कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५७
(१) उदकाहिभस्त्रामुच्छ्वासमृत्तिकया स्त्रियाः पुरुषस्य वा पूरयेत्, नासिकाबन्धनं मुखग्रहश्च ।
(२) वराहवस्तिमुच्छ्वासमृत्तिकया पूरयित्वा मर्कटस्नायुनावबध्नीयाद्, आनाहकारणम् ।
(३) कृष्णचतुर्दश्यां शस्त्रहताया गोः कपिलायाः पित्तेन राजवृक्षमयीममित्रप्रतिमामञ्जयात्, अन्धीकरणम् ।
(४) चतुर्भक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां बलिं कृत्वा शूलप्रोतस्य पुरुषस्यास्थ्ना कीलकान्कारयेत् । एतेषामेकः पुरीषे मूत्रे वा निखात आनाहं करोति; पादेऽस्यासने वा निखातः शोषेण मारयति; आपणे क्षेत्रे गृहे वा वृत्तिच्छेदं करोति ।
(५) एतेन कल्पेन विद्युद्दग्धस्य वृक्षस्य कीलका व्याख्याताः ।
दिया जाय और उसको जल से निरंतर सींचा जाय । जब उसमें अंकुर निकल आयें तो दूसरे पुष्यनक्षत्र काल में उसको उखाड़ कर उसकी रस्सी बनवाई जाय । उस रस्सी के द्वारा धनुष की डोरी और यंत्रों का भी छेदन किया जा सकता है ।
( १ ) जल में रहने वाले सांप की केंचुल को किसी स्त्री या पुरुष की चिता के ऊपर की मिट्टी से भर लिया जाय । यह योग जिस पर भी प्रयोग किया जाय उसका मुँह और नाक बंद हो जाते हैं ।
( २ ) इसी तरह सूअर की आंत में चिता के ऊपर की मिट्टी भर कर उसे किसी बन्दर की नाड़ी से बाँध दिया जाय तो उस योग के प्रयोग से पाखाना रुका रह जाता है ।
( ३ ) यदि कृष्ण चतुर्दशी की तिथि में हथियार से मारी गयी कपिला के पित्ते को अमलतास की शलाका से शत्रु की प्रतिमा की आंखों पर अंजन की तरह लगाया जाय तो शत्रु अंधा हो जाता है ।
( ४ ) चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में विधिपूर्वक बलि देकर फांसी से मरे हुए किसी आदमी की हड्डी से बहुत-सी कीलें बनवायी जाँय । उनमें से एक कील को जिसके भी पेशाब या पाखाने में गाड़ दिया जाता है उसका पाखाना-पेशाब बंद हो जाता है । यदि किसी के जूते या आसन में इस कील को गाड़ दिया जाय तो वह व्यक्ति सूख-सूख कर मर जाता है । जिसकी दूकान, खेत या घर में यह कील गाड़ दी जाय उसकी आजीविका नष्ट हो जाती है ।
( ५ ) इसी प्रकार वज्र पड़े पेड़ की लकड़ी से बनाई गई कीलों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।