महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३५४-
चतुःपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन
ब्राह्मण उवाच
समुत्पन्नाभिधानोऽस्मि वाङ्माधुर्येण तेऽनघ ।
मित्रत्वमभिपन्नस्त्वं किंचिद् वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ १ ॥
ब्राह्मण बोला— निष्पाप! आपकी मीठी बातें सुनकर ही मैं आपके प्रति स्नेह-बन्धनसे बँध गया हूँ। आपके ऊपर मेरा मित्रभाव हो गया है; अतः आपसे कुछ कह रहा हूँ, मेरी बात सुनिये ॥ १ ॥
गृहस्थधर्मं विप्रेन्द्र कृत्वा पुत्रगतं त्वहम् ।
धर्मं परमकं कुर्यां को हि मार्गो भवेद् द्विज ॥ २ ॥
विप्रवर! मैं गृहस्थ-धर्मको अपने पुत्रोंके अधीन करके सर्वश्रेष्ठ धर्मका पालन करना चाहता हूँ। ब्रह्मन्! बताइये, मेरे लिये कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर होगा? ॥ २ ॥
अहमात्मानमास्थाय एक एवात्मनि स्थितिम् ।
कर्तुं काङ्क्षामि नेच्छामि बद्धः साधारणैर्गुणैः ॥ ३ ॥
कभी मेरी इच्छा होती है कि अकेला ही रहूँ और आत्माका आश्रय लेकर उसीमें स्थित हो जाऊँ? परंतु इन तुच्छ विषयोंसे बँधा होनेके कारण वह इच्छा नष्ट हो जाती है ॥ ३ ॥
यावदेतदतीतं मे वयः पुत्रफलाश्रितम् ।
तावदिच्छामि पाथेयमादातुं पारलौकिकम् ॥ ४ ॥
अब तककी सारी आयु पुत्रसे फल पानेकी कामनामें ही बीत गयी। अब ऐसे धर्ममय धनका संग्रह करना चाहता हूँ, जो परलोकके मार्गमें पाथेय (राहखर्च) का काम दे सके ॥ ४ ॥
अस्मिन् हि लोकसम्भारं परं पारमभीप्सतः ।
उत्पन्ना मे मतिरियं कुतो धर्ममयः प्लवः ॥ ५ ॥
मुझे इस संसारसागरसे पार जानेकी इच्छा हुई है, अतः मेरे मनमें यह जिज्ञासा हो रही है कि मुझे धर्ममयी नौका कहाँसे प्राप्त होगी? ॥ ५ ॥
संयुज्यमानानि निशम्य लोके
निर्यात्यमानानि च सात्त्विकानि ।
दृष्ट्वा तु धर्मध्वजकेतुमालां
प्रकीर्यमाणामुपरि प्रजानाम् ॥ ६ ॥
न मे मनो रज्यति भोगकाले
दृष्ट्वा यतीन् प्रार्थयतः परत्र ।
तेनातिथि बुद्धिबलाश्रयेण
धर्मेण धर्मे विनियुङ्क्ष्व मां त्वम् ॥ ७ ॥
जब मैं सुनता हूँ कि संसारमें विषयोंके सम्पर्कमें आये हुए सात्त्विक पुरुष भी तरह-तरहकी यातनाएँ भोगते हैं तथा जब देखता हूँ कि समस्त प्रजाके ऊपर यमराजकी ध्वजाएँ फहरा रही हैं, तब भोगकालमें भोगोंके प्राप्त होनेपर भी उन्हें भोगनेकी रुचि मेरे मनमें नहीं होती है। जब संन्यासियोंको भी दूसरोंके दरवाजोंपर अन्न-वस्त्रकी भीख माँगते देखता हूँ, तब उस संन्यास-धर्ममें भी मेरा मन नहीं लगता है; अतः अतिथिदेव! आप अपनी ही बुद्धिके बलसे अब मुझे धर्मद्वारा धर्ममें लगाइये ॥ ६-७ ॥
सोऽतिथिर्वचनं तस्य श्रुत्वा धर्माभिभाषिणः।
प्रोवाच वचनं श्लक्ष्णं प्राज्ञो मधुरया गिरा ॥ ८ ॥
धर्मयुक्त वचन बोलनेवाले उस ब्राह्मणकी बात सुनकर उस विद्वान् अतिथिने मधुर वाणीमें यह उत्तम वचन कहा ॥ ८ ॥
अतिथिरुवाच
</div>अहमप्यत्र मुह्यामि ममाप्येष मनोरथः।
न च संनिश्चयं यामि बहुद्वारे त्रिविष्टपे ॥ ९ ॥
**अतिथिने कहा—**विप्रवर! मेरा भी ऐसा ही मनोरथ है। मैं भी आपकी ही भाँति श्रेष्ठ धर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ, परंतु मुझे भी इस विषयमें मोह ही बना हुआ है। स्वर्गके अनेक द्वार (साधन) हैं, अतः किसका आश्रय लिया जाय? इसका निश्चय मैं भी नहीं कर पाता हूँ ॥ ९ ॥
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद् यज्ञफलं द्विजाः।
वानप्रस्थाश्रयाः केचिद् गार्हस्थ्यं केचिदास्थिताः ॥ १० ॥
कोई द्विज मोक्षकी प्रशंसा करते हैं तो कोई यज्ञफलकी। कोई वानप्रस्थ-धर्मका आश्रय लेते हैं तो कोई गार्हस्थ्य-धर्मका ॥ १० ॥
राजधर्माश्रयं केचित् केचिदात्मफलाश्रयम्।
गुरुधर्माश्रयं केचित्केचिद् वाक्संयमाश्रयम् ॥ ११ ॥
कोई राजधर्म, कोई आत्मज्ञान, कोई गुरुशुश्रूषा और कोई मौनव्रतका ही आश्रय लिये बैठे हैं ॥ ११ ॥
मातरं पितरं केचिच्छुश्रूषन्तो दिवं गताः।
अहिंसया परे स्वर्गं सत्येन च तथा परे ॥ १२ ॥
कुछ लोग माता-पिताकी सेवा करके ही स्वर्गमें चले गये। कोई अहिंसासे और कोई सत्यसे ही स्वर्गलोकके भागी हुए हैं ॥ १२ ॥
आहवेऽभिमुखाः केचिन्निहतास्त्रिदिवं गताः।
केचिदुञ्छव्रतैः सिद्धाः स्वर्गमार्गं समाश्रिताः ॥ १३ ॥
कुछ वीर पुरुष युद्धमें शत्रुओंका सामना करते हुए मारे जाकर स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं। कितने ही मनुष्य उञ्छवृत्तिके द्वारा सिद्धि प्राप्त करके स्वर्गगामी हुए हैं ॥ १३ ॥
केचिदध्ययने युक्ता वेदव्रतपराः शुभाः ।
बुद्धिमन्तो गताः स्वर्गं तुष्टात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ १४ ॥
कुछ बुद्धिमान् पुरुष संतुष्टचित्त और जितेन्द्रिय हो वेदोक्त व्रतका पालन तथा स्वाध्याय करते हुए शुभसम्पन्न हो स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर चुके हैं ॥ १४ ॥
आर्जवेनापरे युक्ता निहतानाजर्वैर्जनैः ।
ऋजवो नाकपृष्ठे वै शुद्धात्मानः प्रतिष्ठिताः ॥ १५ ॥
कितने ही सरल और शुद्धात्मा पुरुष सरलतासे ही संयुक्त हो कुटिल मनुष्योंद्वारा मारे गये और स्वर्ग-लोकमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ १५ ॥
एवं बहुविधैर्लोकैर्धर्मद्वारैरनावृतैः ।
ममापि मतिराविग्ना मेघलेखेव वायुना ॥ १६ ॥
इस प्रकार लोकमें धर्मके विविध एवं बहुत-से दरवाजे खुले हुए हैं, उनसे मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार उद्विग्न एवं चंचल हो उठी है, जैसे वायुसे मेघोंकी घटा ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
चतुःपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका
उपाख्यानविषयक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५४ ॥