महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३१८-
अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फल मुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्थं परं यत् तत् पृष्टस्तेऽहं नराधिप ।
परं गुह्यमिमं प्रश्नं शृणुष्वावहितो नृप ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—नरेश्वर! तुमने जो मुझसे अव्यक्तमें स्थित परब्रह्मके विषयमें प्रश्न किया है, वह अत्यन्त गूढ़ है। उसके विषयमें ध्यान देकर सुनो ॥ १ ॥
यथाऽऽर्षेणेह विधिना चरताऽवनतेन ह ।
मयाऽऽदित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप ॥ २ ॥
मिथिलापते! पूर्वकालमें मैंने शास्त्रोक्त विधिसे व्रतका आचरण करते हुए नतमस्तक होकर भगवान् सूर्यसे जिस प्रकार शुक्लयजुर्वेदके मन्त्र उपलब्ध किये थे, वह सब प्रसंग सुनो ॥ २ ॥
महता तपसा देवस्तपिष्णुः सेवितो मया ।
प्रीतेन चाहं विभुना सूर्येणोक्तस्तदानघ ॥ ३ ॥
निष्पाप नरेश! पहलेकी बात है, मैंने बड़ी भारी तपस्या करके तपनेवाले भगवान् सूर्यकी आराधना की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने मुझसे कहा— ॥ ३ ॥
वरं वृणीष्व विप्रर्षे यदिष्टं ते सुदुर्लभम् ।
तत् ते दास्यामि प्रीतात्मा मत्प्रसादो हि दुर्लभः ॥ ४ ॥
‘ब्रह्मर्षे! तुम्हारी जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो। वह अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें दे दूँगा; क्योंकि मेरा मन तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट है। मेरा कृपा-प्रसाद प्रायः दुर्लभ है’ ॥ ४ ॥
ततः प्रणम्य शिरसा मयोक्तस्तपतां वरः ।
यजूंषि नोपयुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५ ॥
तब मैंने मस्तक झुकाकर तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यको प्रणाम किया और उनसे कहा—‘प्रभो! मैं शीघ्र ही ऐसे यजुर्मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ' जो आजसे पहले
दूसरे किसीके उपयोगमें नहीं आये हैं' ।। ५ ।।
ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज ।
सरस्वतीह वाग्भूता शरीरं ते प्रवेक्ष्यति ।। ६ ।।
ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु ।
विवृतं च ततो मेऽस्यं प्रविष्टा च सरस्वती ।। ७ ।।
तब भगवान् सूर्यने मुझसे कहा—'ब्रह्मन्! मैं तुम्हें यजुर्वेद प्रदान करता हूँ। तुम अपना मुँह खोलो। वाङ्मयी सरस्वती देवी तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करेंगी।' यह सुनकर मैंने मुँह खोल दिया और सरस्वती देवी उसमें प्रविष्ट हो गयीं ।। ६-७ ।।
ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ ।
अविज्ञानादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ।। ८ ।।
निष्पाप नरेश! सरस्वतीके प्रवेश करते ही मैं तापसे जलने लगा और जलमें घुस गया। महात्मा भास्करकी महिमाको न जानने तथा अपनेमें सहनशीलता न होनेके कारण मुझे उस समय विशेष कष्ट हुआ था ।। ८ ।।
ततो विदह्यमानं मामुवाच भगवान् रविः ।
मुहूर्तं सह्यतां दाहस्ततः शीतीभविष्यति ।। ९ ।।
तदनन्तर मुझे तापसे दग्ध होता देख भगवान् सूर्यने कहा—'तात! तुम दो घड़ीतक इस तापको सहन करो। फिर यह स्वयं ही शीतल एवं शान्त हो जायगा' ।।
शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः ।
प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज ।। १० ।।
जब मैं पूर्ण शीतल हो गया, तब मुझे देखकर भगवान् भास्करने कहा—'विप्रवर! खिल और उपनिषदों-सहित सम्पूर्ण वेद तुम्हारे भीतर प्रतिष्ठित होंगे ।। १० ।।
कृत्स्नं शतपथं चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ ।
तस्यान्ते चापुनर्भावे बुद्धिस्तव भविष्यति ।। ११ ।।
'द्विजश्रेष्ठ! तुम सम्पूर्ण शतपथका भी प्रणयन (सम्पादन) करोगे। इसके बाद तुम्हारी बुद्धि मोक्षमें स्थिर होगी ।। ११ ।।
प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत् सांख्ययोगेप्सितं पदम् ।
एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्तत ।। १२ ।।
'तुम उस अभीष्ट पदको प्राप्त करोगे, जिसे सांख्यवेत्ता तथा योगी भी पाना चाहते हैं।' इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अदृश्य हो गये ।। १२ ।।
ततोऽनुव्याहृतं श्रुत्वा गते देवे विभावसौ ।
गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तयं वै सरस्वतीम् ।। १३ ।।
मैंने सूर्यदेवका वह कथन सुना। फिर जब वे चले गये, तब मैंने घर आकर प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका चिन्तन किया ।। १३ ।।
ततः प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता ।
ओङ्कारमादितः कृत्वा मम देवी सरस्वती ॥ १४ ॥
मेरे स्मरण करते ही स्वर और व्यंजन-वर्णोंसे विभूषित अत्यन्त मंगलमयी सरस्वतीदेवी ॐकारको आगे करके मेरे सम्मुख प्रकट हुई ॥ १४ ॥
ततोऽहमर्घ्यं विधिवत् सरस्वत्यै न्यवेदयम् ।
तपतां च वरिष्ठाय निषण्णस्तत्परायणः ॥ १५ ॥
तब मैंने सरस्वतीदेवी तथा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् भास्करको अर्घ्य निवेदन किया और उन्हींका चिन्तन करता हुआ बैठ गया ॥ १५ ॥
ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् ।
चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥ १६ ॥
उस समय बड़े हर्षके साथ मैंने रहस्य, संग्रह और परिशिष्टभागसहित समस्त शतपथका संकलन किया ॥ १६ ॥
कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् ।
विप्रियार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ॥ १७ ॥
ततः सशिष्येण मया सूर्येणेव गभस्तिभिः ।
व्यस्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ॥ १८ ॥
महाराज! तदनन्तर मैंने अपने सौ उत्तम शिष्योंको शतपथका अध्ययन कराया। इसके बाद शिष्यसहित अपने महामनस्वी मामाका (जो पहले मुझे तिरस्कृत कर चुके थे) अप्रिय करनेके लिये किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यकी भाँति शिष्योंसे सुशोभित हो मैंने तुम्हारे पिता महात्मा राजा जनकके यज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ १७-१८ ॥
मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्धं हृतवानहम् ।
स्ववेददक्षिणायार्थे विमर्दे मातुलेन ह ॥ १९ ॥
उस समय अपने वेदकी दक्षिणाके लिये मामाके द्वारा विशेष आग्रह होनेपर महर्षि देवलके सामने ही मैंने आधी दक्षिणा उन्हें दे दी और आधी स्वयं ग्रहण की ॥ १९ ॥
सुमन्तुनाथ पैलेन तथा जैमिनिना च वै ।
पित्रा ते मुनिभिश्चैव ततोऽहमनुमानितः ॥ २० ॥
तदनन्तर सुमन्तु, पैल, जैमिनि, तुम्हारे पिता तथा अन्य ऋषि-मुनियोंने मेरा बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥
दश पञ्च च प्राप्तानि यजूंष्यर्कान्मयानघ ।
तथैव रोमहर्षण पुराणमवधारितम् ॥ २१ ॥
निष्पाप नरेश! इस प्रकार मैंने सूर्यदेवसे शुक्लयजुर्वेदकी पंद्रह शाखाएँ प्राप्त कीं। इसी तरह रोमहर्षण सूतसे मैंने पुराणोंका अध्ययन किया ॥ २१ ॥
बीजमेतत् पुरस्कृत्य देवीं चैव सरस्वतीम् ।
सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप ॥ २२ ॥
कर्तुं शतपथं चेदमपूर्वं च कृतं मया ।
यथाभिलषितं मार्गं तथा तच्चोपपादितम् ॥ २३ ॥
नरेश्वर! तदन्तर मैंने बीजरूप प्रणव और सरस्वती देवीको सामने करके भगवान् सूर्यकी कृपासे शतपथकी रचना आरम्भ की और इस अपूर्व ग्रन्थको पूर्ण कर लिया और जो मोक्षका मार्ग मुझे अभीष्ट था, उसका भी भलीभाँति सम्पादन किया ॥ २२-२३ ॥
शिष्याणामखिलं कृत्स्नमनुज्ञातं ससंग्रहम् ।
सर्वे च शिष्याः शुचयो गताः परमहर्षिताः ॥ २४ ॥
फिर मैंने शिष्योंको वह सारा ग्रन्थ रहस्य और संग्रह-सहित पढ़ाया और उन्हें घर जानेकी अनुमति दे दी। फिर वे सभी शुद्ध आचार-विचारवाले शिष्य अत्यन्त हर्षित हो अपने-अपने घरको चले गये ॥ २४ ॥
शाखाः पञ्चदशेमास्तु विद्या भास्करदेशिताः ।
प्रतिष्ठाप्य यथाकामं वेद्यं तदनुचिन्तयम् ॥ २५ ॥
इस प्रकार सूर्यदेवके द्वारा उपदेश की हुई शुक्लयजुर्वेद विद्याकी इन पंद्रह शाखाओंका ज्ञान प्राप्त करके मैंने इच्छानुसार वेद्यतत्त्वका चिन्तन किया है ॥ २५ ॥
किमत्र ब्रह्मण्यमृतं किं च वेद्यमनुत्तमम् ।
चिन्तयंस्तत्र चागत्य गन्धर्वो मामपृच्छत ॥ २६ ॥
विश्वावसुस्ततो राजन् वेदान्तज्ञानकोविदः ।
राजन्! एक समय वेदान्तज्ञानमें कुशल विश्वावसु नामक गन्धर्व मेरे पास आया एवं इस बातका विचार करते हुए कि यहाँ ब्राह्मण-जातिके लिये हितकर क्या है? सत्य और सर्वोत्तम ज्ञातव्य वस्तु क्या है? मुझसे पूछने लगा ॥ २६ १/२ ॥
चतुर्विंशांस्ततोऽपृच्छत् प्रश्नान् वेदस्य पार्थिव ॥ २७ ॥
पञ्चविंशतिमं प्रश्नं पप्रच्छान्वीक्षिकीं तदा ।
विश्वाविश्वं तथाश्वाश्वं मित्रं वरुणमेव च ॥ २८ ॥
पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् उन्होंने वेदके सम्बन्धमें चौबीस प्रश्न पूछे। फिर आन्वीक्षिकी विद्याके सम्बन्धमें पचीसवाँ प्रश्न उपस्थित किया। वे चौबीस प्रश्न इस प्रकार हैं—१. विश्वा क्या है? २. अविश्व क्या है? ३. अश्वा क्या है? ४. अश्व क्या है? ५. मित्र क्या है? ६. वरुण क्या है? ॥ २७-२८ ॥
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञोऽज्ञः कस्तपा अतपास्तथा ।
सूर्याति सूर्य इति च विद्याविद्ये तथैव च ॥ २९ ॥
७. ज्ञान क्या है? ८. ज्ञेय क्या है? ९. ज्ञाता क्या है? १०. अज्ञ क्या है? ११. क कौन है? १२. कौन तपस्वी है? १३. और कौन अतपस्वी है? १४. कौन सूर्य है? १५. तथा कौन अतिसूर्य? १६. और विद्या क्या है? १७. तथा अविद्या क्या है? ॥ २९ ॥