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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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( २० )

"जब गण ने व्यक्तिगत संपत्ति, वर्ण और दासता को विकसित कर लिया, तो वह राज्यम् हो गया और वह निर्वाचित नेतृत्व जो 'शासन करने' के लिए चुना जाता था, राजन् हो गया ।" ( डाँगे, पृ० १६१ ) ।

वार्ताशस्त्रोपजीवी संघ : कौटिल्य ने ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६६ ) प्राचीन गण-संघों में शस्त्रोपजीवी या आयुधजीवी और राजशब्दोपजीवी का उल्लेख किया है। इन संघों उल्लेख कौटिल्य से पूर्व वैयाकरण पाणिनि भी कर चुके थे, किन्तु उनकी समुचित व्याख्या न तो पाणिनि का भाष्य-लेखक ही कर सका और न आधुनिक विद्वानों ने ही की। यहाँ तक डा० जायसवाल जैसे प्रकाण्ड अर्थशास्त्रविद् विद्वान् ने भी उक्त संघों के संबंध में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा। इन गणों का परिचय और उनकी पारस्परिक भिन्नता का स्पष्ट विवेचन डांगे जी ने किया है। उन्हीं के शब्दों में इस प्रसंग को यहाँ उद्धृत किया जाता है :

"आयुधजीवी और शस्त्रोपजीवी संघों का अर्थ उन गणों से है, जो अब भी अपनी उस प्राचीन विशेषता को लिये हुए थे जिसके अनुसार उस गण के सभी सदस्य सशस्त्र होते थे। लेकिन सामाजिक संगठन की इसी एक विशेषता का उल्लेख क्यों किया गया ? यह इसलिये कि उस समय तक गणसदस्यों ने किसी ऐसे वर्ग-शासन और स्थायी वर्ग-विभाजन को विकसित नहीं किया था जिसमें केवल शासकवर्ग के हाथों में, अथवा निःशस्त्र श्रमिक जनता के विरुद्ध सेना के हाथों में शस्त्र की शक्ति केन्द्रित होती थी और उसके द्वारा निःशस्त्र जनता शासित होती थी। इस विशेषता का उल्लेख इसलिए किया गया है कि उस समय तक गण का निर्वाचित नेतृत्व एक सशस्त्र पैतृक अभिजात वर्ग में परिणत नहीं हो गया था। राजतांत्रिक वर्ग शासन-सत्ता के लेखक, गण की इस विशेषता की ओर स्वभावतया आकर्षित हुए थे। यह सैनिक लोकतंत्र था। फिर भी उस आदिम साम्यसंघ से इसका रूप भिन्न था, जिसमें किसी भी वर्ग की सत्ता नहीं थी। इस गण में संपत्ति-भेद प्रवेश कर चुका था। कृषि (वार्त्ता) व्यापार, मुद्रा, धन तथा पितृसत्तात्मक दासता का उदय भी उन गणों में होने लगा था। लेकिन वर्गों के आत्म-विरोध इतने तीव्र नहीं हो उठे थे कि निर्धन श्रमशील आर्य विशों का नाश करने की अथवा उनको निःशस्त्र करने की आवश्यकता आ जाती। गण के अन्दर सब लोग श्रम करते थे और शूद्र दासों को छोड़कर सब लोग शस्त्र धारण करते थे। उस सशस्त्र श्रमिक गण में नेतृत्व के पद पर संपत्तिशालियों को चुना जाता था। इस प्रकार के वार्त्ता-शस्त्रोपजीवी अथवा आयुधजीवी संघों का अस्तित्व भारत में हम ३०० वर्ष ईसा पूर्व तक पाते हैं। उन संघों में से कुछ के नाम इस प्रकार हैं :