महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११७-
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुनः कुत्ता हो जाना
भीष्म उवाच
व्याघ्रश्चोटजमूलस्थस्तृप्तः सुप्तो हतैर्मृगैः ।
नागश्चागात् तमुद्देशं मत्तो मेघ इवोद्धतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वह बाघ अपने मारे हुए मृगोंके मांस खाकर तृप्त हो महर्षिकी कुटीके पास ही सो रहा था। इतनेमें ही वहाँ ऊँचे उठे हुए मेघके समान काला एक मदोन्मत्त हाथी आ पहुँचा ॥ १ ॥
प्रभिन्नकरटः प्रांशुः पद्मी विततकुम्भकः ।
सुविषाणो महाकायो मेघगम्भीरनिःस्वनः ॥ २ ॥
उसके गण्डस्थलसे मदकी धारा चू रही थी। उसका कुम्भस्थल बहुत विस्तृत था। उसके ऊपर कमलका चिह्न बना हुआ था, उसके दाँत बड़े सुन्दर थे। वह विशालकाय ऊँचा हाथी मेघके समान गम्भीर गर्जना करता था ॥ २ ॥
तं दृष्ट्वा कुञ्जरं मत्तमायान्तं बलगर्वितम् ।
व्याघ्रो हस्तिभयात् त्रस्तस्तमृषिं शरणं ययौ ॥ ३ ॥
उस बलाभिमानी मदोन्मत्त गजराजको आते देख वह बाघ भयभीत हो पुनः ऋषिकी शरणमें गया ॥ ३ ॥
ततोऽनयत् कुञ्जरत्वं व्याघ्रं तमृषिसत्तमः ।
महामेघनिभं दृष्ट्वा स भीतो ह्यभवद् गजः ॥ ४ ॥
तब उन मुनिश्रेष्ठने उस बाघको हाथी बना दिया। उस महामेघके समान हाथीको देखकर वह जंगली हाथी भयभीत होकर भाग गया ॥ ४ ॥
ततः कमलषण्डानि शल्लकीगहनानि च ।
व्यचरत् स मुदायुक्तः पद्मरेणुविभूषितः ॥ ५ ॥
तदनन्तर वह हाथी कमलोंके परागसे विभूषित और आनन्दित हो कमलसमूहों तथा शल्लकी लताकी झाड़ियोंमें विचरने लगा ॥ ५ ॥
कदाचिद् भ्रममाणस्य हस्तिनः सम्मुखं तदा ।
ऋषेस्तस्योटजस्थस्य कालोऽगच्छन्निशानिशम् ॥ ६ ॥
कभी-कभी वह हाथी आश्रमवासी ऋषिके सामने भी घूमा करता था। इस तरह उसका कितनी ही रातोंका समय व्यतीत हो गया ॥ ६ ॥
अथाजगाम तं देशं केसरी केसरारुणः ।
गिरिकन्दरजो भीमः सिंहो नागकुलान्तकः ॥ ७ ॥
तदनन्तर उस प्रदेशमें एक केसरी सिंह आया, जो अपनी केसरके कारण कुछ लाल-सा जान पड़ता था। पर्वतकी कन्दरामें पैदा हुआ वह भयानक सिंह गजवंशका विनाश करनेवाला काल था ॥ ७ ॥
तं दृष्ट्वा सिंहमायान्तं नागः सिंहभयार्दितः ।
ऋषिं शरणमापेदे वेपमानो भयातुरः ॥ ८ ॥
उस सिंहको आते देख वह हाथी उसके भयसे पीड़ित एवं आतुर हो थर-थर काँपने लगा और ऋषिकी शरणमें गया ॥ ८ ॥
स ततः सिंहतां नीतो नागेन्द्रो मुनिना तदा ।
वन्यं नागणयत् सिंहं तुल्यजातिसमन्वयात् ॥ ९ ॥
तब मुनिने उस गजराजको सिंह बना दिया। अब वह समान जातिके सम्बन्धसे जंगली सिंहको कुछ भी नहीं गिनता था ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा च सोऽभवत् सिंहो वन्यो भयसमन्वितः ।
स चाश्रमेऽवसत् सिंहस्तस्मिन्नेव महावने ॥ १० ॥
उसे देखकर जंगली सिंह स्वयं ही डर गया। वह सिंह बना हुआ कुत्ता महावनमें उसी आश्रममें रहने लगा ॥ १० ॥
तद्भयात् पशवो नान्ये तपोवनसमीपतः ।
व्यदृश्यन्त तदा त्रस्ता जीविताकांक्षिणस्तथा ॥ ११ ॥
उसके भयसे जंगलके दूसरे पशु डर गये और अपनी जान बचानेकी इच्छासे तपोवनके समीप कभी नहीं दिखायी दिये ॥ ११ ॥
कदाचित् कालयोगेन सर्वप्राणिविहिंसकः ।
बलवान् क्षतजाहारो नानासत्त्वभयंकरः ॥ १२ ॥
अष्टपाद्दूर्ध्वनयनः शरभो वनगोचरः ।
तं सिंहं हन्तुमागच्छन्मुनेस्तस्य निवेशनम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर कालयोगसे वहाँ एक बलवान् वनवासी समस्त प्राणियोंका हिंसक शरभ आ पहुँचा, जिसके आठ पैर और ऊपरकी ओर नेत्र थे। वह रक्त पीनेवाला जानवर नाना प्रकारके वन-जन्तुओंके मनमें भय उत्पन्न कर रहा था। वह उस सिंहको मारनेके लिये मुनिके आश्रमपर आया ॥ १२-१३ ॥
(तं दृष्ट्वा शरभं यान्तं सिंहः परभयातुरः ।
ऋषिं शरणमापेदे वेपमानः कृताञ्जलिः ॥)
शरभको आते देख सिंह अत्यन्त भयसे व्याकुल हो काँपता हुआ हाथ जोड़कर मुनिकी शरणमें आया ॥
तं मुनिः शरभं चक्रे बलोत्कटमरिंदम ।
ततः स शरभो वन्यो मुनेः शरभमग्रतः ॥ १४ ॥
दृष्ट्वा बलिनमत्युग्रं द्रुतं सम्प्राद्रवद् वनात् ।
शत्रुदमन युधिष्ठिर! तब मुनिने उसे बलोन्मत्त शरभ बना दिया। जंगली शरभ उस मुनिनिर्मित अत्यन्त भयंकर एवं बलवान् शरभको सामने देखकर भयभीत हो तुरंत ही उस वनसे भाग गया ॥ १४ १/२ ॥
स एवं शरभस्थाने संन्यस्तो मुनिना तदा ॥ १५ ॥
मुनेः पार्श्वगतो नित्यं शरभः सुखमाप्तवान् ।
इस प्रकार मुनिने उस कुत्तेको उस समय शरभके स्थानमें प्रतिष्ठित कर दिया। वह शरभ प्रतिदिन मुनिके पास सुखसे रहने लगा ॥ १५ १/२ ॥
ततः शरभसंत्रस्ताः सर्वे मृगगणास्तदा ॥ १६ ॥
दिशः सम्प्राद्रवन् राजन् भयाज्जीवितकांक्षिणः ।
राजन्! उस शरभसे भयभीत हो जंगलके सभी पशु अपनी जान बचानेके लिये डरके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ १६ १/२ ॥
शरभोऽप्यतिसंहृष्टो नित्यं प्राणिवधे रतः ॥ १७ ॥
फलमूलाशनं कर्तुं नैच्छत् स पिशिताशनः ।
शरभ भी अत्यन्त प्रसन्न हो सदा प्राणियोंके वधमें तत्पर रहता था। वह मांसभोजी जीव फल-मूल खानेकी कभी इच्छा नहीं करता था ॥ १७ १/२ ॥
ततो रुधिरतर्षेण बलिना शरभोऽन्वितः ॥ १८ ॥
इयेष तं मुनिं हन्तुमकृतज्ञः श्वयोनिजः ।
तदनन्तर एक दिन रक्तकी प्रबल प्याससे पीड़ित वह शरभ, जो कुत्तेकी जातिसे पैदा होनेके कारण कृतघ्न बन गया था, मुनिको ही मार डालनेकी इच्छा करने लगा ॥ १८ १/२ ॥
(चिन्तयामास च तदा शरभः श्वानपूर्वकः ।
अस्य प्रभावात् सम्प्राप्तो वाङ्मात्रेण तु केवलम् ॥
शरभत्वं सुदुष्प्रापं सर्वभूतभयङ्करम् ।
उस पहलेके कुत्ते और वर्तमानकालके शरभने सोचा कि इन महर्षिके प्रभावसे—इनके वाणीद्वारा केवल कह देनेमात्रसे मैंने परम दुर्लभ शरभका शरीर पा लिया, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर है ॥
अन्येऽप्यत्र भयत्रस्ताः सन्ति हस्तिभयार्दिताः ॥
मुनिमाश्रित्य जीवन्तो मृगाः पक्षिगणास्तथा ।
तेषामपि कदाचिच्च शरभत्वं प्रयच्छति ॥
सर्वसत्त्वोत्तमं लोके बलं यत्र प्रतिष्ठितम् ।
इन मुनीश्वरकी शरण लेकर जीवन धारण करनेवाले दूसरे भी बहुत-से मृग और पक्षी हैं, जो हाथी तथा दूसरे भयानक जन्तुओंसे भयभीत रहते हैं। सम्भव है, ये उन्हें भी कदाचित् शरभका शरीर प्रदान कर दें, जहाँ संसारके सभी प्राणियोंसे श्रेष्ठ बल प्रतिष्ठित है।।
पक्षिणामप्ययं दद्यात् कदाचिद् गारुडं बलम् ।।
यावदन्यस्य सम्प्रीतः कारुण्यं च समाश्रितः ।
न ददाति बलं तुष्टः सत्त्वस्यान्यस्य कस्यचित् ।।
तावदेनमहं विप्रं वधिष्यामि च शीघ्रतः ।
स्थातुं मया शक्यमिह मुनिघातान्न संशयः ॥)
ये चाहें तो कभी पक्षियोंको भी गरुड़का बल दे सकते हैं। अतः दयाके वशीभूत हो जबतक किसी दूसरे जीवपर संतुष्ट या प्रसन्न हो ये उसे ऐसा ही बल नहीं दे देते, तबतक ही इन ब्रह्मर्षिका मैं शीघ्र वध कर डालूँगा। मुनिका वध हो जानेके पश्चात् मैं यहाँ बेखटके रह सकूँगा, इसमें संशय नहीं है ।।
ततस्तेन तपःशक्त्या विदितो ज्ञानचक्षुषा ।। १९ ।।
विज्ञाय स महाप्राज्ञो मुनिः श्वानं तमुक्तवान् ।
ज्ञाननेत्रोंसे युक्त उन मुनीश्वरने अपनी तपःशक्तिसे शरभके उस मनोभावको जान लिया। जानकर उन महाज्ञानी मुनिने उस कुत्तेसे कहा— ।। १९½ ।।
श्वा त्वं द्वीपित्वमापन्नो द्वीपीव्याघ्रत्वमागतः ।। २० ।।
व्याघ्रान्नागो मदपटुर्नागः सिंहत्वमागतः ।
सिंहस्त्वं बलमापन्नो भूयः शरभतां गतः ।। २१ ।।
'अरे! तू पहले कुत्ता था, फिर चीता बना, चीतेसे बाघकी योनिमें आया, बाघसे मदोन्मत्त हाथी हुआ, हाथीसे सिंहकी योनिमें आ गया, बलवान् सिंह रहकर फिर शरभका शरीर पा गया ।। २०-२१ ।।
मया स्नेहपरीतेन विसृष्टो न कुलान्वयः ।
यस्मादेवमपापं मां पाप हिंसितुमिच्छसि ।
तस्मात् स्वयोनिमापन्नः श्वैव त्वं हि भविष्यसि ।। २२ ।।
'यद्यपि तू नीच कुलमें पैदा हुआ था, तो भी मैंने स्नेहवश तेरा परित्याग नहीं किया। पापी! तेरे प्रति मेरे मनमें कभी पापभाव नहीं हुआ था, तो भी इस प्रकार तू मेरी हत्या करना चाहता है; अतः तू फिर अपनी पूर्वयोनिमें ही आकर कुत्ता हो जा' ।। २२ ।।
ततो मुनिजनद्वेष्टा दुष्टात्मा प्राकृतोऽबुधः ।
ऋषिणा शरभः शप्तस्तद्रूपं पुनराप्तवान् ।। २३ ।।
महर्षिके इस प्रकार शाप देते ही वह मुनिजनद्रोही दुष्टात्मा नीच और मूर्ख शरभ फिर कुत्तेके रूपमें परिणत हो गया ।। २३ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता तथा ऋषिका
संवादविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं।)