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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा

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एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

धर्ममर्थं च कामं च वेदाः शंसन्ति भारत ।
कस्य लाभो विशिष्टोऽत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**राजा युधिष्ठिरने पूछा—**भरतनन्दन पितामह! वेद तो धर्म, अर्थ और काम—तीनोंकी ही प्रशंसा करते हैं; अतः आप मुझे यह बताइये कि इन तीनोंमेंसे किसकी प्राप्ति मेरे लिये सबसे बढ़कर है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
कुण्डधारेण यत् प्रीत्या भक्तायोपकृतं पुरा ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जिसके अनुसार कुण्डधार नामक मेघने पूर्वकालमें प्रसन्न होकर अपने एक भक्तका उपकार किया था ॥ २ ॥

अधनो ब्राह्मणः कश्चित् कामाद् धर्ममवैक्षत ।
यज्ञार्थं सततोऽर्थार्थी तपोऽतप्यत दारुणम् ॥ ३ ॥
किसी समय एक निर्धन ब्राह्मणने सकामभावसे धर्म करनेका विचार किया। वह यज्ञ करनेके लिये सदा ही धनकी इच्छा रखता था, अतः बड़ी कठोर तपस्या करने लगा ॥ ३ ॥

स निश्चयमथो कृत्वा पूजयामास देवताः ।
भक्त्या न चैवाध्यगच्छद् धनं सम्पूज्य देवताः ॥ ४ ॥
यही निश्चय करके उसने भक्तिपूर्वक देवताओंकी पूजा-अर्चा आरम्भ की। परंतु देवताओंकी पूजा करके भी वह धन न पा सका ॥ ४ ॥

ततश्चिन्तामनुप्राप्तः कतमद्दैवतं तु तत् ।
यन्ये द्रुतं प्रसीदेत मानुषैरजडीकृतम् ॥ ५ ॥
तब वह इस चिन्तामें पड़ा कि वह कौन-सा देवता है, जो मुझपर शीघ्र प्रसन्न हो जाय और मनुष्योंने आराधना करके जिसे जड न बना दिया हो ॥ ५ ॥

सोऽथ सौम्येन मनसा देवानुचरमन्तिके ।
प्रत्यपश्यज्जलधरं कुण्डधारमवस्थितम् ॥ ६ ॥

तदनन्तर उस ब्राह्मणने शान्त मनसे देवताओंके अनुचर कुण्डधार नामक मेघको पास ही खड़ा देखा ।।
दृष्ट्वैव तं महाबाहुं तस्य भक्तिरजायत ।
अयं मे धास्यति श्रेयो वपुरेतद्धि तादृशम् ।। ७ ।।
उस महाबाहु मेघको देखते ही ब्राह्मणके मनमें उसके प्रति भक्ति उत्पन्न हो गयी और वह सोचने लगा कि यह अवश्य मेरा कल्याण करेगा; क्योंकि इसका यह शरीर वैसे ही लक्षणोंसे सम्पन्न है ।। ७ ।।
संनिकृष्टश्च देवस्य न चान्यैर्मानुषैर्वृतः ।
एष मे दास्यति धनं प्रभूतं शीघ्रमेव च ।। ८ ।।
यह देवताका संनिकटवर्ती है और दूसरे मनुष्योंने इसे घेर नहीं रखा है। इसलिये यह मुझे शीघ्र ही प्रचुर धन देगा ।। ८ ।।
ततो धूपैश्च गन्धैश्च माल्यैरुच्चावचैरपि ।
बलिभिर्विविधाभिश्च पूजयामास तं द्विजः ।। ९ ।।
तब ब्राह्मणने धूप, गन्ध, छोटे-बड़े माल्य तथा भाँति-भाँतिके पूजोपहार अर्पित करके कुण्डधार मेघका पूजन किया ।। ९ ।।
ततस्त्वल्पेन कालेन तुष्टो जलधरस्तदा ।
तस्योपकारनियतामिमां वाचमुवाच ह ।। १० ।।
इससे वह मेघ थोड़े ही समयमें संतुष्ट हो गया और उसने ब्राह्मणके उपकारमें नियमपूर्वक प्रवृत्ति सूचित करनेवाली यह बात कही— ।। १० ।।

ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा ।
निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ।। ११ ।।
‘ब्रह्मन्! ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर और व्रतभंग करनेवाले मनुष्यके लिये साधुपुरुषोंने प्रायश्चित्तका विधान किया है, किंतु कृतघ्नके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है’ ।। ११ ।।
आशायास्तनयोऽधर्मः क्रोधोऽसूयासुतः स्मृतः ।
लोभः पुत्रो निकृत्यास्तु कृतघ्नो नार्हति प्रजाम् ।। १२ ।।
‘आशाका पुत्र अधर्म है। असूयाका पुत्र क्रोध माना गया है। निकृति (शठता) का पुत्र लोभ है; परंतु कृतघ्न मनुष्य संतान पानेके योग्य नहीं है’ ।। १२ ।।
ततः स ब्राह्मणः स्वप्ने कुण्डधारस्य तेजसा ।
अपश्यत् सर्वभूतानि कुशेषु शयितस्तदा ।। १३ ।।
तदनन्तर वह ब्राह्मण कुण्डधारके तेजसे प्रेरित हो कुशोंकी शय्यापर सो गया और स्वप्नमें उसने समस्त प्राणियोंको देखा ।। १३ ।।
शमेन तपसा चैव भक्त्या च निरुपस्कृतः ।
शुद्धात्मा ब्राह्मणो रात्रौ निदर्शनमपश्यत ।। १४ ।।

वह शम-दम, तप और भक्तिभावसे सम्पन्न, भोगरहित तथा शुद्धचित्तवाला था। उस ब्राह्मणको रातमें कुछ ऐसा दृष्टान्त दिखायी दिया, जिससे उसे कुण्डधारके प्रति अपनी भक्तिका परिचय मिल गया ॥ १४ ॥

मणिभद्रं स तत्रस्थं देवतानां महाद्युतिम् ।
अपश्यत महात्मानं व्यादिशन्तं युधिष्ठिर ॥ १५ ॥

युधिष्ठिर! उसने देखा कि महातेजस्वी महात्मा यक्षराज मणिभद्र वहाँ विराजमान हैं और देवताओंके समक्ष विभिन्न याचकोंको उपस्थित कर रहे हैं ॥ १५ ॥

तत्र देवाः प्रयच्छन्ति राज्यानि च धनानि च ।
शुभैः कर्मभिरारब्धाः प्रच्छिन्दन्त्यशुभेषु च ॥ १६ ॥

वहाँ देवतालोग उन याचकोंके शुभकर्मके बदले राज्य और धन आदि दे रहे थे और अशुभ कर्मका भोग उपस्थित होनेपर पहलेके दिये हुए राज्य आदिको भी छीन लेते थे ॥ १६ ॥

पश्यतामथ यक्षाणां कुण्डधारो महाद्युतिः ।
निपत्य पतितो भूमौ देवानां भरतर्षभ ॥ १७ ॥

भरतश्रेष्ठ! वहाँ यक्षोंके देखते-देखते महातेजस्वी कुण्डधारने देवताओंके आगे धरतीपर माथा टेक दिया ॥

ततस्तु देववचनान्मणिभद्रो महामनाः ।
उवाच पतितं भूमौ कुण्डधार किमिष्यते ॥ १८ ॥

तब महामनस्वी मणिभद्रने देवताओंके कहनेसे पृथ्वीपर पड़े हुए उस मेघसे पूछा, 'कुण्डधार! तुम क्या चाहते हो?' ॥ १८ ॥

कुण्डधार उवाच

यदि प्रसन्ना देवा मे भक्तोऽयं ब्राह्मणो मम ।
अस्यानुग्रहमिच्छामि कृतं किंचित् सुखोदयम् ॥ १९ ॥

कुण्डधार बोला— यह ब्राह्मण मेरा भक्त है। यदि देवतालोग मुझपर प्रसन्न हों तो मैं इसके ऊपर उनका ऐसा अनुग्रह चाहता हूँ, जिससे इसे भविष्यमें कुछ सुख मिल सके ॥ १९ ॥

ततस्तं मणिभद्रस्तु पुनर्वचनमब्रवीत् ।
देवानामेव वचनात् कुण्डधारं महाद्युतिम् ॥ २० ॥

तब मणिभद्रने देवताओंकी ही आज्ञासे महातेजस्वी कुण्डधारके प्रति पुनः यह बात कही ॥ २० ॥

मणिभद्र उवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते कृतकृत्यः सुखी भव ।

धनार्थी यदि विप्रोऽयं धनमस्मै प्रदीयताम् ॥ २१ ॥
**मणिभद्र बोले—**कुण्डधार! उठो, उठो; तुम्हारा कल्याण हो, तुम कृतकृत्य और सुखी हो जाओ। यदि यह ब्राह्मण धन चाहता तो इसे धन दे दिया जाय ॥ २१ ॥
यावद् धनं प्रार्थयते ब्राह्मणोऽयं सखा तव ।
देवानां शासनात् तावदसंख्येयं ददाम्यहम् ॥ २२ ॥
तुम्हारा सखा यह ब्राह्मण जितना धन चाहता हो, देवताओंकी आज्ञासे मैं उतना ही अथवा असंख्य धन इसे दे रहा हूँ ॥ २२ ॥
विचार्य कुण्डधारस्तु मानुष्यं चलमध्रुवम् ।
तपसे मतिमाधत्त ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
युधिष्ठिर! परंतु कुण्डधारने यह सोचकर कि मानव-जीवन चंचल एवं अस्थिर है, उस ब्राह्मणके तपोबलको भी बढ़ानेका विचार किया ॥ २३ ॥

कुण्डधार उवाच

नाहं धनानि याचामि ब्राह्मणाय धनप्रद ॥ २४ ॥
अन्यमेवाहमिच्छामि भक्तायानुग्रहं कृतम् ।
पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद् वा रत्नसंचयम् ॥ २५ ॥
भक्ताय नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः ।
धर्मेऽस्य रमतां बुद्धिर्धर्मं चैवोपजीवतु ।
धर्मप्रधानो भवतु ममैषोऽनुग्रहो मतः ॥ २६ ॥
**कुण्डधार बोला—**धनदाता देव! मैं ब्राह्मणके लिये धनकी याचना नहीं करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे इस भक्तपर किसी और प्रकारका ही अनुग्रह किया जाय। मैं अपने इस भक्तको रत्नोंसे भरी हुई पृथ्वी अथवा रत्नोंका विशाल भण्डार नहीं देना चाहता। मेरी तो यह इच्छा है कि यह धर्मात्मा हो। इसकी बुद्धि धर्ममें लगी रहे तथा यह धर्मसे ही जीवन-निर्वाह करे। इसके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता रहे। इसीको मैं इसके लिये महान् अनुग्रह मानता हूँ ॥ २४—२६ ॥

मणिभद्र उवाच

सदा धर्मफलं राज्यं सुखानि विविधानि च ।
फलान्येवायमश्नातु कायक्लेशविवर्जितः ॥ २७ ॥
**मणिभद्र बोला—**धर्मके फल तो सदा राज्य और नाना प्रकारके सुख ही हैं; अतः यह ब्राह्मण शारीरिक कष्टसे रहित हो केवल उन फलोंका ही उपभोग करे ॥ २७ ॥

भीष्म उवाच

ततस्तदेव बहुशः कुण्डधारो महायशाः ।

अभ्यासमकरोद् धर्मे ततस्तुष्टास्तु देवताः ॥ २८ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! मणिभद्रके ऐसा कहनेपर भी महायशस्वी कुण्डधारने बार-बार अपनी वही बात दुहरायी। ब्राह्मणका धर्म बढ़े, इसीके लिये आग्रह किया। इससे सब देवता संतुष्ट हो गये ॥ २८ ॥

मणिभद्र उवाच
प्रीतास्ते देवताः सर्वा द्विजस्यास्य तथैव च ।
भविष्यत्येष धर्मात्मा धर्मे चाधास्यते मतिः ॥ २९ ॥
**तब मणिभद्रने कहा—**कुण्डधार! सब देवता तुमपर और इस ब्राह्मणपर भी बहुत प्रसन्न हैं। यह धर्मात्मा होगा और इसकी बुद्धि धर्ममें ही लगी रहेगी ॥
ततः प्रीतो जलधरः कृतकार्यो युधिष्ठिर ।
ईप्सितं मनसो लब्ध्वा वरमन्यैः सुदुर्लभम् ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ मनोवाञ्छित वर पाकर कृतकृत्य एवं सफल-मनोरथ हो वह मेघ बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ ३० ॥
ततोऽपश्यत चीराणि सूक्ष्माणि द्विजसत्तमः ।
पार्श्वतोऽभ्याशतो न्यस्तान्यथ निर्वेदमागतः ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपने निकट अगल-बगलमें रखे हुए बहुत-से सूक्ष्म चीर (वल्कल आदि) देखे। इससे उसके मनमें बड़ा खेद एवं वैराग्य हुआ ॥ ३१ ॥

ब्राह्मण उवाच
अयं न सुकृतं वेत्ति कोन्वन्यो वेत्स्यते कृतम् ।
गच्छामि वनमेवाहं वरं धर्मेण जीवितुम् ॥ ३२ ॥
**ब्राह्मण मन-ही-मन बोला—**जब मेरे इस पुण्यमय तपका उद्देश्य यह कुण्डधार ही नहीं समझ पा रहा है, तब दूसरा कौन जानेगा! अच्छा, अब मैं वनको ही चलता हूँ। धर्ममय जीवन बिताना ही अच्छा है ॥ ३२ ॥

भीष्म उवाच
निर्वेदाद् देवतानां च प्रसादात् स द्विजोत्तमः ।
वनं प्रविश्य सुमहत् तप आरब्धवांस्तदा ॥ ३३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! वैराग्य और देवताओंके कृपाप्रसादसे वनमें जाकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने उस समय बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ३३ ॥
देवतातिथिशेषेण फलमूलाशनो द्विजः ।
धर्मे चास्य महाराज दृढा बुद्धिरजायत ॥ ३४ ॥

देवताओं और अतिथियोंको अर्पण करके शेष बचे हुए फल-मूल आदिका वह आहार करता था। महाराज! धर्मके विषयमें उसकी बुद्धि अटल हो गयी थी॥ ३४॥
त्यक्त्वा मूलफलं सर्वं पर्णाहारोऽभवद् द्विजः।
पर्णं त्यक्त्वा जलाहारः पुनरासीद् द्विजस्तदा॥ ३५॥
वायुभक्षस्ततः पश्चाद् बहून् वर्षगणानभूत्।
न चास्य क्षीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ ३६॥
कुछ कालके बाद वह ब्राह्मण सारे फल-मूलका भोजन छोड़कर केवल पत्ते चबाकर रहने लगा। फिर पत्तेका भी त्याग करके केवल जल पीकर निर्वाह करने लगा। तत्पश्चात् बहुत वर्षोंतक वह केवल वायु पीकर रहा। फिर भी उसकी प्राणशक्ति क्षीण नहीं होती थी, यह एक अद्भुत-सी बात थी॥ ३५-३६॥
धर्मे च श्रद्दधानस्य तपस्युग्रे च वर्ततः।
कालेन महता तस्य दिव्या दृष्टिरजायत॥ ३७॥
धर्ममें श्रद्धा रखते हुए दीर्घकालतक उग्र तपस्यामें लगे हुए उस ब्राह्मणको दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गयी॥
तस्य बुद्धिः प्रादुरासीद् यदि दद्यामहं धनम्।
तुष्टः कस्यचिदेवेह मिथ्यावाङ् न भवेन्मम॥ ३८॥
उस समय उसे यह अनुभव हुआ कि यदि मैं संतुष्ट होकर इस जगत्में किसीको प्रचुर धन दे दूँ तो मेरा दिया हुआ वचन मिथ्या नहीं होगा॥ ३८॥
ततः प्रहृष्टवदनो भूय आरब्धवांस्तपः।
भूयश्चाचिन्तयत् सिद्धो यत्परं सोऽभिमन्यते॥ ३९॥
यह विचार आते ही उसका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने बड़े उत्साहके साथ पुनः तपस्या आरम्भ की। पुनः सिद्धि प्राप्त होनेपर उसने देखा कि वह मनमें जो-जो संकल्प करता है, वह अत्यन्त महान् होनेपर भी सामने प्रस्तुत हो जाता है। यह देखकर ब्राह्मणने पुनः यों विचार किया—॥ ३९॥
यदि दद्यामहं राज्यं तुष्टो वै यस्य कस्यचित्।
स भवेदचिराद् राजा न मिथ्या वाग् भवेन्मम।
‘यदि मैं संतुष्ट होकर जिस किसीको भी राज्य दे दूँ तो वह शीघ्र ही राजा हो जायगा। मेरी यह बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती’॥ ३९½॥
तस्य साक्षात् कुण्डधारो दर्शयामास भारत॥ ४०॥
ब्राह्मणस्य तपोयोगात् सौहृदेनाभिचोदितः॥ ४१॥
समागम्य स तेनाथ पूजां चक्रे यथाविधि।
ब्राह्मणः कुण्डधारस्य विस्मितश्चाभवन्नृप॥ ४२॥

भरतनन्दन! इतनेहीमें ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे तथा उसके प्रति सौहार्दसे प्रेरित होकर कुण्डधारने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उससे मिलकर ब्राह्मणने कुण्डधारकी विधिपूर्वक पूजा की। नरेश्वर! उसे देखकर ब्राह्मणको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४०—४२ ॥
ततोऽब्रवीत् कुण्डधारो दिव्यं ते चक्षुरुत्तमम् ।
पश्य राज्ञां गतिं विप्र लोकांश्र्चैव तु चक्षुषा ॥ ४३ ॥
तब कुण्डधारने ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर! तुम्हें परम उत्तम दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है; अतः तुम अपनी आँखोंसे देख लो कि राजाओंको किस गतिकी प्राप्ति होती है तथा वे किन-किन लोकोंमें जाते हैं' ॥ ४३॥
ततो राजसहस्राणि मग्नानि निरये तदा ।
दूरादपश्यद् विप्रः स दिव्ययुक्तेन चक्षुषा ॥ ४४ ॥
तब उस ब्राह्मणने दूरसे ही अपने दिव्य नेत्रोंसे देखा कि सहस्रों राजा नरकमें डूबे हुए हैं ॥ ४४ ॥

कुण्डधार उवाच
मां पूजयित्वा भावेन यदि त्वं दुःखमाप्नुयाः ।
कृतं मया भवेत् किं ते कश्च तेऽनुग्रहो भवेत् ॥ ४५ ॥
**कुण्डधार बोला—**ब्रह्मन्! तुमने बड़े भक्तिभावसे मेरी पूजा की थी। इसपर भी यदि तुम धन पाकर दुःख ही भोगते रहते तो मेरे द्वारा तुम्हारा क्या उपकार हुआ होता और तुम्हारे ऊपर मेरा कौन-सा अनुग्रह सिद्ध हो सकता था ॥
पश्य पश्य च भूयस्त्वं कामानिच्छेत् कथं नरः ।
स्वर्गद्वारं हि संरुद्धं मानुषेषु विशेषतः ॥ ४६ ॥
देखो-देखो, एक बार फिर लोगोंकी दशापर दृष्टिपात करो। यह सब देख-सुनकर मनुष्य भोगोंकी इच्छा कैसे कर सकता है। जो धन और भोगोंमें आसक्त हैं, ऐसे लोगों, विशेषतः मनुष्योंके लिये स्वर्गका दरवाजा प्रायः बंद ही रहता है ॥ ४६ ॥

भीष्म उवाच
ततोऽपश्यत् स कामं च क्रोधं लोभं भयं मदम् ।
निद्रां तन्द्रीं तथाऽऽलस्यमावृत्य पुरुषान् स्थितान् ॥ ४७ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर ब्राह्मणने देखा कि उन भोगी पुरुषोंको काम, क्रोध, लोभ, भय, मद, निद्रा, तन्द्रा और आलस्य आदि शत्रु घेरकर खड़े हैं ॥

कुण्डधार उवाच
एतैर्लोकाः सुसंरुद्धा देवानां मानुषाद् भयम् ।
तथैव देववचनाद् विघ्नं कुर्वन्ति सर्वशः ॥ ४८ ॥

कुण्डधार बोला—विप्रवर! देखो, सब लोग इन्हीं दोषोंसे घिरे हुए हैं। देवताओंको मनुष्योंसे भय बना रहता है, इसलिये ये काम आदि दोष देवताओंके आदेशसे मनुष्यके धर्म और तपस्यामें सब प्रकारसे विघ्न डाला करते हैं ॥ ४८ ॥
न देवैरननुज्ञातः कश्चिद् भवति धार्मिकः ।
एष शक्तोऽसि तपसा दातुं राज्यं धनानि च ॥ ४९ ॥
देवताओंकी अनुमति प्राप्त किये बिना कोई निर्विघ्नरूपसे धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता; किंतु तुम्हें तो देवताओंका अनुग्रह प्राप्त हो गया है। इसलिये अब तुम अपने तपके प्रभावसे दूसरोंको राज्य और धन देनेमें समर्थ हो गये हो ॥ ४९ ॥

भीष्म उवाच
ततः पपात शिरसा ब्राह्मणस्तोयधारिणे ।
उवाच चैनं धर्मात्मा महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ५० ॥
कामलोभानुबन्धेन पुरा ते यदसूयितम् ।
मया स्नेहमविज्ञाय तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तब उस धर्मात्मा ब्राह्मणने धरतीपर मस्तक टेककर कुण्डधार मेघको साष्टांग प्रणाम किया और उससे कहा—'प्रभो! आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया है। आपके स्नेहको न समझकर काम और लोभके बन्धनमें बँधे रहनेसे मैंने पहले आपके प्रति जो दोषदृष्टि कर ली थी, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें' ॥
क्षान्तमेव मयेत्युक्त्वा कुण्डधारो द्विजर्षभम् ।
सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५२ ॥
(कुण्डधारने कहा—) 'विप्रवर! मैं तो पहलेसे ही क्षमा कर चुका हूँ' ऐसा कहकर उस मेघने उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी दोनों भुजाओंद्वारा हृदयसे लगा लिया और वह फिर वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ ५२ ॥
ततः सर्वांस्तदा लोकान् ब्राह्मणोऽनुचचार ह ।
कुण्डधारप्रसादेन तपसा सिद्धिमागतः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर कुण्डधारके कृपाप्रसादसे तपस्याद्वारा सिद्धि पाकर वह ब्राह्मण सम्पूर्ण लोकोंमें विचरने लगा ॥
विहायसा च गमनं तथा संकल्पितार्थता ।
धर्माच्छक्त्या तथा योगाद् या चैव परमा गतिः ॥ ५४ ॥
आकाशमार्गसे चलना, संकल्पमात्रसे ही अभीष्ट वस्तुका प्राप्त हो जाना तथा धर्म, शक्ति और योगके द्वारा जो परमगति प्राप्त होती है, वह सब कुछ उस ब्राह्मणको प्राप्त हो गयी ॥ ५४ ॥
देवता ब्राह्मणाः सन्तो यक्षा मानुषचारणाः ।

धार्मिकान् पूजयन्तीह न धनाढ्यान् न कामिनः ॥ ५५ ॥
देवता, ब्राह्मण, साधु-संत, यक्ष, मनुष्य और चारण-ये सब-के-सब इस जगत्में धर्मात्माओंका ही पूजन करते हैं, धनियों और भोगियोंका नहीं ॥ ५५ ॥
सुप्रसन्ना हि ते देवा यत्ते धर्मे रता मतिः ।
धने सुखकला काचिद् धर्मे तु परमं सुखम् ॥ ५६ ॥
राजन्! तुम्हारे ऊपर भी देवता बहुत प्रसन्न हैं, जिससे तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी हुई है। धनमें तो सुखका कोई लेशमात्र ही रहता है। परमसुख तो धर्ममें ही है ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि कुण्डधारोपाख्याने
एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें कुण्डधारका उपाख्यानविषयक दो सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७१ ॥