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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता

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द्विशततमोऽध्यायः

जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता

युधिष्ठिर उवाच

किमुत्तरं तदा तौ स्म चक्रतुस्तस्य भाषिते ।
ब्राह्मणो वाथवा राजा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! उस समय विरूपके पूर्वोक्त वचन कहनेपर ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकु उन दोनोंने उसे क्या उत्तर दिया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
अथवा तौ गतौ तत्र यदेतत् कीर्तितं त्वया ।
संवादो वा तयोः कोऽभूत् किं वा तौ तत्र चक्रतुः ॥ २ ॥
तथा आपने जो यह सद्योमुक्ति, क्रममुक्ति और लोकान्तरकी प्राप्तिरूप तीन प्रकारकी गति बतायी है, उनमेंसे वे दोनों किस गतिको प्राप्त हुए? उस समय उन दोनोंमें क्या बातचीत हुई और उन्होंने क्या किया? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

तथेत्येवं प्रतिश्रुत्य धर्मं सम्पूज्य च प्रभो ।
यमं कालं च मृत्युं च स्वर्गं सम्पूज्य चार्हतः ॥ ३ ॥
पूर्वं ये चापरे तत्र समेता ब्राह्मणर्षभाः ।
सर्वान् सम्पूज्य शिरसा राजानं सोऽब्रवीद् द्विजः ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— प्रभो! तब 'बहुत अच्छा' कहकर ब्राह्मणने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग—इन सभी पूजनीय देवताओंका पूजन किया। वहाँ पहलेसे जो ब्राह्मण मौजूद थे और दूसरे भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबके चरणोंमें सिर झुकाकर सबकी यथोचित पूजा करके ब्राह्मणने राजासे कहा— ॥ ३-४ ॥
फलेनानेन संयुक्तो राजर्षे गच्छ मुख्यताम् ।
भवता चाभ्यनुज्ञातो जपेयं भूय एव ह ॥ ५ ॥
'राजर्षे! इस फलसे संयुक्त होकर आप श्रेष्ठ गतिको प्राप्त कीजिये और आपकी आज्ञा लेकर मैं फिर जपमें लग जाऊँगा ॥ ५ ॥
वरश्च मम पूर्वं हि दत्तो देव्या महाबल ।
श्रद्धा ते जपतो नित्यं भवत्विति विशाम्पते ॥ ६ ॥

'महाबली प्रजानाथ! मुझे देवी सावित्रीने वर दिया है कि जपमें तुम्हारी नित्य श्रद्धा बनी रहेगी'॥ ६॥

राजोवाच

यद्येवमफला सिद्धिः श्रद्धा च जपितुं तव।
गच्छ विप्र मया सार्धं जापकं फलमाप्नुहि॥ ७॥
राजाने कहा— विप्रवर! यदि इस प्रकार मुझे फल समर्पण करनेके कारण आपको फलकी प्राप्ति नहीं हो रही है और पुनः जप करनेमें ही आपकी श्रद्धा होती है तो आप मेरे साथ ही चलें और जप-दानजनित फलको प्राप्त करें॥ ७॥

ब्राह्मण उवाच

कृतः प्रयत्नः सुमहान् सर्वेषां संनिधाविह।
सह तुल्यफलावावां गच्छावो यत्र नौ गतिः॥ ८॥
ब्राह्मणे कहा— राजन्! मैंने यहाँ सबके समीप आपको अपने जपका फल देनेके लिये महान् प्रयत्न किया है; फिर भी आपका आग्रह साथ-साथ फलका उपभोग करनेका रहा है; अतः हम दोनों समान फलके ही भागी हों। चलिये, जहाँतक हम दोनोंकी गति हो सके, साथ-साथ चलें॥ ८॥

भीष्म उवाच

व्यवसायं तयोस्तत्र विदित्वा त्रिदशेश्वरः।
सह देवैरुपययौ लोकपालैस्तथैव च॥ ९॥
साध्याश्च विश्वे मरुतो वाद्यानि सुमहान्ति च।
नद्यः शैलाः समुद्राश्च तीर्थानि विविधानि च॥ १०॥
तपांसि संयोगविधिर्वेदाः स्तोभाः सरस्वती।
नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहूहूः॥ ११॥
गन्धर्वश्चित्रसेनश्च परिवारगणैर्युतः।
नागाः सिद्धाश्च मुनयो देवदेवः प्रजापतिः॥ १२॥
विष्णुः सहस्रशीर्षश्च देवोऽचिन्त्यः समागमत्।
अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि वा विभो॥ १३॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवगण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित

चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे ।। ९–१३ ।।
पुष्पवर्षाणि दिव्यानि तत्र तेषां महात्मनाम् ।
ननृतुश्चाप्सरःसंघास्तत्र तत्र समन्ततः ।। १४ ।।
वहाँ उन महात्माओंपर दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगी। झुंडकी झुंड अप्सराएँ सब ओर नृत्य करने लगीं ।। १४ ।।
अथ स्वर्गस्तथा रूपी ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ।
संसिद्धस्त्वं महाभाग त्वं च सिद्धस्तथा नृप ।। १५ ।।
तदनन्तर मूर्तिमान् स्वर्गने ब्राह्मणसे कहा—‘महाभाग! तुम सिद्ध हो गये।’ फिर राजासे कहा—‘नरेश्वर! तुम भी सिद्ध हो गये’ ।। १५ ।।
अथ तौ सहितौ राजन्नन्योन्यविधिना ततः ।
विषयप्रतिसंहारमुभावेव प्रचक्रतुः ।। १६ ।।
राजन्! तदनन्तर वे दोनों एक-दूसरेका उपकार करते हुए एक साथ हो गये। उन्होंने एक ही साथ अपने मनको विषयोंकी ओरसे हटा लिया ।। १६ ।।
प्राणापानौ तथोदानं समानं व्यानमेव च ।
एवं तौ मनसि स्थाप्य दधतुः प्राणयोर्मनः ।। १७ ।।
उपस्थितकृतौ तौ च नासिकाग्रमधो भ्रुवोः ।
भ्रुकुट्या चैव मनसा शनैर्धारयतस्तदा ।। १८ ।।
तदनन्तर प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—इन पाँचों प्राण-वायुओंको हृदयमें स्थापित किया; इस प्रकार स्थित हुए उन दोनोंने मनको प्राण और अपानके साथ मिला दिया। भौहोंके नीचे नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए मनसहित प्राण-अपानको उन्होंने दोनों भौहोंके बीच स्थिर किया ।। १७-१८ ।।
निश्चेष्टाभ्यां शरीराभ्यां स्थिरदृष्टी समाहितौ ।
जितात्मानौ तथाऽऽधाय मूर्धन्यात्मानमेव च ।। १९ ।।
इस प्रकार मनको जीतकर दृष्टिको एकाग्र करके उन दोनोंने प्राणसहित मनको सुषुम्णा मार्गद्वारा मूर्धामें स्थापित कर दिया। फिर वे दोनों समाधिमें स्थित हो गये। उस समय उन दोनोंके शरीर जड़की भाँति चेष्टाहीन हो गये ।। १९ ।।
तालुदेशमथोद्वाल्य ब्राह्मणस्य महात्मनः ।
ज्योतिर्ज्याला सुमहती जगाम त्रिदिवं तदा ।। २० ।।
इसी समय महात्मा ब्राह्मणके तालुदेश (ब्रह्म-रन्ध्र) का भेदन करके एक ज्योतिर्मयी विशाल ज्वाला निकली और स्वर्गकी ओर चल दी ।। २० ।।
हाहाकारस्तथा दिक्षु सर्वेषां सुमहानभूत् ।

तज्ज्योतिः स्तूयमानं स्म ब्रह्माणं प्राविशत् तदा ।। २१ ।।
ततः स्वागतमित्याह तत् तेजः प्रपितामहः ।
प्रादेशमात्रं पुरुषं प्रत्युद्गम्य विशाम्पते ।। २२ ।।
फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् कोलाहल मच गया। उस ज्योतिकी सभी लोग स्तुति करने लगे। प्रजानाथ! प्रादेशके बराबर लंबे पुरुषका आकार धारण किये वह तेजःपुंज ब्रह्माजीके पास पहुँचा, तब ब्रह्माजीने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया ।। २१-२२ ।।
भूयश्चैवापरं प्राह वचनं मधुरं तदा ।
जापकैस्तुल्यफलता योगानां नात्र संशयः ।। २३ ।।
ब्रह्माजीने उस तेजोमय पुरुषका स्वागत करनेके पश्चात् पुनः उससे मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा—'विप्रवर! योगियोंको जो फल मिलता है, निस्संदेह वही फल जप करनेवालोंको भी प्राप्त होता है ।। २३ ।।