कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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श्वपाकीहस्ताद्बिलखावलेखनं क्रीणीयात् । तन्माषैः सह कण्डोलिकायां कृत्वा असङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्य कुमार्या पेषयित्वा गुलिकाः कारयेत् । तत एकां गुलिकामभिमन्त्रयित्वा यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।
(१) एतेनैव कल्पेन श्वाविधः शल्यकं त्रिकालं त्रिश्वेतमसङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्यादहनभस्मना सह यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।
सुवर्णपुष्पीं ब्रह्माणीं ब्रह्माणं च कुशध्वजम् ।
सर्वांश्च देवता वन्दे वन्दे सर्वांश्च तापसान् ॥
वशं मे ब्राह्मणा यान्तु भूमिपालाश्च क्षत्रियाः ।
वशं वैश्याश्च शूद्राश्च वशतां यान्तु मे सदा ।
स्वाहा । अमिले किमिले वसुजारे प्रयोगे फक्के वयुद्धे विहाले दन्त-कटके स्वाहा ।
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ।
श्वाविधः शल्यकं चैतत्त्रिश्वेतं ब्रह्मनिर्मितम् ॥
प्रसुप्ताः सर्वसिद्धा हि एतत्ते स्वापनं कृतम् ।
यावद् ग्रामस्य सीमान्तः सूर्यस्योद्गमनादिति ॥ स्वाहा ।
(२) एतस्य प्रयोगः—श्वाविधः शल्यकानि त्रिश्वेतानि । सप्तरात्रो-
पोषितः कृष्णचतुर्दश्यां खादिराभिः समिधाभिरग्निमेतेन मन्त्रेणाष्टशत-
बाद कृष्ण पक्ष के पुष्य नक्षत्र में किसी चण्डाल की स्त्री के हाथ से चूहे का एक टुकड़ा खरीद लिया जाय । उसको उड़दों के साथ एक डिब्बे में बन्द कर किसी खुले श्मशान में गढ़ा खोदकर उसमें गाड़ दिया जाय । अगली चतुर्दशी को उस डिब्बे को गढ़े से निकाल कर किसी कुमारी के द्वारा उसको पिसवा दिया जाय और उस चूर्ण की गोलियां बना दी जांय । उसके बाद एक-एक गोली को उक्त मंत्रों से अभिमंत्रित कर जिस स्थान पर फेंक दिया जाय उस स्थान के सभी प्राणी सो जाते हैं । यह पहिला योग है ।
(१) ऊपर बताये नियम के अनुसार किसी चाण्डालिनी के हाथ से साही के ऐसे कांटे खरीदे जांय, जो तीन जगह से सफेद और तीन जगह से काले हों । उन कांटों को पूर्ववत् किसी खुले श्मशान में गाड़ दिया जाय । १५ दिन के बाद अगली चतुर्दशी को उसे उखाड़ कर श्मशान की राख के साथ उपर्युक्त मंत्रों से अभिमंत्रित करके जिस स्थान पर वह कांटा फेंका जायेगा वहाँ के सभी प्राणी सो जायेंगे । यह दूसरा योग है । तीसरे प्रस्वापन योग के लिए 'सुवर्णपुष्पीं' आदि मंत्रों का विधान है—
(२) प्रयोग-विधि : पूर्वोक्त विधि के अनुसार तीन स्थानों से सफेद साही के