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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 836 of 918

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Page 836

७५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण पुरुषघातिनः काण्डकस्य शलाकामञ्जनीं च कारयेत्, ततोऽन्यतमेनाक्षिचूर्णेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(२) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण कालायसीमाञ्जनीं शलाकां च कारयेत्; ततो निशाचराणां सत्त्वानामन्यतमस्य शिरःकपालमञ्जनेन पूरयित्वा मृतायाः स्त्रिया योनौ प्रवेश्य दाहयेत्; तदञ्जनं पुष्येणोद्धृत्य तस्यामञ्जन्यां निदध्यात् । तेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(३) यत्र ब्राह्मणमाहिताग्निं दग्धं दह्यमानं वा पश्येत्, तत्र त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण स्वयम्मृतस्य वाससा प्रसेवं कृत्वा चिताभस्मना पूरयित्वा तमाबध्य नष्टच्छायारूपश्चरति ।
(४) ब्राह्मणस्य प्रेतकार्ये या गौर्मार्यते, तस्या अस्थिमज्जाचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पशूनामन्तर्धानम् ।


बिल्ली, उल्लू और बागुली इन चारों जानवरों की दोनों आंखों का अलग-अलग चूर्ण बनाये । तदनन्तर दाईं आंखों से बने चूर्ण को दाईं आंख पर और बाईं आंखों से बने चूर्ण को बाईं आंख पर लगाने वाले व्यक्ति की छाया और काया नहीं दिखाई देती है ।

( १ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में जिस बाण से कोई व्यक्ति मारा गया हो उसी वाण के लोहे की एक सलाई और सुरमादानी बनवा कर कुत्ता, बिल्ली, उल्लू और बागुली इनमें से किसी की भी दाईं-बाईं आँख का अलग-अलग चूर्ण बनाकर उसी सलाई तथा सुरमादानी के द्वारा आँखों में लगाने वाला पुरुष रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण कर सकता है ।

( २ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में फौलाद के लोहे की सुरमादानी-सलाई बना दी जाय और रात में घूमने वाले किसी भी जानवर की खोपड़ी को अञ्जन से भरकर उसे किसी मरी हुई स्त्री की योनि में डाल कर जला दिया जाय । तदनन्तर पुष्य नक्षत्र में उस अञ्जन को उक्त लोहे की सुरमादानी में भर दिया जाय और उसी सलाई से उस अंजन को आँखों में लगाने से भी रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण किया जा सकता है ।

( ३ ) अथवा जहाँ पर कोई अग्निहोत्री ब्राह्मण जलाया गया हो या जलाया जा रहा हो, उस स्थान पर तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में अपनी मृत्यु से मरे हुए किसी व्यक्ति के वस्त्र से एक थैली बनाकर उसमें उसी मनुष्य की चिता की राख भर दी जाय और उस पोटली को अपने किसी अंग पर बाँध दिया जाय, ऐसा करने से वह पुरुष छाया-रूप से रहित यथेच्छ कहीं भी विचरण कर सकता है ।

( ४ ) ब्राह्मण के श्राद्धकार्य में जो गाय मारी जाय उसकी हड्डी और मज्जा