महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३४५-
पञ्चचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य नारदः परमेष्ठिजः ।
दैवं कृत्वा यथान्यायं पित्र्यं चक्रे ततः परम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! किसी समय ब्रह्मपुत्र नारदजीने शास्त्रीय विधिके अनुसार पहले देवकार्य (हवन-पूजन) करके फिर पितृकार्य (श्राद्ध-तर्पण) किया ॥ १ ॥
ततस्तं वचनं प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मजः प्रभुः ।
क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्र्ये च कल्पिते ॥ २ ॥
त्वया मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे शंस यथागमम् ।
किमेतत् क्रियते कर्म फलं वास्य किमिष्यते ॥ ३ ॥
तब धर्मके ज्येष्ठ पुत्र नरने उनसे इस प्रकार पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य हो। तुम्हारे द्वारा देवकार्य और पितृकार्यके सम्पादित होनेपर उन कर्मोंसे किसकी पूजा सम्पन्न होती है? यह मुझे शास्त्रके अनुसार बताओ। तुम यह कौन-सा कर्म करते हो? और इसके द्वारा किस फलको प्राप्त करना चाहते हो? ॥ २-३ ॥
नारद उवाच
त्वयैतत् कथितं पूर्वं दैवं कर्तव्यमित्यपि ।
दैवतं च परो यज्ञः परमात्मा सनातनः ॥ ४ ॥
नारदजीने कहा— प्रभो! आपने ही पहले यह कहा था कि देवकर्म सबके लिये कर्तव्य है; क्योंकि देवकर्म उत्तम यज्ञ है और यज्ञ सनातन परमात्माका स्वरूप है ॥ ४ ॥
ततस्तद्भावितो नित्यं यजे वैकुण्ठमव्ययम् ।
तस्माच्च प्रसूतः पूर्वं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५ ॥
अतः आपके उस उपदेशसे प्रभावित होकर मैं प्रतिदिन अविनाशी भगवान् वैकुण्ठका यजन करता हूँ। उन्हींसे सर्वप्रथम लोकपितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं ॥
मम वै पितरं प्रीतः परमेष्ठ्यप्यजीजनत् ।
अहं संकल्पजस्तस्य पुत्रः प्रथमकल्पितः ॥ ६ ॥
परमेष्ठी ब्रह्माने प्रसन्न होकर मेरे पिता प्रजापतिको उत्पन्न किया³। मैं उनका संकल्पजनित प्रथम पुत्र हूँ ॥
यजामि वै पितॄन् साधो नारायणविधौ कृते ।
एवं स एव भगवान् पिता माता पितामहः ॥ ७ ॥
साधो! मैं पहले नारायणकी आराधनाका कार्य पूर्ण कर लेनेपर पितरोंका पूजन करता
हूँ। इस प्रकार वे भगवान् नारायण ही मेरे पिता, माता और पितामह हैं ॥ ७ ॥
इज्यते पितृयज्ञेषु तथा नित्यं जगत्पतिः ।
श्रुतिश्चाप्यपरा देवी पुत्रान् हि पितरोऽयजन् ॥ ८ ॥
पितृयज्ञोंमें सदा श्रीहरिकी ही आराधना की जाती है। एक दूसरी श्रुति है कि पिताओं
(देवताओं) नें पुत्रों (अग्निष्वात्त³ आदि) का पूजन किया ॥ ८ ॥
वेदश्रुतिः प्रणष्टा च पुनरध्यापिता सुतैः ।
ततस्ते मन्त्रदाः पुत्राः पितृत्वमुपपेदिरे ॥ ९ ॥
देवताओंका वेदज्ञान भूल गया था; फिर उनके पुत्रोंने ही उन्हें वेदश्रुतियोंको पढ़ाया।
इसीसे वे मन्त्रदाता पुत्र पितृभावको प्राप्त हुए ॥ ९ ॥
नूनं पुरैतद् विदितं युवयोर्भावितात्मनोः ।
पुत्राश्च पितरश्चैव परस्परमपूजयन् ॥ १० ॥
पुत्रों और पिताओंने जो परस्पर एक-दूसरेका पूजन किया, यह बात आप दोनों
शुद्धात्मा पुरुषोंको निश्चय ही पहलेसे ही ज्ञात रही होगी ॥ १० ॥
त्रीन् पिण्डान् न्यस्य वै पृथ्व्यां पूर्वं दत्त्वा कुशानिति ।
कथं तु पिण्डसंज्ञां ते पितरो लेभिरे पुरा ॥ ११ ॥
देवताओंने पृथ्वीपर पहले कुश बिछाकर उनपर पितरोंके निमित्त तीन पिण्ड रखकर
जो उनका पूजन किया था, इसका क्या कारण है? पूर्वकालमें पितरोंने पिण्डनाम कैसे
प्राप्त किया? ॥ ११ ॥
नरनारायणावूचतुः
इमां हि धरणीं पूर्वं नष्टां सागरमेखलाम् ।
गोविन्द उज्जहाराशु वाराहं रूपमास्थितः ॥ १२ ॥
**नर-नारायण बोले—**मुने! यह समुद्रसे घिरी हुई पृथ्वी पहले एकार्णवके जलमें
डूबकर अदृश्य हो गयी थी। उस समय भगवान् गोविन्दने वराहरूप धारण करके
शीघ्रतापूर्वक इसका उद्धार किया था ॥ १२ ॥
स्थापयित्वा तु धरणीं स्वे स्थाने पुरुषोत्तमः ।
जलकर्दमलिप्ताङ्गो लोककार्यार्थमुद्यतः ॥ १३ ॥
वे पुरुषोत्तम पृथ्वीको अपने स्थानपर स्थापित करके जल और कीचड़से लिपटे अंगोंसे
ही लोकहितका कार्य करनेके लिये उद्यत हुए ॥ १३ ॥
प्राप्ते चाह्निककाले तु मध्यदेशगते रवौ ।
दंष्ट्राविलग्नांस्त्रीन् पिण्डान् विधाय सहसा प्रभुः ॥ १४ ॥
स्थापयामास वै पृथ्व्यां कुशानास्तीर्य नारद ।
स तेष्वात्मानमुद्दिश्य पित्र्यं चक्रे यथाविधि ॥ १५ ॥
जब सूर्य दिनके मध्य भागमें आ पहुँचे और तत्कालोचित नित्यकर्मका समय उपस्थित हुआ, तब भगवान्ने अपनी दाढ़ोंमें लगी हुई मिट्टीके सहसा तीन पिण्ड बनाये। नारद! फिर पृथ्वीपर कुश बिछाकर उन्होंने उन कुशोंपर ही वे पिण्ड रख दिये। इसके बाद अपने ही उद्देश्यसे उन पिण्डोंपर विधिपूर्वक पितृपूजनका कार्य सम्पन्न किया ॥ १४-१५ ॥
संकल्पयित्वा त्रीन् पिण्डान् स्वेनैव विधिना प्रभुः ।
आत्मगात्रोष्मसम्भूतैः स्नेहगर्भैस्तिलैरपि ॥ १६ ॥
प्रोक्ष्यापसव्यं देवेशः प्राङ्मुखः कृतवान् स्वयं ।
मर्यादास्थापनार्थं च ततो वचनमुक्तवान् ॥ १७ ॥
अपने ही विधानसे प्रभुने वे तीनों पिण्ड संकल्पित किये। फिर अपने शरीरकी ही गर्मीसे उत्पन्न हुए स्नेहयुक्त तिलों द्वारा अपसव्यभावसे उन पिण्डोंका प्रोक्षण किया। तदनन्तर देवेश्वर श्रीहरिने स्वयं ही पूर्वाभिमुख हो प्रार्थना की और धर्म-मर्यादाकी स्थापनाके लिये यह बात कही ॥ १६-१७ ॥
वृषाकपिरुवाच
अहं हि पितरः स्रष्टुमुद्यतो लोककृत् स्वयं ।
यस्य चिन्तयतः सद्यः पितृकार्यविधीन् परान् ॥ १८ ॥
दंष्ट्राभ्यां प्रविनिर्धूता ममैते दक्षिणां दिशम् ।
आश्रिता धरणीं पिण्डास्तस्मात् पितर एव ते ॥ १९ ॥
भगवान् वराहने कहा— मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका स्रष्टा हूँ। मैं स्वयं ही जब पितरोंकी सृष्टिके लिये उद्यत हो पितृकार्यसम्बन्धी दूसरी विधियोंका चिन्तन करने लगा, उसी क्षण मेरी दो दाढ़ोंसे ये तीन पिण्ड दक्षिण दिशाकी ओर पृथ्वीपर गिर पड़े; अतः ये पिण्ड पितृस्वरूप ही हैं ॥ १८-१९ ॥
त्रयो मूर्तिविहीना वै पिण्डमूर्तिधरास्त्विमे ।
भवन्तु पितरो लोके मया सृष्टाः सनातनाः ॥ २० ॥
तीन पितर मूर्तिहीन या अमूर्त होते हैं, जो पिण्डरूप मूर्ति धारण करके प्रकट हुए हैं, लोकमें मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये ये सनातन पितर हों ॥ २० ॥
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः ।
अहमेवात्र विज्ञेयस्त्रिषु पिण्डेषु संस्थितः ॥ २१ ॥
पिता, पितामह और प्रपितामह—इनके रूपमें मुझे ही इन तीन पिण्डोंमें स्थित जानना चाहिये ॥ २१ ॥
नास्ति मत्तोऽधिकः कश्चित् को वान्योऽर्च्यो मया स्वयम् ।
को वा मम पिता लोके अहमेव पितामहः ॥ २२ ॥
मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है; फिर दूसरा कौन है जिसका स्वयं मैं पूजन करूँ? संसारमें मेरा पिता कौन है? सबका दादा-बाबा तो मैं ही हूँ ॥ २२ ॥
पितामहपिता चैव अहमेवात्र कारणम् ।
इत्येतदुक्त्वा वचनं देवदेवो वृषाकपिः ॥ २३ ॥
वराहपर्वते विप्र दत्त्वा पिण्डान् सविस्तरम् ।
आत्मानं पूजयित्वैव तत्रैवादर्शनं गतः ॥ २४ ॥
पितामहका पिता—परदादा भी मैं ही हूँ। मैं ही इस जगत्का कारण हूँ। विप्रवर! ऐसी बात कहकर देवाधिदेव भगवान् वराहने वराहपर्वतपर विस्तारपूर्वक पिण्डदान दे पितरोंके रूपमें अपने आपका ही पूजन करके वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २३-२४ ॥
एषा तस्य स्थितिर्विप्र पितरः पिण्डसंज्ञिताः ।
लभन्ते सततं पूजां वृषाकपिवचो यथा ॥ २५ ॥
ब्रह्मन्! यह भगवान्की ही नियत की हुई मर्यादा है। इस प्रकार पितरोंको पिण्डसंज्ञा प्राप्त हुई है। भगवान् वराहके कथनानुसार वे पितर सदा सबके द्वारा पूजा प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥
ये यजन्ति पितॄन् देवान् गुरूंश्चैवातिथींस्तथा ।
गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं यथा ॥ २६ ॥
कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते ।
अन्तर्गतः स भगवान् सर्वसत्त्वशरीरगः ॥ २७ ॥
जो देवता, पितर, गुरु, अतिथि, गौ, श्रेष्ठ ब्राह्मण, पृथ्वी और माताकी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा पूजा करते हैं, वे वास्तवमें भगवान् विष्णुकी ही आराधना करते हैं; क्योंकि भगवान् विष्णु समस्त प्राणियोंके शरीरमें अन्तरात्मारूपसे विराजमान हैं ॥ २६-२७ ॥
समः सर्वेषु भूतेषु ईश्वरः सुखदुःखयोः ।
महान् महात्मा सर्वात्मा नारायण इति श्रुतिः ॥ २८ ॥
सुख और दुःखके स्वामी श्रीहरि समस्त प्राणियोंमें समभावसे स्थित हैं। श्रीनारायण महान्, महात्मा एवं सर्वात्मा हैं; ऐसा श्रुतिमें कहा गया है ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
पञ्चचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४५ ॥
१-यद्यपि नारदजी ब्रह्माजीके ही पुत्र हैं तथापि दक्षके शापवश उन्हें पुनः प्रजापतिसे जन्म ग्रहण करना पड़ा यह कथा हरिवंशमें आयी है।
२-अग्निष्वात्त आदि पितृगण देवताओंके ही पुत्र हैं। एक समय देवता दीर्घकालतक असुरोंके साथ युद्धमें लगे रहे, इसलिये उन्हें अपने पढ़े हुए वेद भूल गये। फिर उन पुत्रोंसे ही वेदोंको पढ़कर देवताओंने उनको पितृपदपर प्रतिष्ठित किया।