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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार

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द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार

भृगुरुवाच

वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरन्तः पुण्यानि तीर्थानि नदीप्रस्रवणानि सुविविक्तेष्वरण्येषु मृगमहिषवराहशार्दूलवनगजाकीर्णेषु तपस्यन्तोऽनुसंचरन्ति त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधि-फलमूलपर्णपरिमितविचित्रनियताहाराः स्थानास-निनो भूमिपाषाणसिकताशर्करावालुकाभस्म-शायिनः काशकुशचर्मवल्कलसंवृताङ्गाः केश-श्मश्रुनखरोमधारिणो नियतकालोपस्पर्शना अस्क-न्दितकालबलिहोमानुष्ठायिनः समित्कुशकुसुमापहा-रसम्मार्जनलब्धविश्रामाः शीतोष्णवर्षपवनविष्टम्भवि-भिन्नसर्वत्वचो विविधनियमोपयोगचर्यानुष्ठानविहि-तपरिशुष्कमांसशोणितत्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्व-योगाच्छरीराण्युद्वहन्ते ॥ १ ॥

भृगुजी कहते हैं—मुने! तीसरे आश्रम वानप्रस्थका पालन करनेवाले मनुष्य धर्मका अनुसरण करते हुए पवित्र तीर्थोंमें, नदियोंके किनारे, झरनोंके आसपास तथा मृग, भैंसे, सूअर, सिंह एवं जंगली हाथियोंसे भरे हुए एकान्त वनोंमें तप करते हुए विचरते रहते हैं। गृहस्थोंके उपभोगमें आनेवाले ग्रामजनोचित सुन्दर वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन और विषयभोगोंका परित्याग करके वे जंगलमें अपने-आप होनेवाले अन्न, फल, मूल तथा पत्तोंका परिमित, विचित्र एवं नियत आहार करते हैं। भूमिपर ही बैठते हैं। जमीन, पत्थर, रेत, कँकरीली मिट्टी, बालू अथवा राखपर ही सोते हैं। काश, कुश, मृगचर्म और वृक्षोंकी छालसे बने वस्त्रोंसे अपना शरीर ढकते हैं। सिरके बाल, दाढ़ी, मूँछ, नख और रोम सदा धारण किये रहते हैं। नियत समयपर स्नान करके निश्चित कालका उल्लंघन न करते हुए बलिवैश्वदेव तथा अग्निहोत्र आदि कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं। सबेरे हवन-पूजनके लिये समिधा, कुशा और फूल आदिका संग्रह करके आश्रमको झाड़-बुहार लेनेके पश्चात् उन्हें कुछ विश्राम मिलता है। सर्दी गर्मी, वर्षा और हवाका वेग सहते-सहते उनके शरीरके चमड़े फट जाते हैं। नाना प्रकारके नियमोंका पालन और सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके रक्त और मांस सूख जाते हैं और शरीरकी जगह चामसे ढँकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह जाता है; फिर भी धैर्य रखकर साहसपूर्वक शरीरका भार ढोते रहते हैं ॥ १ ॥

यस्त्वेतां नियतश्चर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् स दहेदग्निवद्दोषाञ् जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥ २ ॥

जो पुरुष नियमके साथ रहकर ब्रह्मर्षियोंद्वारा आचरणमें लायी हुई इस वानप्रस्थ धर्मकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह अग्निकी भाँति अपने दोषोंको भस्म करके दुर्लभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥

परिव्राजकानां पुनराचारः—तद्यथा विमुच्याग्नि-धनकलत्रपरिबर्हणं संगेष्वात्मनः स्नेहपाशानवधूय परिव्रजन्ति । समलोष्टाश्मकाञ्चनास्त्रिवर्गप्रवृत्तेष्व-सक्तबुद्धयोऽरिमित्रोदासीनानां तुल्यदर्शनाः स्थावर-जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जानां भूतानां वाङ्मनः-कर्मभिरनभिद्रोहिणोऽनिकेताः पर्वतपुलिनवृक्षमूल देवतायतनान्यनुचरन्तो वासार्थमुपेयुर्नगरं ग्रामं वा नगरे पञ्चरात्रिकाः ग्रामे चैकरात्रिकाः प्रविश्य च प्राणधारणार्थं द्विजातीनां भवनान्यसंकीर्णकर्मणामुपतिष्ठेयुः पात्रपतितायाचितभैक्ष्याः कामक्रोधदर्प-लोभमोहकार्पण्यदम्भपरिवादाभिमानहिंसानिवृत्ता इति ॥ ३ ॥

अब संन्यासियोंका आचरण बतलाया जाता है। वह इस प्रकार है—इसमें प्रवेश करनेवाले पुरुष अग्निहोत्र, धन, स्त्री आदि परिवार तथा घरकी सारी सामग्रीका परित्याग करके भोगों और संगोंके प्रति अपनी आसक्तिके बन्धनोंको तोड़कर सदाके लिये घरसे बाहर निकल जाते हैं। ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हैं। धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी प्रवृत्तियोंमें उनकी बुद्धि आसक्त नहीं होती। शत्रु, मित्र और उदासीन—सबके प्रति वे समान दृष्टि रखते हैं। स्थावर, पिण्डज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा कभी द्रोह नहीं करते हैं, कुटी या मठ बनाकर नहीं रहते हैं। उन्हें चाहिये कि चारों ओर विचरते रहें तथा रात्रिमें ठहरनेके लिये पर्वतकी गुफा, नदीका किनारा, वृक्षकी जड़, देवमन्दिर, नगर अथवा गाँवमें चले जाया करें। नगरमें पाँच रात्रि और गाँवमें एक रातसे अधिक न ठहरें। प्राणधारणके लिये अपने विशुद्ध धर्मोंका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन द्विजातियोंके ऐसे घरोंपर जाकर खड़े हो जायँ, जहाँ संकीर्णता न हो। बिना माँगे ही पात्रमें जितनी भिक्षा आ जाय, उतनी ही स्वीकार करें। काम, क्रोध, दर्प, लोभ, मोह, कृपणता, दम्भ, निन्दा, अभिमान तथा हिंसासे सर्वथा दूर रहें ॥ ३ ॥

भवन्ति चात्र श्लोकाः—
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः ।
न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ॥ ४ ॥
इस विषयमें ये श्लोक प्रसिद्ध हैं—
जो मुनि सब प्राणियोंको अभयदान देकर विचरता है, उसको सम्पूर्ण प्राणियोंमें किसीसे भी कहीं भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं
शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।

विप्रस्तु भैक्ष्योपगतैर्हविर्भि-
श्चिताग्निनां स व्रजते हि लोकम् ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण अग्निहोत्रको अपने शरीरमें आरोपित करके शरीरस्थ अग्निके उद्देश्यसे अपने मुखमें प्राप्त भिक्षारूप हविष्यका होम करता है, वह अग्नि-चयन करनेवाले अग्निहोत्रियोंके लोकमें जाता है ॥ ५ ॥

मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं
शुचिः सुसंकल्पितमुक्तबुद्धिः ।
अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं
स ब्रह्मलोकं श्रयते मनुष्यः ॥ ६ ॥
जो बुद्धिको संकल्परहित करके पवित्र हो शास्त्रोक्त विधिके अनुसार मोक्ष-आश्रम (संन्यास) के नियमोंका पालन करता है, वह मनुष्य बिना ईंधनकी आगके समान परम शान्त ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

भरद्वाज उवाच

अस्माल्लोकात् परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते ।
तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ७ ॥
भरद्वाजने पूछा—ब्रह्मन्! इस लोकसे कोई श्रेष्ठ लोक सुना जाता है; किंतु वह देखनेमें नहीं आता। मैं उसे जानना चाहता हूँ, आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥

भृगुरुवाच

उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते ।
पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥ ८ ॥
भृगुजीने कहा—मुने! उत्तरदिशामें हिमालयके पार्श्वभागमें, जो सर्वगुणसम्पन्न एवं पुण्यमय प्रदेश है, वहाँके भू-भागपर श्रेष्ठ लोक बताया जाता है, वह पवित्र, कल्याणकारी और कमनीय लोक है ॥ ८ ॥

तत्र ह्यापापकर्माणः शुचयोऽत्यन्तनिर्मलाः ।
लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥ ९ ॥
वहाँ पापकर्मसे रहित, पवित्र, अत्यन्त निर्मल, लोभ और मोहसे शून्य तथा सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित मानव निवास करते हैं ॥ ९ ॥

स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः ।
काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधयो न च ॥ १० ॥
वह देश स्वर्गके तुल्य है। वहाँ सभी शुभ गुणोंकी स्थिति बतायी गयी है। वहाँ समयपर ही मृत्यु होती है। रोग-व्याधि किसीका स्पर्श नहीं करते हैं ॥ १० ॥

न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः ।

नान्योन्यं बध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः ।
परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते ॥ ११ ॥
वहाँ किसीके मनमें परायी स्त्रियोंके प्रति लोभ नहीं होता। सब लोग अपनी ही स्त्रियोंमें अनुरक्त रहते हैं। वहाँके निवासी धनके लिये एक दूसरेका वध नहीं करते। किसीको बन्धनमें नहीं डालते। उन्हें कभी महान् विस्मय नहीं होता। अधर्मका तो वहाँ नाम भी नहीं है। वहाँ किसीके मनमें संदेह नहीं पैदा होता है ॥ ११ ॥

कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते ।
पानासनाशनोपेताः प्रासादभवनाश्रयाः ॥ १२ ॥
सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः ।
प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते ।
श्रमेण महता केचित् कुर्वन्ति प्राणधारणम् ॥ १३ ॥
वहाँ किये हुए कर्मका फल प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है। उस लोकमें कुछ लोग बड़े-बड़े महलोंमें रहते, अच्छे आसनोंपर बैठते और उत्तमोत्तम वस्तुएँ खाते-पीते हैं। समस्त कामनाओंसे सम्पन्न और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित होते हैं तथा कुछ लोगोंको प्राणधारणमात्रके लिये भोजन प्राप्त होता है, कुछ लोग बड़े परिश्रमसे तपोमय जीवन व्यतीत करते हुए प्राण धारण करते हैं (इस प्रकार वह लोक इस लोकसे सर्वथा उत्कृष्ट है)* ॥ १२-१३ ॥

इह धर्मपराः केचित् केचिन्नैकृतिका नराः ।
सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनोऽपरे ॥ १४ ॥
इस मनुष्यलोकमें कुछ मनुष्य धर्मपरायण होते हैं तो कुछ बड़े भारी ठग निकलते हैं। इसीलिये कोई सुखी और कोई दुखी होते हैं। कुछ धनवान् और कुछ लोग निर्धन हो जाते हैं ॥ १४ ॥

इह श्रमो भयं मोहः क्षुधा तीव्रा च जायते ।
लोभश्चार्थकृतो नृणां येन मुह्यन्त्यपण्डिताः ॥ १५ ॥
इहलोकमें श्रम, भय, मोह और तीव्र भूखका कष्ट होता है। मनुष्योंमें धनका लोभ विशेष होता है, जिससे अज्ञानी पुरुष मोहमें पड़ जाते हैं ॥ १५ ॥

इह वार्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कारिणः ।
यस्तद्भेदोभयं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते ॥ १६ ॥
इस देशमें धर्म और अधर्म करनेवाले मनुष्योंके विषयमें नाना प्रकारकी बातें सुनी जाती हैं। जो धर्म और अधर्म दोनोंके परिणामको जानता है, वह विद्वान् पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ १६ ॥

सोपधं निकृतिः स्तेयं परिवादो ह्यसूयिता ।
परोपघातो हिंसा च पैशुन्यमनृतं तथा ॥ १७ ॥

एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते ।
यस्त्वेतान् नाचरेद् विद्वांस्तपस्तस्य प्रवर्धते ॥ १८ ॥
कपट, शठता, चोरी, निन्दा, दूसरोंके दोष देखना, दूसरोंको हानि पहुँचाना, प्राणियोंकी हिंसा करना, चुगली खाना और झूठ बोलना—जो इन दुर्गुणोंका सेवन करता है, उसकी तपस्या क्षीण होती है और जो विद्वान् इन दोषोंको कभी अपने आचरणमें नहीं लाता, उसकी तपस्या निरन्तर बढ़ती रहती है ॥ १७-१८ ॥

इह चिन्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः ।
कर्मभूमिरियं लोके इह कृत्वा शुभाशुभम् ।
शुभैः शुभमवाप्नोति तथाशुभमथान्यथा ॥ १९ ॥
इस लोकमें पुण्य और पापकर्मके सम्बन्धमें अनेक प्रकारके विचार होते रहते हैं। यह कर्मभूमि है। इस जगत्में शुभ और अशुभ कर्म करके मनुष्य शुभ कर्मोंका शुभ फल पाता है और अशुभ कर्मोंका अशुभ फल भोगता है ॥ १९ ॥

इह प्रजापतिः पूर्वं देवाः सर्षिगणास्तथा ।
इष्ट्वेष्टतपसः पूता ब्रह्मलोकमुपाश्रिताः ॥ २० ॥
पूर्वकालमें यहीं प्रजापति, देवता तथा ऋषियोंने यज्ञ और अभीष्ट तपस्या करके पवित्र हो ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लिया ॥ २० ॥

उत्तरः पृथिवीभागः सर्वपुण्यतमः शुभः ।
इहस्थास्तत्र जायन्ते ये वै पुण्यकृतो जनाः ॥ २१ ॥
पृथ्वीका उत्तरभाग सबसे अधिक पवित्र और मंगलमय है। इस लोकमें जो पुण्यात्मा मनुष्य हैं, वे ही मृत्युके पश्चात् उस भूभागमें जन्म लेते हैं ॥ २१ ॥

असत्कर्माणि कुर्वन्तस्तिर्यग्योनिषु चापरे ।
क्षीणायुषस्तथा चान्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ॥ २२ ॥
दूसरे लोग जो यहाँ पापकर्म करते हैं, वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं और दूसरे कितने ही आयुक्षय होनेपर नष्ट हो जाते हैं और पातालमें चले जाते हैं ॥ २२ ॥

अन्योन्यभक्षणासक्ता लोभमोहसमन्विताः ।
इहैव परिवर्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम् ॥ २३ ॥
जो लोभ और मोहसे युक्त हो एक दूसरेको खा जानेके लिये उद्यत रहते हैं, वे भी इसी लोकमें आवागमन करते रहते हैं, उत्तरदिशाके उत्कृष्ट लोकमें नहीं जाने पाते हैं ॥

ये गुरून् पर्युपासन्ते नियता ब्रह्मचारिणः ।
पन्थानं सर्वलोकानां विजानन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥
जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरुजनोंकी उपासना करते हैं, वे मनीषी पुरुष सभी लोकोंके मार्गको जानते हैं ॥ २४ ॥

इत्युक्तोऽयं मया धर्मः संक्षिप्तो ब्रह्मनिर्मितः ।

धर्माधर्मौ हि लोकस्य यो वै वेत्ति स बुद्धिमान् ॥ २५ ॥
इस प्रकार मैंने यहाँ ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित इस धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो लोकमें करने और न करने योग्य धर्म और अधर्मको जानता है, वही बुद्धिमान् है ॥ २५ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तो भृगुणा राजन् भरद्वाजः प्रतापवान् ।
भृगुं परमधर्मात्मा विस्मितः प्रत्यपूजयत् ॥ २६ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! भृगुजीके इस प्रकार कहनेपर परम धर्मात्मा प्रतापी भरद्वाजने आश्चर्यचकित होकर उनकी पूजा की ॥ २६ ॥
एष ते प्रसवो राजन् जगतः सम्प्रकीर्तितः ।
निखिलेन महाप्राज्ञ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २७ ॥
परम बुद्धिमान् नरेश! इस प्रकार मैंने तुमसे जगत्‌की उत्पत्तिके सम्बन्धमें ये सारी बातें बतायी हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥


* आचार्य नीलकण्ठने 'उत्तरे हिमवत्पार्श्वे' इत्यादिसे लेकर इस अध्यायके अन्ततकके श्लोकोंका आध्यात्मिक अर्थ किया है। वे परलोक या उत्कृष्ट लोकका अर्थ परमात्मा मानते हैं और इसी दृष्टिसे उन्होंने श्रुति और युक्तिका आश्रय ले पूरे प्रकरणकी संगति लगायी है।