महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश
षडशीतितमोऽध्यायः
राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश
युधिष्ठिर उवाच
कथंविधं पुरं राजा स्वयमावस्तुमर्हति ।
कृतं वा कारयित्वा वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! राजाको स्वयं कैसे नगरमें निवास करना चाहिये? वह पहलेसे बनी हुई राजधानीमें रहे या नये नगरका निर्माण कराकर उसमें निवास करे, यह मुझे बताइये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
वस्तव्यं यत्र कौन्तेय सपुत्रज्ञातिबन्धुना ।
न्याय्यं तत्र परिप्रष्टुं वृत्तिं गुप्तिं च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भारत! कुन्तीनन्दन! पुत्र, कुटुम्बीजन तथा बन्धुवर्गके साथ राजा जिस नगरमें निवास करे, उसमें जीवन-निर्वाह तथा रक्षाकी व्यवस्थाके सम्बन्धमें तुम्हारा प्रश्न करना न्यायसङ्गत है ॥ २ ॥
तस्मात् ते वर्तयिष्यामि दुर्गकर्म विशेषतः ।
श्रुत्वा तथा विधातव्यमनुष्ठेयं च यत्नतः ॥ ३ ॥
इसलिये मैं तुम्हारे समक्ष दुर्गनिर्माणकी क्रियाका विशेषरूपसे वर्णन करूँगा। तुम इस विषयको सुनकर वैसा ही करना और प्रयत्नपूर्वक दुर्गका निर्माण कराना ॥
षड्विधं दुर्गमास्थाय पुराण्यथ निवेशयेत् ।
सर्वसम्पत्प्रधानं यद् बाहुल्यं चापि सम्भवेत् ॥ ४ ॥
जहाँ सब प्रकारकी सम्पत्ति प्रचुरमात्रामें भरी हुई हो तथा जो स्थान बहुत विस्तृत हो, वहाँ छः प्रकारके दुर्गोंका आश्रय लेकर राजाको नये नगर बसाने चाहिये ॥
धन्वदुर्गं महीदुर्गं गिरिदुर्गं तथैव च ।
मनुष्यदुर्गं अब्दुर्गं वनदुर्गं च तानि षट् ॥ ५ ॥
उन छहों दुर्गोंके नाम इस प्रकार हैं—धन्वदुर्ग¹, महीदुर्ग², गिरिदुर्ग³, मनुष्यदुर्ग⁴, जलदुर्ग⁵, तथा वनदुर्ग⁶ ॥ ५ ॥
यत्पुरं दुर्गसम्पन्नं धान्यायुधसमन्वितम् ।
दृढप्राकारपरिखं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ ६ ॥
विद्वांसः शिल्पिनो यत्र निचयाश्च सुसंचिताः ।
धार्मिकश्च जनो यत्र दाक्ष्यमुत्तममास्थितः ॥ ७ ॥
ऊर्जस्विनरनागाश्वं चत्वरापणशोभितम् ।
प्रसिद्धव्यवहारं च प्रशान्तमकुतोभयम् ॥ ८ ॥
सुप्रभं सानुनादं च सुप्रशस्तनिवेशनम् ।
शूराढ्यजनसम्पन्नं ब्रह्मघोषानुनादितम् ॥ ९ ॥
समाजोत्सवसम्पन्नं सदा पूजितदैवतम् ।
वश्यामात्यबलो राजा तत्पुरं स्वयमाविशेत् ॥ १० ॥
जिस नगरमें इनमेंसे कोई-न-कोई दुर्ग हो, जहाँ अन्न और अस्त्र-शस्त्रोंकी अधिकता हो, जिसके चारों ओर मजबूत चहारदीवारी और गहरी एवं चौड़ी खाई बनी हो, जहाँ हाथी, घोड़े और रथोंकी बहुतायत हो, जहाँ विद्वान् और कारीगर बसे हों, जिस नगरमें आवश्यक वस्तुओंके संग्रहसे भरे हुए कई भंडार हों, जहाँ धार्मिक तथा कार्यकुशल मनुष्योंका निवास हो, जो बलवान् मनुष्य, हाथी और घोड़ोंसे सम्पन्न हो, चौराहे तथा बाजार जिसकी शोभा बढ़ा रहे हों, जहाँका न्याय-विचार एवं न्यायालय सुप्रसिद्ध हो, जो सब प्रकारसे शान्तिपूर्ण हो, जहाँ कहींसे कोई भय या उपद्रव न हो, जिसमें रोशनीका अच्छा प्रबन्ध हो, संगीत और वाद्योंकी ध्वनि होती रहती हो, जहाँका प्रत्येक घर सुन्दर और सुप्रशस्त हो, जिसमें बड़े-बड़े शूरवीर और धनाढ्य लोग निवास करते हों, वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती हो तथा जहाँ सदा ही सामाजिक उत्सव और देवपूजनका क्रम चलता रहता हो, ऐसे नगरके भीतर अपने वशमें रहनेवाले मन्त्रियों तथा सेनाके साथ राजाको स्वयं निवास करना चाहिये ॥ ६—१० ॥
तत्र कोशं बलं मित्रं व्यवहारं च वर्धयेत् ।
पुरे जनपदे चैव सर्वदोषान् निवर्तयेत् ॥ ११ ॥
राजाको चाहिये कि वह उस नगरमें कोष, सेना, मित्रोंकी संख्या तथा व्यवहारको बढ़ावे। नगर तथा बाहरके ग्रामोंमें सभी प्रकारके दोषोंको दूर करे ॥ ११ ॥
भाण्डागारायुधागारं प्रयत्नेनाभिवर्धयेत् ।
निचयान् वर्धयेत् सर्वांस्तथा यन्त्रायुधालयान् ॥ १२ ॥
अन्नभण्डार तथा अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहालयको प्रयत्नपूर्वक बढ़ावे, सब प्रकारकी वस्तुओंके संग्रहालयोंकी भी वृद्धि करे, यन्त्रों तथा अस्त्र-शस्त्रोंके कारखानोंकी उन्नति करे ॥ १२ ॥
काष्ठलोहतुषाङ्गारदारुशृङ्गास्थिवैणवान् ।
मज्जा स्नेहवसा क्षौद्रमौषधग्राममेव च ॥ १३ ॥
शणं सर्जरसं धान्यमायुधानि शरांस्तथा ।
चर्म स्नायुं तथा वेत्रं मुञ्जबल्वजबन्धनान् ॥ १४ ॥
काठ, लोहा, धानकी भूसी, कोयला, बाँस, लकड़ी, सींग, हड्डी, मज्जा, तेल, घी, चरबी, शहद, औषधसमूह, सन, राल, धान्य, अस्त्र-शस्त्र, बाण, चमड़ा, ताँत, बेंत तथा मूँज और बल्वजकी रस्सी आदि सामग्रियोंका संग्रह रखे ॥ १३-१४ ॥
आशयाश्चोदपानाश्च प्रभूतसलिलाकराः ।
निरोद्धव्याः सदा राज्ञा क्षीरिणश्च महीरुहाः ॥ १५ ॥
जलाशय (तालाब, पोखरे आदि), उदपान (कुँए, बावड़ी आदि), प्रचुर जलराशिसे भरे हुए बड़े-बड़े तालाब तथा दूधवाले वृक्ष—इन सबकी राजाको सदा रक्षा करनी चाहिये ॥ १५ ॥
सत्कृताश्च प्रयत्नेन आचार्यर्त्विक्पुरोहिताः ।
महेष्वासाः स्थपतयः सांवत्सरचिकित्सकाः ॥ १६ ॥
आचार्य, ऋत्विज्, पुरोहित और महान् धनुर्धरोंका तथा घर बनानेवालोंका, वर्षफल बतानेवाले ज्योतिषियोंका और वैद्योंका यत्नपूर्वक सत्कार करे ॥ १६ ॥
प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता दक्षाः शूरा बहुश्रुताः ।
कुलीनाः सत्त्वसम्पन्ना युक्ताः सर्वेषु कर्मसु ॥ १७ ॥
विद्वान्, बुद्धिमान्, जितेन्द्रिय, कार्यकुशल, शूर, बहुज्ञ, कुलीन तथा साहस और धैर्यसे सम्पन्न पुरुषोंको यथायोग्य समस्त कर्मोंमें लगावे ॥ १७ ॥
पूजयेद् धार्मिकान् राजा निगृह्णीयादधार्मिकान् ।
नियुञ्ज्याच्च प्रयत्नेन सर्ववर्णान् स्वकर्मसु ॥ १८ ॥
राजाको चाहिये कि धार्मिक पुरुषोंका सत्कार करे और पापियोंको दण्ड दे। वह सभी वर्णोंको प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने कर्मोंमें लगावे ॥ १८ ॥
बाह्यमाभ्यन्तरं चैव पौरजानपदं तथा ।
चारैः सुविदितं कृत्वा ततः कर्म प्रयोजयेत् ॥ १९ ॥
गुप्तचरोंद्वारा नगर तथा छोटे ग्रामोंके बाहरी और भीतरी समाचारोंको अच्छी तरह जानकर फिर उसके अनुसार कार्य करे ॥ १९ ॥
चरान्मन्त्रं च कोशं च दण्डं चैव विशेषतः ।
अनुतिष्ठेत् स्वयं राजा सर्वं ह्यत्र प्रतिष्ठितम् ॥ २० ॥
गुप्तचरोंसे मिलने, गुप्त सलाह करने, खजानेकी जाँच-पड़ताल करने तथा विशेषतः अपराधियोंको दण्ड देनेका कार्य राजा स्वयं करे; क्योंकि इन्हींपर सारा राज्य प्रतिष्ठित है ॥ २० ॥
उदासीनारिमित्राणां सर्वमेव चिकीर्षितम् ।
पुरे जनपदे चैव ज्ञातव्यं चारचक्षुषा ॥ २१ ॥
राजाको गुप्तचररूपी नेत्रोंके द्वारा देखकर सदा इस बातकी जानकारी रखनी चाहिये कि मेरे शत्रु, मित्र तथा तटस्थ व्यक्ति नगर और छोटे ग्रामोंमें कब क्या करना चाहते हैं? ॥ २१ ॥
ततस्तेषां विधातव्यं सर्वमेवाप्रमादतः ।
भक्तान् पूजयता नित्यं द्विषतश्च निगृह्णता ॥ २२ ॥
उनकी चेष्टाएँ जान लेनेके पश्चात् उनके प्रतीकारके लिये सारा कार्य बड़ी सावधानीके साथ करना चाहिये। राजाको उचित है कि वह अपने भक्तोंका सदा आदर करे और द्वेष रखनेवालोंको कैद कर ले ॥ २२ ॥
यष्टव्यं क्रतुभिर्नित्यं दातव्यं चाप्यपीडया ।
प्रजानां रक्षणं कार्यं न कार्यं धर्मबाधकम् ॥ २३ ॥
उसे प्रतिदिन नाना प्रकारके यज्ञ करना तथा दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए दान देना चाहिये। वह प्रजाजनोंकी रक्षा करे और कोई भी कार्य ऐसा न करे जिससे धर्ममें बाधा आती हो ॥ २३ ॥
कृपणानाथवृद्धानां विधवानां च योषिताम् ।
योगक्षेमं च वृत्तिं च नित्यमेव प्रकल्पयेत् ॥ २४ ॥
दीन, अनाथ, वृद्ध तथा विधवा स्त्रियोंके योगक्षेम एवं जीविकाका सदा ही प्रबन्ध करे ॥ २४ ॥
आश्रमेषु यथाकालं चैलभाजनभोजनम् ।
सदैवोपहरेद् राजा सत्कृत्याभ्यर्च्य मान्य च ॥ २५ ॥
राजा आश्रमोंमें यथासमय वस्त्र, बर्तन और भोजन आदि सामग्री सदा ही भेजा करे, तथा सबको सत्कार, पूजन एवं सम्मानपूर्वक वे वस्तुएँ अर्पित करे ॥ २५ ॥
आत्मानं सर्वकार्याणि तापसे राष्ट्रमेव च ।
निवेदयेत् प्रयत्नेन तिष्ठेत् प्रह्वश्च सर्वदा ॥ २६ ॥
अपने राज्यमें जो तपस्वी हों, उन्हें अपने शरीर-सम्बन्धी, सम्पूर्ण कार्यसम्बन्धी तथा राष्ट्रसम्बन्धी समाचार प्रयत्नपूर्वक बताया करे और उनके सामने सदा विनीतभावसे रहे ॥ २६ ॥
सर्वार्थत्यागिनं राजा कुले जातं बहुश्रुतम् ।
पूजयेत् तादृशं दृष्ट्वा शयनासनभोजनैः ॥ २७ ॥
जिसने सम्पूर्ण स्वार्थोंका परित्याग कर दिया है, ऐसे कुलीन एवं बहुश्रुत विद्वान् तपस्वीको देखकर राजा शय्या, आसन और भोजन देकर उसका सम्मान करे ॥ २७ ॥
तस्मिन् कुर्वीत विश्वासं राजा कस्याञ्चिदापदि ।
तापसेषु हि विश्वासमपि कुर्वन्ति दस्यवः ॥ २८ ॥
कैसी भी आपत्तिका समय क्यों न हो? राजाको तो तपस्वीपर विश्वास करना ही चाहिये; क्योंकि चोर और डाकू भी तपस्वी महात्माओंपर विश्वास करते हैं ।।
तस्मिन् निधीनादधीत प्रज्ञां पर्याददीत च ।
न चाप्यभीक्ष्णं सेवेत भृशं वा प्रतिपूजयेत् ॥ २९ ॥
राजा उस तपस्वीके निकट अपने धनकी निधियोंको रखे और उससे सलाह भी लिया करे; परंतु बार-बार उसके पास जाना-आना और उसका सङ्ग न करे, तथा उसका अधिक सम्मान भी न करे (अर्थात् गुप्तरूपसे ही उसकी सेवा और सम्मान करे। लोगोंपर इस बातको प्रकट न होने दे) ॥ २९ ॥
अन्यः कार्यः स्वराष्ट्रेषु परराष्ट्रेषु चापरः ।
अटवीषु परः कार्यः सामन्तनगरेष्वपि ॥ ३० ॥
राजा अपने राज्यमें, दूसरोंके राज्योंमें, जंगलोंमें तथा अपने अधीन राजाओंके नगरोंमें भी एक-एक भिन्न-भिन्न तपस्वीको अपना सुहृद् बनाये रखे ॥ ३० ॥
तेषु सत्कारमानाभ्यां संविभागांश्च कारयेत् ।
परराष्ट्राटवीस्थेषु यथा स्वविषये तथा ॥ ३१ ॥
उन सबको सत्कार और सम्मानके साथ आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करे। जैसे अपने राज्यके तपस्वीका आदर करे, वैसे ही दूसरे राज्यों तथा जंगलोंमें रहनेवाले तापसोंका भी सम्मान करना चाहिये ॥ ३१ ॥
ते कस्याञ्चिदवस्थायां शरणं शरणार्थिने ।
राज्ञे दद्युर्यथाकामं तापसाः संशितव्रताः ॥ ३२ ॥
वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शरणार्थी राजाको किसी भी अवस्थामें इच्छानुसार शरण दे सकते हैं ॥ ३२ ॥
एष ते लक्षणोद्देशः संक्षेपेण प्रकीर्तितः ।
यादृशे नगरे राजा स्वयमावस्तुमर्हति ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार राजाको स्वयं जैसे नगरमें निवास करना चाहिये, उसका लक्षण मैंने यहाँ संक्षेपसे बताया है ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्गपरीक्षायां
षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्गपरीक्षाविषयक
छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
१. धन्वदुर्गका दूसरा नाम मरुदुर्ग भी है। जिसके चारों ओर बालूका घेरा हो, उस किलेको धन्वदुर्ग कहते हैं।
२. समतल जमीनके अंदर बना हुआ किला या तहखाना महीदुर्ग कहलाता है।
३. पर्वतशिखरपर बना हुआ वह किला जो चारों ओरसे उत्तुंग पर्वतमालाओंद्धारा घिरा हुआ हो, गिरिदुर्ग कहलाता है।
४. फौजी किलेका ही नाम मनुष्यदुर्ग है।
५. जिसके चारों ओर जलका घेरा हो, वह जलदुर्ग कहलाता है।
६. जो स्थान कटवाँसी आदिके घने जंगलसे घिरा हुआ हो, उसे वनदुर्ग कहा गया है।