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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

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प्र० १७७ : अ० १ ] शत्रु-वध के प्रयोग ७४३

(१) चण्डालाग्निं च मांसेन चिताग्निं मानुषेण च ।
समस्तान् बस्तवसया मानुषेण ध्रुवेण च ॥
जुहुयादग्निमन्त्रेण राजवृक्षकदारुभिः ।
एष निष्प्रतिकारोऽग्निर्द्विषतां नेत्रमोहनः ॥
(२) अदिते ! नमस्ते, अनुमते ! नमस्ते, सरस्वति ! नमस्ते, देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा ।

इति औपनिषदिके चतुर्दशाऽधिकरणे परघातप्रयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितः पञ्चचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


किया जाय, व्यभिचारिणी स्त्री के घर से लायी गयी अग्नि में सरसों से हवन किया जाय; सूतिका गृह से लायी गयी अग्नि में दही से हवन किया जाय; अग्निहोत्री के घर से लायी गयी अग्नि में चावलों से हवन किया जाय ।

( १ ) चांडाल के यहाँ से लायी गयी अग्नि में मांस से हवन किया जाय; चिता से लायी गयी अग्नि में मनुष्य से हवन किया जाय; और तदनंतर इन सब अग्नियों को एकत्र करके उनमें बकरी की चर्बी से सूखी बरगद की लकड़ी से हवन किया जाय; तदनन्तर अग्नि के स्तुतिवाचक मंत्रों द्वारा अमलतास की लकड़ियों द्वारा हवन किया जाय । इस प्रकार की अग्नि का फिर कोई प्रतीकार नहीं है । यह अग्नि केवल दुर्ग आदि को ही नहीं जलाती, वरन् उसको देखने मात्र से ही शत्रुओं की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ।

( २ ) इन मंत्रों से हवन किया जाय—आदिते ! नमस्ते । अनुमते ! नमस्ते । सरस्वति ! नमस्ते । देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा । सोमाय स्वाहा । भूः स्वाहा । भुवः स्वाहा ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में परघातप्रयोग नामक पहला अध्याय समाप्त

—: ० :—

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प्रकरण १७८प्रलम्भने अद्भुतोत्पादनम्
अध्याय २

(१) शिरीषोडुम्बरशमीचूर्णं सर्पिषा संहृत्यार्धमासिकक्षुद्योगः ।
(२) कशेरुकोत्पलकन्देक्षुमूलबिसदूर्वाक्षीरघृतमण्डसिद्धो मासिकः ।
(३) माषयवकुलत्थदर्भमूलचूर्णं वा क्षीरघृताभ्यां, वल्लीक्षीरघृतं वा समसिद्धं सालपृश्निपर्णीमूलकल्कं पयसा पीत्वा, पयो वा तत्सिद्धं मधुघृताभ्यामशित्वा, मासमुपवसति ।
(४) श्वेतबस्तमूत्रे सप्तरात्रोषितैः सिद्धार्थकैः सिद्धं तैलं कटुकालाबौ मासार्धमासस्थितं चतुष्पदद्विपदानां विरूपकरणम् ।
(५) तक्रयवभक्षस्य सप्तरात्रादूर्ध्वं श्वेतगर्दभस्य लण्डयवैः सिद्धं गौरसर्षपतैलं विरूपकरणम् ।


प्रलम्भन योग में अद्भुत उत्पादन

( १ ) सिरण ( शिरीष ), गूलर और शमी इन तीनों के चूर्ण को घी के साथ मिलाकर खाने से पन्द्रह दिन तक भूख नहीं लगती है ।

( २ ) कसेरु, कमल की जड़, गन्ने की जड़, कमल डंडी, दूब, दूध, घी और मांड, इन सबको एक साथ मिलाकर खाने से एक महीने तक भूख नहीं लगती है ।

( ३ ) उड़द, जौ, कुलथी और कुशा की जड़ इन सब को दूध-घी के साथ मिलाकर पीने से एक मास तक भूखा रहा जा सकता है; अथवा अजमोद, दूध और घी को बराबर मिलाकर पी लेने पर भी एक महीने तक भूख नहीं लगती है । इसी प्रकार शालपर्णी ( सालवन ) और पृश्निपर्णी ( पिठवन ) की जड़ों के कल्क को दूध के साथ पीने से या शालपर्णी और पृश्निपर्णी के साथ दूध को पकाकर उसे शहद के साथ खाने से भी एक मास तक भूख नहीं लगती है ।

( ४ ) यदि सफेद बकरे के पेशाब में सात रात तक रखी हुई सरसों से निकाला हुआ तेल एक मास या पंद्रह दिन तक तूम्बी में रखा जाय तो उसके बाद जिन चौपायों या दुपायों पर वह तेल लगाया जायेगा, उनका रूप बदल जायेगा; इसको विरूपकरण ( दूसरा रूप बनाना ) योग कहते हैं ।

( ५ ) इसी तरह किसी आदमी को यदि सात दिन तक मट्ठा और जौ खिलाकर सफेद गधे की लीद तथा जौ के साथ पकाये हुये सफेद सरसों के तेल को लगाने या खाने को दिया जाय तो उसकी शक्ल बदल जाती है ।

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प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४५

(१) एतयोरन्यतरस्य मूत्रलण्डरससिद्धं सिद्धार्थकतैलमर्कतूलपतङ्ग-चूर्णप्रतिवापं श्वेतीकरणम् ।
(२) श्वेतकुक्कुटाजगरलण्डयोगः श्वेतीकरणम् ।
(३) श्वेतबस्तमूत्रे श्वेतसर्षपाः सप्तरात्रोषितास्तक्रमर्कक्षीरमर्कतूल-कटुकमत्स्यविडङ्गाश्च । एष पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ।
(४) समुद्रमण्डूकीशङ्खसुधाकदलीक्षारतक्रयोगः श्वेतीकरणम् ।
(५) कदल्यवल्गुजक्षाररसशुक्ताः सुरायुक्तास्तक्रार्कतूलस्नुहिलवणं धान्याम्लं च पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ।
(६) कटुकालाबौ वल्लीगते नगरमर्धमासस्थितं गौरसर्षपपिष्टं रोम्णां श्वेतीकरणम् ।
(७) अर्कतूलोऽर्जुने कीटः श्‍वेता च गृहगौलिका ।
एतेन पिष्टेनाभ्यक्ताः केशाः स्युः शङ्खपाण्डराः ॥


( १ ) सफेद गधा या सफेद बकरे के पेशाब तथा लीद के रस के साथ पकाये हुए सरसों के तेल को आक, पलास, पीपल और धान के चूर्ण के साथ मिलाकर श्वेतीकरण योग बनाया जाता है, इसके लगाने या खाने से शक्ल-सूरत सफेद हो जाती है ।

( २ ) सफेद मुर्गा और अजगर साँप, इन दोनों की विष्ठा को मिलाकर तैयार किया हुआ योग भी सफेद बना देता है ।

( ३ ) यदि सफेद बकरे के पेशाब में सात रात तक सफेद सरसों को रखा जाय और तदनन्तर पन्द्रह दिन तक उस सरसों को मठा, आक का दूध, आक, पारस पीपल, कड़वा परवल ( पटोल ), मछली तथा वायबिडंग के चूर्ण के साथ मिलाकर बनाया जाय तो वह भी आकृति को सफेद बना देता है ।

( ४ ) समुद्री मेढकी, शंख, सुधा, केला, जवाखार और मठा, इन सब चीजों का योग भी सफेद कर देता है ।

( ५ ) केला, बाकुची, जवाखार, पारा, और कोई खट्टा फल, इन सबको शराब में भिगो दिया जाय, तदनन्तर छाछ, आक, पारसपीपल, सेंहुड़, नमक और कंजा को उसमें मिलाकर पंद्रह दिन तक रखा रहने दिया जाय । इस तरह का योग भी सफेद बना देता है ।

( ६ ) बेल में लगी हुई कड़वी तूम्बी में सोंठ भरकर उसे पंद्रह दिन तक रख दिया जाय और बाद में उसको बंगा सरसों के साथ पीस लिया जाय, यह भी श्वेतीकरण योग है ।

( ७ ) आक, पारसपीपल, अर्जुन कीट और सफेद छिपकली, इन सबको एक साथ पीस कर यदि बालों में लगाया जाय तो बाल शंख के समान श्वेत हो जाते हैं ।

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७४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) गोमयेन तिन्दुकारिष्टकल्केन मर्दिताङ्गस्य भल्लातकरसानुलिप्तस्य मासिकः कुष्ठयोगः ।
(२) कृष्णसर्पमुखे गृहगौलिकामुखे वा सप्तरात्रोषिता गुञ्जाः कुष्ठयोगः ।
(३) शुकपित्ताण्डरसाभ्यङ्गः कुष्ठयोगः ।
(४) कुष्ठस्य प्रियालकल्ककषायः प्रतीकारः ।
(५) कुक्कुटीकोशातकीशतावरीमूलयुक्तमाहारयमाणो मासेन गौरो भवति ।
(६) वटकषायस्नातः सहचरकल्कदिग्धः कृष्णो भवति ।
(७) शकुनकङ्गुतैलयुक्ता हरितालमनःशिलाः श्यामीकरणम् ।
(८) खद्योतचूर्णं सर्षपतैलयुक्तं रात्रौ ज्वलति ।
(९) खद्योतगण्डूपदचूर्णं समुद्रजन्तूनां भृङ्गकपालानां खदिरकर्णिकाराणां पुष्पचूर्णं वा शकुनकङ्गुतैलयुक्तं तेजनचूर्णं पारिभद्रकत्वङ्मषी मण्डूकवसया युक्ता गात्रप्रज्वलनमग्निना ।


( १ ) गोबर, छोटा तेंदुआ और नीम के कल्क से शरीर पर मालिश करने के बाद, यदि भिलावा और पारा मिला कर शरीर में लगा दिया जाय तो एक महीने के अन्दर कोढ़ उपज आता है ।

( २ ) काले सांप के या छिपकली के मुँह में सात रात तक रखी हुई रत्ती को यदि देह पर रगड़ा जाय तो कोढ़ हो जाता है ।

( ३ ) तोते के पित्ते तथा अंडे के रस से शरीर पर मालिश करने से कोढ़ हो जाता है ।

( ४ ) चिरौंजी के कल्क से बनाया हुआ काढ़ा कुष्ठ रोग का प्रतीकार है ।

( ५ ) मुर्गी, कड़वी तोरई, परवल और शतावरी की जड़ को एक मास तक खाने से शरीर गौरवर्ण हो जाता है ।

( ६ ) यदि बरगद के काढ़े से स्नान कर फिर पियाबांस के कल्क की मालिश की जाय तो शरीर काला पड़ जाता है ।

( ७ ) गिद्ध और काँगनी के तेल में हड़ताल तथा मैनसिल मिलाकर मालिश करने से भी शरीर साँवला हो जाता है ।

( ८ ) यदि जुगुन्तू का चूर्ण सरसों के तेल के साथ मिला दिया जाय तो वह रात में जलने लगता है ।

( ९ ) जुगनू और गेंहुए का चूर्ण तथा इसी प्रकार के छोटे-छोटे समुद्री जानवरों का चूर्ण भृंग नामक पक्षी के सिर की हड्डियों का चूर्ण, खैर तथा कनेर के फूलों का चूर्ण, गिद्ध तथा कांगनी के तेल में मिला बांस का चूर्ण और मेढ़क की चर्बी से मिली

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प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४७

(१) पारिभद्रकत्वग्वज्रकदलीतिलकल्कप्रदिग्धं शरीरमग्निना ज्वलति ।
(२) पीलुत्वङ्मषीमयः पिण्डो हस्ते ज्वलति । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति ।
(३) तेन प्रदिग्धमङ्गं कुशाम्रफलतैलसिक्तं समुद्रमण्डूकीफेनकसर्जरस-चूर्णयुक्तं वा ज्वलति ।
(४) मण्डूकवसासिद्धेन पयसा कुलीरादीनां वसया समभागं तैलं सिद्ध-मभ्यङ्गो गात्राणामग्निप्रज्वालनम् । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति ।
(५) वेणूमूलशैवललिप्तमङ्गं मण्डूकवसादिग्धमग्निना ज्वलति ।
(६) पारिभद्रकप्रतिबलावञ्जुलवज्रकदलीमूलकल्केन मण्डूकवसा-दिग्धेन तैलेनाभ्यक्तपादोऽङ्गारेषु गच्छति ।
(७) उपोदका प्रतिबला वञ्जुलः पारिभद्रकः ।
एतेषां मूलकल्केन मण्डूकवसया सह ॥


नीम की छाल की स्याही, इनमें से प्रत्येक चूर्ण को देह पर मलने से बिना किसी पीड़ा या जलन के शरीर पर आग जलने लगती है ।

( १ ) नीम की छाल, थूहर, केला और तिल के कल्क से पोते हुए शरीर पर बिना किसी पीड़ा के अग्नि जलने लगती है ।

( २ ) पीलु वृक्ष की छाल की स्याही का बना हुआ गोला, बिना अग्नि-संसर्ग के ही, हाथ में जलने लगता है। मेढक की चर्बी से सना हुआ वही गोला आग के संसर्ग से जलने लगता है।

( ३ ) उस गोले को अंग में लपेट कर कुशा के तेल और आम की गुठली के तेल से शरीर में चुपड़े अथवा समुद्री मेढ़की, समुद्रफेन और राल, इन सब के चूर्ण को देह में लगाया जाय तो अग्नि का संसर्ग होते ही देह जलने लगती है ।

( ४ ) मेढ़क की चर्बी के साथ पके हुए दूध तथा केंकड़े की चर्बी में उतना ही तेल मिलाकर यदि उससे मालिश की जाय तो शरीर में अग्नि की लपटें उठने लगती हैं । मेढ़क की चर्बी से सना हुआ व्यक्ति अग्नि का संसर्ग पाते ही जल उठता है ।

( ५ ) बाँस की जड़ और सेंवार से लिपा हुआ अंग तथा मेढक की चर्बी से लिपा हुआ अंग अग्नि के संसर्ग से जलने लगता है ।

( ६ ) नीम ( पारिभद्रक ), खरेंटी ( प्रतिबला ), वंजुल ( तेंदुआ, बेत, अशोक ) थूहर और केला, इन सब पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर तथा उसमें मेढक की चर्बी एवं तेल मिला लिया जाय और तब उस योग की पैरों में मालिस की जाय तो अंगारों कें ऊपर चला जा सकता है ।

( ७ ) पोदीना ( उपोदका ), खरेंटी, वंजुल और नीम, इनके पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर उसमें मेढक की चर्बी मिला दी जाय तो उस तेल का साफ पैरों

७४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

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७४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

साधयेत्तैलमेतेन पादावभ्यज्य निर्मलौ ।
अङ्गारराशौ विचरेद्यथा कुसुमसञ्चये ॥
(१) हंसक्रौञ्चमयूराणामन्येषां वा महाशकुनीनामुदकप्लवानां पुच्छेषु बद्धा नलदीपिका रात्रावुल्कादर्शनम् ।
(२) वैद्युतं भस्माग्निशमनम् ।
(३) स्त्रीपुष्पपायिता माषा व्रजकुलीमूलं मण्डूकवसामिश्रं चुल्ल्यां दीप्तायामपाचनम् । चुल्लीशोधनं प्रतीकारः ।
(४) पीलुमयो मणिरग्निगर्भः सुवर्चलामूलग्रन्थिः सूत्रग्रन्थिर्वा पिचुपरिवेष्टितो मुखादग्निधूमोत्सर्गः ।
(५) कुशाम्रफलतैलसिक्तोऽग्निर्वर्षप्रवातेषु ज्वलति ।
(६) समुद्रफेनकस्तैलयुक्तोऽम्भसि प्लवमानो ज्वलति ।
(७) प्लवङ्गमानामस्थिषु कल्माषवेणुना निर्मथितोऽग्निर्नोदकेन शाम्यति, उदकेन च ज्वलति ।


में मालिश करने से धधकते अंगारों के ढेर में वैसे ही घूमा जा सकता है, जैसे कि फूलों के ढेर में ।

( १ ) यदि हंस, क्रौंच, मयूर और अन्य बत्तख आदि जलचर पक्षियों की पूंछों पर नलदीपिका ( नरकट पर रखी हुई छोटी-सी जलती हुई बत्ती ) लगायी जाय तो वह रात में दूर से भयप्रद उल्का के समान दिखाई देती है ।

( २ ) बिजली गिरने से जली हुई लकड़ी की राख अग्नि को शांत कर देती है ।

( ३ ) स्त्री के रज से मिले हुए उड़द और मेढक की चर्बी से मिली हुई गोष्ठ ( गायों की जगह ) में पैदा होने वाली बड़े कटहल की जड़, इन दोनों को आग पर चढ़ाकर कितना भी पकाया जाय, पर नहीं पकती । चूल्हे से उतार कर इनको साफ कर देना ही इनका प्रतीकार है ।

( ४ ) पीलु की लकड़ी से बना हुआ मटका अग्निगर्भ ( तत्काल ही अग्नि को खींचने वाला ) होता है । अलसी की जड़ की गांठ या अलसी के सूतों की गांठ रूई से लपेट देने पर मुँह से आग और धुआँ छोड़ने का साधन है ।

( ५ ) कुश, आम और तेल के सहारे जलायी हुयी आग आँधी और वर्षा में भी जलती रहती ।

( ६ ) पानी में तैरते हुए समुद्र झाग में यदि तेल मिला दिया जाय तो वह जलते हुए तैरता रहेगा ।

( ७ ) बंदर की हड्डियों में विचित्र बाँस के मंथन से पैदा की गई अग्नि जल से नहीं बुझ सकती है, बल्कि जल के संसर्ग से वह और भी धधकने लगती है ।

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प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४९

(१) शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुरुषस्य वामपार्श्वपर्शुकास्थिषु कल्माषवेणुना निर्मथितोऽग्निः, स्त्रियाः पुरुषस्य वास्थिषु मनुष्यपर्शुक्रया निर्मथितोऽग्नियंत्र त्रिप्रसव्यं गच्छति, न चात्रान्योऽग्निर्ज्वलति ।

(२) चुचुन्दरी खञ्जरीटः खारकीटश्च पिष्यते ।
अश्वमूत्रेण संसृष्टा निगलानां तु भञ्जनम् ॥

(३) अयस्कान्तो वा पाषाणः ।
(४) कुलीराण्डदर्दुरखारकीटसाप्रदेहेन द्विगुणो दारकगर्भः कङ्कभास-पार्श्वोत्पलोदकपिष्टश्चतुष्पदद्विपदानां पादलेपः, उलूकगृध्रवसाभ्यामुष्ट्र-चर्मोपानहावभ्यज्य वटपत्रैः प्रतिच्छाद्य पञ्चाशद्योजनान्यश्रान्तो गच्छति । श्येनकङ्ककाकगृध्रहंसक्रौञ्चवीचिरल्लानां मज्जानो रेतांसि वा योजन-शताय । सिंहव्याघ्रद्वीपिकाकोलूकानां मज्जानो रेतांसि वा, सार्ववर्णिकानि गर्भपतनान्युष्ट्रिकायामभिषूय श्मशाने प्रेतशिशून् वा तत्समुत्थितं मेदो योजनशताय ।


(१) तलवार, भाला या त्रिशूल आदि से मारे हुए पुरुष की बाईं पसली की हड्डियों में विचित्र बाँस के मंथन से पैदा की गई अग्नि, या स्त्री अथवा पुरुष की हड्डियों में मनुष्यों की पसली से मंथन कर पैदा हुई अग्नि, इन दोनों अग्नियों को जहाँ पर तीन बार वाईं ओर से घुमा दिया जाय, वहाँ पर कोई आग नहीं जल सकती है।

(२) छुछुन्दर, खंजन और खारकीट, इन तीनों को घोड़े के पेशाब के साथ अलग-अलग पीस कर फिर एक साथ मिला दिया जाय तो वह मिश्रण बेड़ी, हथकड़ी, आदि तोड़ने के काम में आ सकता है।

(३) अथवा अयस्कांत नामक मणि से भी लोहे की जंजीरें तोड़ी जा सकती हैं।

(४) केंकड़े के अंडे, मेढक, खारकीट की चर्बी से बढ़ाये हुए सूकरगर्भ को कंक पक्षी, गिद्ध की पसलियों तथा कमल के जल से पीस कर, उस औषधि को चौपायों या दुपायों के पैरों में लेप कर दिया जाय तो बिना थकावट के पचास योजन तक चला जा सकता है, उल्लू, तथा गिद्ध की चर्बी को ऊँट के चमड़े से बने जूतों पर चुपड़ कर और बरगद के पत्तों से ढँककर फिर उन्हीं जूतों को पहिन कर पचास योजन तक बिना थकावट के सफर किया जा सकता है; बाज, सफेद चील (कंक), कौआ, गीध, हंस, क्रौंच और वीचिरल्ल की चर्बी और वीर्य को मिलाकर पूर्वोक्त ढंग से पैरों तथा जूतों में लेप किया जाय तो बिना थके-अलसाये सौ योजन सफर किया जा सकता है; शेर, बाघ, भेड़िया, कौआ और उल्लू, इन सबकी चर्बी तथा वीर्य, अथवा सभी वर्णों के गिरे हुए गर्भो को मिट्टी के किसी बर्तन में अथवा

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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७५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) अनिष्टै रद्भुतोत्पातैः परस्योद्वेगमाचरेत् ।
आराज्यायेति निर्वादः समानः कोप उच्यते ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भनेऽद्भुतोत्पादनं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदितः षट्चत्वारिंशदधिकशततमः ।

—: ० :—


मरे हुए छोटे बच्चों को श्मशान भूमि में ही अभिषव करके उनके शरीर से निकली हुई चर्बी को पैर, जूते आदि में लेप करके बिना थकावट ही सौ योजन तक जाया जा सकता है ।

( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को चाहिए कि इन आश्चर्यजनक अद्भुत तथा अनिष्टकारक उत्पातों से वह अपने शत्रु को अच्छी तरह बेचैन करे । यद्यपि इस प्रकार का व्यापार अनिष्टकारी, और कलंकित कर देने वाला होता है, फिर भी पारस्परिक वैमनस्य बढ़ जाने के कारण, उसको उपयोग में लाना ही पड़ता है । इसलिए यहाँ पर इसका निरूपण किया गया ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण १७८ | # प्रलम्भने भैषज्यमन्त्रप्रयोगः
अध्याय ३ |


(१) मार्जारोष्ट्रवृकवराहश्वाविद्वागुलीनप्तृकाकोलुकानामन्येषां वा निशाचराणां सत्त्वानामेकस्य द्वयोर्बहूनां वा दक्षिणानि वामानि वाक्षीणि गृहीत्वा द्विधा चूर्णं कारयेत् । ततो दक्षिणं वामेन वामं दक्षिणेन समभ्यज्य रात्रौ तमसि च पश्यति ।
(२) एकाम्लकं वराहाक्षि खद्योतः कालशारिबा ।
एतेनाभ्यक्तनयनो रात्रौ रूपाणि पश्यति ॥
(३) त्रिरात्रोपोषितः पुष्ये शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरः-कपाले मृत्तिकायां यवानावाप्याविक्षीरेण सेचयेत्, ततो यवविरूढमालामा-बध्य नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(४) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण श्वमार्जारोलूकवागुलीनां दक्षिणानि वामानि चाक्षीणि द्विधा चूर्णं कारयेत् । ततो यथास्वमभ्यक्ताक्षो नष्ट-च्छायारूपश्चरति ।


प्रलम्भन योग में औषधि तथा मंत्र का प्रयोग

( १ ) रात में घूमनेवाले : बिल्ली, ऊँट, भेड़िया, सूअर, साही, बागुली, नप्ता, कौआ और उल्लू अथवा रात्रि में विचरण करने वाले इसी प्रकार के दूसरे प्राणी, इनमें से एक, दो या अनेकों की दोनों आँखों को निकाल कर उनका अलग-अलग चूर्ण बनाया जाय । तदनन्तर बाईं आँखों से बना चूर्ण दाईं आँख पर और दाईं आँख से बना चूर्ण बाईं आँख पर अञ्जन कर देने से मनुष्य भी रात के समय घोर अंधकार में प्रत्येक वस्तु को देख सकता है ।

( २ ) एक बड़हल ( अम्ल क ), सूअर की आंख, जुगूनू और काली शारिवा नामक औषधि को एक साथ मिलाकर आंख में लगाने से रात में सभी चीजें दिखाई देती हैं ।

( ३ ) तीन रात तक उपवास करने वाला व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में हथियार से मारे हुए अथवा फाँसी पर चढ़ाये गये आदमी की खोपड़ी में मिट्टी भर कर उसमें जौ बो दे और उसको भेंड़ के दूध से सींचता जाय । जब वे जौ उग आते हैं तब उनकी माला पहिन कर चलने वाले व्यक्ति की न तो छाया दिखाई देती है और न रूप ही ।

( ४ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने वाला व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में कुत्ता,

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७५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण पुरुषघातिनः काण्डकस्य शलाकामञ्जनीं च कारयेत्, ततोऽन्यतमेनाक्षिचूर्णेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(२) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण कालायसीमाञ्जनीं शलाकां च कारयेत्; ततो निशाचराणां सत्त्वानामन्यतमस्य शिरःकपालमञ्जनेन पूरयित्वा मृतायाः स्त्रिया योनौ प्रवेश्य दाहयेत्; तदञ्जनं पुष्येणोद्धृत्य तस्यामञ्जन्यां निदध्यात् । तेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(३) यत्र ब्राह्मणमाहिताग्निं दग्धं दह्यमानं वा पश्येत्, तत्र त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण स्वयम्मृतस्य वाससा प्रसेवं कृत्वा चिताभस्मना पूरयित्वा तमाबध्य नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(४) ब्राह्मणस्य प्रेतकार्ये या गौर्मार्यते, तस्या अस्थिमज्जाचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पशूनामन्तर्धानम् ।


बिल्ली, उल्लू और बागुली इन चारों जानवरों की दोनों आंखों का अलग-अलग चूर्ण बनाये । तदनन्तर दाईं आंखों से बने चूर्ण को दाईं आंख पर और बाईं आंखों से बने चूर्ण को बाईं आंख पर लगाने वाले व्यक्ति की छाया और काया नहीं दिखाई देती है ।

( १ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में जिस बाण से कोई व्यक्ति मारा गया हो उसी वाण के लोहे की एक सलाई और सुरमादानी बनवा कर कुत्ता, बिल्ली, उल्लू और बागुली इनमें से किसी की भी दाईं-बाईं आँख का अलग-अलग चूर्ण बनाकर उसी सलाई तथा सुरमादानी के द्वारा आँखों में लगाने वाला पुरुष रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण कर सकता है ।

( २ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में फौलाद के लोहे की सुरमादानी-सलाई बना दी जाय और रात में घूमने वाले किसी भी जानवर की खोपड़ी को अञ्जन से भरकर उसे किसी मरी हुई स्त्री की योनि में डाल कर जला दिया जाय । तदनन्तर पुष्य नक्षत्र में उस अञ्जन को उक्त लोहे की सुरमादानी में भर दिया जाय और उसी सलाई से उस अंजन को आँखों में लगाने से भी रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण किया जा सकता है ।

( ३ ) अथवा जहाँ पर कोई अग्निहोत्री ब्राह्मण जलाया गया हो या जलाया जा रहा हो, उस स्थान पर तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में अपनी मृत्यु से मरे हुए किसी व्यक्ति के वस्त्र से एक थैली बनाकर उसमें उसी मनुष्य की चिता की राख भर दी जाय और उस पोटली को अपने किसी अंग पर बाँध दिया जाय, ऐसा करने से वह पुरुष छाया-रूप से रहित यथेच्छ कहीं भी विचरण कर सकता है ।

( ४ ) ब्राह्मण के श्राद्धकार्य में जो गाय मारी जाय उसकी हड्डी और मज्जा

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५३

(१) सर्पदष्टस्य भस्मना पूर्णा प्रचलाकभस्त्रा मृगाणामन्तर्धानम् ।
(२) उलूकबागुलीपुच्छपुरीषजान्वस्थिचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पक्षिणामन्तर्धानम् ।
(३) इत्यष्टावन्तर्धानयोगाः ।
(४) बलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्बरम् ।
भण्डीरपाकं नरकं निकुम्भं कुम्भमेव च ॥
देवशं नारदं वन्दे वन्दे सावणिगालवम् ।
एतेषामनुयोगेन कृतं ते स्वापनं महत् ॥
यथा स्वपन्त्यजगराः स्वपन्त्यपि चमूखलाः ।
तथा स्वपन्तु पुरुषा ये च ग्रामे कुतूहलाः ॥
भण्डकानां सहस्रेण रथनेमिशतेन च ।
इमं गृहं प्रवेक्ष्यामि तूष्णीमासन्तु भाण्डकाः ॥
नमस्कृत्वा च मनवे बद्ध्वा शूनकफेलकाः ।
ये देवा देवलोकेषु मानुषेषु च ब्राह्मणाः ॥
अध्ययनपारगाः सिद्धा ये च कैलासतापसाः ।
एते च सर्वसिद्धेभ्यः कृतं ते स्वापनं महत् ॥
अतिगच्छति च मय्यपगच्छन्तु संहताः ।
अलिते वलिते मनवे स्वाहा ॥
(५) एतस्य प्रयोगः—त्रिरात्रोपोषितः कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां


के चूर्ण से भरी हुई साँप की केंचुल को यदि किसी पशु पर बाँध दिया जाय तो उसको भी कोई नहीं देख पाता है ।

(१) यदि सर्प से कटे हुए किसी जानवर की राख को मोरपेंच की बनी हुई थैली में भर दिया जाय और वह थैली किसी जंगली जानवर के अङ्ग पर बाँध दी जाय तो वह जानवर दृष्टि से अन्तर्धान हो जाता है ।

(२) यदि उल्लू तथा बागुली दोनों की पूँछ, विष्ठा, टाँग और हड्डियों के चूर्ण को साँप की केंचुल में भर दिया जाय तो वह सभी पक्षियों के अंतर्धान का योग है ।

(३) यहाँ तक अंतर्धान होने के संबंध में आठ प्रकार के योगों का निरूपण किया गया है ।

(४) प्रस्वापन मंत्र : ( 'बलिं वैरोचनम्' आदि ये जो मंत्र दिये गये हैं इनका संबंध आगे बताये गये चार प्रकार के प्रस्वापन ( सबको सुला देने वाले ) योगों से है । अर्थ की दृष्टि से ये मंत्र सर्वथा सुबोध हैं और अर्थ की अपेक्षा उनका उपयोग उनके मूलपाठ में ही है ।

(५) उक्त मंत्रों के प्रयोग का प्रकार : तीन रात तक उपवास करने के

४८ कौ०

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७५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

श्वपाकीहस्ताद्बिलखावलेखनं क्रीणीयात् । तन्माषैः सह कण्डोलिकायां कृत्वा असङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्य कुमार्या पेषयित्वा गुलिकाः कारयेत् । तत एकां गुलिकामभिमन्त्रयित्वा यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

(१) एतेनैव कल्पेन श्वाविधः शल्यकं त्रिकालं त्रिश्वेतमसङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्यादहनभस्मना सह यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

सुवर्णपुष्पीं ब्रह्माणीं ब्रह्माणं च कुशध्वजम् ।
सर्वांश्च देवता वन्दे वन्दे सर्वांश्च तापसान् ॥
वशं मे ब्राह्मणा यान्तु भूमिपालाश्च क्षत्रियाः ।
वशं वैश्याश्च शूद्राश्च वशतां यान्तु मे सदा ।
स्वाहा । अमिले किमिले वसुजारे प्रयोगे फक्के वयुद्धे विहाले दन्त-कटके स्वाहा ।
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ।
श्वाविधः शल्यकं चैतत्त्रिश्वेतं ब्रह्मनिर्मितम् ॥
प्रसुप्ताः सर्वसिद्धा हि एतत्ते स्वापनं कृतम् ।
यावद् ग्रामस्य सीमान्तः सूर्यस्योद्गमनादिति ॥ स्वाहा ।

(२) एतस्य प्रयोगः—श्वाविधः शल्यकानि त्रिश्वेतानि । सप्तरात्रो-
पोषितः कृष्णचतुर्दश्यां खादिराभिः समिधाभिरग्निमेतेन मन्त्रेणाष्टशत-


बाद कृष्ण पक्ष के पुष्य नक्षत्र में किसी चण्डाल की स्त्री के हाथ से चूहे का एक टुकड़ा खरीद लिया जाय । उसको उड़दों के साथ एक डिब्बे में बन्द कर किसी खुले श्मशान में गढ़ा खोदकर उसमें गाड़ दिया जाय । अगली चतुर्दशी को उस डिब्बे को गढ़े से निकाल कर किसी कुमारी के द्वारा उसको पिसवा दिया जाय और उस चूर्ण की गोलियां बना दी जांय । उसके बाद एक-एक गोली को उक्त मंत्रों से अभिमंत्रित कर जिस स्थान पर फेंक दिया जाय उस स्थान के सभी प्राणी सो जाते हैं । यह पहिला योग है ।

(१) ऊपर बताये नियम के अनुसार किसी चाण्डालिनी के हाथ से साही के ऐसे कांटे खरीदे जांय, जो तीन जगह से सफेद और तीन जगह से काले हों । उन कांटों को पूर्ववत् किसी खुले श्मशान में गाड़ दिया जाय । १५ दिन के बाद अगली चतुर्दशी को उसे उखाड़ कर श्मशान की राख के साथ उपर्युक्त मंत्रों से अभिमंत्रित करके जिस स्थान पर वह कांटा फेंका जायेगा वहाँ के सभी प्राणी सो जायेंगे । यह दूसरा योग है । तीसरे प्रस्वापन योग के लिए 'सुवर्णपुष्पीं' आदि मंत्रों का विधान है—

(२) प्रयोग-विधि : पूर्वोक्त विधि के अनुसार तीन स्थानों से सफेद साही के

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५५

सम्पातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् । तत एकमेतेन मन्त्रेण ग्रामद्वारि गृहद्वारि वा यत्र निखन्यते, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

बलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्बरम् ।
निकुम्भं नरकं कुम्भं तन्तुकच्छं महासुरम् ॥
अर्मालवं प्रमीलं च मण्डोलूकं घटोबलम् ।
कृष्णकंसोपचारं च पौलोमीं च यशस्विनीम् ॥
अभिमन्त्रयित्वा गृह्णामि सिद्धार्थं शवशारिकाम् ।
जयतु जयति च नमः शलकभूतेभ्यः स्वाहा ।
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ।
सुखं स्वपन्तु सिद्धार्थं यमर्थं मार्गयामहे ॥
यावदस्तमयादुदयो यावदर्थं फलं मम ॥ इति स्वाहा ।

**(१) एतस्य प्रयोगः—**चतुर्भक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्याम सङ्कीर्ण आदहने बलिं कृत्वा एतेन मन्त्रेण शवशारिकां गृहीत्वा पोत्रीपोट्टलिकां बध्नीयात् । तन्मध्ये श्वाविधः शल्यकेन विद्ध्वा यत्रैतेन मन्त्रेण निखन्यते, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

(२) उपैमि शरणं चार्गिण दैवतानि दिशो दश ।
अपयान्तु च सर्वाणि वशतां यान्तु मे सदा ॥ स्वाहा ।

**(३) एतस्य प्रयोगः—**त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शर्करा एकविंशति-


कांटों को श्मशान भूमि में गाड़ दिया जाय । तदनन्तर सात रात्रि तक उपवास रखने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को खैर आदि की समिधाओं से उक्त मंत्रों द्वारा शहद तथा घी मिलाकर उससे १०८ बार अग्नि में हवन किया जाय । उसके बाद श्मशान में गड़े हुए उन कांटों को उखाड़ कर उनको उक्त मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर घर, गाँव या दरवाजा, जहाँ पर भी गाड़ दिया जाता है वहाँ के सब लोग निद्राग्रस्त हो जाते हैं । यह तीसरा योग है । चौथे प्रस्वापन योग के लिए ‘बलिं वैरोचनम्’ आदि मंत्रों का उपयोग किया जाय ।

(१) प्रयोग-विधि : चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को खुले हुए श्मशान के मैदान में पशुबलि देकर एक मरी हुई मैना को कपड़े की पोटली में बाँध लिया जाय । उसके बीच में साही का एक काँटा छेद कर उपर्युक्त मंत्र को पढ़ते हुए उस पोटली को जिस स्थान में भी गाड़ दिया जाय वहीं के सब प्राणी सो जायेंगे । यह चौथा योग है ।

( २ ) द्वार खोलने का मंत्र : बंद दरवाजा खोलने के लिए ‘उपैमि शरणम्’ आदि मंत्र का प्रयोग किया जाय ।

( ३ ) प्रयोग-विधि : तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र काल

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७५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौदहवां अधिकरण

सम्पातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् । ततो गन्धमाल्येन पूजयित्वा निखानयेत् । द्वितीयेन पुष्येणोद्धृत्यैकां शर्करामभिमन्त्रयित्वा कवाटमाहन्यात् । अभ्यन्तरं चतसृणां शर्कराणां द्वारमपाव्रियते ।
(१) चतुर्थभक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां भग्नस्य पुरुषस्यास्थ्ना ऋषभं कारयेत्; अभिमन्त्रयेच्चैतेन, द्विगोयुक्तं गोयानमाहृतं भवति; ततः परमाकाशे विक्रामति ।
(२) सदा रविरविः सगण्डपरिघाति सवं भणाति । चण्डालीकुम्भोत्तम्बकटुकसारीघः सनारीभगोऽसि स्वाहा ।
(३) तालोद्घाटनं प्रस्वापनं च ।
(४) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरःकपाले मृत्तिकायां तुवरीरावास्योदकेन सेचयेत् । जातानां पुष्येणैव गृहीत्वा रज्जुकां वर्तयेत् । ततः सज्ज्यानां धनुषां यन्त्राणां च पुरस्ताच्छेदनं ज्याच्छेदनं करोति ।


में बहुत-सी खोपड़ियों या कंकड़ियों को लेकर उनके ऊपर अग्नि में शहद और घी से इक्कीस वार आहुति डाल कर हवन किया जाय । उसके बाद गंधमाल्य से उनकी पूजा करके एक गढा खोद कर उसमें उन्हें गाड़ दिया जाय । दूसरे पुष्य नक्षत्र में उन्हें उखाड़ कर उनमें से एक कंकड़ी को उपर्युक्त मन्त्र द्वारा अभिमंत्रित करके बंद दरवाजे पर मार दिया जाय । उसके मारने से चार कंकड़ी के बराबर किवाड़ में छेद हो जायेगा । इसी प्रकार सारे दरवाजे पर छेद करके उसको तोड़ा या खोला जा सकता है ।

( १ ) चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को किसी पुरुष की टूटी हुई हड्डी पर बैल की मूर्ति बनायी जाय । तदनन्तर उपर्युक्त विधि एवं उपर्युक्त मंत्र के द्वारा होम-पूजा आदि करके उस मूर्ति को अभिमंत्रित किया जाय । ऐसा करने से दो बैलों से जुती हुई गाड़ी वहाँ उपस्थित हो जाती है । उसके द्वारा वह साधक आकाश या पृथ्वी पर कहीं भी घूम सकता है ।

( २ ) ताला तोड़ने तथा सुला देने का मंत्र : 'सदा रविरविः' आदि मंत्र के प्रयोग की वही विधि है, जो दरवाजा खोलने वाले मंत्र के प्रसंग में बतायी गयी है ।

( ३ ) उक्त मंत्र को विधिवत् सिद्ध करके ताला तोड़ा जा सकता है और सुलाया भी जा सकता है ।

( ४ ) धनुष की डोरी काटने का प्रयोग : तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्यनक्षत्र काल में किसी ऐसे पुरुष की खोपड़ी में, जो हथियार से मारा गया हो या शूली पर चढ़ाया गया हो, मिट्टी भर कर उसमें तोर या अरहर बो

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५७

(१) उदकाहिभस्त्रामुच्छ्वासमृत्तिकया स्त्रियाः पुरुषस्य वा पूरयेत्, नासिकाबन्धनं मुखग्रहश्च ।

(२) वराहवस्तिमुच्छ्वासमृत्तिकया पूरयित्वा मर्कटस्नायुनावबध्नीयाद्, आनाहकारणम् ।

(३) कृष्णचतुर्दश्यां शस्त्रहताया गोः कपिलायाः पित्तेन राजवृक्षमयीममित्रप्रतिमामञ्जयात्, अन्धीकरणम् ।

(४) चतुर्भक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां बलिं कृत्वा शूलप्रोतस्य पुरुषस्यास्थ्ना कीलकान्कारयेत् । एतेषामेकः पुरीषे मूत्रे वा निखात आनाहं करोति; पादेऽस्यासने वा निखातः शोषेण मारयति; आपणे क्षेत्रे गृहे वा वृत्तिच्छेदं करोति ।

(५) एतेन कल्पेन विद्युद्दग्धस्य वृक्षस्य कीलका व्याख्याताः ।


दिया जाय और उसको जल से निरंतर सींचा जाय । जब उसमें अंकुर निकल आयें तो दूसरे पुष्यनक्षत्र काल में उसको उखाड़ कर उसकी रस्सी बनवाई जाय । उस रस्सी के द्वारा धनुष की डोरी और यंत्रों का भी छेदन किया जा सकता है ।

( १ ) जल में रहने वाले सांप की केंचुल को किसी स्त्री या पुरुष की चिता के ऊपर की मिट्टी से भर लिया जाय । यह योग जिस पर भी प्रयोग किया जाय उसका मुँह और नाक बंद हो जाते हैं ।

( २ ) इसी तरह सूअर की आंत में चिता के ऊपर की मिट्टी भर कर उसे किसी बन्दर की नाड़ी से बाँध दिया जाय तो उस योग के प्रयोग से पाखाना रुका रह जाता है ।

( ३ ) यदि कृष्ण चतुर्दशी की तिथि में हथियार से मारी गयी कपिला के पित्ते को अमलतास की शलाका से शत्रु की प्रतिमा की आंखों पर अंजन की तरह लगाया जाय तो शत्रु अंधा हो जाता है ।

( ४ ) चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में विधिपूर्वक बलि देकर फांसी से मरे हुए किसी आदमी की हड्डी से बहुत-सी कीलें बनवायी जाँय । उनमें से एक कील को जिसके भी पेशाब या पाखाने में गाड़ दिया जाता है उसका पाखाना-पेशाब बंद हो जाता है । यदि किसी के जूते या आसन में इस कील को गाड़ दिया जाय तो वह व्यक्ति सूख-सूख कर मर जाता है । जिसकी दूकान, खेत या घर में यह कील गाड़ दी जाय उसकी आजीविका नष्ट हो जाती है ।

( ५ ) इसी प्रकार वज्र पड़े पेड़ की लकड़ी से बनाई गई कीलों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।

७५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

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७५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) पुनर्नवमवाचीनं निम्बः काकमधुश्च यः।
कपिरोम मनुष्यास्थि बद्ध्वा मृतकवाससा ॥
निखन्यते गृहे यस्य पिष्ट्वा वा यं प्रपाययेत् ।
सपुत्रदारः सधनस्त्रीन्पक्षान्नातिवर्तते ॥
(२) पुनर्नवमवाचीनं निम्बः काकमधुश्च यः।
स्वयंगुप्ता मनुष्यास्थि पदे यस्य निखन्यते ॥
द्वारे गृहस्य सेनाया ग्रामस्य नगरस्य वा।
सपुत्रदारः सधनस्त्रीन् पक्षान्नातिवर्तते ॥
(३) अजमर्कटरोमाणि मार्जारनकुलस्य च।
ब्राह्मणानां श्वपाकानां काकोलूकस्य चाहरेत् ॥
एतेन विष्ठावक्षुण्णा सद्य उत्सादनकारिका।
(४) प्रेतनिर्मालिका किण्वं रोमाणि नकुलस्य च ॥
वृश्चिकाल्यहिकृत्तिश्च पदे यस्य निखन्यते।
भवत्यपुरुषः सद्यो यावत्तन्नापनीयते ॥
(५) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरः-
कपाले मृत्तिकायां गुञ्जा आवास्योदकेन च सेचयेत्। जातानाममावास्यायां

(१) दक्षिण की ओर पैदा होने वाला पुनर्नवा तथा जिसका फल कौओं के लिए स्वादुकर होता है, ऐसा काकमधु, नीम, बन्दर के बाल और मनुष्य की हड्डी, इन सबको मरे हुए आदमी के कपड़े में बाँध कर जिसके घर में गाड़ दिया जाता है अथवा जिसको पीस कर पिला दिया जाता है वह पुरुष डेढ़ मास के भीतर ही समस्त धन-जन के सहित विनष्ट हो जाता है।

(२) दक्षिण की ओर पैदा होने वाला पुनर्नवा, काकमधु, नीम, धमासा (स्वयंगुप्ता) और मनुष्य की हड्डी, इन सबको जिसके घर, सेना, गाँव, नगर या दरवाजे पर गाड़ दिया जाता है वह व्यक्ति डेढ़ मास के भीतर समस्त जन-धन के सहित विनष्ट हो जाता है।

(३) बकरा, बन्दर, बिल्ली, नेवला, ब्राह्मण, चाण्डाल, कौआ और उल्लू, इन सबके बालों को इकट्ठा करके तथा जिसको मारना हो उसका पाखाना इन बालों के साथ मिलाकर उसका स्पर्श कराते ही उस व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो जाती है।

(४) मुर्दे पर डाली गई माला, सुराबीज और नेवले के बाल इन सबको यदि बिच्छू, भौंरा और सांप, इन तीनों की खाल के साथ मिलाकर किसी के स्थान पर गाड़ दिया जाय तो वह पुरुष तब तक नपुंसक बना रहता है, जब तक कि उसके स्थान से उन गड़ी हुई चीजों को न निकाला जाय।

(५) तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में हथियार से मारे हुए

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५९

पौर्णमास्यां वा पुष्ययोगिन्यां गुञ्जावल्लीर्ग्राहयित्वा मण्डलकानि कारयेत् । तेष्वन्नपानभाजनानि न्यस्तानि न क्षीयन्ते ।

(१) रात्रिप्रेक्षायां प्रवृत्तायां प्रदीपाग्निषु मृतधेनोः स्तानानुत्कृत्य दाहयेत् । दग्धान् वृषमूत्रेण पेषयित्वा नवकुम्भमन्तर्लेपयेत्; तं ग्राममपसव्यं परिणीय तत्र न्यस्तं नवनीतमेषां तत्सर्वमागच्छतीति ।

(२) कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां शुनो लग्नकस्य योनौ कालायसीं मुद्रिकां प्रेषयेत्; तां स्वयं पतितां गृह्णीयात्; तया वृक्षफलान्याकारितान्यागच्छन्ति ।

(३) मन्त्रभैषज्यसंयुक्ता योगा मायाकृताश्च ये ।
उपहन्यादमित्रांस्तैः स्वजनं चाभिपालयेत् ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भने भैषज्यमन्त्रप्रयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः; आदितः सप्तचत्वारिंशदधिकशततमः ।

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या फांसी लगे व्यक्ति की खोपड़ी में मिट्टी भर कर उसमें रत्ती ( गुंजा ) बो दिये जांय और उन्हें निरंतर सींचा जाय । जब उसमें लताएँ निकल आवें तब पुष्य नक्षत्र की अमावस्या या पूर्णमासी को उन गुंजा की बेलों को उखाड़ कर उनका गोल घेरा बना दिया जाय । उस घेरे के बीच में रखी हुई खाने-पीने की सामग्री कभी खतम ही नहीं होती है ।

( १ ) रात में जिस समय कोई तमाशा हो रहा हो तब, मशाल की आग से मरी हुई गाय के झुलसे हुए थनों को काट कर उन्हें बैल के पेशाब के साथ पीसने के बाद एक कोरे घड़े के भीतर चारों ओर लीप दिया जाय । उस घड़े को बाईं ओर से गाँव की परिक्रमा करा के जिस जगह पर रखा जाय, गाँव भर का सारा मक्खन उस घड़े में खिंचा चला आता है ।

( २ ) पुष्य नक्षत्र की कृष्ण चतुर्दशी में किसी कामासक्त कुतिया की योनि में लोहे की एक अंगूठी लगा दी जाय और जब वह अंगूठी अपने आप गिर पड़े तो उसे ले लिया जाय । उसके बाद उस अंगूठी के द्वारा जिस पेड़ का फल बुलाना हो फौरन अपने पास चला आता है ।

( ३ ) मंत्र, ओषधि और माया से युक्त ऊपर जिन योगों का निरूपण किया गया है, उनसे शत्रु का नाश और स्वजनों का उपकार करना चाहिए ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में भैषज्यमन्त्रप्रयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १७९स्वबलोपघातप्रतीकारः
अध्याय ४

(१) स्वपक्षे परप्रयुक्तानां दूषिविषगराणां प्रतीकारे श्लेष्मातककपित्थदन्तिदन्तशठगोजीशिरीषपाटलीबलास्योनाकपुनर्नवाश्वेतावरणक्वाथयुक्तं चन्दनसालावृकीलोहितयुक्तं तेजनोदकं राजोपभोग्यानां गुह्यप्रक्षालनं स्त्रीणां सेनायाश्च विषप्रतीकारः ।

(२) पृषतनकुलनीलकण्ठगोधापित्तयुक्तं मषीराजिचूर्णं सिन्दुवारितवरणवारणीतण्डुलीयकशत्पर्वाग्रपिण्डीतकयोगो मदनदोषहरः ।

(३) शृगालविन्नामदनसिन्दुवारितवरणवारणवल्लीमूलकषायाणामन्यतमस्य समस्तानां वा क्षीरयुक्तं पानं मदनदोषहरम् ।


शत्रु द्वारा किये गये घातक प्रयोगों का प्रतीकार

( १ ) शत्रु द्वारा किये गये दूषक तथा विष आदि के घातक प्रयोगों का प्रतीकार इस प्रकार करना चाहिए : लहसोड़ा ( श्लेष्मातक ), कैथा ( कपित्थ ), जमालघोटा ( दंती ); जम्भीरी नीबू ( दंतशठ ), गोभी ( गोजी ); सिरस ( शिरीष ), काली पाढरी या पाटल ( पाटली ), खरैंटी ( बला ), सोनापाठा ( स्योनाक ); पुनर्नवा, शराव और वरनावृक्ष का काढ़ा बना कर चंदन, सालावृकी ( बंदरिया या सियारिन या कुतिया ) के खून से सानकर बांस के पानी ( तेजनोदक ) से राजा के उपयोग में आने वाली स्त्रियों की योनि, स्तन आदि गुप्तांगों को साफ कराया जाय और सेना में प्रयुक्त विष का प्रतीकार किया जाय ।

( २ ) दागीमृग ( पृषतन ), नेवला, मोर और गोह के पित्ते को काले संभालू ( मषी ) तथा राई के चूर्ण में मिलाकर बनाये गये योग से पागल बना देने वाले विषों का प्रतीकार किया जाय । संभालू, बरना, दूब ( बारुणी ), चौलाई, बाँस का अग्रभाग ( शतपर्वाग्र ) और मैनफल, इन सब चीजों का योग भी उन्मादजन्य दोषों का उपशमन करने वाला होता है ।

( ३ ) शृगालविन्ना औषधि, धतूरा ( मदन ), संभालू ( सिंधुवारित ), बरना ( वरण ) और गजपीपल ( वारणवल्लीमूल ) इन सबकी जड़ों को मिलाकर अथवा उनका अलग-अलग काढा, दूध के साथ पीने से उन्माद पैदा करने वाले विषयोगों को शांत कर देता है ।

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प्र० १७९ : अ० ४ ] घातक प्रयोगों का प्रतीकार ७६१

( १ ) कैडर्यपूतिलतैलमुन्मादहरं नस्तःकर्म ।
( २ ) प्रियङ्गुनक्तमालयोगः कुष्ठहरः ।
( ३ ) कुष्ठलोध्रयोगः पाकशोषण्नः ।
( ४ ) कट्फलद्रवन्तीविलङ्गचूर्णं नस्तःकर्म शिरोरोगहरम् ।
( ५ ) प्रियङ्गुमञ्जिष्ठातगरलाक्षारसमधुकहरिद्राक्षौद्रयोगो रज्जूदक-विषप्रहारपतननिःसंज्ञानां पुनःप्रत्यानयनाय ।
( ६ ) मनुष्याणामक्षमात्रं, गवाश्वानां द्विगुणं, चतुर्गुणं हस्त्युष्ट्राणाम् ।
( ७ ) रुक्मगर्भश्चैषां मणिः सर्वविषहरः ।
( ८ ) जीवन्तीश्वेतामुष्ककपुष्पवन्दाकानामक्षीबे जातस्य अश्वत्थस्य मणिः सर्वविषहरः ।


( १ ) कायफल ( कैडर्य ), कांटेदार कंजरुआ ( पूति ) और तिल इन तीनों के तेल को नासिका में डालने से उन्माद शांत हो जाता है ।

( २ ) मेंहदी या कांगनी ( प्रियंगु ) और करंज ( नक्तमाल ), इन दोनों का योग कुष्ठ-रोग को दूर कर देता है ।

( ३ ) कूट और लोध से बनाया गया योग पाकरोग ( बाल आदि का पकना ) और क्षयरोग को दूर कर देता है ।

( ४ ) कायफल ( कट्फल ), मूषकपर्णी ( द्रवंत्ती ) और बायविडंग ( विडंग ), इन तीनों के चूर्ण को नासिका में डालने से शिर के समस्त रोग दूर हो जाते हैं ।

( ५ ) प्रियंगु, मजीठ, तगर; लाख, महुआ, हल्दी और शहद इन सब चीजों का चूर्णयोग रस्सी, दूषित जल, विष, चोट तथा गिर जाने से हुई बेहोशी को दूर करने में लाभदायक है ।

( ६ ) प्रतीकार के लिए दी जाने वाली उक्त औषधियों की मात्रा मनुष्यों के लिए एक अक्ष ( सोलह माष ), गाय तथा घोड़ों को उससे दुगुनी और हाथी तथा ऊँटों को उससे चौगुनी देनी चाहिए ।

( ७ ) बेहोशी को दूर करने वाला जो योग ऊपर बताया गया है उसको यदि सोने के पत्तर में रखकर उसका तावीज बनाकर धारण किया जाय तो किसी भी प्रकार का विष असर नहीं करने पाता है ।

( ८ ) गिलोय ( जीवन्ती ), सफेद संभालू, काली पाढ़री, पुष्प ( औषधि ) और अमरवेल ( बन्दा ), इन सब को मणि ( ताबीज ); अथवा सहिजन या नीम के पेड़ में पैदा हुए पीपल के पत्ते को ताबीज में रख कर बाँध दिया जाय तो सभी प्रकार के विष शांत हो जाते हैं ।

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७६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) तूर्याणां तैः प्रलिप्तानां शब्दो विषविनाशनः ।
लिप्तध्वजं पताकां वा दृष्ट्वा भवति निर्विषः ॥
(२) एतैः कृत्वा प्रतीकारं स्वसैन्यानामथात्मनः ।
अमित्रेषु प्रयुञ्जीत विषधूमाम्बुदूषणान् ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे स्वबलोपघातप्रतीकारो नाम चतुर्थोऽध्यायः;
आदितोऽष्टचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
समाप्तमिदमौपनिषदिकं चतुर्दशमधिकरणम् ।
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(१) गिलोय आदि औषधियों से चुपड़े गये वाद्यों का शब्द विष को नष्ट करने वाला होता है । इसी प्रकार इन्हीं औषधियों से लिप्त ध्वजाओं को देखकर भी विष का प्रभाव जाता रहता है ।

(२) विजिगीषु राजा को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार की औषधियों द्वारा वह अपनी सेना की तथा अपनी रक्षा करके विषैले धुंए का और विषाक्त पानी का प्रयोग सदा अपने शत्रुओं पर करता रहे ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में स्वबलोपघातप्रतीकार नामक चौथा अध्याय समाप्त
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