महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
नर-नारायणका नारदजीके साथ संवाद
नर-नारायणका नारदजीके साथ संवाद
श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन्! तुमने जिसके विषयमें प्रश्न किया है, वह अपने लिये गोपनीय विषय है। यद्यपि यह सनातन रहस्य किसीसे कहने योग्य नहीं है, तथापि तुम-जैसे भक्त पुरुषको तो उसे बताना ही चाहिये; अतः मैं यथार्थ रूपसे इस विषयका वर्णन करूँगा॥ २८॥
यत् तत् सूक्ष्ममविज्ञेयमव्यक्तमचलं ध्रुवम्।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम्॥ २९॥
स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते।
त्रिगुणव्यतिरिक्तो वै पुरुषश्चेति कल्पितः॥ ३०॥
तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।
अव्यक्ता व्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरव्यया॥ ३१॥
जो सूक्ष्म, अज्ञेय, अव्यक्त, अचल और ध्रुव है, जो इन्द्रियों, विषयों और सम्पूर्ण भूतोंसे परे है, वही सब प्राणियोंका अन्तरात्मा है; अतः क्षेत्रज्ञ नामसे कहा जाता है, वही त्रिगुणातीत तथा पुरुष कहलाता है। उसीसे त्रिगुणमय अव्यक्तकी उत्पत्ति हुई है। द्विजश्रेष्ठ! उसीको व्यक्तभावमें स्थित, अविनाशिनी अव्यक्त प्रकृति कहा गया है॥ २९—३१॥
तां योनिमावयोर्र्विद्धि योऽसौ सदसदात्मकः।
आवाभ्यां पूज्यतेऽसौ हि दैवे पित्र्ये च कल्प्यते॥ ३२॥
वह सदसत्स्वरूप परमात्मा ही हम दोनोंकी उत्पत्तिका कारण है, इस बातको जान लो। हम दोनों उसीकी पूजा करते तथा उसीको देवता और पितर मानते हैं॥ ३२॥
नास्ति तस्मात् परोऽन्यो हि पिता देवोऽथवा द्विज।
आत्मा हि नः स विज्ञेयस्ततस्तं पूजयावहे॥ ३३॥
ब्रह्मन्! उससे बढ़कर दूसरा कोई देवता या पितर नहीं है। वही हमलोगोंका आत्मा है, यह जानना चाहिये। अतः हम उसीकी पूजा करते हैं॥ ३३॥
तेनैषा प्रथिता ब्रह्मन् मर्यादा लोकभाविनी।
दैवं पित्र्यं च कर्तव्यमिति तस्यानुशासनम्॥ ३४॥
ब्रह्मन्! उसीने लोकको उन्नतिके पथपर ले जानेवाली यह धर्मकी मार्यादा स्थापित की है। देवताओं और पितरोंकी पूजा करनी चाहिये, यह उसीकी आज्ञा है॥
ब्रह्मा स्थाणुर्मनुर्दक्षो भृगुर्धर्मस्तपो यमः।
मरीचिरङ्गिराऽत्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः॥ ३५॥
वसिष्ठः परमेष्ठी च विवस्वान् सोम एव च।
कर्दमश्चापि यः प्रोक्तः क्रोधो विक्रीत एव च॥ ३६॥
एकविंशतिरुत्पन्नास्ते प्रजापतयः स्मृताः।
तस्य देवस्य मर्यादां पूजयन्तः सनातनीम्॥ ३७॥
ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्ष, भृगु, धर्म, तप, यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, कर्दम, क्रोध, और विक्रीत—ये इक्कीस प्रजापति उसी परमात्मासे उत्पन्न बताये गये हैं तथा उसी परमात्माकी सनातन धर्म-मर्यादाका पालन एवं पूजन करते हैं ।। ३५-३७ ।।
दैवं पित्र्यं च सततं तस्य विज्ञाय तत्त्वतः ।
आत्मप्राप्तानि च ततः प्राप्नुवन्ति द्विजोत्तमाः ॥ ३८ ॥
श्रेष्ठ द्विज उसीके उद्देश्यसे किये जानेवाले देवता तथा पितृ-सम्बन्धी कार्योंको ठीक-ठीक जानकर अपनी अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेते हैं ।। ३८ ।।
स्वर्गस्था अपि ये केचित् तान् नमस्यन्ति देहिनः ।
ते तत्प्रसादाद् गच्छन्ति तेनादिष्ट फलां गतिम् ॥ ३९ ॥
स्वर्गमें रहनेवाले प्राणियोंमेंसे भी जो कोई उस परमात्माको प्रणाम करते हैं, वे उसके कृपा-प्रसादसे उसीकी आज्ञाके अनुसार फल देनेवाली उत्तम गतिको प्राप्त करते हैं ।। ३९ ।।
ये हीनाः सप्तदशभिर्गुणैः कर्मभिरेव च ।
कलाः पञ्चदश त्यक्ता ते मुक्ता इति निश्चयः ॥ ४० ॥
जो पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धिरूप सत्रह गुणोंसे, सब कर्मोंसे रहित हो पंद्रह कलाओंको त्याग करके स्थित हैं, वे ही मुक्त हैं, यह शास्त्रका सिद्धान्त है ।। ४० ।।
मुक्तानां तु गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पिता ।
स हि सर्वगुणैश्चैव निर्गुणश्चैव कथ्यते ॥ ४१ ॥
ब्रह्मन्! मुक्त पुरुषोंकी गति क्षेत्रज्ञ परमात्मा निश्चित किया गया है। वही सर्वसद्गुणसम्पन्न तथा निर्गुण भी कहलाता है ।। ४१ ।।
दृश्यते ज्ञानयोगेन आवां च प्रसूतौ ततः ।
एवं ज्ञात्वा तमात्मानं पूजयावः सनातनम् ॥ ४२ ॥
ज्ञानयोगके द्वारा उसका साक्षात्कार होता है। हम दोनोंका आविर्भाव उसीसे हुआ है—ऐसा जानकर हम दोनों उस सनातन परमात्माकी पूजा करते हैं ।। ४२ ।।
तं वेदाश्चाश्रमाश्चैव नानामतसमाश्रिताः ।
भक्त्या सम्पूजयन्त्याशु गतिं चैषां ददाति सः ॥ ४३ ॥
चारों वेद, चारों आश्रम तथा नाना प्रकारके मतोंका आश्रय लेनेवाले लोग भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं और वह इन सबको शीघ्र ही उत्तम गति प्रदान करता है ।। ४३ ।।
ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः ।
एतदभ्यधिकं तेषां यत् ते तं प्रविशन्त्युत ॥ ४४ ॥
जो सदा उसका स्मरण करते तथा अनन्य भावसे उसकी शरण लेते हैं, उन्हें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे उसके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ४४ ॥
इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्तितः ।
भक्त्या प्रेम्णा च विप्रर्षे अस्मद्भक्त्या च ते श्रुतः ॥ ४५ ॥
नारद! ब्रह्मर्षे! तुममें भगवान्के प्रति भक्ति और प्रेम है। हमलोगोंके प्रति भी तुम्हारा भक्तिभाव बना हुआ है। इसलिये हमने तुम्हारे सामने इस गोपनीय विषयका वर्णन किया है और तुम्हें इसे सुननेका शुभ अवसर मिला है ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/३ श्लोक हैं)