कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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हिन्दु प्रजातन्त्रों की स्थापना
वैदिक युग के बाद का लोक-जीवन अपने-अपने वर्ग का स्वतंत्र शासन करने की ओर तीव्र गति से प्रवृत्त हो रहा था। वैदिक युग में प्रचलित राज-शासन की जगह बाद में प्रजातंत्र ने ले ली थी। मेगस्थनीज ने (मेगस्थनीज, पृ० ३८,४०) परंपरागत, दंत-कथाओं के आधार पर यही बताया है कि वैदिक काल के उत्तरवर्ती समाज ने राजा के द्वारा शासन की प्रथा का अंत कर दिया था और भारत के विभिन्न भागों में प्रजातंत्र शासन की प्रतिष्ठा होने लग गयी थी।
प्राचीन भारत में प्रजातंत्र शासन-प्रणाली के परिचायक गणतंत्रों और संघराज्यों के संबंध में हमें बौद्धों के धर्मग्रन्थों में प्रचुर सामग्री देखने को मिलती है। भिक्षुओं की गणना के संबंध में महावग्ग (डेविड्स तथा ओल्डेन-वर्ग का अनुवाद, खंड १३, पृ० २६९) में कहा गया है कि सब भिक्षुओं को एक जगह एकत्र करके उनकी गणना या तो गण की रीति पर की जाती थी या गोटी के द्वारा मत एकत्र किये जाते थे और मताधिकार के लिए शला-काएँ ली जाती थीं। महावग्ग में एक शब्द गणपूरक (खंड १३, पृ० ८०७) आया है, जिसका अर्थ है गण की पूर्ति करने वाला। संभवतः गणपूरक एक प्रधान अधिकारी होता था। डा० जायसवाल ने इसी आधार पर गण शब्द का अर्थ पार्लियामेंट या सिनेट दिया है और यह माना है कि उन्हीं के द्वारा तब प्रजातंत्र राज्यों का शासन होता था (हिन्दू-राजतंत्र, १, पृ० ३०)।
गण शब्द के अतिरिक्त संघ शब्द का भी प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख हुआ है। वैयाकरण पाणिनि ने संघ शब्द को गण के अर्थ में प्रयुक्त किया है (अष्टा-ध्यायी ३।३।८६)। आरंभ में संघ से प्रजातंत्र का ही बोध होता था, इसका प्रभाव हमें मज्झिमनिकाय (१।४।५।३५) में भी देखने को मिलता है। पाणिनि ने क्षुद्रक, मालव (अष्टाध्यायी ४।२।२५), त्रिगर्त (५।३।११६) आंध्र, वृष्णि (५।३।११४) आदि प्रजातंत्र के संघटनों का उल्लेख किया है। वे संघ दो प्रकार के थे। एक तो गण और दूसरा निकाय। गण एक राज-नीतिक सभा या पंचायत थी। यद्यपि सभी वर्गों के लोग इसके सदस्य हो सकते थे, तथापि शासन करने वाला मंत्रिमण्डल केवल क्षत्रियों का ही होता था। इसका कार्यसंचालन बहुमत से होता था। निकाय एक अराजनीतिक समुदाय होता था, जिसमें वंशगत भेदभाव का अभाव होता था। उसका कार्य भी बहुमत पर था। निष्कर्ष यह है कि उस समय गण और संघ प्रजातंत्र ही थे। भाष्यकार पतंजलि ने उक्त दोनों शब्दों की बारीकी के संबंध में प्रकाश डालते हुए लिखा है कि गण शब्द तो शासन-प्रणाली का पर्यायवाची था और