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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages
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THE
VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA
75
❦ ❧

ARTHAŚĀSTRA

OF

KAUṬILYA

AND

THE CĀṆAKYA SŪTRA

Edited With
INTRODUCTION, HINDI TRANSLATION & GLOSSARY

By

Shri Vachaspati Gairola

Head of the Manuscript Department
Hindi Sangrahalaya, Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad.

(चौखम्बा)

CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN

VARANASI

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© CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
CHOWK (Behind The Benares State Bank Building)
Post Box No. 69
VARANASI 221001


Third Edition
1984


Also can be had of
CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
K. 37/117, Gopal Mandir Lane
Post Box No. 129
VARANASI 221001

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महामहोपाध्याय
पं० गणपति शास्त्री
की
पुण्यस्मृति
में

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रागरागिणिकुसुम

द्वितीय सोपान ०१

कि

गीतकाण्ड

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भूमिका

समिति : सभा

समिति : प्राचीन भारत में शासन-व्यवस्था के परिचालन के लिए आज की भाँति सभायें तथा समितियाँ नियुक्त होती थीं । उदाहरण के लिए प्रौढ़ों की राजसभा, जनता की सार्वजनिक सभा, व्यापारियों तथा व्यवसायियों का मण्डल ( पूग ), राज्यों का 'संघ' और कुटुम्बों ( कुलों ) की ग्रामसभायें । ये ही सभायें कानून बनातीं तथा उसको जनता में क्रियान्वित करती थीं । इन सभाओं का प्रमुख कार्य जनता का प्रतिनिधित्व करना और राजा के निर्वाचन तथा सार्वजनिक भलाई के लिए अपनी राय देना था । कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में सभा : समिति की गंभीर व्याख्या की गयी है ।

यदि हम सभा : समिति के इतिहास की खोज करते हैं तो उसके बीज हमें मानव-सभ्यता के मूल में बिखरे दिखायी देते हैं । मनुष्य की उदयवेला से ही उसके इतिहास का आरम्भ होता है ।

वैदिक साहित्य के अध्ययन से हमें विदित होता है कि उस समय राष्ट्रीय जीवन-सम्बन्धी सार्वजनिक कार्यों को संपन्न करने के लिए समिति की व्यवस्था थी । यह समिति सर्वसाधारण प्रजाजनों ( विशः ) द्वारा आयोजित तथा स्वीकृत होती थी । उसी के द्वारा राजा का चुनाव होता था । वह इतनी महत्त्वपूर्ण थी कि उसमें सभी लोगों का उपस्थित होना अनिवार्य बताया गया है (ऋग्वेद १०।१७३।१; अथर्ववेद ६।८७।१ ) । राजनीतिक दृष्टि से इस लोकसंस्था का दूसरा भी महत्त्व था; क्योंकि उसी के द्वारा राजा के अतिरिक्त राजव्यवस्था का भी संचालन होता था । यही कारण है कि ऋग्वेद ( १०।१९१।३ ) में उसकी नीति तथा मंत्रणा के लिए शुभकामना प्रकट की गयी है । निर्वाचित राजा के लिए 'समिति' की प्रत्येक बैठक में उपस्थित होना आवश्यक था ( ऋग्वेद ९।६२।६ ) ।

समिति में उपस्थित प्रत्येक वक्ता इस बात के लिए यत्नशील रहता था कि उसका भाषण ओजस्वी, सर्वप्रिय और अकाट्य सिद्ध हो ( अथर्ववेद २।२७ ) । अथर्ववेद के इस वचन से यह ध्वनि निकलती है कि समिति के वक्ताओं के विभिन्न मत होते थे और उनमें विभिन्न दृष्टियों से जनहित की

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चिन्तना की जाती थी । इस समिति में राजनीतिक विषयों के अतिरिक्त शिक्षा और ज्ञान-संबंधी बातों पर भी वाद-विवाद हुआ करता था । मूलतः वह एक धर्मपालिका या न्यायपालिका भी होती थी ।

समिति के सदस्य समाज के विभिन्न समुदायों या क्षेत्रों ( वर्गों ) के प्रति-निधि होते थे । उस युग में प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त का आदर होता था । ग्राम-संघटन के प्रतिनिधि को ग्रामणी कहा जाता था । यहाँ तक कि ग्रामणी के नाम पर ग्राम शब्द का व्यवहार हुआ ( काशिका ५।३।११२ ) । इस प्रकार गाँवों, व्यापारियों, दार्शनिकों और राजनीतिकों के अपने-अपने प्रति-निधि होते थे । वे प्रतिनिधि समिति के प्रमुख अंग थे । अथर्ववेद में इन समि-तियों और ग्रामों की बड़ी स्तुति की गयी है ( १२।१।५६ ) । वैदिक काल के परवर्ती समाज में समिति के संघटन के मुख्य आधार ग्राम ही हुआ करते थे ।

इस प्रकार की समिति की ऐतिहासिक प्राचीनता के संबंध में ठीक-ठीक पता नहीं चलता है। अथर्ववेद ( ७।१२ ) में उसको अनादि और प्रजापति की कन्या कहा गया है। उसके अस्तित्व और कार्यों का प्रमाण सर्वप्रथम ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में और उसके बाद छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।

ऋग्वेद ( ६।२८।६; ८।४।६; १०।३४।६० ) के अनेक स्थलों पर समिति : सभा की विशेषताओं पर कई तरह से प्रकाश डाला गया है । वहाँ उसको एक ऐसा समुदाय बताया गया है, जिसको सामाजिक व्यवहारों तथा सार्वजनिक मामलों पर विवाद करने का पूरा अधिकार था ।

लगभग सूत्रग्रन्थों के निर्माण ( ५०० ई० पूर्व ) के समय से समिति की जगह परिषद् ( पर्षत् ) ने ले ली थी ( पारस्कर गृह्यसूत्र ३।१३।४ ) । इस प्रकार हमें विदित होता है कि सार्वजनिक संघटनों या संस्थाओं के लिए समिति शब्द का प्रयोग वैदिककाल में ही होने लगा था ।

सभा : समिति के अतिरिक्त वेदकालीन सार्वजनिक संस्था सभा के अस्तित्व का भी पता चलता है । अथर्ववेद ( ७।१२।१-४ ) में उसको समिति की बहिन और प्रजापति की दो कन्याओं में से एक माना गया है । सायणा-चार्य ने उसकी व्याख्या करते हुए लिखा है कि 'नरिष्ठा' ( सभा ) बहुत से लोगों के उस निर्णय को कहते हैं, जिसका कथमपि उल्लंघन न हो सके । उसका निर्णय अमान्य नहीं हो सकता है, क्योंकि वह समुदाय की वस्तु है और एकस्वर में कही हुई बात है ।

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इस संबंध में स्वर्गीय विद्वान् डॉ० काशीप्रसाद जायसवाल का कथन है कि संभवतः वह चुने गये लोगों की एक स्थायी संस्था होती थी और समिति के अधीन होकर कार्य करती थी ( हिन्दू राजतंत्र १, पृष्ठ २६ ) । यह सभा प्रमुखतया राष्ट्रीय न्यायालय का कार्य करती थी ।

वाजसनेयी संहिता में प्रयुक्त सभाचार ( ३०।६ ) और अथर्ववेद में प्रयुक्त सभासद ( ३।१९।१; ७।१२।२; १८।५५।६ ) शब्द का अभिप्राय उस व्यक्ति से बताया गया है, जो सभा में उपस्थित होकर न्याय करता है । महाभारत ( ४।१।२४ ) में सभास्तार का प्रयोग न्यायाधीश के लिए किया गया है । उसमें एक जगह ( ५।३५।३८ ) यह कहा गया है कि वह सभा, सभा नहीं है, जिसमें प्रौढ़ लोग न हों; और वे प्रौढ, प्रौढ नहीं, जो नियम घोषित न कर सकें । अथर्ववेद ( ६।८८; ५।१० ) में उसको जनता की आवाज और न्याय का एकमात्र निदर्शन करने वाली कहा गया है । ऋग्वेद ( १०।१९१।३ ) में एक विशेष बात इस संबंध में यह भी कही गयी है कि राज्य की अभ्युन्नति के लिये राजा और सभा में भेद होना परमावश्यक है ।

इस प्रकार यद्यपि सभी प्राचीन ग्रंथों के उद्धरणों से यह स्पष्ट है कि समिति तथा 'सभा' के अधिकारों में कुछ अन्तर अवश्य था, किन्तु उसका संवैधानिक ढाँचा लगभग एक ही था ।

आदिम आर्यसंघों का स्वरूप

आदिम आर्य-संघों की संघटन-व्यवस्था की ओर आधुनिक लेखकों का ध्यान तब गया जब वे सर्वथा ध्वस्त हो चुके थे और उनकी जगह वर्ग-शासन-सत्ता एवं नये युद्धों ने ले ली थी; अर्थात् जब गृहयुद्ध, शासनसत्ता, कर, कानून और आचार के आन्तरिक संघटन के बनाने का प्रश्न समाज के सामने उपस्थित हुआ था । इस दृष्टि से वैदिक साहित्य में साम्य-संघ के आंतरिक विधानों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है; उसमें न तो धन की चर्चा है न व्यक्तिगत अधिकारों का विवेचन और न दण्ड के लिये कोई व्यवस्था ही । उसमें संसार, मनुष्य, अग्नि, पशु, धन आदि की उत्पत्ति कैसे हुई, इन्हीं प्रश्नों पर अधिकतर विचार किया गया है । ब्राह्मण-ग्रन्थों में अवश्य ही आचार, सत्ता और व्यवहार के सम्बन्ध में जिज्ञासायें प्रगट की गयी हैं । वैदिक साहित्य की अपेक्षा महाभारत और स्मृतियों में यह बात हमें अधिक स्पष्ट रूप में देखने को मिलती है कि आदिम आर्यसंघों और परवर्ती सामाजिक संगठनों में क्या अन्तर था एवं उनके संचालन का स्वरूप क्या था ।

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प्रागैतिहासिक संघ : इतिहासकारों ने प्रागैतिहासिक मानव-सभ्यता के विकास को उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर प्रस्तर, कांस्य या लौह आदि अनेक अवस्थाओं में विभक्त किया है। प्रागैतिहासिक मानव ने अपनी जीविकोपार्जन के साधन अन्न, वस्त्र, आश्रय-स्थान आदि के लिये प्रकृति से संघर्ष किया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने जितने साधनों का उपयोग किया, जितने व्यक्ति संघटित हुए, उन व्यक्तियों की जो योग्यता, कार्यक्षमता आदि थी वे सब मिलकर उस युग की उत्पादन शक्तियाँ कहलायीं। उत्पादन की ये शक्तियाँ समाज की आवश्यकता और क्रियाशीलता के अनुसार सदा ही बदलती रहती हैं।

सबसे पहले मनुष्य जब संगठनों की ओर प्रवृत्त होकर अपने सामाजिक जीवन का निर्माण करने में अग्रसर हो रहा था, उसका परिचय इतिहासकारों ने एक जांगल मानव के रूप में प्राप्त किया। कंद मूल और फल ही उसका आहार था। उसने पत्थरों के औजार तैयार किये; रगड़ से वह आग भी पैदा कर चुका था; धनुष-बाण का भी वह आविष्कार कर चुका था; वह गाँवों में बसने लग गया था, और टोकरियाँ बुनना तथा अस्त्र-शस्त्र बनाना भी उसने सीख लिया था। मनुष्य की दूसरी उन्नतावस्था बर्बरयुग के नाम से कही गयी है। इस युग में मिट्टी की कला अधिक विकसित हुई। पशु-पालन और पौधे उगाना इस युग की बड़ी विशेषताओं में हैं। मकान बनाने के लिये ईंटों और पत्थरों का प्रयोग भी इस युग में होने लगा था। इस युग में भोजन के लिये मांस तथा दूध पर्याप्त रूप में उपलब्ध था। लेखन-कला का जन्म भी इसी युग में हुआ। सभ्यता के तीसरे युग में पहुँच कर मनुष्य ने सारी जांगल प्रवृत्तियों और बर्बर स्वभाव को छोड़कर श्रम के विभाजन तथा उत्पादन की दिशा में अधिक उन्नति की। इस युग में विनिमय और उत्पादन की नयी शक्तियों ने वर्ग-भेद, शोषण, दासता, विरोध और निजी संपत्ति को जन्म दिया, जिससे पूरे समाज में क्रांति हुई।

ऐतिहासिक संघ : मनुष्य के आर्थिक जीवन के इतिहास का आरम्भ उत्पादन की शक्तियों, वितरण की अवस्थाओं और विनिमय के माध्यमों के जन्म से होता है। आर्ययुगीन प्राग्भारतीय समाज में इन शक्तियों, अवस्थाओं तथा माध्यमों का क्या स्वरूप था, इसका विवरण हमें भारत के प्राचीन साहित्य के अनुशीलन से प्राप्त होता है।

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय समाज की चार अवस्थायें बतायी गयी हैं : कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। हिन्दू समाज के

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इन चारों युगों का संचालक धर्म रहा है। धर्म अर्थात् रहन-सहन का ढंग; शासन सत्ता के नियम, विवाह-संबंध आदि। हिन्दू-साहित्य के प्राचीनतम प्रमाण वेद, धार्मिक प्रवृत्ति से परिचालित उक्त युग-परिवर्त्तन को किस रूप में प्रस्तुत करते हैं, इसका परिचय श्री डांगे के शब्दों में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है "पूरा वेद-साहित्य सिर्फ एक माँग उपस्थित करता है। और उस माँग को पूरा करने के लिए उपायों को खोजता है। वह माँग धन है। इस धन के दो रूप हैं। एक है अन्न और दूसरा है प्रजा ( मनुष्य ) धन या अन्न उस समाज के उत्पादन के साधनों, आर्थिक उत्पादन की क्रियाशीलता का द्योतक है जिसका सीधा संबंध प्रजा से जुड़ा है। इन दो प्रश्नों पर सभी वेद-संहिताओं में बहुत मात्रा में सामग्री मिलती है" ( पृ० ७३ ) ।

अग्नि की उत्पत्ति : आर्ययुगीन मानव के सामने पहिली समस्यायें भोजन, निवास, आग और आत्मरक्षा की थी। कृतयुग में जब कि मनुष्य नितांत ही जंगली अवस्था में था, उसको कई कारणों से, जैसे—भोजन, रोग तथा शत्रुओं के कारण, एक स्थान से दूसरे स्थान में भटकना पड़ा। प्रकृति के विरोध में, आत्मरक्षा के लिए, उसने निरन्तर संघर्ष किया। धीरे-धीरे उसने आग का पता लगाया, जिसका श्रेय महर्षि अंगिरस को है ( ऋग्वेद ५।२।८; १०३२।६; ५।११।६ )। आग का पता लग जाने से तत्कालीन जन-जीवन में महान् क्रांतिकारी परिवर्त्तन हुआ। उसको प्राकृतिक शक्ति के रूप में देखा गया। एक ओर तो उसका उपयोग पशुओं तथा मछलियों के मांस को भूनने में किया गया और दूसरी ओर उसको शत्रुबाधा को दूर करने तथा भूत-प्रेतादि को भगाने वाली महाशक्ति के रूप में भी पूजा जाने लगा ( ऋग्वेद ३।१५।१; ) । धीरे-धीरे मनुष्य ने समझा कि ये पशु, जो दूध देते हैं, जिनका मांस खाकर जीवित रहा जा सकता है; उनकी रोमयुक्त खाल को ओढ़ कर सर्दी दूर की जा सकती है और उनकी हड्डियों तथा उनके सींगों से उपयोगी औजार भी बनाये जा सकते हैं।

अग्नि की सहायता से मनुष्य की उन्नति का एक दूसरा रूप सामने आया। ज्यों ही उसको यह ज्ञात हुआ कि अग्नि के द्वारा कच्चे लोहे को पिघला कर बड़े-बड़े असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं, कि समाज का ढांचा ही बदल गया; किन्तु मनुष्य की यह सूझ बहुत बाद की है। जांगल युग से बर्बर युग में पहुँच कर, अर्थात् कृतयुग के आविष्कारों का विकास कर जब उसने त्रेतायुग में प्रवेश किया तो प्रकृति के सामने उसने अपनी जिन दुर्बलताओं को स्वीकार किया था, उन पर उसने विजय प्राप्त कर ली। उसने अपने

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यायावरीय जीवन को समाप्त कर बस्तियां बसायीं; उसने अनियमित भोजन-व्यवस्था को नियमित बनाया; वस्त्रों के द्वारा उसने अपनी नग्नता को ढका । इस प्रकार की विकासावस्था में पहुँच कर उसने उत्पादन की नई प्रणाली, सामाजिक संघटन के नये ढंग और कला के नवीन स्वरूपों को जन्म दिया ।

यज्ञ की सृष्टि : अग्नि का पता लग जाने के बाद यज्ञ की सृष्टि हुई । यज्ञ, जो कि ब्रह्म के अस्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और जिसके द्वारा भविष्य के लिए आदिम साम्यसंघ के तत्त्वों का निर्माण हुआ । यज्ञ और ब्रह्म के संबंध में श्री डांगे का कथन है कि "आर्यों के साम्यसंघ का नाम ही ब्रह्म है और यज्ञ उस समाज की उत्पादन प्रणाली है । आदिम साम्यसंघ और उत्पादन की सामूहिक प्रणाली का यही रूप था । उत्पादन की इस प्रणाली तथा विराट् ब्रह्म के स्वरूप अथवा साम्यसंघ का ज्ञान वेद है । हिन्दू-परंपरा ने इतिहास को इसी तरह से लेखबद्ध किया है; और आर्य-इतिहास के सबसे प्राचीन युग-आदिम साम्यवाद के युग को समझने के लिए यही एक कुञ्जी है" ( भारत : आदिम साम्यवाद से दासप्रथा तक का इतिहास, पृ० ७८-७९ )।

सत्र यज्ञ में आदिम साम्यसंघ के प्रचुर तत्त्व समाविष्ट हुए मिलते हैं । यह यज्ञ एक सामूहिक आयोजन के रूप में सम्पन्न होता था । इसके आयोजन में भी सामूहिक श्रम होता था और उसका फल-विभाजन भी सामूहिक रूप में हुआ करता था । जब तक कि प्राचीन आर्यसंघों में व्यक्तिगत सम्पत्ति, वर्गभेद और शासनसत्ता का जन्म नहीं हुआ था, उनकी सामूहिक उत्पादन-प्रणाली का नाम यज्ञ था, जिनका ज्ञान वेदों में सुरक्षित है । "इस यज्ञ ने आर्यों के साम्यसंघ को समुन्नत, धनवान् और वैभवशाली बनाकर उसे नष्ट होने से बचा लिया था......जब मानव-समाज प्रगति के पथ पर और आगे बढ़ा और उसने धातुओं को पिघलाना सीखकर हंसिया या खुरपी बनाना सीख लिया था, तब भी आर्यों के धार्मिक विधिकर्म अपने पूर्वजों की भाँति देवताओं को प्रसन्न करने के लिए और उन्हीं की भाँति धन प्राप्त करने के लिए उन पूर्वजों के कार्यों का अनुसरण करते थे—वे उन्हीं छन्दों को गाते थे .....प्राचीन काल में यज्ञ एक यथार्थ था। बाद में वह मिथ्या वस्तु हो गयी थी । समाज के उत्तराधिकारियों ने इस अस्तित्वहीन यज्ञ को अपने उत्तराधिकार में पाया । इन उत्तराधिकारियों में अतीत काल की विचारधारा और उसके व्यवहार के कुछ अवशेष थे । वे उस यज्ञ को विधि रूप में और मंत्रों के छंदों को इस आशामय विश्वास से अपने साथ लिये रहे मानो उसके

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अनुकरण द्वारा धन और आनंद की उपलब्धि हो सकती है” ( डांगे पृ० ६१-९२ ) ।

उत्पत्ति और श्रम का विभाजन : यद्यपि आदिम साम्यसंघ की उत्पादन-शक्तियों में विकास हो रहा था; फिर भी श्रम की मात्रा बढ़ जाने पर भी जीवन में दरिद्रता बढ़ रही थी । सत्र श्रम के द्वारा जो श्रम-विभाजन की व्यवस्था थी भी उसके द्वारा ऐसी आशा नहीं थी कि जीवन में एक ऐसी स्थिति आ सकेगी, जिससे स्थायी रूप से आर्थिक हित का विकास हो सकेगा । यद्यपि इन उत्पादन के आरंभिक साधनों में विकास नहीं हो पाया था; तथापि सारे उत्पादन पर उत्पादकों का ही नियंत्रण था । उत्पादन के इन अविकसित साधनों के कारण आदिम साम्यसंघ ( कम्यून ) में श्रम-विभाजन की रीति का अभाव रहा । इसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी था कि तब तक समाज में न तो वर्ण-भेद की विधायें पैदा हुई थीं और समाज का आकार बहुत छोटा था । पूरे साम्यसंघ का निर्माण विशों ( वस्ती के निवासी ) द्वारा होता था ।

आदिम साम्यसंघ में विभिन्न वर्गों की उत्पत्ति और श्रम-विभाजन की प्रणाली का उदय धीरे-धीरे हुआ । सत्र यज्ञों के युग में हम इतना अन्तर अवश्य पाते हैं कि जहाँ पुरुषों का कार्य शिकार करना, युद्ध करना, पशु-पालन था वहाँ नारी घर का प्रवन्ध करती थीं, भोजन बनाती थीं, पशुओं को पालती थीं और बस्ती की निकटतम भूमि में अन्न उपजाती थीं । किन्तु ये इतने अस्पष्ट प्रमाण हैं कि इनके द्वारा ठीक तरह से श्रम-विभाजन की वास्तविक रूपरेखा नहीं समझी जा सकती है ।

वस्तुतः यज्ञ के अनुयायी आर्यों का प्राचीन समाज एक गण-संघटन था । उस संघटन के सभी सदस्य कुटुम्ब से एवं रक्त से संबंधित थे और उसको स्वयंचलित सशस्त्र संघटन कहा जा सकता है । इस प्रकार के प्राचीनतम दस गण थे, जिनके नाम हैं : यदु, तुर्वश, द्रुह्यु, अणु, पुरु, अंग, वंग, कलिंग, पुंद्र और सुह्म ।

विवाह सम्बन्ध : आर्य-समूहों के संघटन का एक ठोस आधार गोत्र शब्द से प्रकट होता है । हिन्दुओं की विवाह-संबंधी व्यवस्था के लिए सगोत्र-असगोत्र को दृष्टि में रखना आवश्यक होता है । अपनी आदिम अवस्था में आर्य लोग अपने गोत्र के अंतर्गत ही विवाह करते थे; किन्तु बाद में, जब कि वे जनसंख्या में बढ़कर अलग-अलग क्षेत्रों में फैल चुके थे और उनका आर्थिक स्तर तथा

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विचार का धरातल अधिक व्यापक हो गया था, तब सगोत्र विवाह निषिद्ध ठहराये जाने लगे थे, जैसा कि आज भी प्रचलित है ( डाँगे, पृ० १०७ )।

हिन्दुओं की विवाह-व्यवस्था के सम्बन्ध में इतिहासकारों के विचार बहुत ही उलझे हुए रहे हैं। हिन्दुओं में बहु-पतित्व या बहु-पत्नीत्व का आधार पशुओं की यौन-प्रवृत्ति को मानने वाले कुछ पूँजीवादी बुद्धिजीवी विद्वानों का कहना है कि आरंभ में पुरुष-नारी के बीच यौन-सम्बन्ध का आधार प्राकृतिक था; किन्तु इधर नयी खोजों के द्वारा यह स्पष्ट हो गया है कि आरम्भ में भी पुरुष-नारी का यौन-सम्बन्ध समाज द्वारा ही नियन्त्रित होता था; उनके सम्बन्धों की नैतिकता या आचार-विचार का नियंत्रण न तो ईश्वर के हाथ में था और न प्रकृति के हाथों में ही।

व्यावहारिक दृष्टि से और शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाय तो हिन्दुओं में विवाह की जो प्रणाली आज प्रचलित है, अपने प्रकृत रूप में वह ऐसी ही नहीं थी। महाभारत ( आदिपर्व, १२२ ) में लिखा है कि कलियुग के चारों विवाह और परिवार का स्वरूप सर्वथा नया था, जो कि कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक नया सामाजिक प्रयोग था और वह प्राकृतिक नहीं था। महाभारत ( शा० प० २०६, ४२-४४ ) में युगों के अनुसार यौन-सम्बन्धों के चार रूप बताये गये हैं, जिनके नाम हैं : संकल्प, संस्पर्श, मैथुन और द्वंद्व।

डाँगे जी ने अपनी पुस्तक ( पृ० १११ ) में इन चार प्रकार के यौन-सम्बन्धों की व्याख्या करते हुए कहा है "सङ्कल्प यौन-सम्बन्ध वे होते थे जिनमें कोई बंधन नहीं था। यह सम्बन्ध किन्हीं दो व्यक्तियों में हो सकता था, जो इसकी कामना या इच्छा करते थे। इस कामना पर कोई भी समाजिक या व्यक्तिगत रोक नहीं थी। संस्पर्श वह यौन-संबंध था जिसमें अपने अत्यन्त निकट संबंधियों के साथ यौन-संबंध स्थापित करने पर रोक लगा दी गयी थी और एक गोत्र में विवाह करने का निषेध कर दिया गया था। उस समय भिन्न-भिन्न गोत्र आपस में यह संबंध स्थापित करते थे। प्राकृतिक वैवाहिक संबंध की अन्तिम अवस्था मैथुन है। यहां से यूथ-विवाह का अंत हो जाता है। जब तक पति-पत्नी की इच्छा रहती थी, तब तक वे एक कुटुम्ब में बँधे रहते थे और दूसरे नर-नारियों से यौन-संबंध नहीं स्थापित करते थे। द्वन्द्व यौन-संबंध का वह रूप है जो कलियुग में प्रचलित है और जिसके अनुसार एक पति और एक पत्नी का जोड़ा होता है। यौन-संबंध के इस रूप के अनुसार नारी, पुरुष की दासी होती है; और वह ( पुरुष ) व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार और

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एकाधिपत्य की शक्ति लेकर निरन्तर नारी के हितों का विरोधी बना रहता है।”

समान वितरण : जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, वैसे-वैसे उत्पादन की आदिम पद्धतियाँ बदलने लगीं। गण-गोत्र टूटने लगे और पूरे एशिया महाद्वीप में, जहाँ जिसको सुविधा मिली, वहीं लोग बसने लगे। जिन स्थानों पर कोई न था वहाँ बस्तियाँ बसाई जाने लगीं और जहाँ पहिले ही से लोग बस चुके थे, वहाँ अधिकार जमाने के लिए युद्ध होने लगे। अधिकारलिप्सा की भावना ने लूट-मार और युद्धों की वृद्धि कर दी थी। युद्ध में शत्रुओं को जब बंदी बनाया जाता था तो उनमें से कुछ को वीरता, सुन्दरता या कलाविद् आदि होने के कारण गण में शामिल कर दिया जाता था, जो कि पूरी तरह गण के सम्बन्धी तथा सदस्य मान लिये जाते थे; लेकिन जिनको साम्यसंघ की छोटी आर्थिक अवस्था में नहीं खपाया जा सकता था उन्हें, परिश्रम द्वारा अधिक फल की प्राप्ति न होने की संभावना से, मार दिया जाता था। उनको साम्यसंघ का शत्रु समझा जाता था और पुरुषमेध की योजना कर उन्हें अग्नि में बलिदान कर दिया जाता था। बाद में उन्हें मारा नहीं दिया जाता था, बल्कि उनके बदले अग्नि में घी की आहुति देकर उन्हें छोड़ दिया जाता था या दास बना लिया जाता था। विकास की अवस्थाएँ ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती गयीं, श्रम का मूल्य बढ़ने लगा। ऐसी दशा में युद्ध-बंदियों को आर्य लोग अग्नि में झोंक देने या भगा देने की अपेक्षा अपना दास बनाने लगे थे। “व्यक्तिगत संपत्ति और वर्ग समाज के उदय होने के साथ-साथ आर्यों के समाज ने शीघ्र ही देखा कि आचारशास्त्र का एक नियम—जो सामूहिकतावादी व्यवस्था में सबके हितों को साधता हुआ भुखमरी से सबकी रक्षा करने और साम्यसंघ के हर सदस्य के बीच एक समान की वितरण शर्त थी—किस प्रकार से अपने विरोधी रूप में प्रकट हुआ। किस तरह वही नियम उत्पीड़न, एकाधिपत्य, थोड़े से शोषकों के वर्ग के पास संपत्ति के संचय कराने में सहायक हुआ और बहु-संख्यक श्रमिकों, दुर्बलों, रोगियों, वृद्धों, दरिद्रों तथा असंख्य गरीब गृहस्थों, नये कलियुग की संस्कृति में दासों और चाकरों के लिए भुखमरी का कारण बन गया” ( डाँगे, पृ० १४१ ) ।

वर्ण-विभाजन : आर्यजातियों की प्रथम विकासावस्था में उत्पादन, कार्य और श्रम की अनेकता के कारण श्रम का विभाजन शुरू हुआ। इससे साम्य-संघ के सदस्यों के बीच भेद पड़ने लगा, और फलतः वे अलग-अलग कार्यों को अपना कर वर्गों में विभक्त होने लगे। लेकिन विकास की इस पहिली

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स्थिति में व्यक्तिगत संपत्ति की भावना न होने के कारण उन वर्गों में पारस्परिक विरोध या द्वेष उत्पन्न नहीं हुआ था। विकास की दूसरी अवस्था में आर्यों के विभिन्न गणों के बीच संपर्क और संघर्ष होना आरम्भ हुआ; और तभी से अतिरिक्त उत्पादन का विनिमय प्रारम्भ हुआ। इन वर्गों ने अपने को अन्य विरोधी वर्गों में बांट लिया था और आदिम साम्यसंघ सदा के लिए छिन्न-भिन्न होकर उनके बीच गृहयुद्ध या वर्गयुद्ध आरम्भ हो गया।

ऐसी स्थिति में उन्नतिशील साम्यसंघ को बाध्य होकर युद्ध-संचालन और सुरक्षा-संबंधी कार्यों को विशेष रूप से निर्वाचित व्यक्तियों एवं अधिकारियों के हाथ में सौंप देना पड़ा। जिन्होंने युद्ध का संचालन और सुरक्षा के अधिकारों को अपने हाथ में लिया वे क्षत्र हो गए। जिन्होंने ऋतुओं का विचार, बाढ़ तथा नदियों आदि की गति को जानने का कार्य संभाला वे ब्राह्मण कहलाये और बाकी जो लोग बच गये थे उन्हें विश या सामान्य लोग कहा जाने लगा, जिनकी संख्या सबसे अधिक थी। ये लोग पशु-पालन, कृषि, दस्तकारी आदि कार्य करते थे। धीरे-धीरे जब श्रम की सामूहिक स्थिति टूटने लगी तो विनिमय के साधन धन-संपत्ति का सर्वाधिकार क्षत्र ( प्रजापतियों ) तथा ब्राह्मण ( गणपतियों ) के हाथों में संचित होने लगा। इस प्रकार समाज दो प्रमुख वर्गों में बँट गया। एक ओर तो धन-संपत्ति वाले क्षत्र तथा ब्राह्मण थे और दूसरी ओर परिश्रम करने वाले विश तथा अन्य लोग हो गये। सारा समाज अमीरों और गरीबों में बँट गया। ऐसे समाज में दास या शूद्रों के लिए कोई स्थान न था। ये दास या शूद्र आर्य थे, जिन्हें युद्ध में बंदी बनाया जाता था तथा दूसरों के हाथ बेचा जा सकता था। उनका न कोई परिवार था न कोई देवता।

सर्वहारा वर्ग : यज्ञ-फल के उत्पादन का उपयोग पहिले सब लोग समान-रूप से करते थे; किन्तु बाद में अकेले ब्राह्मण ही उनके स्वामी बन गये। क्षत्र सरदारों का भी यही हाल था। केवल विश ही ऐसे थे जो शूद्रों के साथ मिल कर कठोर परिश्रम करके भी दरिद्रता का जीवन बिता रहे थे। श्री डांगे महोदय ने अपनी पुस्तक में वैदिक युग में सर्वथा असमान समाज का स्वरूप और उसके प्रति ऋग्वेद के कवि का विक्षोभ इस प्रकार उद्धृत किया है।

"क्या ईश्वर के हाथों में मनुष्य के लिए अकेला दण्ड भूख है ? अगर देवता की यह इच्छा है कि गरीब लोग भूख से मरें, तो धनी लोग अमर क्यों नहीं हैं ? मूर्ख ( धनी ) के पास भोजन का जमा होना किसी की भलाई नहीं करता। वह सिर्फ अपने-आप ही खाता है, अपने दोस्तों को भोजन नहीं देता है। लोग उसकी बुराई करते हैं" ( ऋग्वेद १०।११७ ) ।

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तत्कालीन समाज के सर्वाहारी वर्ग के प्रति शेष जनता की धारणा कितनी विक्षुब्ध तथा द्वेषयुक्त थी, इसका एक उदाहरण डांगे जी ने उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है कि :—

“हमारे पास अनेक काम, अनेक इच्छाएँ और अनेक संकल्प हैं । बढ़ई की कामना आरे की आवाज सुनने की है । वैद्य, रोगी की कराह सुनने की अभिलाषा रखता है । ब्राह्मण को यजमान की अभिलाषा है । अपनी लकड़ी, पंखा, निहाई और भट्टी को लेकर लुहार किसी धनी की राह देख रहा है । मैं एक गायक हूँ । मेरा बाप वैद्य है । मेरी माँ अन्न कूटती है । जिस तरह से चरवाहे गायों के पीछे दौड़ते हैं, हम लोग उसी तरह से धन के पीछे दौड़ रहे हैं” ( ऋग्वेद ६।११२।१-३ ) ।

इस प्रकार सारा समाज श्रम के अभाव में दुःखी और उपयुक्त जीविका पाने के लिए विकल था । धन-संपत्ति का सारा उत्तराधिकार कुछ ही व्यक्तियों ने हड़प लिया था और शेष सारा वृहत् समाज, सारे शिल्पज्ञ, कलाकार और कारीगर आजीविका के लिये तड़प रहे थे । जन-सामान्य की इस सामूहिक माँग ने तत्कालीन समाज में एक नयी क्रांति को जन्म दिया ।

इस क्रांति का पहिला प्रभाव तो प्राचीन साम्यसंघ की एकता पर पड़ा । उसमें आत्म-विरोध बढ़ते जा रहे थे और शनैः-शनैः उसके टुकड़े-टुकड़े हो रहे थे । प्राचीन यज्ञ-गण-गोत्र के विरोध में उत्पादन के नये सम्बन्ध उग रहे थे । दास प्रथा के आधार पर निर्मित व्यक्तिगत-संपत्ति की व्यवस्था अब समानता और स्वाधीनता के आधार पर निर्मित नयी व्यवस्था के आगे ध्वस्त होने लग गयी थी । आर्य-गण अब गृह-युद्ध से बुरी तरह घिर गये थे ।

वर्ण-व्यवस्था के कारण जिस नयी आर्थिक व्यवस्था का जन्म हुआ था और जो निरन्तर ही विकसित हो रही थी उसने आर्यों की प्राचीन अखण्ड गण-व्यवस्था को पराभूत कर लिया था । अपनी स्थिति को स्थिर बनाये रखने के लिये गणों ने हवन और दान के पुराने नियमों के पालनार्थ आवाज उठायी और प्राचीन प्रथा के अनुसार उत्पादन के उपभोग, वितरण तथा उपयोग का नारा लगाया; किन्तु उनके ये उपदेश अब सफल न हो सके । यद्यपि गणों के बीच धनी और निर्धन दोनों प्रकार के लोग थे, तथापि धनी वर्ग ही लाभान्वित था । ब्रह्म-क्षत्र वर्ण के संपत्तिशाली वर्ग विशों और शूद्रों के श्रम के शोषक बने हुए थे; दासों और पशुओं का एकाधिकार स्वामित्व वे पहिले ही से प्राप्त कर चुके थे । यही कारण थे, जिससे वर्ण-भेद, वर्ग-भेद में बदल गया और आत्मयुद्ध तथा गृह-युद्ध की भावना तेजी से उमड़ पड़ी ।

२ कौ० भू०

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व्यक्तिगत संपत्ति का एक दुष्परिणाम यह भी हुआ कि साम्यसंघ के परिवार और घर तक विच्छिन्न हो गये । पितृसत्ता की प्रबलता ने मातृसत्ता को दबा दिया, जिसके कारण पतियों से पत्नियों का और पुत्रों से माताओं का विरोध उठ खड़ा हुआ और यद्यपि अब भी प्राचीन श्रुति को ही प्रमाणिक माना जाता रहा; किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से सूत्रग्रंथों तथा स्मृतिग्रंथों को ही अपनाया जाने लगा था ( डाँगे, पृ० १८० ) ।

विश लोकतंत्र की अवस्था अब बहुत ही दयनीय हो गई थी । संपत्तिशाली ब्रह्म-क्षत्र परिवारों ने उनको भी चूस डाला था । वे जितना ही गरीब होते जा रहे थे, उतना ही विजित दासों की ओर झुकते जा रहे थे और ब्रह्म-क्षत्र वर्ग से उनके विरोध की खाई उतनी ही चौड़ी होती जा रही थी । मेहनतकश विश वर्ग की इस दुर्दशा ने गाँवों और नगरों के विरोध को जन्म दिया । इस स्थिति से सत्ताधारी ब्रह्म-क्षत्र-वर्ग भयभीत था कि कहीं मेहनतकश शूद्र और गरीब विश मिलकर सारे समाज को उलट न दें । सारी शासनसत्ता को, व्यक्तिगत संपत्ति को तथा पितृसत्ता को नष्टकर प्राचीन समानता की स्थापना न कर दें ।

मेहनतकश श्रमिक जनता के इस विरोध, वैमनस्य एवं क्रांति ने परवर्ती साम्राज्यों जन्म दिया । यद्यपि महाभारत-युद्ध ( ३०००-२००० ई० पू० ) से पहिले हिन्दू दास शासन व्यवस्था की पूर्ण प्रतिष्ठा नहीं हो सकी थी, फिर भी इतना स्पष्ट है कि अर्धं दास और अर्ध सामन्ती राज्यों की वृद्धि ने गणसंघों का उन्मूलन करना आरम्भ कर दिया था । महाभारत-युद्ध के बाद पूर्व की ओर गंगा की वादी में दास-राज्यों का अस्तित्व प्रकाश में आने लग गया था ।

अराजक और वैराज्य-संघ : निश्चित रूप से यह बताना कि भारतीय इतिहास के परवर्ती साम्राज्यों का उदय कब हुआ था, जरा कठिन है । आर्यों की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का संबंध बहुधा अफगानिस्तान, सिंधु नदी के मैदानों, दक्षिणस्थ हिमालय और पंजाब के प्रदेशों से था । यहीं पर आर्य गणों द्वारा वर्ण, संपत्ति, वर्ग और दासता को विकसित किया जाना समीचीन प्रतीत होता है । आदिम साम्य-युग की जिस गण-व्यवस्था के सम्बन्ध में पहिले बताया गया है, परवर्ती समय तक यद्यपि उनमें से बहुत गण ध्वस्त तथा क्षीण हो चुके थे, तथापि उनका अस्तित्व सर्वथा विलुप्त नहीं हुआ था, और इस प्रकार के दीर्घजीवी गणों में अर्याणी, गणार्याणी: जुवार्याणी, दो-रज्जणी, बी-रज्जणी और विरुद्ध रज्जणी आदि का नाम उल्लेखनीय है, जिनका हवाला आचारांग जैनसूत्रों में देखने को मिलता है ।

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( १६ )

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में (पृ० ५६२-५६३) अराजक और वैराज्य नामक दो गणों का उल्लेख किया है। अराजक व्यवस्था से आधुनिक विद्वानों ने अराजकतावाद का अभिप्राय निकाला है; किन्तु इन गणों की वास्तविकता यह थी कि प्राचीन समय के अनुसार अभी भी वे एक साथ मिलकर रहते थे और एक साथ भोजन करते थे। अराजक गणसंघों का जैसा चित्रण हमें अथर्ववेद ( ३।३०।५-६ ) में देखने को मिलता है, ठीक वैसी ही स्थिति उक्त गणों की परवर्ती समय तक भी बनी रही। अर्थशास्त्र के उक्त प्रसंग में बताया गया है कि उनके समाज में अपने पराये की कोई द्विविधा ही पैदा नहीं हुई थी। किन्तु दास राज्यों के शक्तिसंपन्न हो जाने पर अराजक जैसे आदिम साम्य-संघों की परम्परा के गणों का निरन्तर ध्वंस होता जा रहा था।

दूसरे प्रकार के वे गण थे, जिनकी व्यवस्था वैराज्य-पद्धति पर थी। यद्यपि इस प्रकार के गणों ने अपना कोई राज्य तथा राज्यतंत्र का विकास नहीं किया; फिर भी इनमें श्रम-विभाजन, संपत्ति की विषमता और पितृसत्तात्मक दासता का विकास हो चुका था। इन वैराज्यों की लोकतंत्रव्यवस्था लोकसभा द्वारा संचालित होती थी।

अराजक और वैराज्य गणों के अतिरिक्त जानवरों का भी एक समाज था, जिसमें लोकतंत्रवादी व्यवस्था थी; किन्तु यह लोकतंत्र आदिम गण-संघों के लोकतंत्र जैसा नहीं था। उसमें त्रिवणों का ही शासन था; उसमें शूद्र दासों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। इस प्रकार की जानपद व्यवस्था के गणराज्य उत्तरकुरुओं तथा उत्तरमाद्रों के थे, जो उत्तर भारत के हिमालय प्रदेश में रहते थे। ये लोग बड़े शक्तिसंपन्न और अपने चरम उत्कर्ष पर थे।

पश्चिमी भारत में इसी समय गण-संघटन की एक स्वराज्य शासनप्रणाली प्रचलित थी। उसका परिचालन ज्येष्ठों की एक समिति द्वारा होता था, जो पैत्रिक हुआ करती थी और जिसका आयोजन चुनाव द्वारा होता था। यद्यपि स्वराज्य का शाब्दिक अर्थ स्व-शासन प्रणाली होता है; किन्तु इस प्रकार की व्यवस्था उसमें नहीं थी। उसका संचालन ज्येष्ठ द्वारा होता था, जो स्वराट् होता था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि आदिम साम्यसंघ अपनी पुरातन विशेषताओं को छोड़कर अब व्यक्तिगत संपत्ति, वर्ग संकीर्णता, स्वामित्व, दासत्व और धनी-निर्धन के रूप में बदल गया था। उसकी प्राकृतिक लोकतंत्र व्यवस्था का अन्त होने लग गया था। अभिजातकुल अब राजकुलों में परिवर्तित हो गये थे।

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( २० )

"जब गण ने व्यक्तिगत संपत्ति, वर्ण और दासता को विकसित कर लिया, तो वह राज्यम् हो गया और वह निर्वाचित नेतृत्व जो 'शासन करने' के लिए चुना जाता था, राजन् हो गया ।" ( डाँगे, पृ० १६१ ) ।

वार्ताशस्त्रोपजीवी संघ : कौटिल्य ने ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६६ ) प्राचीन गण-संघों में शस्त्रोपजीवी या आयुधजीवी और राजशब्दोपजीवी का उल्लेख किया है। इन संघों उल्लेख कौटिल्य से पूर्व वैयाकरण पाणिनि भी कर चुके थे, किन्तु उनकी समुचित व्याख्या न तो पाणिनि का भाष्य-लेखक ही कर सका और न आधुनिक विद्वानों ने ही की। यहाँ तक डा० जायसवाल जैसे प्रकाण्ड अर्थशास्त्रविद् विद्वान् ने भी उक्त संघों के संबंध में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा। इन गणों का परिचय और उनकी पारस्परिक भिन्नता का स्पष्ट विवेचन डांगे जी ने किया है। उन्हीं के शब्दों में इस प्रसंग को यहाँ उद्धृत किया जाता है :

"आयुधजीवी और शस्त्रोपजीवी संघों का अर्थ उन गणों से है, जो अब भी अपनी उस प्राचीन विशेषता को लिये हुए थे जिसके अनुसार उस गण के सभी सदस्य सशस्त्र होते थे। लेकिन सामाजिक संगठन की इसी एक विशेषता का उल्लेख क्यों किया गया ? यह इसलिये कि उस समय तक गणसदस्यों ने किसी ऐसे वर्ग-शासन और स्थायी वर्ग-विभाजन को विकसित नहीं किया था जिसमें केवल शासकवर्ग के हाथों में, अथवा निःशस्त्र श्रमिक जनता के विरुद्ध सेना के हाथों में शस्त्र की शक्ति केन्द्रित होती थी और उसके द्वारा निःशस्त्र जनता शासित होती थी। इस विशेषता का उल्लेख इसलिए किया गया है कि उस समय तक गण का निर्वाचित नेतृत्व एक सशस्त्र पैतृक अभिजात वर्ग में परिणत नहीं हो गया था। राजतांत्रिक वर्ग शासन-सत्ता के लेखक, गण की इस विशेषता की ओर स्वभावतया आकर्षित हुए थे। यह सैनिक लोकतंत्र था। फिर भी उस आदिम साम्यसंघ से इसका रूप भिन्न था, जिसमें किसी भी वर्ग की सत्ता नहीं थी। इस गण में संपत्ति-भेद प्रवेश कर चुका था। कृषि (वार्त्ता) व्यापार, मुद्रा, धन तथा पितृसत्तात्मक दासता का उदय भी उन गणों में होने लगा था। लेकिन वर्गों के आत्म-विरोध इतने तीव्र नहीं हो उठे थे कि निर्धन श्रमशील आर्य विशों का नाश करने की अथवा उनको निःशस्त्र करने की आवश्यकता आ जाती। गण के अन्दर सब लोग श्रम करते थे और शूद्र दासों को छोड़कर सब लोग शस्त्र धारण करते थे। उस सशस्त्र श्रमिक गण में नेतृत्व के पद पर संपत्तिशालियों को चुना जाता था। इस प्रकार के वार्त्ता-शस्त्रोपजीवी अथवा आयुधजीवी संघों का अस्तित्व भारत में हम ३०० वर्ष ईसा पूर्व तक पाते हैं। उन संघों में से कुछ के नाम इस प्रकार हैं :

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( २१ )

"१ वृक, २ दामानि, ३ 'तथा अन्य', ( ३-८ ) छह त्रिगर्तों का मण्डल ( इस मंडल के छह सदस्य कौण्डोपरथ, दाण्डकी, कौष्टकी, जलमानि, ब्राह्म गुप्त और जानकि होते थे ), ९ यौधेय तथा अन्य, १० पार्श्व तथा अन्य, ११ क्षुद्रक, १२ मालव, १३ कठ, १४ सौभूति, १५ शिबि, १६ पारल, १७ भागल १८ कंबोज, १९ सुराष्ट्र, २० क्षत्रिय, २१ श्रेणी, २२ ब्रह्माणक, २३ अंबष्ठ" ( डांगे पृ० १९३ )

इनमें से अधिकांश गणों का निवासस्थान बाहीक प्रदेश था। यह वाहीक प्रदेश सिन्धु नदी की घाटी में पंजाब से लेकर सिन्ध के दक्षिण तक फैला हुआ था। जिन छह त्रिगर्तों का ऊपर उल्लेख किया गया है, वे जम्मू के निकट हिमालय के पर्वतीय जिलों में रहते थे। इन गण-संघों में सैनिक लोकतंत्र का प्रभुत्व था और उनमें इतना दृढ़ संगठन था कि सिंधु नदी के तट पर सिकन्दर की शक्तिशाली सेना को उनसे हार माननी पड़ी थी।

राजशब्दोपजीवी संघ : प्राचीन गणतंत्रों के प्रसंग में कौटिल्य ने राज-शब्दोपजीवी नामक एक दूसरी श्रेणी के गणों का उल्लेख किया है। ( अर्थ-शास्त्र, पृ० ६६९ ) । श्रेणी के गणों में लिच्छवी, मल्ल, शाक्य, मौर्य, कुकुर, माद्र, अंधक-वृष्णी, कुरु और पांचाल आदि को रखा जा सकता है। इन गणों में संपत्ति-भेद, गण-युद्ध और लोकतंत्र की शिथिलता के कारण उनकी शासन-व्यवस्था इतनी दुर्बल हो चुकी थी कि उनमें नेतृत्व का आधार पैतृक-परंपरा मात्र रह गया था। उनके निर्वाचित व्यक्तियों की सभाएँ राजन् कहलाती थीं। अकेले लिच्छवियों के ७,७०७ राजन् थे । ये लोग शासन-सत्ता को चलाने के लिए कार्यकारिणी सभाओं, अफसरों तथा नायकों का निर्वाचन करते थे। इसी लिए कौटिल्य के इन गण-संघों को, उनकी कार्य-व्यवस्था के अनुरूप राजशब्दोपजीवी संघ कहा है।

दण्डप्रधान दास-व्यवस्था की विजय और विश लोकतंत्रों के दमन के बाद समाज में भयंकर शोषण और आर्थिक विकास का आरंभ हुआ। विस्तृत भूमि-खंडों को कृषियोग्य बनाया गया और इतिहास में पहली बार प्रादेशिक राज्य का अस्तित्व प्रकाश में आने लगा। इस प्रकार की वर्ग-विशिष्ट राजतंत्रवादी राज्य-व्यवस्था ने पशुधन तथा स्वतंत्र प्रजा का बहिष्कार कर दिया और शांति के उद्देश्यों पर आधारित गण के साम्यसंघ को समाप्त कर दिया। यहीं से राज्य-व्यवस्था और दण्ड-व्यवस्था का आरंभ हुआ।

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हिन्दु प्रजातन्त्रों की स्थापना

वैदिक युग के बाद का लोक-जीवन अपने-अपने वर्ग का स्वतंत्र शासन करने की ओर तीव्र गति से प्रवृत्त हो रहा था। वैदिक युग में प्रचलित राज-शासन की जगह बाद में प्रजातंत्र ने ले ली थी। मेगस्थनीज ने (मेगस्थनीज, पृ० ३८,४०) परंपरागत, दंत-कथाओं के आधार पर यही बताया है कि वैदिक काल के उत्तरवर्ती समाज ने राजा के द्वारा शासन की प्रथा का अंत कर दिया था और भारत के विभिन्न भागों में प्रजातंत्र शासन की प्रतिष्ठा होने लग गयी थी।

प्राचीन भारत में प्रजातंत्र शासन-प्रणाली के परिचायक गणतंत्रों और संघराज्यों के संबंध में हमें बौद्धों के धर्मग्रन्थों में प्रचुर सामग्री देखने को मिलती है। भिक्षुओं की गणना के संबंध में महावग्ग (डेविड्स तथा ओल्डेन-वर्ग का अनुवाद, खंड १३, पृ० २६९) में कहा गया है कि सब भिक्षुओं को एक जगह एकत्र करके उनकी गणना या तो गण की रीति पर की जाती थी या गोटी के द्वारा मत एकत्र किये जाते थे और मताधिकार के लिए शला-काएँ ली जाती थीं। महावग्ग में एक शब्द गणपूरक (खंड १३, पृ० ८०७) आया है, जिसका अर्थ है गण की पूर्ति करने वाला। संभवतः गणपूरक एक प्रधान अधिकारी होता था। डा० जायसवाल ने इसी आधार पर गण शब्द का अर्थ पार्लियामेंट या सिनेट दिया है और यह माना है कि उन्हीं के द्वारा तब प्रजातंत्र राज्यों का शासन होता था (हिन्दू-राजतंत्र, १, पृ० ३०)।

गण शब्द के अतिरिक्त संघ शब्द का भी प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख हुआ है। वैयाकरण पाणिनि ने संघ शब्द को गण के अर्थ में प्रयुक्त किया है (अष्टा-ध्यायी ३।३।८६)। आरंभ में संघ से प्रजातंत्र का ही बोध होता था, इसका प्रभाव हमें मज्झिमनिकाय (१।४।५।३५) में भी देखने को मिलता है। पाणिनि ने क्षुद्रक, मालव (अष्टाध्यायी ४।२।२५), त्रिगर्त (५।३।११६) आंध्र, वृष्णि (५।३।११४) आदि प्रजातंत्र के संघटनों का उल्लेख किया है। वे संघ दो प्रकार के थे। एक तो गण और दूसरा निकाय। गण एक राज-नीतिक सभा या पंचायत थी। यद्यपि सभी वर्गों के लोग इसके सदस्य हो सकते थे, तथापि शासन करने वाला मंत्रिमण्डल केवल क्षत्रियों का ही होता था। इसका कार्यसंचालन बहुमत से होता था। निकाय एक अराजनीतिक समुदाय होता था, जिसमें वंशगत भेदभाव का अभाव होता था। उसका कार्य भी बहुमत पर था। निष्कर्ष यह है कि उस समय गण और संघ प्रजातंत्र ही थे। भाष्यकार पतंजलि ने उक्त दोनों शब्दों की बारीकी के संबंध में प्रकाश डालते हुए लिखा है कि गण शब्द तो शासन-प्रणाली का पर्यायवाची था और