज्वालाओंसे व्याप्त होकर जाज्वल्यमान दिखायी देने लगता है ॥ २ ॥

पृथिव्यां यानि भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च ।
तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥ ३ ॥
भूतलके जितने भी चराचर प्राणी हैं, वे सब पहले ही दग्ध होकर पृथ्वीमें एकाकार हो जाते हैं ॥ ३ ॥

ततः प्रलीने सर्वस्मिन् स्थावरे जङ्गमे तथा ।
निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर्दृश्यते कूर्मपृष्ठवत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर स्थावर-जंगम सम्पूर्ण प्राणियोंके लीन हो जानेपर तृण और वृक्षोंसे रहित हुई यह भूमि कछुवेकी पीठ-सी दिखायी देने लगती है ॥ ४ ॥

भूमेरपि गुणं गन्धमाप आददते यदा ।
आत्तगन्धा तदा भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् जब जल पृथ्वीके गुण गन्धको ग्रहण कर लेता है, तब गन्धहीन हुई पृथ्वी अपने कारणभूत जलमें लीन हो जाती है ॥ ५ ॥

आपस्तत्र प्रतिष्ठन्ति ऊर्मिमत्यो महास्वनाः ।
सर्वमेवेदमापूर्य तिष्ठन्ति च चरन्ति च ॥ ६ ॥
फिर तो जल गम्भीर शब्द करता हुआ चारों ओर उमड़ पड़ता है और उसमें उत्ताल तरंगें उठने लगती हैं। वह सम्पूर्ण विश्वको अपनेमें निमग्न करके लहराता रहता है ॥ ६ ॥

अपामपि गुणं तात ज्योतिराददते यदा ।

आपस्तदा त्वात्तगुणा ज्योतिःषूपरमन्ति वै ॥ ७ ॥
वत्स! तदनन्तर तेज जलके गुण रसको ग्रहण कर लेता है और रसहीन जल तेजमें लीन हो जाता है ॥ ७ ॥
यदाऽऽदित्यं स्थितं मध्ये गृह्णन्ति शिखिनोऽर्चिषः ।
सर्वमेवेदमर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते नभः ॥ ८ ॥
उस समय जब आगकी लपटें सूर्यको अपने भीतर करके चारों ओरसे ढक लेती हैं, तब सम्पूर्ण आकाश ज्वालाओंसे व्याप्त होकर प्रज्वलित होता-सा जान पड़ता है ॥ ८ ॥
ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुरददते यदा ।
प्रशाम्यति ततो ज्योतिर्वायुर्धोधूयते महान् ॥ ९ ॥
फिर तेजके गुण रूपको वायुतत्त्व ग्रहण कर लेता है। इससे आग शान्त हो जाती है और वायुमें मिल जाती है। तब वायु अपने महान् वेगसे सम्पूर्ण आकाशको क्षुब्ध कर डालती है ॥ ९ ॥
ततस्तु स्वनमासाद्य वायुः सम्भवमात्मनः ।
अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च दोध्वीति दिशो दश ॥ १० ॥
वह बड़े जोरसे हरहराती और अपने वेगसे उत्पन्न आवाजको फैलाती हुई ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर दसों दिशाओंमें चलने लगती है ॥ १० ॥
वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते यदा ।
प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु तिष्ठति नादवत् ॥ ११ ॥
इसके बाद आकाश वायुके गुण स्पर्शको भी ग्रस लेता है। तब वायु शान्त हो जाती और आकाशमें मिल जाती है; फिर तो आकाश महान् शब्दसे युक्त हो अकेला ही रह जाता है ॥ ११ ॥
अरूपमरसस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् ।
सर्वलोकप्रणदितं खं तु तिष्ठति नादवत् ॥ १२ ॥
उसमें रूप, रस, गन्ध और स्पर्शका नाम भी नहीं रह जाता। किसी भी मूर्त पदार्थकी सत्ता नहीं रहती। जिसका शब्द सभी लोकोंमें निनादित होता था, वह आकाश ही केवल शब्द गुणसे युक्त होकर शेष रहता है ॥ १२ ॥
आकाशस्य गुणं शब्दमभिव्यक्तात्मकं मनः ।
मनसो व्यक्तमव्यक्तं ब्राह्मः सम्प्रतिसंचरः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् दृश्य प्रपंचको व्यक्त करनेवाला मन आकाशके गुण शब्दको, जो मनसे ही प्रकट हुआ था, अपनेमें लीन कर लेता है। इस तरह व्यक्त मन और अव्यक्त (महत्तत्त्व) का ब्रह्माके मनमें लय होना ब्राह्म प्रलय कहलाता है ॥ १३ ॥
तदात्मगुणमाविश्य मनो ग्रसति चन्द्रमाः ।
मनस्युपरते चापि चन्द्रमस्युपतिष्ठते ॥ १४ ॥

महाप्रलयके समय चन्द्रमा व्यक्त मनको आत्मगुणमें प्रविष्ट करके स्वयं उसको ग्रस लेते हैं। तब मन उपरत (शान्त) हो जाता है; फिर वह चन्द्रमामें उपस्थित रहता है ॥ १४ ॥

तं तु कालेन महता संकल्पः कुरुते वशे ।
चित्तं ग्रसति संकल्पं तच्च ज्ञानमनुत्तमम् ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् संकल्प (अव्यक्त मन) दीर्घकालमें उस व्यक्तमनसहित चन्द्रमाको अपने वशीभूत कर लेता है और समष्टि बुद्धि संकल्पको ग्रस लेती है। उसी बुद्धिको परम उत्तम ज्ञान माना गया है ॥ १५ ॥

कालो गिरति विज्ञानं कालं बलमिति श्रुतिः ।
बलं कालो ग्रसति तु तं विद्वान् कुरुते वशे ॥ १६ ॥
सुननेमें आया है कि काल ज्ञान (समष्टि बुद्धि) को ग्रस लेता है, शक्ति उस कालको अपने अधीन कर लेती है; फिर महाकाल शक्तिको और परब्रह्म महाकालको अपने अधीन कर लेता है ॥ १६ ॥

आकाशस्य यथा घोषं तं विद्वान् कुरुतेऽत्मनि ।
तदव्यक्तं परं ब्रह्म तच्छाश्वतमनुत्तमम् ।
एवं सर्वाणि भूतानि ब्रह्मैव प्रतिसंचरः ॥ १७ ॥
जिस प्रकार आकाश अपने गुण शब्दको आत्मसात् कर लेता है, उसी प्रकार ब्रह्म महाकालको अपनेमें विलीन कर लेता है। वह परब्रह्म परमात्मा अव्यक्त, सनातन और सर्वोत्तम है। इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंका लय होता है और सबके लयका अधिष्ठान परब्रह्म परमात्मा ही है ॥ १७ ॥

यथावत् कीर्तितं सम्यगेवमेतदसंशयम् ।
बोध्यं विद्यामयं दृष्ट्वा योगिभिः परमात्मभिः ॥ १८ ॥
इस प्रकार परमात्मस्वरूप योगियोंने इस ज्ञानमय बोध्यतत्त्वका साक्षात्कार करके इसका यथार्थरूपसे वर्णन किया है, यह उत्तम ज्ञान निःसंदेह ऐसा ही है ॥ १८ ॥

एवं विस्तारसंक्षेपौ ब्रह्माव्यक्ते पुनः पुनः ।
युगसाहस्रयोरादावहोरात्रस्तथैव च ॥ १९ ॥
इस प्रकार बारंबार अव्यक्त परब्रह्ममें सृष्टिका विस्तार और लय होता है। ब्रह्माजीका दिन एक हजार चतुर्युगका होता है और उनकी रात भी उतनी ही बड़ी होती है; यह बात पहले ही बता दी गयी है ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकका अनुप्रश्नविषयक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३३ ॥

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