कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५३
(१) सर्पदष्टस्य भस्मना पूर्णा प्रचलाकभस्त्रा मृगाणामन्तर्धानम् ।
(२) उलूकबागुलीपुच्छपुरीषजान्वस्थिचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पक्षिणामन्तर्धानम् ।
(३) इत्यष्टावन्तर्धानयोगाः ।
(४) बलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्बरम् ।
भण्डीरपाकं नरकं निकुम्भं कुम्भमेव च ॥
देवशं नारदं वन्दे वन्दे सावणिगालवम् ।
एतेषामनुयोगेन कृतं ते स्वापनं महत् ॥
यथा स्वपन्त्यजगराः स्वपन्त्यपि चमूखलाः ।
तथा स्वपन्तु पुरुषा ये च ग्रामे कुतूहलाः ॥
भण्डकानां सहस्रेण रथनेमिशतेन च ।
इमं गृहं प्रवेक्ष्यामि तूष्णीमासन्तु भाण्डकाः ॥
नमस्कृत्वा च मनवे बद्ध्वा शूनकफेलकाः ।
ये देवा देवलोकेषु मानुषेषु च ब्राह्मणाः ॥
अध्ययनपारगाः सिद्धा ये च कैलासतापसाः ।
एते च सर्वसिद्धेभ्यः कृतं ते स्वापनं महत् ॥
अतिगच्छति च मय्यपगच्छन्तु संहताः ।
अलिते वलिते मनवे स्वाहा ॥
(५) एतस्य प्रयोगः—त्रिरात्रोपोषितः कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां
के चूर्ण से भरी हुई साँप की केंचुल को यदि किसी पशु पर बाँध दिया जाय तो उसको भी कोई नहीं देख पाता है ।
(१) यदि सर्प से कटे हुए किसी जानवर की राख को मोरपेंच की बनी हुई थैली में भर दिया जाय और वह थैली किसी जंगली जानवर के अङ्ग पर बाँध दी जाय तो वह जानवर दृष्टि से अन्तर्धान हो जाता है ।
(२) यदि उल्लू तथा बागुली दोनों की पूँछ, विष्ठा, टाँग और हड्डियों के चूर्ण को साँप की केंचुल में भर दिया जाय तो वह सभी पक्षियों के अंतर्धान का योग है ।
(३) यहाँ तक अंतर्धान होने के संबंध में आठ प्रकार के योगों का निरूपण किया गया है ।
(४) प्रस्वापन मंत्र : ( 'बलिं वैरोचनम्' आदि ये जो मंत्र दिये गये हैं इनका संबंध आगे बताये गये चार प्रकार के प्रस्वापन ( सबको सुला देने वाले ) योगों से है । अर्थ की दृष्टि से ये मंत्र सर्वथा सुबोध हैं और अर्थ की अपेक्षा उनका उपयोग उनके मूलपाठ में ही है ।
(५) उक्त मंत्रों के प्रयोग का प्रकार : तीन रात तक उपवास करने के
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