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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 711)

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कालकवृक्षीय मुनि राजा जनकका राजकुमार क्षेमदर्शीके साथ मेल करा रहे हैं

धर्मात्मनां क्वचिल्लोके नान्यास्ति गतिरीदृशी ।
महात्मा राजपुत्रोऽयं सतां मार्गमनुष्ठितः ॥ १३ ॥
'जगत्में धर्मात्मा राजाओंके लिये अच्छे मन्त्रीके समान दूसरी कोई गति नहीं है। यह राजकुमार महामना है। इसने सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय लिया है ॥ १३ ॥
सुसंगृहीतस्त्वेवैष त्वया धर्मपुरोगमः ।
संसेव्यमानः शत्रूंस्ते गृह्णीयान्महतो गणान् ॥ १४ ॥
'यदि तुमने धर्मको सामने रखकर इसे सम्मान-पूर्वक अपनाया तो तुमसे सेवित होकर यह तुम्हारे शत्रुओंके भारी-से-भारी समुदायोंको काबूमें कर सकता है ॥ १४ ॥
यद्ययं प्रतियुद्ध्येत् त्वां स्वकर्म क्षत्रियस्य तत् ।
जिगीषमाणस्त्वां युद्धे पितृपैतामहे पदे ॥ १५ ॥
'यदि यह अपने बाप-दादोंके राज्यके लिये युद्धमें तुम्हें जीतनेकी इच्छा रखकर तुम्हारे साथ संग्राम छेड़ दे तो क्षत्रियके लिये यह स्वधर्मका पालन ही होगा ॥ १५ ॥
त्वं चापि प्रतियुद्ध्येथा विजिगीषुव्रते स्थितः ।
अयुध्वैव नियोगान्मे वशे कुरु हिते स्थितः ॥ १६ ॥
उस समय तुम भी विजयाभिलाषी राजाके व्रतमें स्थित हो इसके साथ युद्ध करोगे ही। अतः मेरी आज्ञा मानकर इसके हित-साधनमें तत्पर हो जाओ और युद्ध किये बिना ही इसे वशमें कर लो ॥ १६ ॥
स त्वं धर्ममवेक्षस्व हित्वा लोभमसाम्प्रतम् ।
न च कामान्न च द्रोहात् स्वधर्मं हातुमर्हसि ॥ १७ ॥
'अनुचित लोभका परित्याग करके तुम धर्मपर ही दृष्टि रखो, कामना अथवा द्रोहसे भी अपने धर्मका परित्याग न करो ॥ १७ ॥
नैव नित्यं जयस्तात नैव नित्यं पराजयः ।
तस्माद् भोजयितव्यश्च भोक्तव्यश्च परो जनः ॥ १८ ॥
'तात! किसीकी भी न तो सदा जय होती है और न नित्य पराजय ही होती है। जैसे राजा दूसरे मनुष्योंको जीतकर उसका तथा उसकी सम्पत्तिका उपभोग करता है, वैसे ही दूसरोंको भी उसे अपनी सम्पत्ति भोगनेका अवसर देना चाहिये ॥ १८ ॥
आत्मन्यपि च संदृश्यावुभौ जयपराजयौ ।
निःशेषकारिणां तात निःशेषकरणाद् भयम् ॥ १९ ॥
'वत्स! अपनेमें भी जय और पराजय दोनोंको देखना चाहिये। जो दूसरोंकी सम्पत्ति छीनकर उसके पास कुछ भी शेष नहीं रहने देते, उन्हें उस सर्वस्वापहरणरूपी पापसे अपने लिये भी सदा भय बना रहता है' ॥ १९ ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं वचनं ब्राह्मणर्षभम् ।
प्रतिपूज्याभिसत्कृत्य पूजार्हमनुमान्य च ॥ २० ॥

मुनिके इस प्रकार कहनेपर राजाने उन पूजनीय ब्राह्मणशिरोमणि महर्षिका पूजन और आदर-सत्कार करके उनकी बातका अनुमोदन करते हुए इस तरह उत्तर दिया ॥ २० ॥
यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महाश्रुतः ।
श्रेयस्कामो यथा ब्रूयादुभयोरेव तत् क्षमम् ॥ २१ ॥
'कोई महाबुद्धिमान्-जैसी बात कह सकता है, कोई महाविद्वान्-जैसी वाणी बोल सकता है, तथा दूसरोंका कल्याण चाहनेवाला महापुरुष जैसा उपदेश दे सकता है, वैसी ही बात आपने कही है। यह हम दोनोंके लिये ही शिरोधार्य करने योग्य है ॥ २१ ॥
यद् यद् वचनमुक्तोऽस्मि करिष्यामि च तत् तथा ।
एतद्धि परमं श्रेयो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ २२ ॥
'भगवन्! आपने मेरे लिये जो-जो आदेश दिया है, उसका मैं उसी रूपमें पालन करूँगा। यह मेरे लिये परम कल्याणकी बात है। इसके सम्बन्धमें मुझे दूसरा कोई विचार नहीं करना है' ॥ २२ ॥
ततः कौसल्यमाहूय मैथिलो वाक्यमब्रवीत् ।
धर्मतो नीतितश्चैव लोकश्च विजितो मया ॥ २३ ॥
अहं त्वया चात्मगुणैर्जितः पार्थिवसत्तम ।
आत्मानमनवज्ञाय जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २४ ॥
तदनन्तर मिथिलानरेशने कोसल-राजकुमारको अपने निकट बुलाकर कहा—'नृपश्रेष्ठ! मैंने धर्म और नीतिका सहारा लेकर सम्पूर्ण जगत्पर विजय पायी है, परंतु आज तुमने अपने गुणोंसे मुझे भी जीत लिया। अतः तुम अपनी अवज्ञा न करके एक विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २३-२४ ॥
नावमन्यामि ते बुद्धिं नावमन्ये च पौरुषम् ।
नावमन्ये जयामीति जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २५ ॥
'मैं तुम्हारी बुद्धिका अनादर नहीं करता, तुम्हारे पुरुषार्थकी अवहेलना नहीं करता और विजयी हूँ, यह सोचकर तुम्हारा तिरस्कार भी नहीं करता; अतः तुम विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २५ ॥
यथावत् पूजितो राजन् गृहं गन्तासि मे भृशम् ।
ततः सम्पूज्य तौ विप्रं विश्वस्तौ जग्मतुर्गृहान् ॥ २६ ॥
'राजन्! तुम मेरेद्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर मेरे घर पधारो।' इतना कहकर वे दोनों परस्पर विश्वस्त हो उन ब्रह्मर्षिकी पूजा करके घरकी ओर चल दिये ॥ २६ ॥
वैदेहस्त्वथ कौसल्यं प्रवेश्य गृहमञ्जसा ।
पाद्यार्घ्यमधुपर्कैस्तं पूजार्हं प्रत्यपूजयत् ॥ २७ ॥
विदेहराजने कोसल-राजकुमारको आदरपूर्वक अपने महलके भीतर ले जाकर अपने उस पूजनीय अतिथिका पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा मधुपर्कके द्वारा पूजन

किया ।। २७ ।।

ददौ दुहितरं चास्मै रत्नानि विविधानि च ।
एष राज्ञां परो धर्मोऽनित्यौ जयपराजयौ ।। २८ ।।

तत्पश्चात् उनके साथ अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया और दहेजमें नाना प्रकारके रत्न भेंट किये। यही राजाओंका परम धर्म है, जय और पराजय तो अनित्य हैं ।। २८ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ।। १०६ ।।