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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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स्थिति में व्यक्तिगत संपत्ति की भावना न होने के कारण उन वर्गों में पारस्परिक विरोध या द्वेष उत्पन्न नहीं हुआ था। विकास की दूसरी अवस्था में आर्यों के विभिन्न गणों के बीच संपर्क और संघर्ष होना आरम्भ हुआ; और तभी से अतिरिक्त उत्पादन का विनिमय प्रारम्भ हुआ। इन वर्गों ने अपने को अन्य विरोधी वर्गों में बांट लिया था और आदिम साम्यसंघ सदा के लिए छिन्न-भिन्न होकर उनके बीच गृहयुद्ध या वर्गयुद्ध आरम्भ हो गया।

ऐसी स्थिति में उन्नतिशील साम्यसंघ को बाध्य होकर युद्ध-संचालन और सुरक्षा-संबंधी कार्यों को विशेष रूप से निर्वाचित व्यक्तियों एवं अधिकारियों के हाथ में सौंप देना पड़ा। जिन्होंने युद्ध का संचालन और सुरक्षा के अधिकारों को अपने हाथ में लिया वे क्षत्र हो गए। जिन्होंने ऋतुओं का विचार, बाढ़ तथा नदियों आदि की गति को जानने का कार्य संभाला वे ब्राह्मण कहलाये और बाकी जो लोग बच गये थे उन्हें विश या सामान्य लोग कहा जाने लगा, जिनकी संख्या सबसे अधिक थी। ये लोग पशु-पालन, कृषि, दस्तकारी आदि कार्य करते थे। धीरे-धीरे जब श्रम की सामूहिक स्थिति टूटने लगी तो विनिमय के साधन धन-संपत्ति का सर्वाधिकार क्षत्र ( प्रजापतियों ) तथा ब्राह्मण ( गणपतियों ) के हाथों में संचित होने लगा। इस प्रकार समाज दो प्रमुख वर्गों में बँट गया। एक ओर तो धन-संपत्ति वाले क्षत्र तथा ब्राह्मण थे और दूसरी ओर परिश्रम करने वाले विश तथा अन्य लोग हो गये। सारा समाज अमीरों और गरीबों में बँट गया। ऐसे समाज में दास या शूद्रों के लिए कोई स्थान न था। ये दास या शूद्र आर्य थे, जिन्हें युद्ध में बंदी बनाया जाता था तथा दूसरों के हाथ बेचा जा सकता था। उनका न कोई परिवार था न कोई देवता।

सर्वहारा वर्ग : यज्ञ-फल के उत्पादन का उपयोग पहिले सब लोग समान-रूप से करते थे; किन्तु बाद में अकेले ब्राह्मण ही उनके स्वामी बन गये। क्षत्र सरदारों का भी यही हाल था। केवल विश ही ऐसे थे जो शूद्रों के साथ मिल कर कठोर परिश्रम करके भी दरिद्रता का जीवन बिता रहे थे। श्री डांगे महोदय ने अपनी पुस्तक में वैदिक युग में सर्वथा असमान समाज का स्वरूप और उसके प्रति ऋग्वेद के कवि का विक्षोभ इस प्रकार उद्धृत किया है।

"क्या ईश्वर के हाथों में मनुष्य के लिए अकेला दण्ड भूख है ? अगर देवता की यह इच्छा है कि गरीब लोग भूख से मरें, तो धनी लोग अमर क्यों नहीं हैं ? मूर्ख ( धनी ) के पास भोजन का जमा होना किसी की भलाई नहीं करता। वह सिर्फ अपने-आप ही खाता है, अपने दोस्तों को भोजन नहीं देता है। लोग उसकी बुराई करते हैं" ( ऋग्वेद १०।११७ ) ।