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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन

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अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः

ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

के पूर्वमासन् पतयः प्रजानां भरतर्षभ ।
के चर्षयो महाभागा दिक्षु प्रत्येकशः स्मृताः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कौन-कौन-से लोग प्रजापति थे और प्रत्येक दिशामें किन-किन महाभाग महर्षियोंकी स्थिति मानी गयी है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

श्रूयतां भरतश्रेष्ठ यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
प्रजानां पतयो येऽस्मिन् दिक्षु ये चर्षयः स्मृताः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतश्रेष्ठ! इस जगत्में जो प्रजापति रहे हैं तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें जिन-जिन ऋषियोंकी स्थिति मानी गयी है, उन सबको जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछते हो; मैं बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥

एकः स्वयम्भूर्भगवानाद्यो ब्रह्मा सनातनः ।
ब्रह्मणः सप्त वै पुत्रा महात्मानः स्वयम्भुवः ॥ ३ ॥
एकमात्र सनातन भगवान् स्वयम्भू ब्रह्मा सबके आदि हैं। स्वयम्भू ब्रह्माके सात महात्मा पुत्र बताये गये हैं ॥ ३ ॥

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठश्च महाभागः सदृशो वै स्वयम्भुवा ॥ ४ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा महाभाग वसिष्ठ। ये सभी स्वयम्भू ब्रह्माके समान ही शक्तिशाली हैं ॥ ४ ॥

सप्तब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सर्वानैव प्रजापतीन् ॥ ५ ॥
पुराणमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। अब मैं समस्त प्रजापतियोंका वर्णन आरम्भ करता हूँ ॥ ५ ॥

अत्रिवंशसमुत्पन्नो ब्रह्मयोनिः सनातनः ।
प्राचीनबर्हिर्भगवान्स्तस्मात् प्राचेतसो दश ॥ ६ ॥
अत्रिकुलमें उत्पन्न जो सनातन ब्रह्मयोनि भगवान् प्राचीनबर्हि हैं, उनसे प्राचेतस नामवाले दस प्रजापति उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥

दशानां तनयस्त्वेको दक्षो नाम प्रजापतिः ।
तस्य द्वे नामनी लोके दक्षः क इति चोच्यते ॥ ७ ॥
उन दसोंके एकमात्र पुत्र दक्ष नामसे प्रसिद्ध प्रजापति हैं। उनके दो नाम बताये जाते हैं—‘दक्ष’ और ‘क’ ॥ ७ ॥

मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तस्य द्वे नामनी स्मृते ।
अरिष्टनेमिरित्येके कश्यपेत्यपरे विदुः ॥ ८ ॥
मरीचिके पुत्र जो कश्यप हैं, उनके भी दो नाम माने गये हैं। कुछ लोग उन्हें अरिष्टनेमि कहते हैं और दूसरे लोग उन्हें कश्यपके नामसे जानते हैं ॥ ८ ॥

अत्रेश्चैवौरसः श्रीमान् राजा सोमश्च वीर्यवान् ।
सहस्रं यश्च दिव्यानां युगानां पर्युपासिता ॥ ९ ॥
अत्रिके औरस पुत्र श्रीमान् और बलवान् राजा सोम हुए, जिन्होंने सहस्र दिव्य युगोंतक भगवान्‌की उपासना की थी ॥ ९ ॥

अर्यमा चैव भगवान् ये चास्य तनया विभो ।
एते प्रदेशाः कथिता भुवनानां प्रभावनाः ॥ १० ॥
प्रभो! भगवान् अर्यमा और उनके सभी पुत्र—ये प्रदेश (आदेश देनेवाले शासक) तथा प्रभावन (उत्तम स्रष्टा) कहे गये हैं ॥ १० ॥

शशबिन्दोश्च भार्याणां सहस्राणि दशाच्युत ।
एकैकस्यां सहस्रं तु तनयानामभूत् तदा ॥ ११ ॥
एवं शतसहस्राणां शतं तस्य महात्मनः ।
पुत्राणां च न ते कंचिदिच्छन्त्यन्यं प्रजापतिम् ॥ १२ ॥
धर्मसे विचलित न होनेवाले युधिष्ठिर! शशबिन्दुके दस हजार स्त्रियाँ थीं। उनमेंसे प्रत्येकके गर्भसे एक-एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन महात्माके एक करोड़ पुत्र थे। वे उनके सिवा किसी दूसरे प्रजापतिकी इच्छा नहीं करते थे ॥ ११-१२ ॥

प्रजामाचक्षते विप्राः पुराणाः शाशबिन्दवीम् ।
स वृष्णिवंशप्रभवो महावंशः प्रजापतेः ॥ १३ ॥
प्राचीनकालके ब्राह्मण अधिकांश प्रजाकी उत्पत्ति शशबिन्दुसे ही बताते हैं। प्रजापतिका वह महान् वंश ही वृष्णिवंशका उत्पादक हुआ ॥ १३ ॥

एते प्रजानां पतयः समुद्दिष्टा यशस्विनः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि देवांस्त्रिभुवनेश्वरान् ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर! ये सब यशस्वी प्रजापति बताये गये हैं। अब मैं तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले देवताओंका परिचय दूँगा ॥ १४ ॥

भगोंऽशश्चार्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा ।
सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महाबलः ॥ १५ ॥

त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते ।
इत्येते द्वादशादित्याः कश्यपस्यात्मसम्भवाः ॥ १६ ॥
भग, अंश, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, महाबली विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे गये हैं। ये बारह आदित्य हैं, जो कश्यप और अदितिके पुत्र हैं ॥ १५-१६ ॥

नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि ।
मार्तण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य महात्मनः ॥ १७ ॥
नासत्य और दस्र—ये दोनों अश्विनीकुमार बताये गये हैं। ये दोनों अष्टम आदित्य महात्मा सूर्यके पुत्र हैं ॥

ते च पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः ।
त्वष्टुश्चैवात्मजः श्रीमान् विश्वरूपो महायशाः ॥ १८ ॥
ये तथा पूर्वोक्त देवता—दो प्रकारके पितर माने गये हैं। त्वष्टाके पुत्र महायशस्वी श्रीमान् विश्वरूप हुए ॥

अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः ।
हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ १९ ॥
सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः ।
पूर्वमेव महाभागा वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सुरेश्वर, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये ग्यारह रुद्र हैं। महाभाग आठ वसुओंके नाम पहले ही बताये गये हैं ॥ १९-२० ॥

एत एवंविधा देवा मनोरेव प्रजापतेः ।
ते च पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः ॥ २१ ॥
इस प्रकार ये देवता प्रजापति मनुकी ही संतान हैं। वे तथा पूर्वोक्त देवता—ये दो प्रकारके पितर माने गये हैं ॥ २१ ॥

शीलयौवनतस्त्वन्यस्तथान्यः सिद्धसाध्ययोः ।
ऋभवो मरुतश्चैव देवानां चोदितो गणः ॥ २२ ॥
देवताओंमें एक वर्ग ऐसा है, जो सुन्दर शील-स्वभाव और अक्षय यौवनसे सम्पन्न है। दूसरा वर्ग सिद्धों और साध्योंका है। ऋभु और मरुत्—ये देवताओंके समुदायोंके नाम हैं ॥ २२ ॥

एवमेते समाम्नाता विश्वेदेवास्तथाश्विनौ ।
आदित्याः क्षत्रियास्तेषां विशश्च मरुतस्तथा ॥ २३ ॥
इसी प्रकार ये विश्वेदेव और अश्विनीकुमार भी देवताओंके गण माने गये हैं। इन देवताओंमें आदित्यगण क्षत्रिय और मरुद्गण वैश्य माने जाते हैं ॥ २३ ॥

अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ ।
स्मृतास्त्वङ्गिरसो देवा ब्राह्मणा इति निश्चयः ॥ २४ ॥
उग्र तपस्यामें लगे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंको शूद्र कहा जाता है। अंगिरा गोत्रवाले सम्पूर्ण देवता ब्राह्मण माने गये हैं। यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ २४ ॥

इत्येतत् सर्वदेवानां चातुर्वर्ण्यं प्रकीर्तितम् ।
एतान् वै प्रातरुत्थाय देवान् यस्तु प्रकीर्तयेत् ॥ २५ ॥
स्वजादन्यकृताच्चैव सर्वपापात् प्रमुच्यते ।
इस प्रकार सम्पूर्ण देवताओंमें जो चार वर्ण हैं, उनका वर्णन किया गया। जो सबेरे उठकर इन देवताओंका कीर्तन करता है, वह स्वयं किये हुए तथा दूसरोंके संसर्गसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण पापसमूहसे मुक्त हो जाता है ॥ २५ १/२ ॥

यवक्रीतोऽथ रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू ॥ २६ ॥
औशिजश्चैव कक्षीवान् बलश्चाङ्गिरसः सुताः ।
यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, औशिज, कक्षीवान् और बल—ये अंगिराके पुत्र हैं ॥ २६ १/२ ॥

ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा ॥ २७ ॥
त्रैलोक्यभावनास्तात् प्राच्यां सप्तर्षयस्तथा ।
तात! मेधातिथिके पुत्र कण्वमुनि, बर्हिषद तथा त्रिलोकीको उत्पन्न करनेमें समर्थ सप्तर्षिगण हैं, जो पूर्व दिशामें स्थित होते हैं ॥ २७ १/२ ॥

उन्मुचो विमुचश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् ॥ २८ ॥
प्रमुचश्चेध्मवाहश्च भगवांश्च दृढव्रतः ।
मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् ॥ २९ ॥
एते ब्रह्मर्षयो नित्यमास्थिता दक्षिणां दिशम् ।
उन्मुच, विमुच, बलवान् स्वस्त्यात्रेय, प्रमुच, इध्मवाह, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मित्रावरुणके प्रतापी पुत्र भगवान् अगस्त्य—ये ब्रह्मर्षि सदा दक्षिण दिशामें रहते हैं ॥ २८-२९ १/२ ॥

उषङ्गुः कवषो धौम्यः परिव्याधश्च वीर्यवान् ॥ ३० ॥
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः ।
अत्रेः पुत्रश्च भगवांस्तथा सारस्वतः प्रभुः ॥ ३१ ॥
एते चैव महात्मानः पश्चिमामाश्रिता दिशम् ।
उषंगु, कवष, धौम्य, शक्तिशाली परिव्याध, एकत, द्वित, त्रित तथा अत्रिके प्रभावशाली पुत्र भगवान् सारस्वत—ये महात्मा महर्षि पश्चिम दिशामें निवास करते हैं ॥ ३०-३१ १/२ ॥

आत्रेयश्च वसिष्ठश्च कश्यपश्च महानृषिः ॥ ३२ ॥

गौतमोऽथ भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ।
तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
जमदग्निश्च सप्तैते उदीचीमाश्रिता दिशम् ।
आत्रेय, वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र तथा महात्मा ऋचीकके पुत्र भगवान् जमदग्नि—ये सात उत्तर दिशामें रहते हैं ॥
एते प्रतिदिशं सर्वे कीर्तितास्तिग्मतेजसः ॥ ३४ ॥
साक्षिभूता महात्मानो भुवनानां प्रभावनाः ।
एवमेते महात्मानः स्थिताः प्रत्येकशो दिशम् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार प्रत्येक दिशामें रहनेवाले सम्पूर्ण तेजस्वी महर्षियोंका वर्णन किया गया। ये महात्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ एवं सबके साक्षी हैं। इनका हृदय बड़ा विशाल है। इस तरह ये प्रत्येक दिशामें निवास करते हैं ॥ ३४-३५ ॥
एतेषां कीर्तनं कृत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते ।
यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तां दिशं शरणं गतः ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान् व्रजेत् ॥ ३६ ॥
इन सबका गुणगान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिस-जिस दिशामें ये महर्षि रहते हैं, उस-उस दिशामें जानेपर जो मनुष्य इनकी शरण लेता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और कुशलपूर्वक अपने घरको पहुँच जाता है ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दिशास्वस्तिकं नाम
अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दिशास्वस्तिक नामक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥