महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२५७-
सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति
स्थाणुरुवाच
प्रजासर्गनिमित्तं मे कार्यवत्तामिमां प्रभो ।
विद्धि सृष्टास्त्वया हीमा मा कुप्यासां पितामह ॥ १ ॥
**महादेवजीने कहा—**प्रभो! पितामह! मेरा मनोरथ या प्रयोजन आपसे प्रजासर्गकी रक्षाके लिये प्रार्थना करना है। आप इस बातको जान लें। आपहीने इन प्रजाओंकी सृष्टि की है; अतः आप इनपर क्रोध न कीजिये ॥ १ ॥
तव तेजोऽग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ॥ २ ॥
देव! जगदीश्वर! आज आपकी क्रोधाग्निसे सारी प्रजाएँ दग्ध हो रही हैं। उन्हें उस अवस्थामें देखकर मुझे दया आती है, आप उनपर क्रोध न करें ॥ २ ॥
प्रजापतिरुवाच
न कुप्ये न च मे कामो न भवेयुः प्रजा इति ।
लाघवार्थं धरण्यास्तु ततः संहार इष्यते ॥ ३ ॥
**प्रजापति ब्रह्माजी बोले—**शिव! मैं प्रजापर कुपित नहीं हूँ और न मेरी यही इच्छा है कि प्रजाओंका विनाश हो जाय। पृथ्वीका भार हल्का करनेके लिये ही प्रजाके संहारकी आवश्यकता प्रतीत हुई है ॥ ३ ॥
इयं हि मां सदा देवी भारार्ता समचोदयत् ।
संहारार्थं महादेव भारेणाप्सु निमज्जति ॥ ४ ॥
महादेव! यह पृथ्वीदेवी भारी भारसे पीड़ित हो सदा मुझे प्रजाके संहारके लिये प्रेरित करती रही है; क्योंकि यह जगत्के भारसे समुद्रमें डुबी जा रही है ॥
यदाहं नाधिगच्छामि बुद्ध्या बहु विचारयन् ।
संहारमासां वृद्धानां ततो मां क्रोध आविशत् ॥ ५ ॥
जब बहुत विचार करनेपर भी मुझे इन बढ़ी हुई प्रजाओंके संहारका कोई उपाय न सूझा, तब मुझे क्रोध आ गया ॥ ५ ॥
स्थाणुरुवाच
संहारार्थं प्रसीदस्व मा क्रुधो विबुधेश्वर ।
मा प्रजाः स्थावरं चैव जङ्गमं च व्यनीनशत् ॥ ६ ॥
महादेवजीने कहा— देवेश्वर! संहारके लिये आप क्रोध न करें। प्रजापर प्रसन्न हों। कहीं ऐसा न हो कि समस्त चराचर प्राणियोंका विनाश हो जाय ।। ६ ।।
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोपलम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। ७ ।।
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् सर्वमुपप्लुतम् ।
प्रसीद भगवन् साधो वर एष वृतो मया ।। ८ ।।
ये सारे जलाशय, सब-के-सब घास और लता-बेलें तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) भस्मीभूत हो रहे हैं। सारे जगत्का प्रलय उपस्थित हो गया है। भगवन्! प्रसन्न होइये। साधो! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ ।। ७-८ ।।
नष्टा न पुनरेष्यन्ति प्रजा ह्येताः कथंचन ।
तस्मान्निवर्ततामेतत् तेन स्वेनैव तेजसा ।। ९ ।।
यदि इन प्रजाओंका नाश हो गया तो ये किसी तरह फिर यहाँ उपस्थित न हो सकेंगी। इसलिये आप अपने ही प्रभावसे इस क्रोधाग्निको निवृत्त कीजिये ।। ९ ।।
उपायमन्यं सम्पश्य भूतानां हितकाम्यया ।
यथामी जन्तवः सर्वे न दह्येरन् पितामह ।। १० ।।
पितामह! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये संहारका कोई दूसरा ही उपाय सोचिये, जिससे ये सारे जीव-जन्तु एक साथ ही दग्ध न हो जायें ।। १० ।।
अभावं हि न गच्छेयुरुच्छिन्नप्रजनाः प्रजाः ।
अधिदैवे नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेश्वरेश्वर ।। ११ ।।
लोकेश्वरेश्वर! आपने मुझे देवताओंके आधिपत्य-पदपर नियुक्त किया है, अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, यदि प्रजाकी संततिका उच्छेद होगा तो समस्त प्रजाओंका सर्वथा अभाव ही हो जायगा; अतः आप इस विनाशको बंद कीजिये ।। ११ ।।
त्वद्भवं हि जगन्नाथ एतत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसाद्य त्वां महादेव याचाम्यावृत्तिजाः प्रजाः ।। १२ ।।
जगन्नाथ! महादेव! यह समस्त चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः मैं आपको प्रसन्न करके यह याचना करता हूँ कि ये सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो—मरकर पुनः जन्म धारण करे ।। १२ ।।
नारद उवाच
श्रुत्वा तु वचनं देवः स्थाणोर्नियतवाङ्मनाः ।
तेजस्तत् संनिजग्राह पुनरेवान्तरात्मनि ।। १३ ।।
नारदजी कहते हैं— राजन्! महादेवजीकी वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्माने मन और वाणीका संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मामें ही लीन कर
लिया ।। १३ ।।
ततोऽग्निमुपसंगृह्य भगवाँल्लोकपूजितः ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कल्पयामास वै प्रभुः ।। १४ ।।
तब लोकपूजित भगवान् ब्रह्माने उस अग्निका उपसंहार करके प्रजाके लिये जन्म और मृत्युकी व्यवस्था की ।। १४ ।।
उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तदा ।
प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यः खेभ्यो नारी महात्मनः ।। १५ ।।
उस क्रोधाग्निका उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे एक मूर्तिमती नारी प्रकट हुई ।। १५ ।।
कृष्णरक्ताम्बरधरा कृष्णनेत्रतलान्तरा ।
दिव्यकुण्डलसम्पन्ना दिव्याभरणभूषिता ।। १६ ।।
उसके वस्त्र काले और लाल थे। आँखोंके निम्न और आभ्यन्तर प्रदेश भी काले रंगके ही थे। वह दिव्य कुण्डलोंसे कान्तिमती तथा अलौकिक आभूषणोंसे विभूषित थी ।। १६ ।।
सा विनिःसृत्य वै खेभ्यो दक्षिणामाश्रिता दिशम् ।
ददृशाते च तां कन्यां देवौ विश्वेश्वरावुभौ ।। १७ ।।
वह ब्रह्माजीके इन्द्रियछिद्रोंसे निकलकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दी। उस समय उन दोनों जगदीश्वरों (ब्रह्मा और शिव) ने उस कन्याको देखा ।। १७ ।।
तामाहूय तदा देवो लोकानामादिरीश्वरः ।
मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ।। १८ ।।
भूपाल! तब लोकोंके आदिकारण भगवान् ब्रह्माने उसे 'मृत्यु' कहकर पुकारा और निकट बुलाकर कहा—'तुम इन प्रजाओंका समय-समयपर विनाश करती रहो ।। १८ ।।
त्वं हि संहारबुद्ध्या मे चिन्तिता रुषितेन च ।
तस्मात् संहर सर्वास्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ।। १९ ।।
'मैंने प्रजाके संहारकी भावनासे रोषमें भरकर तुम्हारा चिन्तन किया था; इसलिये तुम मूढ़ और विद्वानोंसहित सम्पूर्ण प्रजाओंका संहार करो ।। १९ ।।
अविशेषेण चैव त्वं प्रजाः संहर कामिनि ।
मम त्वं हि नियोगेन श्रेयः परमवाप्स्यसि ।। २० ।।
कामिनि! तुम मेरे आदेशसे सामान्यतः सारी प्रजाका संहार करो। इससे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी' ।। २० ।।
एवमुक्ता तु सा देवी मृत्युः कमलमालिनी ।
प्रदध्यौ दुःखिता बाला साश्रुपातमतीव च ।। २१ ।।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर कमलोंकी मालासे अलंकृत नवयौवना मृत्यु देवी नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दुखी हो बड़ी चिन्तामें पड़ गयी ।। २१ ।।
पाणिभ्यां चैव जग्राह तान्यश्रूणि जनेश्वरः ।
मानवानां हितार्थाय ययाचे पुनरेव ह ॥ २२ ॥
तब जनेश्वर ब्रह्माजीने मानवोंके हितके लिये अपने दोनों हाथोंमें मृत्युके आँसू ले लिये। फिर मृत्युने उनसे इस प्रकार प्रार्थना की ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे
सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिका संवादविषयक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५७ ॥