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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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कौटिल्य के अर्थशास्त्र में (पृ० ५६२-५६३) अराजक और वैराज्य नामक दो गणों का उल्लेख किया है। अराजक व्यवस्था से आधुनिक विद्वानों ने अराजकतावाद का अभिप्राय निकाला है; किन्तु इन गणों की वास्तविकता यह थी कि प्राचीन समय के अनुसार अभी भी वे एक साथ मिलकर रहते थे और एक साथ भोजन करते थे। अराजक गणसंघों का जैसा चित्रण हमें अथर्ववेद ( ३।३०।५-६ ) में देखने को मिलता है, ठीक वैसी ही स्थिति उक्त गणों की परवर्ती समय तक भी बनी रही। अर्थशास्त्र के उक्त प्रसंग में बताया गया है कि उनके समाज में अपने पराये की कोई द्विविधा ही पैदा नहीं हुई थी। किन्तु दास राज्यों के शक्तिसंपन्न हो जाने पर अराजक जैसे आदिम साम्य-संघों की परम्परा के गणों का निरन्तर ध्वंस होता जा रहा था।

दूसरे प्रकार के वे गण थे, जिनकी व्यवस्था वैराज्य-पद्धति पर थी। यद्यपि इस प्रकार के गणों ने अपना कोई राज्य तथा राज्यतंत्र का विकास नहीं किया; फिर भी इनमें श्रम-विभाजन, संपत्ति की विषमता और पितृसत्तात्मक दासता का विकास हो चुका था। इन वैराज्यों की लोकतंत्रव्यवस्था लोकसभा द्वारा संचालित होती थी।

अराजक और वैराज्य गणों के अतिरिक्त जानवरों का भी एक समाज था, जिसमें लोकतंत्रवादी व्यवस्था थी; किन्तु यह लोकतंत्र आदिम गण-संघों के लोकतंत्र जैसा नहीं था। उसमें त्रिवणों का ही शासन था; उसमें शूद्र दासों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। इस प्रकार की जानपद व्यवस्था के गणराज्य उत्तरकुरुओं तथा उत्तरमाद्रों के थे, जो उत्तर भारत के हिमालय प्रदेश में रहते थे। ये लोग बड़े शक्तिसंपन्न और अपने चरम उत्कर्ष पर थे।

पश्चिमी भारत में इसी समय गण-संघटन की एक स्वराज्य शासनप्रणाली प्रचलित थी। उसका परिचालन ज्येष्ठों की एक समिति द्वारा होता था, जो पैत्रिक हुआ करती थी और जिसका आयोजन चुनाव द्वारा होता था। यद्यपि स्वराज्य का शाब्दिक अर्थ स्व-शासन प्रणाली होता है; किन्तु इस प्रकार की व्यवस्था उसमें नहीं थी। उसका संचालन ज्येष्ठ द्वारा होता था, जो स्वराट् होता था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि आदिम साम्यसंघ अपनी पुरातन विशेषताओं को छोड़कर अब व्यक्तिगत संपत्ति, वर्ग संकीर्णता, स्वामित्व, दासत्व और धनी-निर्धन के रूप में बदल गया था। उसकी प्राकृतिक लोकतंत्र व्यवस्था का अन्त होने लग गया था। अभिजातकुल अब राजकुलों में परिवर्तित हो गये थे।