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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 834 of 918

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Page 834

७५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) अनिष्टै रद्भुतोत्पातैः परस्योद्वेगमाचरेत् ।
आराज्यायेति निर्वादः समानः कोप उच्यते ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भनेऽद्भुतोत्पादनं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदितः षट्चत्वारिंशदधिकशततमः ।

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मरे हुए छोटे बच्चों को श्मशान भूमि में ही अभिषव करके उनके शरीर से निकली हुई चर्बी को पैर, जूते आदि में लेप करके बिना थकावट ही सौ योजन तक जाया जा सकता है ।

( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को चाहिए कि इन आश्चर्यजनक अद्भुत तथा अनिष्टकारक उत्पातों से वह अपने शत्रु को अच्छी तरह बेचैन करे । यद्यपि इस प्रकार का व्यापार अनिष्टकारी, और कलंकित कर देने वाला होता है, फिर भी पारस्परिक वैमनस्य बढ़ जाने के कारण, उसको उपयोग में लाना ही पड़ता है । इसलिए यहाँ पर इसका निरूपण किया गया ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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