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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

सत्कार पाकर की हुई दूसरी संधि मध्यम है और भयके कारण की जानेवाली तीसरी संधि अधम मानी गयी है। इन सबका उस ग्रन्थमें विस्तारपूर्वक वर्णन है ॥ ३७ ॥

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सत्कार पाकर की हुई दूसरी संधि मध्यम है और भयके कारण की जानेवाली तीसरी संधि अधम मानी गयी है। इन सबका उस ग्रन्थमें विस्तारपूर्वक वर्णन है ॥ ३७ ॥

महाभारत

राजासे हीन प्रजाकी ब्रह्माजीसे राजाके लिये प्रार्थना

यात्राकालाश्च चत्वारस्त्रिवर्गस्य च विस्तरः ।
विजयो धर्मयुक्तश्च तथार्थविजयश्च ह ॥ ३८ ॥
आसुरश्चैव विजयस्तथा कार्त्स्न्येन वर्णितः ।
लक्षणं पञ्चवर्गस्य त्रिविधं चात्र वर्णितम् ॥ ३९ ॥

शत्रुओंपर चढ़ाई करनेके चार* अवसर, त्रिवर्गके विस्तार, धर्म-विजय, अर्थ-विजय तथा आसुर-विजयका भी उक्त ग्रन्थमें पूर्णरूपसे वर्णन किया गया है। मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, सेना और कोष—इन पाँच वर्गोंके उत्तम, मध्यम और अधम भेदसे तीन प्रकारके लक्षणोंका भी प्रतिपादन किया गया है ॥ ३८-३९ ॥

प्रकाशश्चाप्रकाशश्च दण्डोऽथ परिशब्दितः ।

प्रकाशोऽष्टविधस्तत्र गुह्यश्च बहुविस्तरः ॥ ४० ॥
प्रकट और गुप्त दो प्रकारकी सेनाओंका भी वर्णन किया गया है। उनमें प्रकट सेना आठ प्रकारकी बतायी गयी है और गुप्त सेनाका विस्तार बहुत अधिक कहा गया है ॥ ४० ॥

रथा नागा हयाश्चैव पादाताश्चैव पाण्डव ।
विष्टिनौवश्चराश्चैव देशिका इति चाष्टमम् ॥ ४१ ॥
अङ्गान्येतानि कौरव्य प्रकाशानि बलस्य तु ।
कुरुवंशी पाण्डुनन्दन! हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, बेगारमें पकड़े गये बोझ ढोनेवाले लोग, नौकारोही, गुप्तचर तथा कर्तव्यका उपदेश करनेवाले गुरु—ये सेनाके प्रकट आठ अङ्ग हैं ॥ ४१ १/२ ॥

जङ्गमाजङ्गमाश्रोक्ताश्चूर्णयोगा विषादयः ॥ ४२ ॥
सेनाके गुप्त अङ्ग हैं जङ्गम (सर्पादिजनित) और अजङ्गम (पेड़-पौधोंसे उत्पन्न) विष आदि चूर्णयोग अर्थात् विनाशकारक ओषधियाँ ॥ ४२ ॥

स्पर्शे चाभ्यवहार्ये चाप्युपांशुर्विविधः स्मृतः ।
अरिर्मित्र उदासीन इत्येतेऽप्यनुवर्णिताः ॥ ४३ ॥
यह गोपनीय दण्डसाधन (विष आदि) शत्रुपक्षके लोगोंके वस्त्र आदिके साथ स्पर्श कराने अथवा उनके भोजनमें मिला देनेके उपयोगमें आता है। विभिन्न मन्त्रोंके जपका प्रयोग भी पूर्वोक्त नीतिशास्त्रमें बताया गया है। इसके सिवा इस ग्रन्थमें शत्रु, मित्र और उदासीनका भी बारंबार वर्णन किया गया है ॥ ४३ ॥

कृत्स्ना मार्गगुणाश्चैव तथा भूमिगुणाश्च ह ।
आत्मरक्षणमाश्वासः सर्गाणां चान्ववेक्षणम् ॥ ४४ ॥
तथा मार्गके समस्त गुण, भूमिके गुण, आत्मरक्षाके उपाय, आश्वासन तथा रथ आदिके निर्माण और निरीक्षण आदिका भी वर्णन है ॥ ४४ ॥

कल्पना विविधाश्चापि नृनागरथवाजिनाम् ।
व्यूहाश्च विविधाभिख्या विचित्रं युद्धकौशलम् ॥ ४५ ॥
उत्पाताश्च निपाताश्च सुयुद्धं सुपलायितम् ।
शस्त्राणां पालनं ज्ञानं तथैव भरतर्षभ ॥ ४६ ॥
सेनाको पुष्ट करनेवाले अनेक प्रकारके योग, हाथी, घोड़ा, रथ और मनुष्य-सेनाकी भाँति-भाँतिकी व्यूह-रचना, नाना प्रकारके युद्धकौशल, जैसे ऊपर उछल जाना, नीचे झुककर अपनेको बचा लेना, सावधान होकर भलीभाँति युद्ध करना, कुशलतापूर्वक वहाँसे निकल भागना—इन सब उपायोंका भी इस ग्रन्थमें वर्णन है। भरतश्रेष्ठ! शस्त्रोंके संरक्षण और प्रयोगके ज्ञानका भी उसमें उल्लेख है ॥ ४५-४६ ॥

बलव्यसनमुक्तं च तथैव बलहर्षणम् ।

पीड़ा चापदकालश्च पत्तिज्ञानं च पाण्डव ॥ ४७ ॥
पाण्डुकुमार! विपत्तिसे सेनाओंका उद्धार करना, सैनिकोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाना, पीड़ा और आपत्तिके समय पैदल सैनिकोंकी स्वामिभक्तिकी परीक्षा करना—इन सब बातोंका उस शास्त्रमें वर्णन किया गया है ॥ ४७ ॥
तथा खातविधानं च योगः संचार एव च ।
चोरैराटविकैश्चोग्रैः परराष्ट्रस्य पीड़नम् ॥ ४८ ॥
अग्निदैर्गरदैश्चैव प्रतिरूपककारकैः ।
श्रेणिमुख्योपजापेन वीरुधश्छेदनेन च ॥ ४९ ॥
दूषणेन च नागानामातङ्कजननेन च ।
आराधनेन भक्तस्य प्रत्ययोपार्जनेन च ॥ ५० ॥
दुर्गके चारों ओर खाई खुदवाना, सेनाका युद्धके लिये सुसज्जित होना तथा रणयात्रा करना, चोरों और भयानक जंगली लुटेरोंद्वारा शत्रुके राष्ट्रको पीड़ा देना, आग लगानेवाले, जहर देनेवाले, छद्मवेशधारी लोगोंद्वारा भी शत्रुको हानि पहुँचाना तथा एक-एक शत्रुदलके प्रधान-प्रधान लोगोंमें भेद उत्पन्न करना, फसल और पौधोंको काट लेना, हाथियोंको भड़काना, लोगोंमें आतङ्क उत्पन्न करना, शत्रुओंमें अनुरक्त पुरुषको अनुनय आदिके द्वारा फोड़ लेना और शत्रुपक्षके लोगोंमें अपने प्रति विश्वास उत्पन्न कराना आदि उपायोंसे शत्रुके राष्ट्रको पीड़ा देनेकी कलाका भी ब्रह्माजीके उक्त ग्रन्थमें वर्णन किया गया है ॥ ४८—५० ॥
सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य ह्रासवृद्धिसमञ्जसम् ।
दूतसामर्थ्यसंयोगात् सराष्ट्रस्य विवर्धनम् ॥ ५१ ॥
अरिमध्यस्थमित्राणां सम्यक् चोक्तं प्रपञ्चनम् ।
अवमर्दः प्रतीघातस्तथैव च बलीयसाम् ॥ ५२ ॥
सात अङ्गोंसे युक्त राज्यके ह्रास, वृद्धि और समान भावसे स्थिति, दूतके सामर्थ्यसे होनेवाली अपनी और अपने राष्ट्रकी वृद्धि, शत्रु, मित्र और मध्यस्थोंका विस्तारपूर्वक सम्यक् विवेचन, बलवान् शत्रुओंको कुचल डालने तथा उनसे टक्कर लेनेकी विधि आदिका उक्त ग्रन्थमें वर्णन किया गया है ॥ ५१-५२ ॥
व्यवहारः सुसूक्ष्मश्च तथा कण्टकशोधनम् ।
श्रमो व्यायामयोगश्च त्यागो द्रव्यस्य संग्रहः ॥ ५३ ॥
शासनसम्बन्धी अत्यन्त सूक्ष्म व्यवहार, कण्टक-शोधन (राज्यकार्यमें विघ्न डालनेवालेको उखाड़ फेंकना), परिश्रम, व्यायाम-योग तथा धनके त्याग और संग्रहका भी उसमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ५३ ॥
अभृतानां च भरणं भृतानां चान्ववेक्षणम् ।
अर्थस्य काले दानं च व्यसने चाप्रसङ्गिता ॥ ५४ ॥

जिनके भरण-पोषणका कोई उपाय न हो, उनके जीवननिर्वाहका प्रबन्ध करना, जिनके भरण-पोषणकी व्यवस्था राज्यकी ओरसे की गयी हो उनकी देखभाल करना, समयपर धनका दान करना, दुर्व्यसनमें आसक्त न होना आदि विविध विषयोंका उस ग्रन्थमें उल्लेख है।।

तथा राजगुणाश्चैव सेनापतिगुणाश्च ह ।
कारणं च त्रिवर्गस्य गुणदोषास्तथैव च ॥ ५५ ॥
राजाके गुण, सेनापतिके गुण, अर्थ, धर्म और कामके साधन तथा उनके गुण-दोषका भी उसमें निरूपण किया गया है ॥ ५५ ॥

दुश्चेष्टितं च विविधं वृत्तिंश्चैवानुवर्तिनाम् ।
शङ्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम् ॥ ५६ ॥
अलब्धलाभो लब्धस्य तथैव च विवर्धनम् ।
प्रदानं च विवृद्धस्य पात्रेभ्यो विधिवत्ततः ॥ ५७ ॥
विसर्गोऽर्थस्य धर्मार्थं कामहेतुकमुच्यते ।
चतुर्थं व्यसनाघाते तथैवात्रानुवर्णितम् ॥ ५८ ॥
भाँति-भाँतिकी दुश्चेष्टा, अपने सेवकोंकी जीविकाका विचार, सबके प्रति सशङ्क रहना, प्रमादका परित्याग करना, अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करना, प्राप्त हुई वस्तुको सुरक्षित रखते हुए उसे बढ़ाना और बढ़ी हुई वस्तुका सुपात्रोंको विधिपूर्वक दान देना—यह धनका पहला उपयोग है। धर्मके लिये धनका त्याग उसका दूसरा उपयोग है, कामभोगके लिये उसका व्यय करना तीसरा और संकट-निवारणके लिये उसे खर्च करना उसका चौथा उपयोग है। इन सब बातोंका उस ग्रन्थमें भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ ५६—५८ ॥

क्रोधजानि तथोग्राणि कामजानि तथैव च ।
दशोक्तानि कुरुश्रेष्ठ व्यसनान्यत्र चैव ह ॥ ५९ ॥
कुरुश्रेष्ठ! क्रोध और कामसे उत्पन्न होनेवाले जो यहाँ दस प्रकारके भयंकर व्यसन हैं, उनका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख है ॥ ५९ ॥

मृगयाक्षास्तथा पानं स्त्रियश्च भरतर्षभ ।
कामजान्यहुराचार्यः प्रोक्तानीह स्वयम्भुवा ॥ ६० ॥
भरतश्रेष्ठ! नीतिशास्त्रके आचार्योंने जो मृगया, द्यूत, मद्यपान और स्त्रीप्रसङ्ग—ये चार प्रकारके कामजनित व्यसन बताये हैं, उन सबका इस ग्रन्थमें ब्रह्माजीने प्रतिपादन किया है ॥ ६० ॥

वाक्पारुष्यं तथोग्रत्वं दण्डपारुष्यमेव च ।
आत्मनो निग्रहस्त्यागो ह्यर्थदूषणमेव च ॥ ६१ ॥
वाणीकी कटुता, उग्रता, दण्डकी कठोरता, शरीरको कैद कर लेना, किसीको सदाके लिये त्याग देना और आर्थिक हानि पहुँचाना—ये छः प्रकारके क्रोधजनित व्यसन उक्त

ग्रन्थमें बताये गये हैं ।। ६१ ।।
यन्त्राणि विविधान्येव क्रियास्तेषां च वर्णिताः ।
अवमर्दः प्रतीघातः केतनानां च भञ्जनम् ।। ६२ ।।
नाना प्रकारके यन्त्रों और उनकी क्रियाओंका भी वर्णन किया गया है। शत्रुके राष्ट्रको कुचल देना, उसकी सेनाओंपर चोट करना और उनके निवास-स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देना—इन सब बातोंका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख है ।। ६२ ।।
चैत्यद्रुमावमर्दश्च रोधः कर्मानुशासनम् ।
अपस्करोऽथ वसनं तथोपायाश्च वर्णिताः ।। ६३ ।।
शत्रुकी राजधानीके चैत्य वृक्षोंका विध्वंस करा देना, उसके निवास-स्थान और नगरपर चारों ओरसे घेरा डालना आदि उपायोंका तथा कृषि एवं शिल्प आदि कर्मोंका उपदेश, रथके विभिन्न अवयवोंका निर्माण, ग्राम और नगर आदिमें निवास करनेकी विधि तथा जीवननिर्वाहके अनेक उपायोंका भी उक्त ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६३ ।।
पणवानकशङ्खानां भेरीणां च युधिष्ठिर ।
उपार्जनं च द्रव्याणां परिमर्दश्च तानि षट् ।। ६४ ।।
युधिष्ठिर! ढोल, नगारे, शंख, भेरी आदि रणवाद्योंको बजाने, मणि, पशु, पृथ्वी, वस्त्र, दास-दासी तथा सुवर्ण—इन छः प्रकारके द्रव्योंका अपने लिये उपार्जन करने तथा शत्रुपक्षकी इन वस्तुओंका विनाश कर देनेका भी इस शास्त्रमें उल्लेख है ।। ६४ ।।
लब्धस्य च प्रशमनं सतां चैवाभिपूजनम् ।
विद्वद्भिरेकीभावश्च दानहोमविधिज्ञता ।। ६५ ।।
मङ्गलालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया ।
आहारयोजनं चैव नित्यमास्तिक्यमेव च ।। ६६ ।।
अपने अधिकारमें आये हुए देशोंमें शान्ति स्थापित करना, सत्पुरुषोंका सत्कार करना, विद्वानोंके साथ एकता (मेल-जोल) बढ़ाना, दान और होमकी विधिको जानना, माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श करना, शरीरको वस्त्र और आभूषणोंसे सजाना, भोजनकी व्यवस्था करना और सर्वदा आस्तिक बुद्धि रखना—इन सब बातोंका भी उस ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६५-६६ ।।
एकेन च यथोत्थेयं सत्यत्वं मधुरा गिरः ।
उत्सवानां समाजानां क्रियाः केतनजास्तथा ।। ६७ ।।
मनुष्य अकेला होकर भी किस प्रकार उत्थान (उन्नति) करे? इसका विचार, सत्यता, उत्सवों और समाजोंमें मधुर वाणीका प्रयोग तथा गृहसम्बन्धी क्रियाएँ—इन सबका वर्णन किया गया है ।। ६७ ।।
प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च सर्वाधिकरणेष्वथ ।
वृत्तेर्भरतशार्दूल नित्यं चैवान्वेक्षणम् ।। ६८ ।।

भरतवंशके सिंह युधिष्ठिर! समस्त न्यायालयोंमें जो प्रत्यक्ष और परोक्ष विचार होते हैं तथा वहाँ जो राजकीय पुरुषोंके व्यवहार होते हैं, उन सबका प्रतिदिन निरीक्षण करना चाहिये। इसका भी उक्त शास्त्रमें उल्लेख है ॥ ६८ ॥
अदण्ड्यत्वं च विप्राणां युक्त्या दण्डनिपातनम् ।
अनुजीविस्वजातिभ्यो गुणेभ्यश्च समुद्भवः ॥ ६९ ॥
ब्राह्मणोंको दण्ड न देनेका, अपराधियोंको युक्तिपूर्वक दण्ड देनेका, अपने पीछे जिनकी जीविका चलती हो उनकी, अपने जाति-भाइयोंकी तथा गुणवान् पुरुषोंकी भी उन्नति करनेका उस ग्रन्थमें उल्लेख है ॥ ६९ ॥
रक्षणं चैव पौराणां राष्ट्रस्य च विवर्धनम् ।
मण्डलस्था च या चिन्ता राजन् द्वादशराजिका ॥ ७० ॥
राजन्! पुरवासियोंकी रक्षा, राज्यकी वृद्धि तथा द्वादश* राजमण्डलोंके विषयमें जो चिन्तन किया जाता है, उसका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख हुआ है ॥ ७० ॥
द्वासप्ततिविधा चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया ।
देशजातिकुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः ॥ ७१ ॥
वैद्यक शास्त्रके अनुसार बहत्तर प्रकारकी शारीरिक चिकित्सा तथा देश, जाति और कुलके धर्मोंका भी भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ ७१ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चात्रानुवर्णिताः ।
उपायाश्चार्थलिप्सा च विविधा भूरिदक्षिण ॥ ७२ ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर! इस ग्रन्थमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका, इनकी प्राप्तिके उपायोंका तथा नाना प्रकारकी धन-लिप्साका भी वर्णन है ॥ ७२ ॥
मूलकर्मक्रिया चात्र मायायोगश्च वर्णितः ।
दूषणं स्रोतसां चैव वर्णितं चास्थिराम्भसाम् ॥ ७३ ॥
इस ग्रन्थमें कोशकी वृद्धि करनेवाले जो कृषि, वाणिज्य आदि मूल कर्म हैं, उनके करनेका प्रकार बताया गया है। मायाके प्रयोगकी विधि समझायी गयी है। स्रोतजल और अस्थिरजलके दोषोंका वर्णन किया गया है ॥ ७३ ॥
यैर्यैरुपायैर्लोकस्तु न चलेदार्यवर्त्मनः ।
तत् सर्वं राजशार्दूल नीतिशास्त्रेऽभिवर्णितम् ॥ ७४ ॥
राजसिंह! जिन-जिन उपायोंद्वारा यह जगत् सन्मार्गसे विचलित न हो, उन सबका इस नीतिशास्त्रमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ७४ ॥
एतत् कृत्वा शुभं शास्त्रं ततः स भगवान् प्रभुः ।
देवानुवाच संहृष्टः सर्वान् शक्रपुरोगमान् ॥ ७५ ॥
इस शुभ शास्त्रका निर्माण करके जगत्के स्वामी भगवान् ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंसे इस प्रकार बोले— ॥ ७५ ॥

उपकाराय लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय च ।
नवनीतं सरस्वत्या बुद्धिरेषा प्रभाविता ॥ ७६ ॥
'देवगण! सम्पूर्ण जगत्‌के उपकार तथा धर्म, अर्थ एवं कामकी स्थापनाके लिये वाणीका सारभूत यह विचार यहाँ प्रकट किया गया ॥ ७६ ॥
दण्डेन सहिता ह्येषा लोकरक्षणकारिका ।
निग्रहानुग्रहरता लोकाननुचरिष्यति ॥ ७७ ॥
'दण्ड-विधानके साथ रहनेवाली यह नीति सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करनेवाली है। यह दुष्टोंके निग्रह और साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रहमें तत्पर रहकर सम्पूर्ण जगत्‌में प्रचलित होगी ॥ ७७ ॥
दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः ।
दण्डनीतिरिति ख्याता त्रीँल्लोँकानभिवर्तते ॥ ७८ ॥
'इस शास्त्रके अनुसार दण्डके द्वारा जगत्‌का सन्मार्गपर स्थापन किया जाता है अथवा राजा इसके अनुसार प्रजावर्गमें दण्डकी स्थापना करता है; इसलिये यह विद्या दण्डनीतिके नामसे विख्यात है। इसका तीनों लोकोंमें विस्तार होगा ॥ ७८ ॥
षाड्गुण्यगुणसारैषा स्थास्यत्यग्रे महात्मसु ।
धर्मार्थकाममोक्षाश्च सकला ह्यत्र शब्दिताः ॥ ७९ ॥
'यह विद्या संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंका सारभूत है। महात्माओंमें इसका स्थान सबसे आगे होगा। इस शास्त्रमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंका निरूपण किया गया है' ॥ ७९ ॥
ततस्तां भगवान् नीतिं पूर्वं जग्राह शङ्करः ।
बहुरूपो विशालाक्षः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥ ८० ॥
तदनन्तर सबसे पहले भगवान् शङ्करने इस नीतिशास्त्रको ग्रहण किया। वे बहुरूप, विशालाक्ष, शिव, स्थाणु, उमापति आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ८० ॥
प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवान् शिवः ।
संचिक्षेप ततः शास्त्रं महास्त्रं ब्रह्मणा कृतम् ॥ ८१ ॥
वैशालाक्षमिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत ।
विशालाक्ष भगवान् शिवने प्रजावर्गकी आयुका ह्रास होता जानकर ब्रह्माजीके रचे हुए इस महान् अर्थसे भरे हुए शास्त्रको संक्षिप्त किया था; इसलिये इसका नाम 'वैशालाक्ष' हो गया। फिर इसे इन्द्रने ग्रहण किया ॥ ८१ ½ ॥
दशाध्यायसहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥ ८२ ॥
भगवानपि तच्छास्त्रं संचिक्षेप पुरंदरः ।
सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् ॥ ८३ ॥

महातपस्वी सुब्रह्मण्य भगवान् पुरन्दरने जब इसका अध्ययन किया, उस समय इसमें दस हजार अध्याय थे। फिर उन्होंने भी इसका संक्षेप किया, जिससे यह पाँच हजार अध्यायोंका ग्रन्थ हो गया। तात! वही ग्रन्थ 'बाहुदन्तक' नामक नीतिशास्त्रके रूपमें विख्यात हुआ ।। ८२-८३ ।।

अध्यायानां सहस्रैस्तु त्रिभिरेव बृहस्पतिः ।
संचिक्षेपेश्वरो बुद्ध्या बार्हस्पत्यं तदुच्यते ।। ८४ ।।
इसके बाद सामर्थ्यशाली बृहस्पतिने अपनी बुद्धिसे इसका संक्षेप किया, तबसे इसमें तीन हजार अध्याय रह गये। यही 'बार्हस्पत्य' नामक नीतिशास्त्र कहलाता है ।। ८४ ।।

अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत् ।
तच्छास्त्रममितप्रज्ञो योगाचार्यो महायशाः ।। ८५ ।।
फिर महायशस्वी, योगशास्त्रके आचार्य तथा अमित बुद्धिमान् शुक्राचार्यने एक हजार अध्यायोंमें उस शास्त्रका संक्षेप किया ।। ८५ ।।

एवं लोकानुरोधेन शास्त्रमेतन्महर्षिभिः ।
संक्षिप्तमायुर्विज्ञाय मर्त्यानां ह्रासमेव च ।। ८६ ।।
इस प्रकार मनुष्योंकी आयुका ह्रास होता जानकर जगत्के हितके लिये महर्षियोंने इस शास्त्रका संक्षेप किया है ।। ८६ ।।

अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् ।
एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ।। ८७ ।।
तदनन्तर देवताओंने प्रजापति भगवान् विष्णुके पास जाकर कहा—'भगवन्! मनुष्योंमें जो एक पुरुष सबसे श्रेष्ठ पद प्राप्त करनेका अधिकारी हो, उसका नाम बताइये' ।।

ततः संचिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः ।
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम् ।। ८८ ।।
तब प्रभावशाली भगवान् नारायणदेवने भलीभाँति सोच-विचारकर अपने तेजसे एक मानस पुत्रकी सृष्टि की, जो विरजाके नामसे विख्यात हुआ ।। ८८ ।।

विरजास्तु महाभागः प्रभुत्वं भुवि नैच्छत ।
न्यासायैवाभवद् बुद्धिः प्रणीता तस्य पाण्डव ।। ८९ ।।
पाण्डुनन्दन! महाभाग विरजाने पृथ्वीपर राजा होनेकी इच्छा नहीं की। उनकी बुद्धिने संन्यास लेनेका ही निश्चय किया ।। ८९ ।।

कीर्तिमांस्तस्य पुत्रोऽभूत् सोऽपि पञ्चातिगोऽभवत् ।
कर्दमस्तस्य तु सुतः सोऽप्यतप्यन्महत् तपः ।। ९० ।।
विरजाके कीर्तिमान् नामक एक पुत्र हुआ। वह भी पाँचों विषयोंसे ऊपर उठकर मोक्षमार्गका ही अवलम्बन करने लगा। कीर्तिमान्‌के पुत्र हुए कर्दम। वे भी बड़ी भारी

तपस्यामें लग गये ॥ ९० ॥
प्रजापतेः कर्दमस्य त्वनङ्गो नाम वै सुतः ।
प्रजा रक्षयिता साधुर्दण्डनीतिविशारदः ॥ ९१ ॥
प्रजापति कर्दमके पुत्रका नाम अनङ्ग था, जो कालक्रमसे प्रजाका संरक्षण करनेमें समर्थ, साधु तथा दण्डनीतिविद्यामें निपुण हुआ ॥ ९१ ॥
अनङ्गपुत्रोऽतिबलो नीतिमानभिगम्य वै ।
प्रतिपेदे महाराज्यमथेन्द्रियवशोऽभवत् ॥ ९२ ॥
अनङ्गके पुत्रका नाम था अतिबल। वह भी नीतिशास्त्रका ज्ञाता था, उसने विशाल राज्य प्राप्त किया। राज्य पाकर वह इन्द्रियोंका गुलाम हो गया ॥ ९२ ॥
मृत्योस्तु दुहिता राजन् सुनीथा नाम मानसी ।
प्रख्याता त्रिषु लोकेषु यासौ वेनमजीजनत् ॥ ९३ ॥
राजन्! मृत्युकी एक मानसिक कन्या थी, जिसका नाम था सुनीथा। जो अपने रूप और गुणके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात थी। उसीने वेनको जन्म दिया था ॥ ९३ ॥
तं प्रजासु विधर्माणं रागद्वेषवशानुगम् ।
मन्त्रपूतैः कुशैर्जघ्नुर्ऋषयो ब्रह्मवादिनः ॥ ९४ ॥
वेन राग-द्वेषके वशीभूत हो प्रजाओंपर अत्याचार करने लगा। तब वेदवादी ऋषियोंने मन्त्रपूत कुशोंद्वारा उसे मार डाला ॥ ९४ ॥
ममन्थुर्दक्षिणं चोरुमृषयस्तस्य मन्त्रतः ।
ततोऽस्य विकृतो जज्ञे ह्रस्वाङ्गः पुरुषो भुवि ॥ ९५ ॥
फिर वे ही ऋषि मन्त्रोच्चारणपूर्वक वेनकी दाहिनी जङ्घाका मन्थन करने लगे। उससे इस पृथ्वीपर एक नाटे कदका मनुष्य उत्पन्न हुआ, जिसकी आकृति बेडौल थी ॥
दग्धस्थूणाप्रतीकाशो रक्ताक्षः कृष्णमूर्धजः ।
निषीदेत्येवमूचुस्तमृषयो ब्रह्मवादिनः ॥ ९६ ॥
वह जले हुए खम्भेके समान जान पड़ता था। उसकी आँखें लाल और काले बाल थे। वेदवादी महर्षियोंने उसे देखकर कहा— 'निषीद' बैठ जाओ ॥ ९६ ॥
तस्मान्निषादाः सम्भूताः क्रूराः शैलवनाश्रयाः ।
ये चान्ये विन्ध्यनिलया म्लेच्छाः शतसहस्रशः ॥ ९७ ॥
उसीसे पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले क्रूर निषादोंकी उत्पत्ति हुई तथा दूसरे जो विन्ध्यगिरिके निवासी लाखों म्लेच्छ थे, उनका भी प्रादुर्भाव हुआ ॥ ९७ ॥
भूयोऽस्य दक्षिणं पाणिं ममन्थुस्ते महर्षयः ।
ततः पुरुष उत्पन्नो रूपेणेन्द्र इवापरः ॥ ९८ ॥
इसके बाद फिर महर्षियोंने वेनके दाहिने हाथका मन्थन किया। उससे एक दूसरे पुरुषका प्राकट्य हुआ, जो रूपमें देवराज इन्द्रके समान थे ॥ ९८ ॥

कवची बद्धनिस्त्रिंशः सशरः सशरासनः ।
वेदवेदाङ्गविच्चैव धनुर्वेदे च पारगः ॥ ९९ ॥
वे कवच धारण किये, कमरमें तलवार बाँधे तथा धनुष और बाण लिये प्रकट हुए थे। उन्हें वेदों और वेदान्तोंका पूर्ण ज्ञान था। वे धनुर्वेदके भी पारङ्गत विद्वान् थे ॥ ९९ ॥

तं दण्डनीतिः सकला श्रिता राजन् नरोत्तमम् ।
ततस्तु प्राञ्जलिर्वैन्यो महर्षींस्तानुवाच ह ॥ १०० ॥
राजन्! नरश्रेष्ठ वेनकुमारको सारी दण्डनीतिका स्वतः ज्ञान हो गया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन महर्षियोंसे कहा— ॥ १०० ॥

सुसूक्ष्मा मे समुत्पन्ना बुद्धिर्धर्मार्थदर्शिनी ।
अनया किं मया कार्यं तन्मे तत्त्वेन शंसत ॥ १०१ ॥
‘महात्माओ! धर्म और अर्थका दर्शन करानेवाली अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि मुझे स्वतः प्राप्त हो गयी है। मुझे इस बुद्धिके द्वारा आपलोगोंकी कौन-सी सेवा करनी है, यह मुझे यथार्थ रूपसे बताइये ॥ १०१ ॥

यन्मां भवन्तो वक्ष्यन्ति कार्यमर्थसमन्वितम् ।
तदहं वै करिष्यामि नात्र कार्या विचारणा ॥ १०२ ॥
‘आपलोग मुझे जिस किसी भी प्रयोजनपूर्ण कार्यके लिये आज्ञा देंगे, उसे मैं अवश्य पूरा करूँगा। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ १०२ ॥

तमूचुस्तत्र देवास्ते ते चैव परमर्षयः ।
नियतो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर ॥ १०३ ॥
तब वहाँ देवताओं और उन महर्षियोंने उनसे कहा—‘वेननन्दन! जिस कार्यमें नियमपूर्वक धर्मकी सिद्धि होती हो, उसे निर्भय होकर करो ॥ १०३ ॥

प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु ।
कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ॥ १०४ ॥
‘प्रिय और अप्रियका विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मानको दूर हटाकर समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखो ॥ १०४ ॥

यश्च धर्मात् प्रविचलेल्लोके कश्चन मानवः ।
निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद् धर्ममवेक्षता ॥ १०५ ॥
‘लोकमें जो कोई भी मनुष्य धर्मसे विचलित हो, उसे सनातन धर्मपर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबलसे परास्त करके दण्ड दो ॥ १०५ ॥

प्रतिज्ञां चाधिरोहस्व मनसा कर्मणा गिरा ।
पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रह्म इत्येव चासकृत् ॥ १०६ ॥
‘साथ ही यह प्रतिज्ञा करो कि ‘मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा भूतलवर्ती ब्रह्म (वेद) का निरन्तर पालन करूँगा’ ॥ १०६ ॥

यश्चात्र धर्मो नित्योक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः ।
तमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन ।। १०७ ।।
‘वेदमें दण्डनीतिसे सम्बन्ध रखनेवाला जो नित्य धर्म बताया गया है, उसका मैं निःशंक होकर पालन करूँगा। कभी स्वच्छन्द नहीं होऊँगा’ ।। १०७ ।।
अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीहि हे विभो ।
लोकं च संकरात्कृत्स्नं त्रातास्मीति परंतप ।। १०८ ।।