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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

अध्याय (पृष्ठ 2333)

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एकत्रिंशोऽध्यायः

चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

ततस्तेषां महाराज तत्रैवामिततेजसाम् ।
छद्मलिङ्गप्रविष्टानां पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १ ॥
व्यतीतः समयः सम्यग् वसतां वै पुरोत्तमे ।
कुर्वतां तस्य कर्माणि विराटस्य महीपतेः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! उन दिनों छद्मवेषमें छिपकर उस श्रेष्ठ नगरमें रहते और महाराज विराटके कार्य सम्पादन करते हुए अतुलित तेजस्वी महात्मा पाण्डवोंका तेरहवाँ वर्ष भलीभाँति बीत चुका था ॥ १-२ ॥

कीचके तु हते राजा विराटः परवीरहा ।
परां सम्भावनां चक्रे कुन्तीपुत्रे युधिष्ठिरे ॥ ३ ॥
कीचकके मारे जानेपर शत्रुहन्ता राजा विराट कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके प्रति बड़ी आदरबुद्धि रखने और उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ करने लगे थे ॥ ३ ॥

ततस्त्रयोदशस्यान्ते तस्य वर्षस्य भारत ।
सुशर्मणा गृहीतं तद् गोधनं तरसा बहु ॥ ४ ॥
भारत! तदनन्तर तेरहवें वर्षके अन्तमें सुशर्माने बड़े वेगसे आक्रमण करके विराटकी बहुत-सी गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४ ॥

(ततः शब्दो महानासीद् रेणुश्च दिवमस्पृशत् ।
शङ्खदुन्दुभिघोषश्च भेरीणां च महास्वनः ॥
गवाश्वरथनागानां नराणां च पदातिनाम् ।
इससे उस समय बड़ा भारी कोलाहल मचा। धरतीकी धूल उड़कर ऊँचे आकाशमें व्याप्त हो गयी। शंख, दुन्दुभि तथा नगारोंके महान् शब्द सब ओर गूँज उठे। बैलों, घोड़ों, रथों, हाथियों तथा पैदल सैनिकोंकी आवाज सब ओर फैल गयी।

एवं तैस्त्वभिनिर्याय मत्स्यराजस्य गोधने ॥
त्रिगर्तैर्गृह्यमाणे तु गोपालाः प्रत्यषेधयन् ।
इस प्रकार इन सबके साथ आक्रमण करके जब त्रिगर्तदेशीय योद्धा मत्स्यराजके गोधनको लेकर जाने लगे, उस समय उन गौओंके रक्षकोंने उन सैनिकोंको रोका।

अथ त्रिगर्ता बहवः परिगृह्य धनं बहु ॥

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परिक्षिप्य हयैः शीघ्रै रथव्रातैश्च भारत ।
गोपालान् प्रत्ययुध्यन्त रणे कृत्वा जये धृतिम् ॥
ते हन्यमाना बहुभिः प्रासतोमरपाणिभिः ।
गोपाला गोकुले भक्ता वारयामासुरोजसा ।
परश्वधैश्च मुसलैर्भिन्दिपालैश्च मुद्गरैः ॥
गोपालाः कर्षणाैश्चित्रैर्जघ्नुरश्वान् समन्ततः ।
भारत! तब त्रिगर्तोंने बहुत-सा धन लेकर उसे अपने अधिकारमें करके शीघ्रगामी अश्वों तथा रथसमूहोंद्वारा युद्धमें विजयका दृढ़ संकल्प लेकर उन गोरक्षकोंका सामना करना आरम्भ किया। त्रिगर्तोंकी संख्या बहुत थी। वे हाथोंमें प्रास और तोमर लेकर विराटके ग्वालोंको मारने लगे; तथापि गोसमुदायके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले वे ग्वाले बलपूर्वक उन्हें रोके रहे। उन्होंने फरसे, मूसल, भिन्दिपाल, मुद्गर तथा 'कर्षण' नामक विचित्र शस्त्रोंद्वारा सब ओरसे शत्रुओंके अश्वोंको मार भगाया।
ते हन्यमानाः संक्रुद्धास्त्रिगर्ता रथयोधिनः ॥
विसृज्य शरवर्षाणि गोपिन् व्यद्रावयन् रणे ।)
ग्वालोंके आघातसे अत्यन्त कुपित हो रथोंद्वारा युद्ध करनेवाले त्रिगर्तसैनिक बाणोंकी वर्षा करके उन ग्वालोंको रणभूमिसे खदेड़ने लगे।
ततो जवेन महता गोपः पुरमथाव्रजत् ।
स दृष्ट्वा मत्स्यराजं च रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली ॥ ५ ॥
तब उन गौओंका रक्षक गोप, जिसने कानोंमें कुण्डल पहन रखे थे, रथपर आरूढ़ हो तीव्र गतिसे नगरमें आया और मत्स्यराजको देखकर दूरसे ही रथसे उतर पड़ा ।। ५ ।।
शूरैः परिवृतं योधैः कुण्डलाङ्गदधारिभिः ।
संवृतं मन्त्रिभिः सार्धं पाण्डवैश्च महात्मभिः ॥ ६ ॥
तं सभायां महाराजमासीनं राष्ट्रवर्धनम् ।
अपने राष्ट्रकी उन्नति करनेवाले महाराज विराट कुण्डल तथा अंगद (बाजूबन्द)-धारी शूरवीर योद्धाओंसे घिरकर मन्त्रियों तथा महात्मा पाण्डवोंके साथ राजसभामें बैठे थे ।। ६ १/२ ।।
सोऽब्रवीदुपसंगम्य विराटं प्रणतस्तदा ॥ ७ ॥
अस्मान् युधि विनिर्जित्य परिभूय सबान्धवान् ।
गवां शतसहस्राणि त्रिगर्ताः कालयन्ति ते ॥ ८ ॥
उस समय उनके पास जाकर गोपने प्रणाम करके कहा—'महाराज! त्रिगर्तदेशके सैनिक हमें युद्धमें जीतकर और भाई-बन्धुओंसहित हमारा तिरस्कार करके आपकी लाखों गौओंको हाँककर लिये जा रहे हैं ।। ७-८ ।।
तान् परीप्सस्व राजेन्द्र मा नेशुः पशवस्तव ।

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तच्छ्रुत्वा नृपतिः सेनां मत्स्यानां समयोजयत् ।। ९ ।।

'राजेन्द्र! उन्हें वापस लेने—छुड़ानेकी चेष्टा कीजिये; जिससे आपके वे पशु नष्ट न हो

जायँ—आपके हाथोंसे दूर न निकल जायँ।' यह सुनकर राजाने मत्स्यदेशकी सेना एकत्र

की ।। ९ ।।

रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् ।

राजानो राजपुत्राश्च तनुत्राण्यथ भेजिरे ।। १० ।।

उसमें रथ, हाथी, घोड़े और पैदल—सब प्रकारके सैनिक भरे थे और वह सेना ध्वजा-

पताकाओंसे व्याप्त थी। फिर राजा तथा राजकुमारोंने पृथक्-पृथक् कवच धारण

किये ।। १० ।।

भानुमन्ति विचित्राणि शूरसेव्यानि भागशः ।

सवज्रायसगर्भं तु कवचं तत्र काञ्चनम् ।। ११ ।।

विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीकोऽभ्यहारयत् ।

वे कवच बड़े चमकीले, विचित्र और शूरवीरोंके धारण करने योग्य थे। राजा विराटके

प्रिय भाई शतानीकने सुवर्णमय कवच ग्रहण किया, जिसके भीतर हीरे और लोहेकी

जालियाँ लगी थीं ।। ११ १/२ ।।

सर्वपारसवं वर्म कल्याणपटलं दृढम् ।। १२ ।।

शतानीकादवरजो मदिराक्षोऽभ्यहारयत् ।

शतानीकसे छोटे भाईका नाम मदिराक्ष था। उन्होंने सुवर्णपत्रसे आच्छादित सुदृढ़

कवच धारण किया, जो सारा-का-सारा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको सहन करनेमें समर्थ

फौलादका बना हुआ था ।। १२ १/२ ।।

शतसूर्यं शतावर्तं शतबिन्दु शताक्षिमत् ।। १३ ।।

अभेद्यकल्पं मत्स्यानां राजा कवचमाहरत् ।

उत्सेधे यस्य पद्मानि शतं सौगन्धिकानि च ।। १४ ।।

मत्स्यदेशके राजा विराटने अभेद्यकल्प नामक कवच ग्रहण किया, जो किसी भी अस्त्र-

शस्त्रसे कट नहीं सकता था। उसमें सूर्यके समान चमकीली सौ फूलियाँ लगी थीं, सौ भँवरें

बनी थीं, सौ बिन्दु (सूक्ष्म चक्र) और सौ नेत्रके समान आकारवाले चक्र बने थे। इसके सिवा

उसमें नीचेसे ऊपरतक सौगन्धिक (कह्लार) जातिके सौ कमलोंकी आकृतियाँ पंक्तिबद्ध

बनी हुई थीं ।। १३-१४ ।।

सुवर्णपृष्ठं सूर्याभं सूर्यदत्तोऽभ्यहारयत् ।

दृढमायसगर्भं च श्वेतं वर्म शताक्षिमत् ।। १५ ।।

विराटस्य सुतो ज्येष्ठो वीरः शङ्खोऽभ्यहारयत् ।

सेनापति सूर्यदत्त (शतानीक)-ने पृष्ठभागमें सुवर्णजटित एवं सूर्यके समान चमकीला

कवच पहन रखा था। विराटके ज्येष्ठ पुत्र वीरवर शंखने श्वेत रंगका एक सुदृढ़ कवच धारण

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किया, जिसके भीतरी भागमें लोहा लगा था और ऊपर नेत्रके समान सौ चिह्न बने हुए थे ।।

शतशश्च तनुत्राणि यथास्वं ते महारथाः ॥ १६ ॥
योत्स्यमाना अनह्यन्त देवरूपाः प्रहारिणः ।
इसी प्रकार सैकड़ों देवताओंके समान रूपवान् महारथियोंने युद्धके लिये उद्यत हो अपने-अपने वैभवके अनुसार कवच पहन लिये। वे सब-के-सब प्रहार करनेमें कुशल थे ॥ १६ १/२ ॥

सूपस्करेषु शुभ्रेषु महत्सु च महारथाः ॥ १७ ॥
पृथक् काञ्चनसंनाहान् रथेष्वश्वानयोजयन् ।
उन महारथियोंने सुन्दर पहियोंवाले विशाल एवं उज्ज्वल रथोंमें पृथक्-पृथक् सोनेके बख्तर धारण कराये हुए घोड़ोंको जोता ॥ १७ १/२ ॥

सूर्यचन्द्रप्रतीकाशे रथे दिव्ये हिरण्मये ॥ १८ ॥
महानुभावो मत्स्यस्य ध्वज उच्छिश्रिये तदा ।
मत्स्यराजके सुवर्णमय दिव्य रथमें, जो सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहा था, उस समय बहुत ऊँची ध्वजा फहराने लगी ॥ १८ १/२ ॥

अथान्यान् विविधाकारान् ध्वजान् हेमपरिष्कृतान् ॥ १९ ॥
यथास्वं क्षत्रियाः शूरा रथेषु समयोजयन् ।
इसी प्रकार अन्य शूरवीर क्षत्रियोंने अपने-अपने रथोंमें यथाशक्ति सुवर्णमण्डित नाना प्रकारकी ध्वजाएँ फहरायीं ॥

(रथेषु युज्यमानेषु कङ्को राजानमब्रवीत् ।
मयाप्यस्त्रं चतुर्मार्गमवाप्तमृषिसत्तमात् ॥
दंशितो रथमास्थाय पदं निर्यामहं गवाम् ।
अयं च बलवाञ्छूरो बल्लवो दृश्यतेऽनघ ॥
गोसंख्यमश्वबन्धं च रथेषु समयोजय ।
नैते न जातु युध्येयुर्गवार्थमिति मे मतिः ॥)

अथ मत्स्योऽब्रवीद् राजा शतानीकं जघन्यजम् ॥ २० ॥
जब रथ जोते जा रहे थे, उस समय कंकने राजा विराटसे कहा—'मैंने भी एक श्रेष्ठ महर्षिसे चार मार्गोंवाले धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है, अतः मैं भी कवच धारण करके रथपर बैठकर गौओंके पदचिह्नोंका अनुसरण करूँगा। निष्पाप नरेश! यह बल्लव नामक रसोइया भी बलवान् एवं शूरवीर दिखायी देता है, इसे गौओंकी गणना करनेवाले गोशालाध्यक्ष तन्तिपाल तथा अश्वोंकी शिक्षाका प्रबन्ध करनेवाले ग्रन्थिकको भी रथोंपर बिठा दीजिये। मेरा विश्वास है कि ये गौओंके लिये युद्ध करनेसे कदापि मुँह नहीं मोड़ सकते।'
तदनन्तर मत्स्यराजने अपने छोटे भाई शतानीकसे कहा— ॥ २० ॥

कङ्कबल्लवगोपाला दामग्रन्थिश्च वीर्यवान् ।

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युद्धयेयुरिति मे बुद्धिवर्तते नात्र संशयः ॥ २१ ॥
‘भैया! मेरे विचारमें यह बात आती है कि ये कंक, बल्लव, तन्तिपाल और ग्रन्थिक भी युद्ध कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
एतेषामपि दीयन्तां रथा ध्वजपताकिनः ।
कवचानि च चित्राणि दृढानि च मृदूनि च ॥ २२ ॥
प्रतिमुञ्चन्तु गात्रेषु दीयन्तामायुधानि च ।
वीराङ्गरूपाः पुरुषा नागराजकरोपमाः ॥ २३ ॥
‘अतः इनके लिये भी ध्वजा और पताकाओंसे सुशोभित रथ दो। ये भी अपने अंगोंमें ऊपरसे दृढ़, किंतु भीतरसे कोमल और विचित्र कवच धारण कर लें। फिर इन्हें भी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र अर्पित करो। इनके अंग और स्वरूप वीरोचित जान पड़ते हैं। इन वीर पुरुषोंकी भुजाएँ गजराजकी सूँड़दण्डकी भाँति शोभा पाती हैं ॥ २२-२३ ॥
नेमे जातु न युध्येरन्निति मे धीयते मतिः ।
एतच्छ्रुत्वा तु नृपतेर्वाक्यं त्वरितमानसः ।
शतानीकस्तु पार्थेभ्यो रथान् राजन् समादिशत् ॥ २४ ॥
‘ये युद्ध न करते हों, यह कदापि सम्भव नहीं अर्थात् ये अवश्य युद्धकुशल हैं। मेरी बुद्धिका तो ऐसा ही निश्चय है।'
जनमेजय! राजाका यह वचन सुनकर शतानीकने उतावले मनसे कुन्तीपुत्रोंके लिये शीघ्रतापूर्वक रथ लानेका आदेश दिया ॥ २४ ॥
सहदेवाय राज्ञे च भीमाय नकुलाय च ।
तान् प्रहृष्टांस्ततः सूता राजभक्तिपुरस्कृताः ॥ २५ ॥
निर्दिष्टा नरदेवेन रथाञ्छीघ्रमयोजयन् ।
सहदेव, राजा युधिष्ठिर, भीम और नकुल—इन चारोंके लिये रथ लानेकी आज्ञा हुई। इस बातसे पाण्डव बड़े प्रसन्न थे। तब राजभक्त सारथि महाराज विराटके बताये अनुसार रथोंको शीघ्रतापूर्वक जोतकर ले आये ॥
कवचानि विचित्राणि मृदूनि च दृढानि च ॥ २६ ॥
विराटः प्रादिशद् यानि तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
तान्यामुच्य शरीरेषु दंशितास्ते परंतपाः ॥ २७ ॥
उसके बाद अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले पाण्डुपुत्रोंको राजा विराटने अपने हाथसे विचित्र कवच प्रदान किये, जो ऊपरसे सुदृढ़ और भीतरसे कोमल थे। उन्हें लेकर उन वीरोंने अपने अंगोंमें यथास्थान बाँध लिया ॥ २६-२७ ॥
रथान् हयैः सुसम्पन्नानास्थाय च नरोत्तमाः ।
निर्ययुर्मुदिताः पार्थाः शत्रुसंघावमर्दिनः ॥ २८ ॥

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शत्रुसमूहको रौंद डालनेवाले वे नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र घोड़े जुते हुए रथोंपर बैठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजभवनसे बाहर निकले ॥ २८ ॥

तरस्विनश्छन्नरूपाः सर्वे युद्धविशारदाः ।
रथान् हेमपरिच्छन्नानास्थाय च महारथाः ॥ २९ ॥
विराटमन्वयुः पार्थाः सहिताः कुरुपुङ्गवाः ।
चत्वारो भ्रातरः शूराः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ॥ ३० ॥

वे बड़े वेगसे चले। उन्होंने अपने यथार्थ स्वरूपको अभीतक छिपा रखा था। वे सब-के-सब युद्धकी कलामें अत्यन्त निपुण थे। कुरुवंशशिरोमणि वे चारों महारथी कुन्तीकुमार सुवर्णमण्डित रथोंपर आरूढ़ हो एक ही साथ विराटके पीछे-पीछे चले। चारों भाई पाण्डव शूरवीर और सत्यपराक्रमी थे ॥ २९-३० ॥

(दीर्घाणां च दृढानां च धनुषां ते यथाबलम् ।
उत्कृष्य पाशान् मौर्वीणां वीराश्चापेष्वयोजयन् ॥
ततः सुवाससः सर्वे ते वीराश्चन्दनोक्षिताः ।
चोदिता नरदेवेन क्षिप्रमश्वानचोदयन् ॥
ते हया हेमसंच्छन्ना बृहन्तः साधुवाहिनः ।
चोदिताः प्रत्यदृश्यन्त पक्षिणामिव पङ्क्तयः ॥)

उन वीरोंने अपने विशाल और सुदृढ़ धनुषोंकी डोरियोंको यथाशक्ति ऊपर खींचकर धनुषके दूसरे सिरेपर चढ़ाया। फिर सुन्दर वस्त्र धारण करके चन्दनसे चर्चित हो उन समस्त वीर पाण्डवोंने नरदेव विराटकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े हाँक दिये। अच्छी तरह रथका भार वहन करनेवाले वे स्वर्णभूषित विशाल अश्व हाँके जानेपर श्रेणीबद्ध होकर उड़ते हुए पक्षियोंके समान दिखायी देने लगे।

भीमाश्च मत्तमातङ्गाः प्रभिन्नकरटामुखाः ।
क्षरन्तश्चैव नागेन्द्राः सुदन्ताः षष्टिहायनाः ॥ ३१ ॥
स्वारूढा युद्धकुशलैः शिक्षिता हस्तिसादिभिः ।
राजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः ॥ ३२ ॥

जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती थी, ऐसे भयंकर मतवाले हाथी तथा सुन्दर दाँतोंवाले साठ वर्षके मदवर्षी गजराज, जिन्हें युद्धकुशल महावतोंने शिक्षा दी थी, सवारोंको अपनी पीठपर चढ़ाये राजा विराटके पीछे-पीछे इस प्रकार जा रहे थे, मानो चलते-फिरते पर्वत हों ॥ ३१-३२ ॥

विशारदानां मुख्यानां हृष्टानां चारुजीविनाम् ।
अष्टौ रथसहस्राणि दश नागशतानि च ॥ ३३ ॥
षष्टिश्चाश्वसहस्राणि मत्स्यानामभिनिर्ययुः ।
तदनीकं विराटस्य शुशुभे भरतर्षभ ॥ ३४ ॥

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युद्धकी कलामें कुशल, प्रसन्न रहनेवाले तथा उत्तम जीविकावाले मत्स्यदेशके प्रधान-प्रधान वीरोंकी उस सेनामें आठ हजार रथी, एक हजार हाथीसवार तथा साठ हजार घुड़सवार थे, जो युद्धके लिये तैयार होकर निकले थे। भरतर्षभ! उनसे विराटकी वह विशाल वाहिनी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी॥ ३३-३४॥

सम्प्रयातं तदा राजन् निरीक्षन्तं गवां पदम्।
तद् बलाग्रयं विराटस्य सम्प्रस्थितमशोभत।
दृढायुधजनाकीर्णं गजाश्वरथसंकुलम्॥ ३५॥

राजन्! उस समय गौओंके पदचिह्न देखती युद्धके लिये प्रस्थित हुई विराटकी वह श्रेष्ठ सेना अपूर्व शोभा पा रही थी। उसमें ऐसे पैदल सैनिक भरे थे, जिनके हाथोंमें मजबूत हथियार थे। साथ ही हाथी, घोड़े तथा रथके सवारोंसे भी वह सेना परिपूर्ण थी॥ ३५॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे मत्स्यराजरणोद्योगे
एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिण दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें मत्स्यराजविराटके युद्धोद्योगसे सम्बद्ध इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं।)