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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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यायावरीय जीवन को समाप्त कर बस्तियां बसायीं; उसने अनियमित भोजन-व्यवस्था को नियमित बनाया; वस्त्रों के द्वारा उसने अपनी नग्नता को ढका । इस प्रकार की विकासावस्था में पहुँच कर उसने उत्पादन की नई प्रणाली, सामाजिक संघटन के नये ढंग और कला के नवीन स्वरूपों को जन्म दिया ।

यज्ञ की सृष्टि : अग्नि का पता लग जाने के बाद यज्ञ की सृष्टि हुई । यज्ञ, जो कि ब्रह्म के अस्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और जिसके द्वारा भविष्य के लिए आदिम साम्यसंघ के तत्त्वों का निर्माण हुआ । यज्ञ और ब्रह्म के संबंध में श्री डांगे का कथन है कि "आर्यों के साम्यसंघ का नाम ही ब्रह्म है और यज्ञ उस समाज की उत्पादन प्रणाली है । आदिम साम्यसंघ और उत्पादन की सामूहिक प्रणाली का यही रूप था । उत्पादन की इस प्रणाली तथा विराट् ब्रह्म के स्वरूप अथवा साम्यसंघ का ज्ञान वेद है । हिन्दू-परंपरा ने इतिहास को इसी तरह से लेखबद्ध किया है; और आर्य-इतिहास के सबसे प्राचीन युग-आदिम साम्यवाद के युग को समझने के लिए यही एक कुञ्जी है" ( भारत : आदिम साम्यवाद से दासप्रथा तक का इतिहास, पृ० ७८-७९ )।

सत्र यज्ञ में आदिम साम्यसंघ के प्रचुर तत्त्व समाविष्ट हुए मिलते हैं । यह यज्ञ एक सामूहिक आयोजन के रूप में सम्पन्न होता था । इसके आयोजन में भी सामूहिक श्रम होता था और उसका फल-विभाजन भी सामूहिक रूप में हुआ करता था । जब तक कि प्राचीन आर्यसंघों में व्यक्तिगत सम्पत्ति, वर्गभेद और शासनसत्ता का जन्म नहीं हुआ था, उनकी सामूहिक उत्पादन-प्रणाली का नाम यज्ञ था, जिनका ज्ञान वेदों में सुरक्षित है । "इस यज्ञ ने आर्यों के साम्यसंघ को समुन्नत, धनवान् और वैभवशाली बनाकर उसे नष्ट होने से बचा लिया था......जब मानव-समाज प्रगति के पथ पर और आगे बढ़ा और उसने धातुओं को पिघलाना सीखकर हंसिया या खुरपी बनाना सीख लिया था, तब भी आर्यों के धार्मिक विधिकर्म अपने पूर्वजों की भाँति देवताओं को प्रसन्न करने के लिए और उन्हीं की भाँति धन प्राप्त करने के लिए उन पूर्वजों के कार्यों का अनुसरण करते थे—वे उन्हीं छन्दों को गाते थे .....प्राचीन काल में यज्ञ एक यथार्थ था। बाद में वह मिथ्या वस्तु हो गयी थी । समाज के उत्तराधिकारियों ने इस अस्तित्वहीन यज्ञ को अपने उत्तराधिकार में पाया । इन उत्तराधिकारियों में अतीत काल की विचारधारा और उसके व्यवहार के कुछ अवशेष थे । वे उस यज्ञ को विधि रूप में और मंत्रों के छंदों को इस आशामय विश्वास से अपने साथ लिये रहे मानो उसके