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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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एकाधिपत्य की शक्ति लेकर निरन्तर नारी के हितों का विरोधी बना रहता है।”

समान वितरण : जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, वैसे-वैसे उत्पादन की आदिम पद्धतियाँ बदलने लगीं। गण-गोत्र टूटने लगे और पूरे एशिया महाद्वीप में, जहाँ जिसको सुविधा मिली, वहीं लोग बसने लगे। जिन स्थानों पर कोई न था वहाँ बस्तियाँ बसाई जाने लगीं और जहाँ पहिले ही से लोग बस चुके थे, वहाँ अधिकार जमाने के लिए युद्ध होने लगे। अधिकारलिप्सा की भावना ने लूट-मार और युद्धों की वृद्धि कर दी थी। युद्ध में शत्रुओं को जब बंदी बनाया जाता था तो उनमें से कुछ को वीरता, सुन्दरता या कलाविद् आदि होने के कारण गण में शामिल कर दिया जाता था, जो कि पूरी तरह गण के सम्बन्धी तथा सदस्य मान लिये जाते थे; लेकिन जिनको साम्यसंघ की छोटी आर्थिक अवस्था में नहीं खपाया जा सकता था उन्हें, परिश्रम द्वारा अधिक फल की प्राप्ति न होने की संभावना से, मार दिया जाता था। उनको साम्यसंघ का शत्रु समझा जाता था और पुरुषमेध की योजना कर उन्हें अग्नि में बलिदान कर दिया जाता था। बाद में उन्हें मारा नहीं दिया जाता था, बल्कि उनके बदले अग्नि में घी की आहुति देकर उन्हें छोड़ दिया जाता था या दास बना लिया जाता था। विकास की अवस्थाएँ ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती गयीं, श्रम का मूल्य बढ़ने लगा। ऐसी दशा में युद्ध-बंदियों को आर्य लोग अग्नि में झोंक देने या भगा देने की अपेक्षा अपना दास बनाने लगे थे। “व्यक्तिगत संपत्ति और वर्ग समाज के उदय होने के साथ-साथ आर्यों के समाज ने शीघ्र ही देखा कि आचारशास्त्र का एक नियम—जो सामूहिकतावादी व्यवस्था में सबके हितों को साधता हुआ भुखमरी से सबकी रक्षा करने और साम्यसंघ के हर सदस्य के बीच एक समान की वितरण शर्त थी—किस प्रकार से अपने विरोधी रूप में प्रकट हुआ। किस तरह वही नियम उत्पीड़न, एकाधिपत्य, थोड़े से शोषकों के वर्ग के पास संपत्ति के संचय कराने में सहायक हुआ और बहु-संख्यक श्रमिकों, दुर्बलों, रोगियों, वृद्धों, दरिद्रों तथा असंख्य गरीब गृहस्थों, नये कलियुग की संस्कृति में दासों और चाकरों के लिए भुखमरी का कारण बन गया” ( डाँगे, पृ० १४१ ) ।

वर्ण-विभाजन : आर्यजातियों की प्रथम विकासावस्था में उत्पादन, कार्य और श्रम की अनेकता के कारण श्रम का विभाजन शुरू हुआ। इससे साम्य-संघ के सदस्यों के बीच भेद पड़ने लगा, और फलतः वे अलग-अलग कार्यों को अपना कर वर्गों में विभक्त होने लगे। लेकिन विकास की इस पहिली