महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन
व्यास उवाच
तपसा कर्मणा चैव प्रदानेन च भारत ।
पुनाति पापं पुरुषः पुनश्चेन्न प्रवर्तते ॥ १ ॥
व्यासजी बोले— भरतनन्दन! मनुष्य तपसे यज्ञ आदि सत्कर्मोंसे तथा दानके द्वारा पापको धो-बहाकर अपने-आपको पवित्र कर लेता है, परंतु यह तभी सम्भव होता है, जब वह फिर पापमें प्रवृत्त न हो ॥ १ ॥
एककालं तु भुञ्जीत चरन् भैक्ष्यं स्वकर्मकृत् ।
कपालपाणिः खट्वाङ्गी ब्रह्मचारी सदोत्थितः ॥ २ ॥
अनसूयुरधःशायी कर्म लोके प्रकाशयन् ।
पूर्णैर्द्वादशभिर्वर्षैर्ब्रह्महा विप्रमुच्यते ॥ ३ ॥
यदि किसीने ब्रह्महत्या की हो तो वह भिक्षा माँगकर एक समय भोजन करे, अपना सब काम स्वयं ही करे, हाथमें खप्पर और खाटका पाया लिये रहे, सदा ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे, उद्यमशील बना रहे, किसीके दोष न देखे, जमीन पर सोये और लोकमें अपना पापकर्म प्रकट करता रहे। इस प्रकार बारह वर्षतक करनेसे ब्रह्महत्यारा पापमुक्त हो जाता है ॥ २-३ ॥
लक्ष्यः शस्त्रभृतां वा स्याद् विदुषामिच्छयाऽऽत्मनः ।
प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धे त्रिरवाक्शिराः ॥ ४ ॥
जपन् वान्यतमं वेदं योजनानां शतं व्रजेत् ।
सर्वस्वं वा वेदविदे ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥ ५ ॥
धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम् ।
मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोब्राह्मणस्य च ॥ ६ ॥
अथवा प्रायश्चित्त बतानेवाले विद्वानोंकी या अपनी इच्छासे शस्त्रधारी पुरुषोंके अस्त्र-शस्त्रोंका निशाना बन जाय अथवा अपनेको प्रज्वलित आगमें झोंक दे अथवा नीचे सिर किये किसी भी एक वेदका पाठ करते हुए तीन बार सौ-सौ योजनकी यात्रा करे अथवा किसी वेदवेत्ता ब्राह्मणको अपना सर्वस्व समर्पण कर दे या जीवन-निर्वाहके लिये पर्याप्त धन अथवा सब सामानोंसे भरा हुआ घर ब्राह्मणको दान कर दे—इस प्रकार गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाला पुरुष ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ॥ ४—६ ॥
षड्भिर्वर्षैः कृच्छ्रभोजी ब्रह्महा पूयते नरः ।
मासे मासे समश्नंस्तु त्रिभिर्वर्षैः प्रमुच्यते ॥ ७ ॥
यदि ब्रह्महत्या करनेवाला पुरुष कृच्छ्रव्रतके अनुसार भोजन करे तो छः वर्षोंमें वह शुद्ध हो जाता है और एक-एक मासमें एक-एक कृच्छ्रव्रतका निर्वाह करते हुए भोजन करे तो वह तीन ही वर्षोंमें पापमुक्त हो जाता है ।।
संवत्सरेण मासाशी पूयते नात्र संशयः ।
तथैवोपवसन् राजन् स्वल्पेनापि प्रपूयते ।। ८ ।।
यदि एक-एक मासपर भोजनक्रम बदलते हुए अत्यन्त तीव्र कृच्छ्रव्रतके अनुसार अन्न ग्रहण करे तो एक वर्षमें ही ब्रह्महत्यासे छुटकारा मिल सकता है३. इसमें संशय नहीं है। राजन्! इसी प्रकार यदि केवल उपवास करनेवाला मनुष्य हो तो उसकी स्वल्प समयमें ही शुद्धि हो जाती है ।। ८ ।।
ऋतुना चाश्वमेधेन पूयते नात्र संशयः ।
ये चाप्यवभृथस्नाताः केचिदेवंविधा नराः ।। ९ ।।
ते सर्वे धूतपाप्मानो भवन्तीति परा श्रुतिः ।
अश्वमेध यज्ञ करनेसे भी ब्रह्महत्याका पाप शुद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो इस प्रकारके लोग महायज्ञोंमें अवभृथ-स्नान करते हैं, वे सभी पापमुक्त हो जाते हैं—ऐसा श्रुतिका३ कथन है ।। ९ १/२ ।।
ब्राह्मणार्थे हतो युद्धे मुच्यते ब्रह्महत्यया ।। १० ।।
गवां शतसहस्रं तु पात्रेभ्यः प्रतिपादयेत् ।
ब्रह्महा विप्रमुच्येत सर्वपापेभ्य एव च ।। ११ ।।
जो पुरुष ब्राह्मणके लिये युद्धमें प्राण दे देता है, वह भी ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। ब्रह्महत्यारा होनेपर भी जो सुपात्र ब्राह्मणोंको एक लाख गौओंका दान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १०-११ ।।
कपिलानां सहस्राणि यो दद्यात् पञ्चविंशतिम् ।
दोग्ध्रीणां स च पापेभ्यः सर्वेभ्यो विप्रमुच्यते ।। १२ ।।
जो दूध देनेवाली पचीस हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।
गोसहस्रं सवत्सानां दोग्ध्रीणां प्राणसंशये ।
साधुभ्यो वै दरिद्रेभ्यो दत्त्वा मुच्येत किल्बिषात् ।। १३ ।।
जब मृत्युकाल निकट हो, उस समय सदाचारी दरिद्र ब्राह्मणोंको दूध देनेवाली एक हजार सवत्सा गौओंका दान करके भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो सकता है ।। १३ ।।
शतं वै यस्तु काम्बोजान् ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति ।
नियतेभ्यो महीपाल स च पापात् प्रमुच्यते ।। १४ ।।
भूपाल! जो संयम-नियमसे रहनेवाले ब्राह्मणोंको सौ काबुली घोड़ोंका दान करता है, उसे भी पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ १४ ॥
मनोरथं तु यो दद्यादेकस्मा अपि भारत ।
न कीर्तयेत दत्त्वा यः स च पापात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥
भरतनन्दन! जो एक ब्राह्मणको भी उसकी मनोवांछित वस्तु दे देता है और देकर फिर उसकी कहीं चर्चा नहीं करता, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥
सुरापानं सकृत् कृत्वा योऽग्निवर्णां सुरां पिबेत् ।
स पावयत्यात्मानमिह लोके परत्र च ॥ १६ ॥
जो एक बार मदिरा-पान करके फिर आगके समान गर्म की हुई मदिरा पी लेता है, वह इहलोक और परलोकमें भी अपनेको पवित्र कर लेता है ॥ १६ ॥
मरुप्रपातं प्रपतन् ज्वलनं वा समाविशन् ।
महाप्रस्थानमातिष्ठन् मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १७ ॥
जलहीन देशमें पर्वतसे गिरकर अथवा अग्निमें प्रवेश करके या महाप्रस्थानकी विधिसे हिमालयमें गलकर प्राण दे देनेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ १७ ॥
बृहस्पतिसवेनेष्ट्वा सुरापो ब्राह्मणः पुनः ।
समितिं ब्राह्मणो गच्छेदिति वै ब्रह्मणः श्रुतिः ॥ १८ ॥
मदिरा पीनेवाला ब्राह्मण ‘बृहस्पति-सव’ नामक यज्ञ करके शुद्ध होनेपर ब्रह्माजीकी सभामें जा सकता है—ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ १८ ॥
भूमिप्रदानं कुर्याद् यः सुरां पीत्वा विमत्सरः ।
पुनर्न च पिबेद् राजन् संस्कृतः स च शुद्ध्यति ॥ १९ ॥
राजन्! जो मदिरा पी लेनेपर ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो भूमिदान करे और फिर कभी उसे न पीये, वह संस्कार करनेके पश्चात् शुद्ध होता है ॥ १९ ॥
गुरुतल्पी शिलां तप्तामायसीमभिसंविशेत् ।
अवकृत्यात्मनः शेफं प्रव्रजेदूर्ध्वदर्शनः ॥ २० ॥
शरीरस्य विमोक्षेण मुच्यते कर्मणोऽशुभात् ।
गुरुपत्नीगमन करनेवाला मनुष्य तपायी हुई लोहेकी शिलापर सो जाय अथवा अपनी मूत्रेन्द्रिय काटकर ऊपरकी ओर देखता हुआ आगे बढ़ता चला जाय। इस प्रकार शरीर छूट जानेपर वह उस पापकर्मसे मुक्त हो जाता है ॥ २० १/२ ॥
कर्मभ्यो विप्रमुच्यन्ते यत्ताः संवत्सरं स्त्रियः ॥ २१ ॥
महाव्रतं चरेद् यस्तु दद्यात् सर्वस्वमेव तु ।
गुर्वर्थे वा हतो युद्धे स मुच्येत् कर्मणोऽशुभात् ॥ २२ ॥
स्त्रियाँ भी एक वर्षतक मिताहार एवं संयमपूर्वक रहनेपर उक्त पापकर्मोंसे मुक्त हो जाती हैं। जो महाव्रतका (एक महीनेतक जल न पीनेके नियमका) पालन करता है,
ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है अथवा गुरुके लिये युद्धमें मारा जाता है, वह अशुभ कर्मके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ।। २१-२२ ।।
अनृतेनोपवर्ती चेत् प्रतिरोध्दा गुरोस्तथा ।
उपाहृत्य प्रियं तस्मै तस्मात् पापात् प्रमुच्यते ।। २३ ।।
झूठ बोलकर जीविका चलानेवाला तथा गुरुका अपमान करनेवाला पुरुष गुरुजीको मनचाही वस्तु देकर प्रसन्न कर ले तो उस पापसे मुक्त हो जाता है ।। २३ ।।
अवकीर्णिनिमित्तं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ।
गोचर्मवासाः षण्मासांस्तथा मुच्येत किल्बिषात् ।। २४ ।।
जिसका ब्रह्मचर्यव्रत खण्डित हो गया हो, वह ब्रह्मचारी उस दोषकी निवृत्तिके उद्देश्यसे ब्रह्महत्याके लिये बताये हुए व्रतका आचरण करे तथा छः महीनों-तक गोचर्म ओढ़कर रहे; ऐसा करनेपर वह पापसे मुक्त हो सकता है ।। २४ ।।
परदारापहारी तु परस्यापहरन् वसु ।
संवत्सरं व्रती भूत्वा तथा मुच्येत किल्बिषात् ।। २५ ।।
परायी स्त्री तथा पराये धनका अपहरण करनेवाला पुरुष एक वर्षतक कठोर व्रतका पालन करनेपर उस पापसे मुक्त होता है ।। २५ ।।
धनं तु यस्यापहरेत् तस्मै दद्यात् समं वसु ।
विविधेनाभ्युपायेन तदा मुच्येत किल्बिषात् ।। २६ ।।
जिसके धनका अपहरण करे, उसे अनेक उपाय करके उतना ही धन लौटा दे तो उस पापसे छुटकारा मिल सकता है ।। २६ ।।
कृच्छ्राद् द्वादशरात्रेण संयतात्मा व्रते स्थितः ।
परिवेत्ता भवेत् पूतः परिवित्तिस्तथैव च ।। २७ ।।
बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई और उसका वह बड़ा भाई—ये दोनों मनको संयममें रखते हुए बारह राततक कृच्छ्रव्रतका अनुष्ठान करनेसे शुद्ध हो जाते हैं ।। २७ ।।
निवेश्यं तु पुनस्तेन सदा तारयता पितॄन् ।
न तु स्त्रिया भवेद् दोषो न तु सा तेन लिप्यते ।। २८ ।।
इसके सिवा, बड़े भाईका विवाह होनेके बाद पहलेका ब्याहा हुआ छोटा भाई पितरोंके उद्धारके निमित्त पुनः विवाह-संस्कार करे; ऐसा करनेसे उस स्त्रीके कारण उसे दोष नहीं प्राप्त होता और न वह स्त्री ही उसके दोषसे लिप्त होती है ।। २८ ।।
भोजनं ह्यन्तराशुद्धं चातुर्मास्ये विधीयते ।
स्त्रियस्तेन प्रशुध्यन्ति इति धर्मविदो विदुः ।। २९ ।।
चौमासेमें एक दिनका अन्तर देकर भोजन करनेका विधान है। उसके पालनसे स्त्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन है ।। २९ ।।
स्त्रियस्त्वाशङ्किताः पापा नोपगम्या विजानता ।
रजसा ता विशुध्यन्ते भस्मना भाजनं यथा ॥ ३० ॥
यदि अपनी स्त्रीके विषयमें पापाचारकी आशङ्का हो तो विज्ञपुरुषको रजस्वला होनेतक उनके साथ समागम नहीं करना चाहिये। रजस्वला होनेपर वे उसी प्रकार शुद्ध हो जाती हैं, जैसे राखसे माँजा हुआ बर्तन ॥
पादजोच्छिष्टकांस्यं यद् गवा घ्रातमथापि वा ।
गण्डूषोच्छिष्टमपि वा विशुध्येद् दशभिस्तु तत् ॥ ३१ ॥
यदि काँसेका बर्तन शूद्रके द्वारा जूठा कर दिया जाय अथवा उसे गाय सूँघ ले अथवा किसीके भी कुल्ला करनेसे वह जूठा हो जाय तो वह दस वस्तुओंसे शोधन करनेपर शुद्ध होता है* ॥ ३१ ॥
चतुष्पात् सकलो धर्मो ब्राह्मणस्य विधीयते ।
पादावकृष्टो राजन्ये तथा धर्मो विधीयते ॥ ३२ ॥
तथा वैश्ये च शूद्रे च पादः पादो विधीयते ।
ब्राह्मणके लिये चारों पादोंसे युक्त सम्पूर्ण धर्मके पालनका विधान है। तात्पर्य यह कि वह शौचाचार या आत्मशुद्धिके लिये किये जानेवाले प्रायश्चित्तका पूरा-पूरा पालन करे। क्षत्रियके लिये एक पाद कमका विधान है। इसी तरह वैश्यके लिये उसके दो पाद और शूद्रके लिये एक पादके पालनकी विधि है। (उदाहरणके तौरपर जहाँ ब्राह्मणके लिये चार दिन उपवासका विधान हो, वहाँ क्षत्रियके लिये तीन दिन, वैश्यके लिये दो दिन और शूद्रके लिये एक दिनके उपवासका विधान समझना चाहिये) ॥ ३२ १/२ ॥
विद्यादेवंविधेनैषां गुरुलाघवनिश्चयम् ॥ ३३ ॥
तिर्यग्योनिबधं कृत्वा द्रुमांश्छित्त्वेतरान् बहून् ।
त्रिरात्रं वायुभक्षः स्यात् कर्म च प्रथयन्नरः ॥ ३४ ॥
इसी प्रकार इन पापोंके गौरव और लाघवका निश्चय करना चाहिये। पशु-पक्षियोंका वध और दूसरे-दूसरे बहुत-से वृक्षोंका उच्छेद करके पापयुक्त हुआ पुरुष अपनी शुद्धिके लिये तीन दिन, तीन रात केवल हवा पीकर रहे और अपना पापकर्म लोगोंपर प्रकट करता रहे ॥ ३३-३४ ॥
अगम्यागमने राजन् प्रायश्चित्तं विधीयते ।
आर्द्रवस्त्रेण षण्मासान् विहार्यं भस्मशायिना ॥ ३५ ॥
राजन्! जो स्त्री समागम करनेके योग्य नहीं है, उसके साथ समागम कर लेनेपर प्रायश्चित्तका विधान है। उसे छः महीनेतक गीला वस्त्र पहनकर घूमना और राखके ढेरपर सोना चाहिये ॥ ३५ ॥
एष एव तु सर्वेषामकार्याणां विधिर्भवेत् ।
ब्राह्मणोक्तेन विधिना दृष्टान्तागमहेतुभिः ॥ ३६ ॥
जितने न करनेयोग्य पापकर्म हैं, उन सबके लिये यही विधि है। ब्राह्मणग्रन्थोंमें बतायी हुई विधिसे दृष्टान्त बतानेवाले शास्त्रोंकी युक्तियोंसे इसी तरह पापशुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ३६ ॥
सावित्रीमप्यधीयीत शुचौ देशे मिताशनः ।
अहिंसो मन्दकोऽजल्पो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ ३७ ॥
जो पवित्र स्थानमें मिताहारी हो हिंसाका सर्वथा त्याग करके राग-द्वेष, मान-अपमान आदिसे शून्य हो मौनभावसे गायत्रीमन्त्रका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३७ ॥
अहःसु सततं तिष्ठेदभ्याकाशं निशां स्वपन् ।
त्रिरह्नि त्रिनिशायां च सवासा जलमाविशेत् ॥ ३८ ॥
स्त्रीशूद्रं पतितं चापि नाभिभाषेद् व्रतान्वितः ।
पापान्यज्ञानतः कृत्वा मुच्येदेवंव्रतो द्विजः ॥ ३९ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह दिनमें खड़ा रहे, रातमें खुले मैदानमें सोये, तीन बार दिनमें और तीन बार रातमें वस्त्रों सहित जलमें घुसकर स्नान करे और इस व्रतका पालन करते समय स्त्री-शूद्र और पतितसे बातचीत न करे, ऐसा नियम लेनेवाला द्विज अज्ञानवश किये हुए सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३८-३९ ॥
शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम् ।
अतिरिच्येत यो यत्र तत्कर्ता लभते फलम् ॥ ४० ॥
मनुष्य शुभ और अशुभ जो कर्म करता है, उसके पाँच महाभूत साक्षी होते हैं। उन शुभ और अशुभ कर्मोंका फल मृत्युके पश्चात् उसे प्राप्त होता है। उन दोनों प्रकारके कर्मोंमें जो अधिक होता है, उसीका फल कर्ताको प्राप्त होता है ॥ ४० ॥
तस्माद् दानेन तपसा कर्मणा च फलं शुभम् ।
वर्धयेदशुभं कृत्वा यथा स्यादतिरेकवान् ॥ ४१ ॥
इसलिये यदि मनुष्यसे अशुभ कर्म बन जाय तो वह दान, तपस्या और सत्कर्मके द्वारा शुभ फलकी वृद्धि करे, जिससे उसके पास अशुभको दबाकर शुभका ही संग्रह अधिक हो जाय ॥ ४१ ॥
कुर्याच्छुभानि कर्माणि निवर्तेत् पापकर्मणः ।
दद्यान्नित्यं च वित्तानि तथा मुच्येत किल्बिषात् ॥ ४२ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह शुभ कर्मोंका ही अनुष्ठान करे, पापकर्मसे सर्वथा दूर रहे तथा प्रतिदिन (निष्कामभावसे) धनका दान करे; ऐसा करनेसे वह पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४२ ॥
अनुरूपं हि पापस्य प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।
महापातकवर्जं तु प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ ४३ ॥
मैंने तुम्हारे सामने पापके अनुरूप प्रायश्चित्त बतलाया है, परंतु महापातकोंसे भिन्न पापोंके लिये ही ऐसा प्रायश्चित्त किया जाता है ॥ ४३ ॥
भक्ष्याभक्ष्येषु चान्येषु वाच्यावाच्ये तथैव च ।
अज्ञानज्ञानयो राजन् विहितान्यनुजानतः ॥ ४४ ॥
राजन्! भक्ष्य, अभक्ष्य, वाच्य और अवाच्य तथा जान-बूझकर और बिना जाने किये हुए पापोंके लिये ये प्रायश्चित्त कहे गये हैं। विज्ञ पुरुषको समझकर इनका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ४४ ॥
जानता तु कृतं पापं गुरु सर्वं भवत्युत ।
अज्ञानात् स्वल्पको दोषः प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ ४५ ॥
जान-बूझकर किया हुआ सारा पाप भारी होता है और अनजानमें वैसा पाप बन जानेपर कम दोष लगता है। इस प्रकार भारी और हलके पापके अनुसार ही उसके प्रायश्चित्तका विधान है ॥ ४५ ॥
शक्यते विधिना पापं यथोक्तेन व्यपोहितुम् ।
आस्तिके श्रद्दधाने च विधिरेष विधीयते ॥ ४६ ॥
शास्त्रोक्त विधिसे प्रायश्चित्त करके सारा पाप दूर किया जा सकता है। परंतु यह विधि आस्तिक और श्रद्धालु पुरुषके लिये ही कही गयी है ॥ ४६ ॥
नास्तिकाश्रद्दधानेषु पुरुषेषु कदाचन ।
दम्भद्वेषप्रधानेषु विधिरेष न दृश्यते ॥ ४७ ॥
जिनमें दम्भ और द्वेषकी प्रधानता है, उन नास्तिक और श्रद्धाहीन पुरुषोंके लिये कभी ऐसे प्रायश्चित्तका विधान नहीं देखा जाता है ॥ ४७ ॥
शिष्टाचारश्च शिष्टश्च धर्मो धर्मभृतां वर ।
सेवितव्यो नरव्याघ्र प्रेत्येह च सुखेप्सुना ॥ ४८ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह! जो इहलोक और परलोकमें सुख चाहता हो उसे श्रेष्ठ पुरुषोंके आचार तथा उनके उपदेश किये हुए धर्मका सदा ही सेवन करना चाहिये ॥ ४८ ॥
स राजन् मोक्ष्यसे पापात् तेन पूर्णेन हेतुना ।
प्राणार्थं वा धनेनैषामथवा नृपकर्मणा ॥ ४९ ॥
नरेश्वर! तुमने तो अपने प्राणोंकी रक्षा, धनकी प्राप्ति अथवा राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही शत्रुओंका वध किया है; अतः इतना ही पर्याप्त कारण है, जिससे तुम पापमुक्त हो जाओगे ॥ ४९ ॥
अथवा ते घृणा काचित् प्रायश्चित्तं चरिष्यसि ।
मा त्वेवानार्यजुष्टेन मन्युना निधनं गमः ॥ ५० ॥
अथवा यदि तुम्हारे मनमें उन अतीत घटनाओंके कारण कोई घृणा या ग्लानि हो तो उनके लिये प्रायश्चित्त कर लेना। परंतु इस प्रकार अनार्य पुरुषोंद्वारा सेवित खेद या रोषके वशीभूत होकर आत्महत्या न करो ॥ ५० ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो भगवता धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन प्रत्युवाच तपोधनम् ॥ ५१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भगवान् व्यासके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करके तपोधन व्यासजीसे इस प्रकार कहा ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीये पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तवर्णनके प्रसङ्गमें पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
१. तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना माँगे जो मिल जाय वह खा लेना तथा तीन दिन उपवास करना—इस प्रकार बारह दिनका कृच्छ्रव्रत होता है। इसी क्रमसे छः वर्षतक रहनेसे ब्रह्महत्या छूट सकती है। यही क्रम यदि तीन-तीन दिनमें परिवर्तित न होकर सम मासोंमें एक-एक सप्ताहमें और विषम मासोंमें आठ-आठ दिनोंमें बदलते हुए एक-एक मासके कृच्छ्रव्रतके अनुसार चले तो तीन वर्षोंमें शुद्धि हो जायगी और यदि एक मास प्रातःकाल, एक मास सायंकाल और एक मास अयाचित भोजन तथा एक मास उपवास—इस प्रकार चार-चार मासके कृच्छ्रव्रतके अनुसार चले तो एक ही वर्षमें ब्रह्महत्याका पाप छूट सकता है।
२. श्रुति इस प्रकार है—‘सर्वं पाप्मानं तरति तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते’।
* गायके दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर—इन पाँच गव्य-पदार्थोंसे तथा मिट्टी, जल, राख, खटाई और आग—इन पाँच वस्तुओंसे पात्रको शुद्ध किया जाता है—यही उसका दस वस्तुओंसे शोधन है।