कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५९
पौर्णमास्यां वा पुष्ययोगिन्यां गुञ्जावल्लीर्ग्राहयित्वा मण्डलकानि कारयेत् । तेष्वन्नपानभाजनानि न्यस्तानि न क्षीयन्ते ।
(१) रात्रिप्रेक्षायां प्रवृत्तायां प्रदीपाग्निषु मृतधेनोः स्तानानुत्कृत्य दाहयेत् । दग्धान् वृषमूत्रेण पेषयित्वा नवकुम्भमन्तर्लेपयेत्; तं ग्राममपसव्यं परिणीय तत्र न्यस्तं नवनीतमेषां तत्सर्वमागच्छतीति ।
(२) कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां शुनो लग्नकस्य योनौ कालायसीं मुद्रिकां प्रेषयेत्; तां स्वयं पतितां गृह्णीयात्; तया वृक्षफलान्याकारितान्यागच्छन्ति ।
(३) मन्त्रभैषज्यसंयुक्ता योगा मायाकृताश्च ये ।
उपहन्यादमित्रांस्तैः स्वजनं चाभिपालयेत् ॥
इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भने भैषज्यमन्त्रप्रयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः; आदितः सप्तचत्वारिंशदधिकशततमः ।
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या फांसी लगे व्यक्ति की खोपड़ी में मिट्टी भर कर उसमें रत्ती ( गुंजा ) बो दिये जांय और उन्हें निरंतर सींचा जाय । जब उसमें लताएँ निकल आवें तब पुष्य नक्षत्र की अमावस्या या पूर्णमासी को उन गुंजा की बेलों को उखाड़ कर उनका गोल घेरा बना दिया जाय । उस घेरे के बीच में रखी हुई खाने-पीने की सामग्री कभी खतम ही नहीं होती है ।
( १ ) रात में जिस समय कोई तमाशा हो रहा हो तब, मशाल की आग से मरी हुई गाय के झुलसे हुए थनों को काट कर उन्हें बैल के पेशाब के साथ पीसने के बाद एक कोरे घड़े के भीतर चारों ओर लीप दिया जाय । उस घड़े को बाईं ओर से गाँव की परिक्रमा करा के जिस जगह पर रखा जाय, गाँव भर का सारा मक्खन उस घड़े में खिंचा चला आता है ।
( २ ) पुष्य नक्षत्र की कृष्ण चतुर्दशी में किसी कामासक्त कुतिया की योनि में लोहे की एक अंगूठी लगा दी जाय और जब वह अंगूठी अपने आप गिर पड़े तो उसे ले लिया जाय । उसके बाद उस अंगूठी के द्वारा जिस पेड़ का फल बुलाना हो फौरन अपने पास चला आता है ।
( ३ ) मंत्र, ओषधि और माया से युक्त ऊपर जिन योगों का निरूपण किया गया है, उनसे शत्रु का नाश और स्वजनों का उपकार करना चाहिए ।
औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में भैषज्यमन्त्रप्रयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।
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