महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन
भरद्वाज उवाच
त एते धातवः पञ्च ब्रह्मा यानसृजत् पुरा ।
आवृता यैरिमे लोका महाभूताभिसंज्ञिताः ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा— भगवन्! लोकमें ये पाँच धातु ही 'महाभूत' कहलाते हैं, जिन्हें ब्रह्माने सृष्टिके आदिमें रचा था। ये ही इन समस्त लोकोंमें व्याप्त हैं ॥ १ ॥
यदासृजत् सहस्राणि भूतानां स महामतिः ।
पञ्चानामेव भूतत्वं कथं समुपपद्यते ॥ २ ॥
परंतु जब महाबुद्धिमान् ब्रह्माजीने और भी हजारों भूतोंकी रचना की है, तब इन पाँचको ही 'भूत' कहना कहाँतक युक्तिसंगत है? ॥ २ ॥
भृगुरुवाच
अमितानां महाशब्दो यान्ति भूतानि सम्भवम् ।
ततस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥ ३ ॥
भृगुजीने कहा— मुने! ये पाँच भूत ही असीम हैं, इसलिये इन्हींके साथ 'महा' शब्द जोड़ा जाता है। इन्हींसे भूतोंकी उत्पत्ति होती है; अतः इन्हींके लिये 'महाभूत' शब्दका प्रयोग सुसंगत है ॥ ३ ॥
चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः ।
पृथिवी चात्र संघातः शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥ ४ ॥
प्राणियोंका शरीर इन पाँच महाभूतोंका ही संघात है। इसमें जो चेष्टा या गति है, वह वायुका भाग है। जो खोखलापन है, वह आकाशका अंश है। ऊष्मा (गर्मी) अग्निका अंश है। लोहू आदि तरल पदार्थ जलके अंश हैं और हड्डी, मांस आदि ठोस पदार्थ पृथ्वीके अंश हैं ॥ ४ ॥
इत्येतैः पञ्चभिर्भूतैर्युक्तं स्थावरजङ्गमम् ।
श्रोत्रं घ्राणं रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेन्द्रियसंज्ञिताः ॥ ५ ॥
इस प्रकार सारा स्थावर-जंगम जगत् इन पाँच भूतोंसे युक्त है। इन्हींके सूक्ष्म अंश श्रोत्र (कान), घ्राण (नासिका), रसना, त्वचा और नेत्र—इन पाँच इन्द्रियोंके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ५ ॥
भरद्वाज उवाच
पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजङ्गमाः ।
स्थावराणां न दृश्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ॥ ६ ॥
**भरद्वाजने पूछा—**भगवन्! आपके कथनानुसार यदि समस्त स्थावर-जंगम पदार्थ इन पाँच महाभूतोंसे ही संयुक्त हैं तो स्थावरोंके शरीरोंमें तो पाँच भूत नहीं दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥
अनूष्मणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः ।
वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ॥ ७ ॥
वृक्षोंके शरीरमें गर्मी नहीं है, कोई चेष्टा भी नहीं है तथा वास्तवमें वे घन हैं; अतः उनके शरीरमें पाँचों भूतोंकी उपलब्धि नहीं होती है ॥ ७ ॥
न शृण्वन्ति न पश्यन्ति न गन्धरसवेदिनः ।
न च स्पर्शं विजानन्ति ते कथं पाञ्चभौतिकाः ॥ ८ ॥
वे न सुनते हैं, न देखते हैं, न गन्ध और रसका ही अनुभव करते हैं और न उन्हें स्पर्शका ही ज्ञान होता है; फिर वे पाञ्चभौतिक कैसे कहे जाते हैं? ॥ ८ ॥
अद्रवत्पादनग्नित्वादभूमित्वादवायुतः ।
आकाशस्याप्रमेयत्वाद् वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥ ९ ॥
उनमें न तो द्रवत्व देखा जाता है, न अग्निका अंश, न पृथ्वी और वायुका ही भाग उपलब्ध होता है। आकाश तो अप्रमेय है; अतः वह भी वृक्षोंमें नहीं है, इसलिये वृक्षोंकी पाञ्चभौतिकता नहीं सिद्ध होती है ॥ ९ ॥
भृगुरुवाच
घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः ।
तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपद्यते ॥ १० ॥
**भृगुजीने कहा—**मुने! यद्यपि वृक्ष ठोस जान पड़ते हैं तो भी उनमें आकाश हैं, इसमें संशय नहीं है। इसीसे उनमें नित्यप्रति फल-फूल आदिकी उत्पत्ति सम्भव हो सकती है ॥ १० ॥
ऊष्मतो म्लायते पर्णं त्वक् फलं पुष्पमेव च ।
म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥ ११ ॥
वृक्षोंके भीतर जो ऊष्मा या गर्मी है, उसीसे उनके पत्ते, छाल, फल फूल, कुम्हलाते हैं, मुरझाकर झड़ जाते हैं; इससे उनमें स्पर्शका होना भी सिद्ध होता है ॥ ११ ॥
वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्यते ।
श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वन्ति पादपाः ॥ १२ ॥
यह भी देखा जाता है कि वायु, अग्नि और बिजलीकी कड़क आदि भीषण शब्द होनेपर वृक्षोंके फल-फूल झड़कर गिर जाते हैं। शब्दका ग्रहण तो श्रवणेन्द्रियसे ही होता है; इससे यह सिद्ध हुआ कि वृक्ष भी सुनते हैं ॥ १२ ॥
वल्ली वेष्टयते वृक्षं सर्वतश्चैव गच्छति ।
न ह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात् पश्यन्ति पादपाः ॥ १३ ॥
लता वृक्षको चारों ओरसे लपेट लेती है और उसके ऊपरी भागतक चढ़ जाती है। बिना देखे किसीको अपने जानेका मार्ग नहीं मिल सकता; इससे सिद्ध है कि वृक्ष देखते भी हैं ॥ १३ ॥
पुण्यापुण्यैस्तथा गन्धैर्धूपैश्च विविधैरपि ।
अर्रोगाः पुष्पिताः सन्ति तस्माज्जिघ्रन्ति पादपाः ॥ १४ ॥
पवित्र और अपवित्र गन्धसे तथा नाना प्रकारके धूपोंकी गन्धसे वृक्ष नीरोग होकर फूलने-फलने लग जाते हैं; इससे प्रमाणित होता है कि वृक्ष भी सूँघते हैं ॥ १४ ॥
पादैः सलिलपानाच्च व्याधीनां चापि दर्शनात् ।
व्याधिप्रतिक्रियत्वाच्च विद्यते रसनं द्रुमे ॥ १५ ॥
वृक्ष अपनी जड़से जल पीते हैं और कोई रोग होनेपर जड़में ओषधि डालकर उनकी चिकित्सा भी की जाती है; इससे सिद्ध है कि वृक्षमें रसनेन्द्रिय भी है ॥ १५ ॥
वक्त्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत् ।
तथा पवनसंयुक्तः पादैः पिबति पादपः ॥ १६ ॥
जैसे मनुष्य कमलकी नाल मुँहमें लगाकर उसके द्वारा ऊपरको जल खींचता है, उसी तरह वायुकी सहायतासे युक्त वृक्ष अपनी जड़ोंद्वारा ऊपरकी ओर पानी खींचता है ॥ १६ ॥
सुखदुःखयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात् ।
जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
वृक्ष कट जानेपर उनमें नया अंकुर उत्पन्न हो जाता है और वे सुख-दुःखको ग्रहण करते हैं। इससे मैं देखता हूँ कि वृक्षोंमें जीव भी हैं। वे अचेतन नहीं हैं ॥ १७ ॥
तेन तज्जलमादत्तं जरयत्यग्निमारुतौ ।
आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥ १८ ॥
वृक्ष अपनी जड़से जो जल खींचता है, उसे उसके अंदर रहनेवाली वायु और अग्नि पचाती है। आहारका परिपाक होनेसे वृक्षमें स्निग्धता आती है और वे बढ़ते हैं ॥ १८ ॥
जङ्गमानां च सर्वेषां शरीरे पञ्च धातवः ।
प्रत्येकशः प्रभिद्यन्ते यैः शरीरं विचेष्टते ॥ १९ ॥
समस्त जंगमोंके शरीरोंमें भी पाँच भूत रहते हैं; परंतु वहाँ उनके स्वरूपमें भेद होता है। उन पाँच भूतोंके सहयोगसे ही शरीर चेष्टाशील होता है ॥ १९ ॥
त्वक् च मांसं तथास्थीनि मज्जा स्नायुश्च पञ्चमम् ।
इत्येतदिह संघातं शरीरे पृथिवीमयम् ॥ २० ॥
शरीरमें त्वचा, मांस, हड्डी, मज्जा और स्नायु—इन पाँच वस्तुओंका समुदाय पृथ्वीमय है ॥ २० ॥
तेजो ह्यग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च ।
अग्निर्जरयते यश्च पञ्चाग्नेयाः शरीरिणः ॥ २१ ॥
तेज, क्रोध, नेत्र, ऊष्मा और जठरानल—ये पाँच वस्तुएँ देहधारियोंके शरीरमें अग्निमय हैं ॥ २१ ॥
श्रोत्रं घ्राणं तथाऽऽस्यं च हृदयं कोष्ठमेव च ।
आकाशात् प्राणिनामेते शरीरे पञ्च धातवः ॥ २२ ॥
कान, नासिका, मुख, हृदय और उदर प्राणियोंके शरीरमें ये पाँच धातुमय खोखलापन आकाशसे उत्पन्न हुए हैं— ॥ २२ ॥
श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च ।
इत्यापः पञ्चधा देहे भवन्ति प्राणिनां सदा ॥ २३ ॥
कफ, पित्त, स्वेद, चर्बी और रुधिर—ये प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाली पाँच गीली वस्तुएँ जलरूप हैं ॥ २३ ॥
प्राणात् प्रणीयते प्राणी व्यानाद् व्यायच्छते तथा ।
गच्छत्यपानोऽधश्चैव समानो हृद्यवस्थितः ॥ २४ ॥
उदानादुच्छ्वसिति च प्रतिभेदाच्च भाषते ।
इत्येते वायवः पञ्च चेष्टयन्तीह देहिनम् ॥ २५ ॥
प्राणसे प्राणी चलने-फिरनेका काम करता है, व्यानसे व्यायाम (बलसाध्य उद्यम) करता है, अपान वायु ऊपरसे नीचेकी ओर जाती है, समान वायु हृदयमें स्थित होती है, उदानसे पुरुष उच्छ्वास लेता है और कण्ठ, तालु आदि स्थानोंके भेदसे शब्दों एवं अक्षरोंका उच्चारण करता है। इस प्रकार ये पाँच वायुके परिणाम हैं, जो शरीरधारीको चेष्टाशील बनाते हैं ॥ २४-२५ ॥
भूमेर्गन्धगुणान् वेत्ति रसं चाद्भ्यः शरीरवान् ।
ज्योतिषा चक्षुषा रूपं स्पर्शं वेत्ति च वाहिना ॥ २६ ॥
जीव भूमिसे ही (अर्थात् घ्राणेन्द्रियद्वारा) गन्ध गुणका अनुभव करता है, जलसम्बन्धी इन्द्रिय रसनासे शरीरधारी पुरुष रसका आस्वादन करता है, तेजोमय नेत्रके द्वारा रूपका तथा वायुसम्बन्धी त्वगिन्द्रियके द्वारा उसे स्पर्शका ज्ञान होता है ॥ २६ ॥
गन्धः स्पर्शो रसो रूपं शब्दश्चात्र गुणाः स्मृताः ।
तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान् गुणान् ॥ २७ ॥
गन्ध, स्पर्श, रस, रूप और शब्द—ये पृथ्वीके गुण माने गये हैं। इनमेंसे प्रधान गन्धके गुणोंका मैं विस्तार-पूर्वक वर्णन करता हूँ ॥ २७ ॥
इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरः कटुरेव च ।
निहारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च ॥ २८ ॥
एवं नवविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्धविस्तरः ।
अनुकूल, प्रतिकूल, मधुर, कटु, निहारी अर्थात् दूरसे आनेवाली, तेज गन्धमिश्रित, स्निग्ध, रूक्ष और विशद—ये गन्धके नौ भेद जानने चाहिये। इस प्रकार पार्थिव गन्धका विस्तार बताया गया ॥ २८ १/२ ॥
ज्योतिः पश्यति चक्षुर्भ्यां स्पर्शं वेत्ति च वायुना ॥ २९ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः ।
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३० ॥
मनुष्य दोनों नेत्रोंसे रूपको देखता है और त्वगिन्द्रियसे स्पर्शका अनुभव करता है। शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये जलके गुण माने गये हैं। उनमें प्रधान गुण रस है, उसकी जानकारीके लिये अब मैं उसके भेदोंका वर्णन करता हूँ। तुम उसे मेरे मुँहसे सुनो ॥ २९-३० ॥
रसो बहुविधः प्रोक्त ऋषिभिः प्रथितात्मभिः ।
मधुरो लवणस्तिक्तः कषायोऽम्लः कटुस्तथा ॥ ३१ ॥
उदारचेता महर्षियोंने रसके अनेक भेद बताये हैं—मधुर, लवण, तिक्त, कषाय, अम्ल और कटु। इन छः रूपोंमें विस्तारको प्राप्त हुआ रस जलमय माना गया है ॥ ३१ ॥
एष षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ॥ ३२ ॥
ज्योतिः पश्यति रूपाणि रूपं च बहुधा स्मृतम् ।
शब्द, स्पर्श और रूप—ये अग्निके तीन गुण बताये जाते हैं। ज्योतिर्मय नेत्र रूपको देखते हैं। अग्निके प्रधान गुण रूपको भी अनेक प्रकारका माना गया है ॥ ३२ १/२ ॥
ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणुवृत्तवान् ॥ ३३ ॥
शुक्लः कृष्णस्तथा रक्तः पीतो नीलारुणस्तथा ।
कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो मृदुदारुणः ॥ ३४ ॥
एवं षोडशविस्तारो ज्योतिरूपगुणः स्मृतः ।
ह्रस्व दीर्घ, स्थूल, चौकोर और सब ओरसे गोल, सफेद, काला, लाल, पीला और आकाशकी भाँति नीला, कठिन, चिक्कण, अल्प, पिच्छिल, मृदु और दारुण—इस प्रकार ज्योतिर्मय रूप नामक गुण सोलह भेदोंमें विस्तारको प्राप्त हुआ है ॥ ३३-३४ १/२ ॥
शब्दस्पर्शौ च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत ॥ ३५ ॥
वायव्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः ।
वायुके दो गुण जानने चाहिये—शब्द और स्पर्श। वायुका प्रमुख गुण स्पर्श ही है, जिसके अनेक भेद माने गये हैं— ॥ ३५ १/२ ॥
उष्णः शीतः सुखो दुःखः स्निग्धो विशद एव च ॥ ३६ ॥
तथा खरो मृदू रूक्षो लघुर्गुरुतरोऽपि च ।
एवं द्वादशधा स्पर्शो वायव्यो गुण उच्यते ॥ ३७ ॥
उष्ण, शीत, सुख, दुःख, स्निग्ध, विशद, खर, मृदु, रूक्ष, हलका, भारी और अधिक भारी—इस प्रकार वायु-सम्बन्धी स्पर्श गुणके बारह भेद कहे जाते हैं ॥ ३६-३७ ॥
तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् ।
तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरं विविधात्मकम् ॥ ३८ ॥
षड्ज ऋषभगान्धारौ मध्यमो धैवतस्तथा ।
पञ्चमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान् ॥ ३९ ॥
एष सप्तविधः प्रोक्तो गुण आकाशसम्भवः ।
आकाशका एकमात्र गुण शब्द ही माना गया है। उस शब्दगुणका अनेक भेदोंमें जो विस्तार हुआ है, उसका वर्णन करता हूँ—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद—ये आकाशजनित शब्द गुणके सात भेद बताये गये हैं, जिन्हें जानना चाहिये ॥ ३८-३९ १/२ ॥
ऐश्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु ॥ ४० ॥
मृदङ्गभेरीशङ्खानां स्तनयित्नो रथस्य च ।
यः कश्चिच्छूयते शब्दः प्राणिनोऽप्राणिनोऽपि वा ।
एतेषामेव सर्वेषां विषये सम्प्रकीर्तितः ॥ ४१ ॥
अपने व्यापक स्वरूपसे तो शब्द सर्वत्र है, किंतु पटह (नगाड़े) आदिमें इसकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होती है। मृदंग, भेरी, शंख, मेघ तथा रथकी घर्घरहाट आदिमें जो कुछ शब्द सुना जाता है और जड या चेतनका जो कुछ भी शब्द श्रवणगोचर होता है, वह सब इन सात भेदोंके ही अन्तर्गत बताया गया है ॥ ४०-४१ ॥
एवं बहुविधाकारः शब्द आकाशसम्भवः ।
आकाशजं शब्दमाहुरेभिर्वायुगुणैः सह ॥ ४२ ॥
इस प्रकार आकाशजनित शब्दके अनेक भेद हैं। वायुसम्बन्धी गुणोंके साथ ही आकाशजनित शब्द होता है; ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं ॥ ४२ ॥
अव्याहतैश्चेतयते न वेत्ति विषमस्थितैः ।
आप्याय्यन्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः ॥ ४३ ॥
जब वायुसम्बन्धी गुण बाधित न होकर शब्दके साथ रहता है, तब मनुष्य शब्दको सुनता और समझता है; किंतु जब वायुसम्बन्धी गुण दीवार अथवा प्रतिकूल वायुसे बाधित होकर विषम अवस्थामें स्थित हो जाते हैं, तब शब्दका ग्रहण नहीं होता है। वे शब्द आदिके उत्पादक धातु (इन्द्रियगोलक) धातुओं (इन पाँचों भूतों) द्वारा ही पोषित होते हैं ॥ ४३ ॥
आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु ।
मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिताः ॥ ४४ ॥
जल, अग्नि और वायु—ये तीन तत्त्व सदा देहधारियोंमें जाग्रत् रहते हैं। ये ही शरीरके मूल हैं और प्राणोंमें ओत-प्रोत होकर शरीरमें स्थित रहते हैं ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥