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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश

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पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश

पराशर उवाच

एष धर्मविधिस्तात गृहस्थस्य प्रकीर्तितः ।
तपोविधिं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ १ ॥
पराशरजी कहते हैं—तात! यह मैंने गृहस्थके धर्मका विधान बताया है। अब मैं तपकी विधि बताऊँगा, उसे मेरे मुखसे सुनो ॥ १ ॥

प्रायेण च गृहस्थस्य ममत्वं नाम जायते ।
सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावै राजसतामसैः ॥ २ ॥
नरश्रेष्ठ! गृहस्थ पुरुषको प्रायः राजस और तामस भावोंके संसर्गवश पदार्थ और व्यक्तियोंमें ममता हो जाती है ॥ २ ॥

गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च ।
दाराः पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै ॥ ३ ॥
घरका आश्रय लेते ही मनुष्यका गौ, खेती-बारी, धन-दौलत, स्त्री-पुत्र तथा भरण-पोषणके योग्य अन्यान्य कुटुम्बीजनोंसे सम्बन्ध स्थापित हो जाता है ॥ ३ ॥

एवं तस्य प्रवृत्तस्य नित्यमेवानुपश्यतः ।
रागद्वेषौ विवर्धेते ह्यनित्यत्वमपश्यतः ॥ ४ ॥
इस प्रकार प्रवृत्तिमार्गमें रहकर वह नित्य ही उन वस्तुओंको देखता है, किंतु उनकी अनित्यताकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती; इसलिये उसके मनमें इनके प्रति राग और द्वेष बढ़ने लगते हैं ॥ ४ ॥

रागद्वेषाभिभूतं च नरं द्रव्यवशानुगम् ।
मोहजाता रतिर्नाम समुपैति नराधिप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! राग और द्वेषके वशीभूत होकर जब मनुष्य द्रव्यमें आसक्त हो जाता है, तब मोहकी कन्या रति उसके पास आ जाती है ॥ ५ ॥

कृतार्थं भोगिनं मत्वा सर्वो रतिपरायणः ।
लाभं ग्राम्यसुखादन्यं रतितो नानुपश्यति ॥ ६ ॥
तब रतिकी उपासनामें लगे हुए सभी लोग भोगीको ही कृतार्थ मानकर रतिके द्वारा जो विषय-सुख प्राप्त होता है, उससे बढ़कर दूसरा कोई लाभ नहीं समझते हैं ॥

ततो लोभाभिभूतात्मा संगाद् वर्धयते जनम् ।

पुष्ट्यर्थं चैव तस्येह जनस्यार्थं चिकीर्षति ॥ ७ ॥
तदनन्तर उनके मनपर लोभका अधिकार हो जाता है और वे आसक्तिवश अपने परिजनोंकी संख्या बढ़ाने लगते हैं। इसके बाद उन कुटुम्बीजनोंके पालन-पोषणके लिये मनुष्यके मनमें धन-संग्रहकी इच्छा होती है ॥ ७ ॥

स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः ।
बालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षयाच्चानुतप्यते ॥ ८ ॥
यद्यपि मनुष्य जानता है कि अमुक काम करना पाप है, तो भी वह धनके लिये उसका सेवन करता है। बाल-बच्चोंके स्नेहमें उसका मन डूबा रहता है और उनमेंसे जब कोई मर जाता है तब उनके लिये वह बारंबार संतप्त होता है ॥ ८ ॥

ततो मानेन सम्पन्नो रक्षन्नात्मपराजयम् ।
करोति येन भोगी स्यामिति तस्माद् विनश्यति ॥ ९ ॥
धनसे जब लोकमें सम्मान बढ़ता है, तब वह मानसम्पन्न पुरुष सदा अपने अपमानसे बचनेके लिये प्रयत्न करता रहता है एवं 'मैं भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न होऊँ' यह उद्देश्य लेकर ही वह सारा कार्य करता है और इसी प्रयत्नमें एक दिन नष्ट हो जाता है ॥ ९ ॥

तथा हि बुद्धियुक्तानां शाश्वतं ब्रह्मवादिनाम् ।
अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ॥ १० ॥
वास्तवमें जो शुभ कर्मोंका अनुष्ठान तो करते हैं, परन्तु उनसे सुख पानेकी इच्छाको त्याग देते हैं, उन समत्व-बुद्धिसे युक्त ब्रह्मवादी पुरुषोंको ही सनातन पदकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥

स्नेहायतननाशाच्च धननाशाच्च पार्थिव ।
आधिव्याधिप्रतापाच्च निर्वेदमुपगच्छति ॥ ११ ॥
पृथ्वीनाथ! संसारी जीवोंको तो जब उनके स्नेहके आधारभूत स्त्री-पुत्र आदिका नाश हो जाता, धन चला जाता और रोग तथा चिन्तासे कष्ट उठाना पड़ता है, तभी वैराग्य होता है ॥ ११ ॥

निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाच्छास्त्रदर्शनम् ।
शास्त्रार्थदर्शनाद् राजंस्तप एवानुपश्यति ॥ १२ ॥
राजन्! वैराग्यसे मनुष्यको आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा होती है। जिज्ञासासे शास्त्रोंके स्वाध्यायमें मन लगता है तथा शास्त्रोंके अर्थ और भावके ज्ञानसे वह तपको ही कल्याणका साधन समझता है ॥ १२ ॥

दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नरः प्रत्यवमर्शवान् ।
यो वै प्रियसुखे क्षीणे तपः कर्तुं व्यवस्यति ॥ १३ ॥
नरेन्द्र! संसारमें ऐसा विवेकी मनुष्य दुर्लभ है, जो स्त्री-पुत्र आदि प्रियजनोंसे मिलनेवाले सुखके न रहनेपर तपमें प्रवृत्त होनेका ही निश्चय करता है ॥ १३ ॥

तपः सर्वगतं तात हीनस्यापि विधीयते ।
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य स्वर्गमार्गप्रवर्तकम् ॥ १४ ॥
तात! तपस्यामें सभीका अधिकार है। जितेन्द्रिय और मनोनिग्रहसम्पन्न हीन वर्णके लिये भी तपका विधान है; क्योंकि तप पुरुषको स्वर्गकी राहपर लानेवाला है ॥ १४ ॥
प्रजापतिः प्रजाः पूर्वमसृजत् तपसा विभुः ।
क्वचित् क्वचिद् ब्रह्मपरो व्रतान्यास्थाय पार्थिव ॥ १५ ॥
भूपाल! पूर्वकालमें शक्तिशाली प्रजापतिने तपमें स्थित होकर और कभी-कभी ब्रह्मपरायण व्रतमें स्थित होकर संसारकी रचना की थी ॥ १५ ॥
आदित्या वसवो रुद्रास्तथैवाग्न्यश्विमारुताः ।
विश्वेदेवास्तथा साध्याः पितरोऽथ मरुद्गणाः ॥ १६ ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वाः सिद्धाश्चान्ये दिवौकसः ।
संसिद्धास्तपसा तात ये चान्ये स्वर्गवासिनः ॥ १७ ॥
तात! आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, अश्विनीकुमार, वायु, विश्वेदेव, साध्य, पितर, मरुद्गण, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सिद्ध तथा अन्य जो स्वर्गवासी देवता हैं, वे सब-के-सब तपस्यासे ही सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥
ये चादौ ब्राह्मणाः सृष्टा ब्रह्मणा तपसा पुरा ।
ते भावयन्तः पृथिवीं विचरन्ति दिवं तथा ॥ १८ ॥
ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन मरीचि आदि ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था, वे तपके ही प्रभावसे पृथ्‍वी और आकाशको पवित्र करते हुए ही विचरते हैं ॥ १८ ॥
मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः ।
महाकुलेषु दृश्यन्ते तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ १९ ॥
मर्त्यलोकमें भी जो राजे-महाराजे तथा अन्यान्य गृहस्थ महान् कुलोंमें उत्पन्न देखे जाते हैं, वह सब उनकी तपस्याका ही फल है ॥ १९ ॥
कौशिकानि च वस्त्राणि शुभान्याभरणानि च ।
वाहनासनपानानि तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २० ॥
रेशमी वस्त्र, सुन्दर आभूषण, वाहन, आसन और उत्तम खान-पान आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥
मनोऽनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः ।
वासः प्रासादपृष्ठे च तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २१ ॥
मनके अनुकूल चलनेवाली सहस्रों रूपवती युवतियाँ और महलोंका निवास आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥ २१ ॥
शयनानि च मुख्यानि भोज्यानि विविधानि च ।
अभिप्रेतानि सर्वाणि भवन्ति शुभकर्मणाम् ॥ २२ ॥

श्रेष्ठ शय्या, भाँति-भाँतिके उत्तम भोजन तथा सभी मनोवांछित पदार्थ पुण्यकर्म करनेवाले लोगोंको ही प्राप्त होते हैं ॥ २२ ॥
नाप्राप्यं तपसः किंचित् त्रैलोक्येऽपि परंतप ।
उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ॥ २३ ॥
परंतप! त्रिलोकीमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तपस्यासे प्राप्त न हो सके; किंतु जिन्होंने काम्य अथवा निषिद्ध कर्म नहीं किये हैं, उनकी तपस्याका फल सुखभोगोंका परित्याग ही है ॥ २३ ॥
सुखितो दुःखितो वापि नरो लोभं परित्यजेत् ।
अवेक्ष्य मनसा शास्त्रं बुद्ध्या च नृपसत्तम ॥ २४ ॥
नृपश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, मन और बुद्धिसे शास्त्रका तत्त्व समझकर लोभका परित्याग कर दे ॥ २४ ॥
असंतोषोऽसुखायेति लोभादिन्द्रियसम्भ्रमः ।
ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता ॥ २५ ॥
असंतोष दुःखका ही कारण है। लोभसे मन और इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, उससे मनुष्यकी बुद्धि उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे बिना अभ्यासके विद्या ॥
नष्टप्रज्ञो यदा तु स्यात् तदा न्यायं न पश्यति ।
तस्मात् सुखक्षये प्राप्ते पुमानुग्रं तपश्चरेत् ॥ २६ ॥
जब मनुष्यकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, तब वह न्यायको नहीं देख पाता अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय नहीं कर पाता है। इसलिये सुखका क्षय हो जानेपर प्रत्येक पुरुषको घोर तपस्या करनी चाहिये ॥
यदिष्टं तत् सुखं प्राहुर्द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते ।
कृताकृतस्य तपसः फलं पश्यस्व यादृशम् ॥ २७ ॥
जो अपनेको प्रिय जान पड़ता है, उसे सुख कहते हैं तथा जो मनके प्रतिकूल होता है, वह दुःख कहलाता है। तपस्या करनेसे सुख और न करनेसे दुःख होता है। इस प्रकार तप करने और न करनेका जैसा फल होता है, उसे तुम भलीभाँति समझ लो ॥ २७ ॥
नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषयांश्चोपभुञ्जते ।
प्राकाश्यं चैव गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ॥ २८ ॥
मनुष्य पापरहित तपस्या करके सदा अपना कल्याण ही देखते हैं। मनोवांछित विषयोंका उपभोग करते हैं और संसारमें उनकी ख्याति होती है ॥ २८ ॥
अप्रियाण्यवमानांश्च दुःखं बहुविधात्मकम् ।
फलार्थी तत्फलं त्यक्त्वा प्राप्नोति विषयात्मकम् ॥ २९ ॥
मनके अनुकूल फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सकाम कर्मका अनुष्ठान करके अप्रिय, अपमान और नाना प्रकारके दुःख पाता है, किंतु उस फलका परित्याग करके वह

सम्पूर्ण विषयोंके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ २९ ॥

धर्मे तपसि दाने च विचिकित्सास्य जायते ।
स कृत्वा पापकान्येव निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३० ॥
जिसे धर्म, तपस्या और दानमें संशय उत्पन्न हो जाता है, वह पापकर्म करके नरकमें पड़ता है ॥ ३० ॥

सुखे तु वर्तमानो वै दुःखे वापि नरोत्तम ।
सुवृत्ताद् यो न चलते शास्त्रचक्षुः स मानवः ॥ ३१ ॥
नरश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, जो सदाचारसे कभी विचलित नहीं होता, वही शास्त्रका ज्ञाता है ॥

इषुप्रापातमात्रं हि स्पर्शयोगे रतिः स्मृता ।
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशाम्पते ॥ ३२ ॥
प्रजानाथ! बाणको धनुषसे छूटकर पृथ्वीपर गिरनेमें जितनी देर लगती है, उतना ही समय स्पर्शेन्द्रिय, रसना, नेत्र, नासिका और कानके विषयोंका सुख अनुभव करनेमें लगता है अर्थात् विषयोंका सुख क्षणिक है ॥

ततोऽस्य जायते तीव्रा वेदना तत्क्षयात् पुनः ।
अबुधा न प्रशंसन्ति मोक्षं सुखमनुत्तमम् ॥ ३३ ॥
फिर वह सुख जब नष्ट हो जाता है, तब उसके लिये मनमें बड़ी वेदना होती है। इतनेपर भी अज्ञानी पुरुष (विषयोंमें ही लिप्त रहते हैं, वे) सर्वोत्तम मोक्ष-सुखकी प्रशंसा नहीं करते हैं अर्थात् उसे नहीं चाहते ॥ ३३ ॥

ततः फलार्थं सर्वस्य भवन्ति ज्यायसे गुणाः ।
धर्मवृत्त्या च सततं कामार्थाभ्यां न हीयते ॥ ३४ ॥
अतः प्रत्येक विवेकी पुरुषके मनमें श्रेष्ठ मोक्षफलकी प्राप्ति करानेके लिये शम-दम आदि गुणोंकी उत्पत्ति होती है। निरन्तर धर्मका पालन करनेसे मनुष्य कभी धन और भोगोंसे वंचित नहीं रहता ॥ ३४ ॥

अप्रयत्नागताः सेव्या गृहस्थैर्विषयाः सदा ।
प्रयत्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ॥ ३५ ॥
इसलिये गृहस्थ पुरुषको सदा बिना प्रयत्न अपने-आप प्राप्त हुए विषयोंका ही सेवन करना चाहिये और प्रयत्न करके तो अपने धर्मका ही पालन करना चाहिये। यही मेरा मत है ॥ ३५ ॥

मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम् ।
क्रियाधर्मविमुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम् ॥ ३६ ॥
क्रियमाणं यदा कर्म नाशं गच्छति मानुषम् ।
तेषां नान्यदृते लोके तपसः कर्म विद्यते ॥ ३७ ॥

जब उत्तम कुलमें उत्पन्न, सम्मानित तथा शास्त्रके अर्थको जाननेवाले पुरुषोंका और असमर्थताके कारण कर्म-धर्मसे रहित एवं आत्मतत्त्वसे अनभिज्ञ मनुष्योंका भी किया हुआ लौकिक कर्म नष्ट हो ही जाता है, तब यही निष्कर्ष निकलता है कि जगत्में उनके लिये तपके सिवा दूसरा कोई सत्कर्म नहीं है ॥ ३६-३७ ॥

सर्वात्मनानुकुर्वीत गृहस्थः कर्मनिश्चयम् ।
दाक्ष्येण हव्यकव्यार्थं स्वधर्मे विचरन् नृप ॥ ३८ ॥
नरेश्वर! गृहस्थको सर्वथा अपने कर्तव्यका निश्चय करके स्वधर्मका पालन करते हुए कुशलतापूर्वक यज्ञ तथा श्राद्ध आदि कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ३८ ॥

यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
एवमाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ३९ ॥
जैसे सम्पूर्ण नदियाँ और नद समुद्रमें जाकर मिलते हैं, उसी प्रकार समस्त आश्रम गृहस्थका ही सहारा लेते हैं ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां
पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९५ ॥