सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

चारों वर्णोंके अलग-अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः

चारों वर्णोंके अलग-अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति

भरद्वाज उवाच

ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम ।
वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा— वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! द्विजोत्तम! अब मुझे यह बताइये कि मनुष्य कौन-सा कर्म करनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र होता है? ॥ १ ॥

भृगुरुवाच

जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः षट्सु कर्मस्ववस्थितः ॥ २ ॥
शौचाचारस्थितः सम्यग्विघसाशी गुरुप्रियः ।
नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥ ३ ॥
भृगुजीने कहा— जो जाति, कर्म आदि संस्कारोंसे सम्पन्न, पवित्र तथा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न है, (यजन-याजन, अध्ययनाध्यापन और दान-प्रतिग्रह—इन) छः कर्मोंमें स्थित रहता है, शौच एवं सदाचारका पालन तथा परम उत्तम यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता है, गुरुके प्रति प्रेम रखता, नित्य व्रतका पालन करता तथा सत्यमें तत्पर रहता है, वही ब्राह्मण कहलाता है ॥ २-३ ॥

सत्यं दानमथाद्रोह आनृशंस्यं त्रपा घृणा ।
तपश्च दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ ४ ॥
जिसमें सत्य, दान, द्रोह न करनेका भाव, क्रूरताका अभाव, लज्जा, दया और तप—ये सद्गुण देखे जाते हैं, वह ब्राह्मण माना गया है ॥ ४ ॥

क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः ।
दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥ ५ ॥
जो क्षत्रियोचित युद्ध आदि कर्मका सेवन करता है, वेदोंके अध्ययनमें लगा रहता है, ब्राह्मणोंको दान देता है और प्रजासे कर लेकर उसकी रक्षा करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है ॥ ५ ॥

वणिज्या पशुरक्षा च कृष्यादानरतिः शुचिः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥ ६ ॥

इसी प्रकार जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न होकर व्यापार, पशुपालन और खेतीका काम करके अन्न संग्रह करनेकी रुचि रखता है और पवित्र रहता है, वह वैश्य कहलाता है ।।
सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः ।
त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥ ७ ॥
किंतु जो वेद और सदाचारका परित्याग करके सदा सब कुछ खानेमें अनुरक्त रहता है और सब तरहके काम करता है, साथ ही बाहर-भीतरसे अपवित्र रहता है, वह शूद्र कहा गया है ।। ७ ।।
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते ।
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥ ८ ॥
उपर्युक्त सत्य आदि सात गुण यदि शूद्रमें दिखायी दें और ब्राह्मणमें न हों तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है ।। ८ ।।
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः ।
एतत् पवित्रं ज्ञानानां तथा चैवात्मसंयमः ॥ ९ ॥
सभी उपायोंसे लोभ और क्रोधको जीतना चाहिये। यही ज्ञानोंमें पवित्र ज्ञान है और यही आत्मसंयम है ।।
वार्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुच्छ्रितौ ।
नित्यं क्रोधाच्छ्रियं रक्षेत् तपो रक्षेच्च मत्सरात् ॥ १० ॥
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ।
क्रोध और लोभ मनुष्यके कल्याणमें बाधा डालनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं; अतः पूरी शक्ति लगाकर इन दोनोंका निवारण करना चाहिये। धन-सम्पत्तिको क्रोधके आघातसे बचाना चाहिये, तपको मात्सर्यके आघातसे बचाना चाहिये, विद्याको मान-अपमानसे और अपने-आपको प्रमादके आक्रमणके बचाना चाहिये ।। १०½ ।।
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धना द्विज ॥ ११ ॥
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी च स बुद्धिमान् ।
ब्रह्मन्! जिसके सभी कार्य कामनाओंके बन्धनसे रहित होते हैं तथा जिसने त्यागकी अतामें सब कुछ होम दिया है, वही त्यागी और वही बुद्धिमान् है ।। ११½ ।।
अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्रायणगतश्चरेत् ॥ १२ ॥
परिग्रहान् परित्यज्य भवेद् बुद्ध्या जितेन्द्रियः ।
अशोकं स्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभयम् ॥ १३ ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे, सबके साथ मैत्रीपूर्ण बर्ताव करे। स्त्री-पुत्र आदिकी ममता एवं आसक्तिको त्यागकर बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको वशमें करे और उस स्थितिको प्राप्त करे, जो इहलोक और परलोकमें भी निर्भय एवं शोकरहित है ।। १२-१३ ।।
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना ।

अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ १४ ॥
नित्य तप करे, मननशील होकर इन्द्रियोंका दमन और मनका संयम करे। आसक्तिके आश्रयभूत देह-गेह आदिमें आसक्त न होकर अजित (परमात्मा) को जीतने (प्राप्त करने) की इच्छा रखे ॥ १४ ॥

इन्द्रियैर्गृह्यते यद् यत् तत्तद् व्यक्तमिति स्थितिः ।
अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ १५ ॥
इन्द्रियोंसे जिसका ग्रहण होता है, वह सब व्यक्त, कहलाता है। जो इन्द्रियातीत होनेके कारण अनुमानसे ही जाना जाय, उसे अव्यक्त समझना चाहिये ॥ १५ ॥

अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारयेन्मनः ।
मनः प्राणे निगृह्णीयात् प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् ॥ १६ ॥
जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस मार्गपर न चले और जो विश्वास करनेयोग्य है, उसमें मन लगावे। मनको प्राणमें और प्राणको ब्रह्ममें स्थापित करे ॥ १६ ॥

निर्वेदादेव निर्वाणं न च किञ्चिद् विचिन्तयेत् ।
सुखं वै ब्रह्मणो ब्रह्म निर्वेदेनाधिगच्छति ॥ १७ ॥
वैराग्यसे ही निर्वाणपद (मोक्ष) प्राप्त होता है। उसे पाकर मनुष्य किसी अनात्मपदार्थका चिन्तन नहीं करता है। ब्राह्मण संसारसे वैराग्य होनेपर सुखस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥

शौचेन सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः ।
सानुक्रोशश्च भूतेषु तद् द्विजातिषु लक्षणम् ॥ १८ ॥
सर्वदा शौच और सदाचारका पालन करे और समस्त प्राणियोंपर दयाभाव बनाये रखे; यह ब्राह्मणका प्रधान लक्षण है ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे वर्णस्वरूपकथने
एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादके प्रसंगमें वर्णोंके स्वरूपका कथनविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८९ ॥