सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

१५४-

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
नारदजीका सेमल-वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न

युधिष्ठिर उवाच

बलिनः प्रत्यमित्रस्य नित्यमासन्नवर्तिनः ।
उपकारापकाराभ्यां समर्थस्योद्यतस्य च ॥ १ ॥
मोहाद् विकत्थनामात्रैरसारोऽल्पबलो लघुः ।
वाग्भिरप्रतिरूपाभिरभिद्रुह्य पितामह ॥ २ ॥
आत्मनो बलमास्थाय कथं वर्तेत मानवः ।
आगच्छतोऽतिक्रुद्धस्य तस्योद्धरणकाम्यया ॥ ३ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! जो बलवान्, नित्य निकटवर्ती, उपकार और अपकार करनेमें समर्थ तथा नित्य उद्योगशील है, ऐसे शत्रुके साथ यदि कोई अल्प बलवान्, असार एवं सभी बातोंमें छोटी हैसियत रखनेवाला मनुष्य मोहवश शेखी बघारते हुए अयोग्य बातें कहकर वैर बाँध ले और वह बलवान् शत्रु अत्यन्त कुपित हो उस दुर्बल मनुष्यको उखाड़ फेंकनेके लिये आक्रमण कर दे, तब वह आक्रान्त मनुष्य अपने ही बलका भरोसा करके उस आक्रमणकारीके साथ कैसा बर्ताव करे? (जिससे उसकी रक्षा हो सके) ॥ १—३ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं भरतश्रेष्ठ शाल्मलेः पवनस्य च ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा—भरतश्रेष्ठ! इस विषयमें विज्ञ पुरुष वायु और सेमलवृक्षके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥

हिमवन्तं समासाद्य महानासीद् वनस्पतिः ।
वर्षपूगाभिसंवृद्धः शाखी स्कन्धी पलाशवान् ॥ ५ ॥

हिमालय पर्वतपर एक बहुत बड़ा वनस्पति था, जो बहुत वर्षोंसे बढ़कर प्रबल हो गया था। वह स्कन्ध, शाखा और पत्तोंसे खूब हरा-भरा था ॥ ५ ॥

तत्र स्म मत्तमातङ्गा घर्मार्ताः श्रमकर्शिताः ।
विश्राम्यन्ति महाबाहो तथान्या मृगजातयः ॥ ६ ॥

महाबाहो! उसके नीचे बहुत-से मतवाले हाथी तथा दूसरे-दूसरे पशु धूपसे पीड़ित और परिश्रमसे थकित होकर विश्राम करते थे ॥ ६ ॥

नल्वमात्रपरीणाहो घनच्छायो वनस्पतिः ।
सारिकाशुकसंजुष्टः पुष्पवान् फलवानपि ॥ ७ ॥

उस वृक्षकी लंबाई चार सौ हाथकी थी। छाया बड़ी सघन थी। उसपर तोते और मैनाओंके समूह बसेरा लेते थे। वह वृक्ष फल और फूल दोनोंसे ही भरा था ॥ ७ ॥
सार्थिका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकसः ।
वसन्ति तत्र मार्गस्थाः सुरम्ये नगसत्तमे ॥ ८ ॥
दल बाँधकर यात्रा करनेवाले वणिक्, वनवासी तपस्वी तथा दूसरे राहगीर भी उस रमणीय एवं श्रेष्ठ वृक्षके नीचे निवास किया करते थे ॥ ८ ॥
तस्य ता विपुलाः शाखा दृष्ट्वा स्कन्धं च सर्वशः ।
अभिगम्याब्रवीदेनं नारदो भरतर्षभ ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस वृक्षकी बड़ी-बड़ी शाखाओं तथा मोटे तनोंको देखकर देवर्षि नारद उसके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥
अहो नु रमणीयस्त्वमहो चासि मनोहरः ।
प्रीयामहे त्वया नित्यं तरुप्रवर शाल्मले ॥ १० ॥
अहो! शाल्मले! तुम बड़े रमणीय और मनोहर हो। तरुप्रवर! तुमसे हमें सदा प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ १० ॥